श्रवण बाधित से क्या आशय है ? इनकी विशेषताओं
का वर्णन कीजि श्रवण बाधित का अर्थ
( Meaning of Hearing
Handicapped ) श्रवण
बाधित बालक ऐसे
बालक हैं जिनकी
सुनने की क्षमता
नष्ट हो जाती
है बोलने और
भाषा में परेशानी का
सामना करते हैं
। ऐसे बालकों
को किसी अन्य
व्यक्ति भाषा सुनने तथा
समझने में परेशानी होती
है क्योंकि ये
सुनने की क्षमता
खो चुके होते
है सभी बालकों
के श्रवण बाधिता
की क्षमता समान
नहीं होती है
। जो वालक
सुनने की को
पूर्ण रूप से
खो देते हैं
वे अन्य बालकों
की अपेक्षा गम्भीर
रूप से कठिनाइयों का
सामना करते हैं
। इस प्रकार
श्रवण बाधित बालक
या तो बहुत
कम सुन पाते
हैं या पूर्णतया नहीं
पाते , वे बहरे
होते हैं ।
कम सुनने वाले
वालक वे हैं
जो श्रवण क्षमता
को कुछ सीमा
तक खो देते
हैं । बालक
जोर से की
गई ध्वनि अथवा
वोली गई आवाज
को सुन सकते
हैं । इस
प्रकार के आवाज
को सुनने के
लिये उन्हें श्रवण
यन्त्र की आवश्यकता नहीं
होती है ।
श्रवण यन्त्र क
इन्हें उपलब्ध हो
तो आवाज को
और अच्छी प्रकार
से सुन सकेंगे
। ऐसे बालकों
को सामन स्कूलों में
तथा सामान्य बालकों
के साथ शिक्षा
देने में कठिनाई
नहीं आती ।
ऐसे अधि बालक
सामान्य शिक्षा कक्ष में
शिक्षा प्राप्त कर
रहे हैं ।
गम्भीर श्रवण बाधित
वे वालक जो
जोर - जोर से
बोली गई आवाज
को भी सुनने
में असमर्थ हैं
। ऐसे बालकों
को विशिष्ट प्रविधियों द्वारा
प्रारम्भिक निपुणता की आवश्यकता होती
है तथा इसके
पश्चात् बालको क , सामान्य स्कूल
में शिक्षा के
लिए प्रवेश कराया
जा सकता है
।
श्रवण
यन्त्र उन्हें सुनने
तथा कार्य करने
में सहायक होता
है । श्रवण
बाधित अथवा श्रवण
दोषयुक्त वालक को श्रवण
प्रशिक्षण तथा श्रवण यन्त्र
को विशेष रूप
से आवश्यकता होती
है । शिक्षण
परिस्थितियों में उसे सुनने
की अपेक्षा , वस्तुओं को
दिखाकर शिक्षा दी
जानी चाहिए ऐसे
बालकों की कुछ
विशिष्ट आवश्यकताओं की विशेषज्ञों जैसे ऑडियोलोजिस्ट तथा
नाक , कान गले
के चिकित्सक उपलब्ध
होने चाहिए ऐसे
बालकों की विशिष्ट आवश्यकतायें उनकी
श्रवण क्षमता के
कम होने की
सीमा तथा प्रक
पर निर्भर करती
हैं । विशेषज्ञों की
आवश्यकता वालक के द्वारा
घर पर अथवा
स्कूल में दि
गये प्रशिक्षण पर
भी निर्भर करती
है । सुनने
रूप जब किसी
बालक के श्रवण
अंगों में कोई
दोष होता है
तब उसे श्रवण
बाधित कहाँ हैं
।
ये दोष
कान के बाहर
, अन्दर तथा मध्य
में भी हो
सकता है ।
श्रवण बाधिता से
वाल में असमर्थ
हो जाता है
। जिसे श्रवण
असमर्थता भी कह सकते
हैं । कुछ
व्यक्ति पूर से बहरे
होते हैं या
उन्हें बहुत कम
सुनाई देता है
। कुछ बालक
जन्म से ही
व • बाधित होते
हैं तथा कुछ
जन्म के बाद
किसी रोग से
पीड़ित होने के
परिणाम स्वरूप श्रवण
• प्रकार वो दोनों
श्रवण और वाणी
बाधित होते हैं
। श्रवण बाधित
वालक की श्रवण
इन्द्रा सामान्य रूप से कार्य
नहीं करती ।
इसलिये उन्हें सुनने
में कठिनाई होती
है और वह
साथ
पढ़ लिख सकते
हैं । । सहायक
यन्त्री का प्रयोग करके
अपना काम चला
लेते हैं ।
ऐसे बालक सामान्य बालकों
के श्रवण बाधित
बालकों की विशेषतायें ( Charastristics of Hearing Impaired Children ) श्रवण बाधित बालक
में व्यवहारिक लक्षणों के
साथ अन्य गुण
भी प्रभावित होते
हैं । यदि
दृष्टि हीन और
बहरे व्यक्ति में
से चयन करना
हो तो बहरे
का चयन किया
जायेगा । ज्योकि
वह चलने फिरने
में और अपने
सांकेतिक भाषा से अपनी
बात कह लेता
है , क्योंकि प्रकार
की होती हैं
भवण बाधित अधिक
क्रियाशील होते हैं ।
ऐसे
बालकों की कुछ
मनोवैज्ञानिक विशेषतायें पाँच
( 1 ) भाषा या
वाणी का विकास
( Language and Speech Development )
1 ) श्रवण बाधित बालकों
को भाषा सीखने
और बोलने की
कौशल पर गम्भीर
प्रभाव होता है
।
( 2 ) इनके गहन
प्रशिक्षण के द्वारा भाषा
का सामान्य विकास
हो पाता है
।
( 3 ) श्रवण बाधित बालक
के भाषा के
उच्चारण में अधिक दोष
होता है ।
( 4 ) जो बालक जन्म
से ही बहरा
होता है उसे
विशिष्ट प्रशिक्षण की आवश्यकता होती
( 5 ) ऐसे बालकों
की अभिवृत्ति ऐसे
होती है कि
वो अपने को
बोलने में अयोग्य
समझने लगते हैं
परन्तु यह कोई
वैज्ञानिक आधार नहीं है
।
( 6 ) गम्भीर रूप
से श्रवण बाधित
बालकों की बड़ी
कठिनाई यह होती
है कि उनमें
भाषां का सामान्य विकास
नहीं होता है
।
( 7 ) ऐसे बालक बहुत
कम ही भाषा
का प्रयोग पाते
हैं ।
( 8 ) श्रवण बाधित बालकों
को सामान्य वालकों
के साथ शिक्षा
नहीं दी जा
सकती है ।
इनके लिये विशिष्ट विद्यालय , विशिष्ट कक्षा
तथा विशिष्ट अध्यापक की
आवश्यकता होती हैं ।
ऐसे बालक होटों
की गतिविधि से
समझने का प्रयास
करते हैं ।
इनके शिक्षण में
सांकेतिक भाषा का अधिक
प्रयोग होता है
।
( 2 ) बौद्धिक योग्यता का
विकास ( Intellectual Development )
( 1 ) श्रवण बाधित बालकों
का मानसिक विकास
सामान्य बालकों के समान
ही होता
( 2 ) श्रवण बाधित
बालकों की चिन्तन
शक्ति सामान्य वालको
के जैसी ही
होती है ।
( 3 ) ऐसे बालकों की
मानसिक मन्दिता नहीं
होती भाषा के
अतिरिक्त अन्य सभी समस्याओं एवं
परिस्थितियों को समझ लेते
हैं ।
( 4 ) ऐसे बालकों
के बौद्धिक कार्य
सामान्य बालको के जैसे
ही होते हैं
।
( 5 ) भाषा कौशल
की दृष्टि से
इन्हें मन्दित बालक
कहा जा सकता
है । परन्तु
इनकी अशाब्दिक भाषा
( सांकेतिक भाषा ) जिसे शारीरिक भाषा
भी कहते हैं
। ये अशाब्दिक भाषा
द्वारा वौद्धिक कार्य
करने में सक्षम
होते हैं ।
( 6 ) बौद्धिक अशाब्दिक परीक्षा ( non -
verbal intelligen test ) में
इनकी बुद्धि लव्धि
उच्च स्तर की
होती है
( 3 ) शैक्षिक निष्पत्ति का
विकास ( Academic Achievement
Performance
( 1 ) शैक्षिक निष्पत्ति की
दृष्टि ऐसे बालकों
में अधिक भिन्नता पाई
जाती है ।
( 2 ) ऐसे बालकों
को पढ़ने में
भी कठिनाई होतीहै
क्योंकि भाषा का सही
विकास न हो
पाता ।
( 3 ) ऐसे बालकों
का बौद्धिक स्तर
ऊँचा हता है
परन्तु फिर भी
शैक्षिक उपलि अधिक नहीं
हो पाती है
।
( 4 ) ऐसे कुछ
ही बालक भाषा
का वोद्धगम्य कर
पाते हैं और
पुस्तकों को अध्ययन कर
लेते हैं ।
( 5 ) शैक्षिक निष्पत्ति की
स्थिति ऐसे बालकों
की अच्छी नहीं
होती क्योंकि शैक्षि
निष्पत्ति में शाब्दिक योग्यता की
अहम भूमिका होती
है ।
( 4 ) सामाजिक तथा
व्यवसायिक समायोजन ( Social
and Occupational Adjustment )
( 1 ) श्रवण बाधित
बालकों के सामाजिक और
व्यक्तित्व सम्वन्धी विशेषतायें सामान्य वालकों से भिन्न
होती है ।
( 2 ) ऐसे बालकों में
पारस्परिक सम्प्रेषण की समस्या होती
है और शाब्दिक अन्
प्रक्रिया नहीं होती है
।
( 3 ) सम्प्रेषण की समस्याओं के
कारण समाज में
इनकी अन्तः प्रक्रिया नहीं
हो पातं है
। जिससे ये
अलग की दुनिया
में ही रहते
हैं ।
( 4 ) ऐसे बालकों
में इच्छायें बड़ी
प्रवल होती है
कि उन्हें सामाजिक मान्यता मिले
और सामाजिक अन्तः
प्रक्रिया भी हो ।
इस इच्छा की
पूर्ति न होने
के कारण हीन
भावन अधिक हो
जाती है ।
( 5 ) इस प्रकार
के वालक अपने
ही समूह में
रहना पसन्द करते
हैं और उनसे
सम्बन्ध बनाते हैं उनकी
रुचियां भी समान होती
हैं ।
( 6 ) आज बड़ी
संख्या में श्रवण
बाधित व्यक्ति विभिन्न व्यवसायों में
नौकरियाँ कर रहे हैं
। कुछ की
शैक्षिक योग्यता भी अधिक होती
है और वे
उच्च पदों पर
कार्यरत हैं । परन्तु
यह प्रवन्ध व्यवस्था में
अधिक सफल नहीं
है । कार्यालयों में
तथा हाथ के
कामों में अधिक
सफल होते हैं
क्योंकि ये काम में
लगे रहते हैं
क्यों क्या और
कैसे प्रश्नों में
नहीं उलझते ।
( 7 ) श्रवण बाधित
बालक भावानात्मक समायोजन में
सामान्य बालकों के समान
होते हैं ।
सामान्य वालकों की तरह
वातावरण के घटक उनके
भावात्मक पक्ष को प्रभावित करते
हैं ।
( 5 ) अन्य विशेषतायें ( Other Characteristics ) कुछ शोध
अध्ययनों द्वारा यह विदित
होता है कि
श्रवण बाधित बालको
को मानसिक योग्यता कम
होती है तथा
शैक्षिक योग्यता एवं समायोजन भी
अच्छा नहीं होता
। इसका मुख्य
कारण यह है
कि ऐसे बालकों
में भाषा का
अभाव रहता है
क्योंकि उन्हें सुनने और
बोलने में कठिनाई
होती है ।
इन छात्रों में
हीन भावना आ
जाती है ।
श्रवण बाधितों को
कुछ महत्वपू विशेषताओं को
निम्नलिखित छः भागों में
विभाजित किया गया है
( अ ) सामाजिक रूप
से बाधित
( स ) व्यक्तित्व की
समस्याएँ
( च ) व्यक्तिगत तथा
सामाजिक विकास की समस्याएँ
( द ) मनोवैज्ञानिक विशेषताएं
( य ) भाषा की
कठिनाई
( र ) असामान्य संवेगात्मक व्यवहार
( अ ) सामाजिकरूप से
बाधित ( Socially Handicapped ) इस प्रकार के
बालक समाज में
भली प्रकार अपना
समायोजन नहीं कर पाते
इन्हें वातावरण में
सामायोजित करने में अधिक
कठिनाई का सामना
करना पड़ा है
। इसके परिणाम
स्वरूप ऐसे बालकों
का व्यक्तित्व का
सन्तुलन नहीं रहता उनमें
कई प्रकार के
दोष आ जाते
हैं । क्योंकि इन
बालकों पाते ।
की सम्प्रेषण क्षमताएँ भी
सामान्य नहीं होती और
वह दूसरों को
भी अपनी बात
नहीं समझ
( ब ) व्यक्तिगत तथा
सामाजिक विकास की समस्याएँ ( Problem in Personal and Social Development ) इन बालकों में
सबसे बड़ी कठिनाई
भाषा की होती
है जो उनके
सामाजिक विकास की प्रक्रिया समुचित
ढंग से नहीं
हो पाती है
और समाज में
अपनी भूमिका का
निर्वाह नहीं कर पाते
और न ही
कोई स्थान बना
पाते । ये
बालक दूसरों पर
ही निर्भर रहते
हैं । इसलिये
इनमें हीन भावना
अधिक होती है
।
( स ) व्यक्तित्व की
समस्याएँ ( Problem
of Personality ) - ऐसे
बालकों में श्रवण
बाधित होने के
कारण व्यक्तित्व की
अनेक समस्यायें उत्पन्न होती
हैं । और
आंशिक रूपसे बाधित
बालक प्रयास करते
हैं कि वह
सामान्य बालकों की तरह
अपना व्यवहार करे
लेकिन बाधिता के
कारण वह ऐसे
करने में असमर्थ
होते हैं जिससे
उनके व्यक्तित्व का
विकास प्रभावित होता
है ।
( द ) मनोवैज्ञानिक विशेषताएँ ( Psychological Characteristics ) - श्रवण बधित बालकों
में व्यवहारिक समस्यायें अधिक
होती हैं क्योंकि वह
जब दूसरों की
बाते नहीं सुन
पाते तो कभी
- कभी उन बातों
का गलत अर्थ
लगाते हैं तथा
तद्नुकूल अपना व्यवहार करते
हैं । जिससे
सामान्य वालक उनके प्रति
सहानुभूति कम हो जाती
है । तथा
तब पामान्य बालक
उनकी सहायता नहीं
करते । श्रवण
बाधित वालक सामान्य बालकों
से अपने का
भिन्न महसूस करते
हैं जिससे उनकी
व्यवहारिक समस्यायें और बढ़ जाती
हैं और व्यक्तिगत का
विकास नहीं होता
।
( य ) भाषा की
कठिनाई ( Problems of Language ) - सामान्यतः इस प्रकार के
बालकों में भाषा
की कठिनाई अधिक
होती है क्योंकि उने
सुनने तथा बोलने
दोनों में कठिनाई
होती हैं , जिससे
सामान्य वालकों से समुचित
शाब्दिक अन्तः प्रक्रिया नहीं
होती । इनकी
शब्दावली भी सीमित होती
है , उन्हें सांकेतिक भाषा
का सहारा लेना
पड़ता है , सामान्य बालकों
की बात को
भी नहीं समझ
पाते । इस
प्रकार के दोष
से भाषा की
कठिनाई रहती है
और भाषा का
लाभ नहीं उठा
पाते ।
( र ) असामान्य भावात्मक व्यवहार ( Abnormal Emotional Behaviour अक्सर इस प्रकार
के बालक भावात्मक व्यवहार में
असामान्य होते हैं क्योंकि दूसरों
की बात को
नहीं समझ पाते
जिससे उनमें तनाव
उत्पन्न हो जाता है
और उनका स्वभाव
चिड़चिड़ा या हटी हो
जाता है ।
अपनी ओर ध्यान
आकर्षित करने के लिये
वे असामान्य व्यवहार करने
लगते हैं ।
श्रवण बाधित बालकों का वर्गीकरण
कीजिये ।
श्रवण बाधित बालकों का वर्गीकरण / प्रकार ( Classification of
Hearning Impaired Children ) वे समस्त बालक जिन्हें सुनने के सम्बन्ध में कोई कठिनाई है श्रवण बाधित बाल कहलाते हैं । ध्वनि का परिसर 1 से 130 डेसिबल्स ( Decibles ) होता है । 130 डी . को के ऊपर की ध्वनि दर्द की संवेदना देती है ।
ध्वनि के परिसर के अनुसार श्रवण बाधित बालको को चार भागों में बाँटा जा सकता है
( 1 ) कम श्रवण बाधित बालक ( Mild Hearning Loss Child ) - सामान्य बातचीत का स्तर 65 डी.बी. होता है । किंचित श्रवण बाधित बालकों को 35-51 डी.वो का श्रवण बाधित होता है , अर्थात् ये बालक 54 डी.वी. तक की ध्वनि को नहीं सुन पाते हैं । यदि सामान्य स्तर पर बातचीत की जाये तो वालक आसानी से सुन लेते हैं परन्तु उससे धीमे स्तर से बोलने पर ये वालक नहीं सुन पाते हैं ।
( 2 ) मन्द श्रवण बाधित बालक ( Moderate Hearning Loss Child ) दे बालक 55-69 डी . वी . का क्षय रखते हैं अतः सामाय स्तर , अर्थात् 65 डेसिवल्स स्तर पर बोलने पर ये वालक सामान्यतः नहीं सुन पाते । थोड़ा ऊँचा बोलने पर सुन पाते हैं ।
( 3 ) गम्भीर रूप से श्रवण बाधित बालक ( Severely Hearning
Impaired Child ) — इन बालकों में 70-89 डी.वी. श्रवण वाधिता होती है और ये काफी ऊँचा बोलने पर जो सामान्यतः कठिन होता है , सुन पाते हैं ।
( 4 ) पूर्ण श्रवण बाधित बालक ( Profoundly Hearing Impaired Child ) ऐसे बालकों को श्रवण बाधित 90 और इससे आगे डी.वी. स्तर का होता है ये बहुत ऊँचा बोलने पर भी कुछ ही शब्द सुन पाते हैं अथवा कुछ अक्षर सुन लेते हैं तो कुछ बालक कुछ भी नहीं सुन पाते हैं । ये बधिर ( deaf ) हैं ।
इस वर्गीकरण को सारांश रूप में ।
निम्नलिखित तालिका में दिया गया है श्रवण बाधिता का वर्गीकरण ( Classification of Hearing Imapairment ) डी.बी. स्तर स्तर श्रवण बाधिता के प्रकार बाधिता प्रतिशत
1 . कम बाधित बालक 35 से 51 डी.बी. तक. 40 प्रतिशत
2 .. मन्द बाधित बालक 55 से 69 डी.बी. तक 40 से 50 प्रतिशत
3. गम्भीर बाधित वालक 70 से 89 डी.वी. तक 50 से 75 प्रतिशत
4. पूर्ण / गहन बाधित बालक 90 से 100 डी.वी. तक 100 प्रतिशत
उपरोक्त वर्गीकरण का मुख्य आधार बाधिता की प्रतिशत और डी.बी. का स्तर है । अन्य प्रकार से श्रवण बाधितों को वर्गीकरण किया गया है । जिसमें भाषा का अनुभव , गतिविधि | की समस्यायें और केन्द्रीय श्रवण बाधिता मुख्य हैं ।
आधुनिक विशेषज्ञों ने श्रवण बाधितों को चार वर्गों में विभाजित किया है ।
( 1 ) आचरण में श्रवण बाधिता ( Conductive Hearing Loss )
( 2 ) नाड़ी संस्थान श्रवण बाधिता ( Sensor - neural Hearing Loss )
( 3 ) मनोजैविक श्रवण बाधिता ( Psychogenic Hearing
Loss )
( 4 ) केन्द्रीय श्रवण बाधिता ( Central Auditory
Defects ) प्रकार
( 1 ) आचरण श्रवण बाघिता ( Conductive Hearing
Loss ) साधारणत : इस के बाधित वालकों में आचरण दोष होता है । इस प्रकार के दोष कानों में किसी प्रकार के रोग के कारण उत्पन्न होते हैं । इन दोषों का चिकित्सा द्वारा उपचार किया जाता है और बालक सामान्य रूप से व्यवहार करने लगते हैं । कभी - कभी गलत चिकित्सा द्वारा इसका प्रभाव नहीं कर पाता है । विपरीत पड़ता है जिससे वह पहले की अपेक्षा अधिक वाघित हो जाता है और सामान्य व्यवहार
( 2 ) नाड़ी संस्थान श्रवण बाधिता ( Sensory - neural Hearning Loss ) - कुछ बालकों के आन्तरिक नाड़ी संस्थान में श्रवण दोष आ जाता है और इसका कोई उपचार किसी प्रकार सम्भव नहीं होता । ऐसे वालक श्रवण यन्त्र का प्रयोग करने से सुनने लगते हैं और सामान्य व्यवहार करने लगते हैं । ऐसे बालकों के शिक्षा प्रविधान के लिये इस तरह के उपायों का प्रयोग किया जाता है उन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है और होटो से भाषा सीखने का प्रशिक्षण दिया जाता है । गम्भीर रूप से बाधित वालकों को विशिष्ट विद्यालय में प्रवेश दिलाया जाता है ।
( 3 ) मनोजैविक श्रवण बाधिता ( Psychogenic Hearning
Loss ) - इस प्रकार के बालकों का श्रवण बाधित होने का कारण पूर्णत : मनोवैज्ञानिक है । ऐसे बालक अपनी कठिनाइयों को बढ़ा - चढ़ा कर के प्रस्तुत करते हैं । कान में कोई रोग होने की वजह से भी श्रवण दोष आ जाता है । कभी - कभी अचेतन रूप से भी श्रवण बाधिता का अनुभव करने लगते हैं और वह कहते है कि मेरा कष्ट असहनीय है । ऐसी परिस्थिति में ये पहिचानना कठिन हो जाता है कि दोष मनोवैज्ञानिक है या जैविक है । इस प्रकार के बालकों के उपचार में बड़ी सावधानी तथा निदान की आवश्यकता होती है । निदान के आधार पर ही उपचार किया जाना चाहिए ।
( 4 ) केन्द्रीय श्रवण दोष ( Central Auditory
Defects ) - इस प्रकार की श्रवण बाधिता अधिक जटिल होती है , इनका कारण पूर्णत : पैथोलॉजी पर आधारित होता है । इस तरह के बालक ध्वनि के बारे में जानकारी रखते हैं परन्तु उनके अर्थ को नहीं समझ पाते । ऐसे वालकों की सम्प्रेषण की गम्भीर समस्या होती है । बाल्यकाल में इस प्रकार का दोष अधिक होता है कुछ दवाइयों के कारण इस प्रकार के श्रवण दोष आ जाते हैं । इस तरह के बालकों के उपचार में अधिक कठिनाई होती है क्योंकि सुधार हेतु अधिक समय चाहिए ।
श्रवण बाधित बालकों
की शिक्षा पर एक निबन्ध
श्रवण
बाधित वालकों की
शिक्षा को निम्नलिखित भागों
में विभाजित किया
जा सकता है
।
जो
इस प्रकार हैं
1. सम्प्रेषण तकनीकी
( Communication Techniques ) श्रवण बाधित
बालक के सम्बन्ध में
जो सबसे बड़ी
कठिनाई है वह
सम्प्रेषण के सम्बन में
है । बालक
सुन नहीं सकता
है अतः कक्षा
में पढ़ाई जाने
वाली बातों का
सही व पूर्ण
अधि नहीं कर
सकता है ।
अत : उसे भली
प्रकार शिक्षित करने
के लिए कुछ
विशेष सम्प्रेषण तकनीक
अपनायी जानी चाहिए
। कुछ सम्प्रेषण तकनीकी
निम्नलिखित हैं
( अ ) चिन्ह
भाषा ( Sign Language ) - वधिर और अत्यधिक ऊँचा
सुनने वाले बालकों
के लिए चिन्ह
भाषाओं का प्रचलन
है , जैसे- ( 1 ) चिन्हित अंग्रेजी , ( 2 ) अमेरिकर चिन्ह
भाषाओं एक - दूसरे
से भिन्न होती
हैं अब विशेषज्ञ चिन्ह
भाषा को प्रमाणित ( Standardise ) कर रहे
हैं ताकि उसे
अधिकतर स्कूलों में
वोला जा सके
और सामानय बातचीत
में तथा टेलीविजन में
उसका प्रयोग हो
सके । चिन्ह
भाषा में शब्दों
वर्णों के लिए
। चिन्ह बने
रहते हैं ।
( ब ) ओष्ठ पठन
( Lip Reading ) - ओष्ठ
पठन में बालकों
को ओठों के
हिलने और गति
के आधार पर
वर्णों और शब्दों
को पढ़ने की
शिक्षा दी जाती
है । ओष्ठ
पठन को कुछ
कमियाँ हैं ।
जैसे ( 1 ) एक बधिर वालक
एक सामान्य गति
से वोले गए
वाक्य को केवल
25 प्रतिशत ही
समझा जा सकता
है । ( 2 ) कुछ ध्वनियों को
उच्चारित करते समय ओठ
लगभग समान गति
से हिलते हैं
, जैसे- प , व
, भ , अ , क
, त आदि ।
( 3 ) बालक
का ध्यान विभाजित हो
जाता है , क्योंकि वह
आधा ध्यान ओठों
की गतियों पर
और आधा ध्यान
कही गई बात
पर केन्द्रित करता
है । फलस्वरूप वह
सम्पूर्ण बात को नहीं
समझता है ।
( स ) संकेत भाषा
( Code Speech ) - संकेत
उसी भाषा में
ओठों को पढ़ने
के साथ हाथ
से मुँह के
पास ही संकेत
दिए जाते हैं
। संकेत उसी
भाषा के होते
हैं , जिसमें कि
वोला जाता है
। संकेत भाषा
के लाभ निम्नलिखित हैं
( 1 ) इसमें
उसी व्याकरण का
प्रयोग होता है
, जो वोली जाती
है । ( 2 ) इससे बालक
आसानी से सुनने
वाले भागों के
साथ सम्प्रेषण कर
सकता है ।
प्रभावशाली ओष्ठ पठन और
संकेत भाषा के
लिए छोटे - छोटे
वाक्य , मुहावरे आदि
धीरे - धीरे साफ
- साफ बोलने चाहिए
। बोली गयी
विषय - वस्तु सार्थक
होनी चाहिए ।
ऐसी स्थिति में
बालक शीघ्र कही
गई बात समझना
सीखेगा ।
( द ) स्पर्श विधि
( Touch Method ) - इसमें
स्पर्श द्वारा कही
गयी बात को
समझने का प्रावधान होता
है ।
( य ) गति
विधि ( Movement Method ) - इसमें शरीर से
विभिन्न गतियाँ करवाकर बधिर
वालकों के सम्प्रेषण से
सहायता दी जाती
है ।
( र ) प्रवर्धक प्रयोग
( Use of Amplifiers ) - ध्वनि
प्रवर्धक यन्त्रों का प्रयोग भी
सम्प्रेषण के लिए किया
जाता है , परन्तु
यह केवल उन
वालकों के लिए
उपयोगी सिद्ध हो
सकता है , जो
सामान्य से थोड़ा ऊँचा
सुनते हैं ।
बधिर बालकों के
लिए यह बेकार
है । यह
एक वाद - विवाद
का विषय है
कि सम्प्रेषण के
इन विभिन्न प्रकारों में
से किसका प्रयोग
किया जाए ।
कुछ विशेषज्ञ एक
और कुछ दो
या दो से
अधिक के प्रयोग
पर बल देते
हैं । वास्तव
में , यह इस
बात पर निर्भर
करता है कि
बालक का श्रवण
दोष कितना है
और वह किन
परिस्थितियों में रह रहा
है । कक्षा
व्यवस्था भी सम्प्रेषण में
सहायक होती है
। श्रवण बाधित
बालकों के लिए
सामान्य वालकों से अधिक
ऊँची कुर्सियों को
व्यवस्था करनी चाहिए ताकि
वे अध्यापक के
ओठों की गति
को पढ़ सकें
। यदि कक्षा
गोलाकार रूप से बैठाई
जाए तो यह
अति उत्तम होगा
। इससे बालक
दूसरे बालकों के
ओठों की गति
भी देख सकता
है । मनोवैज्ञानिक समस्याएँ उत्पन्न करती
है । साथ
ही उसमें अन्य
बालकों से भिन्न
होने की अनुभूति भी
नहीं आएगी ,
2. शिक्षण तकनीकी ( Teaching Technology ) श्रवण बाधित
बालकों के लिए
निम्नलिखित शिक्षण तकनीकी अपनाई
जानी चाहिए
( 1 ) शिक्षण विषय
- वस्तु को सहायक
सामग्री की सहायता से
पढ़ाया जाना चाहिए
, जो सहायक सामग्री प्रयोग
की जा सकती
है , वह इस
प्रकार है- आकृतियाँ , चित्र
, संकेत शब्द , मॉडल
, मानचित्र , इशारे ।
( 2 ) शिक्षण के
बीच - बीच में
प्रश्न पूछना अनिवार्य है
। प्रश्न पूछने
से यह पता
लग सकता है
कि बालक पढ़ाई
गई बात को
कितना समझ रहा
है ।
( 3 ) श्रवण बाधित
बालक को एक
नोट लेने वाला
व्यक्ति ( note -
taker ) प्रदान
किया जाना चाहिए
।
इसकी कुछ
विशेषताएँ इस प्रकार होना
अनिवार्य हैं
( अ ) श्रवण
बाधित बालक के
प्रति भावुक हो
।
( ब ) विषय
का अच्छा ज्ञानं
रखता हो ।
( स ) सामान्य से
अच्छी शैक्षिक उपलब्धि हो
।
( द ) दिशा
और व्यवस्था को
स्वीकार करने की इच्छा
हो ।
( य ) कक्षा
- कक्ष अध्यापक से
कार्य लेने में
आत्म - विश्वास का
अनुभव करता हो
।
( र ) अपनी आलोचना
या दिखावे के
लिए प्रदर्शित बुरी
भावना को स्वीकार करने
की इच्छा हो
।
( 4 ) यदि नोट लेने
वाले व्यक्ति की
व्यवस्था नहीं हो पाती
है तो श्रवण
बाधित बालक के
किसी सहपाठी से
कहा जा सकता
है कि वह
जो नोट्स लेता
है , उसकी कार्बन
कापी निकाला करें
। कार्बन कापी
का प्रयोग श्रवण
बाधित वालक कर
सकता है ।
( 5 ) श्रवण बाधित
बालकों के लिए
एक विशेष अध्यापक ( Special teacher ) जो प्रशिक्षण प्राप्त हो
नियुक्त किया जाना चाहिए
। इसका कार्य
अन्य अध्यापकों और
माता - पिता से
मिलकर बालकों की
पढ़ाई की व्यवस्था करना
होगा ।
( 6 ) श्रवण बाधित वालकों
की अधिगम कमियों
की ओर विशेष
ध्यान दिया जाना
चाहिए । यह
देखना चाहिए कि
वे शब्दों को
ठीक लिखते और
बोलते हैं अथवा
नहीं । प्रारम्भिक अवस्था
में ही सुधार
कर लेना बालक
के हित में
होगा ।
( 7 ) आजकल श्रवण बाधित
बालक के शिक्षण
के लिए कम्प्यूटर का
प्रयोग किया जाता
है । इनका
प्रयोग परीक्षण और
पुनर्वास के लिए सफलतापूर्वक किया
जा सकता है
। जैसा कि
लेविट ने देखा
है । इनका
प्रयोग कम्प्यूटर सहायता
प्राप्त अनुदेशन (
Computer Assisted Instruction ) के लिए
भी किया जाता
है । जैसा-
गोल्डबर्ग ने दिखाया है
।
( 8 ) श्रवण वाधित बालकों
के लिए कुछ
तकनीकी कार्यक्रम ( Technical Programmes ) बनाने चाहिए
। रोचेस्टर तकनीक
विज्ञान संस्था ( Rochester Institute of Technology
) में स्थित बधिर
राष्ट्रीय तकनीकी संस्था में
इस प्रकार के
कार्यक्रम उपलब्ध हैं ।
इन्हें भारतीय संस्कृति के
अनुसार परिवर्तित किया
जा सकता और
सर्वथा नवीन का
भी बनाए जा
सकते हैं ।
3. श्रवण बाधित बालकों
को शैक्षिक सुविधाएँ ( Educational Facilities for Hearing Impaired Children ) श्रवण बाधित बालकों
का दिन - प्रतिदिन के
क्रियाकलाप भली प्रकार से
करने सहायता देने
के लिए कुछ
सुविधाएं दी जानी चाहिए
। ये सुविधाएँ उनके
ज्ञान को निरि
रूप से विकसित
करेंगी । ये
सुविधाएँ तथा साधन निम्नलिखित हैं
( 1 ) श्रवण सहायक उपकरण
का उपयोग ( Use of Hearing Aids )
( 2 ) व्यवसायिक प्रशिक्षण ( Vocational Training )
( 3 ) श्रवण प्रशिक्षण ( Auditory Training )
( 4 ) पूर्व प्राथमिक शिक्षा
( Nursery Education )
( 5 ) कक्षा का समुचित
प्रबन्धन (
Classroom Management )
( 6 ) बोलने व
पढ़ने का प्रशिक्षण ( Speech and Reading Training )
( 7 ) माता - पिता
की भूमिका ( Role of Parents )
( 8 ) विद्यालय की
भूमिका ( Role of School )
( 9 ) अध्यापक की भूमिका ( Role of Teacher ) ।
( 1 ) दृश्य - श्रव्य संकेत
सामग्री श्रवण बाधित वालक
के लिए अत्यन्त लाभदायक सिद्ध
हो सकती है
। जैसे- टेलीफोन में
ध्वनि प्रवर्धक या
विस्तारक लगाने से बालक
टेलीफोन पर बातचीत कर
सकते हैं ।
टेलीफोन में लगी टिमटिमाती रोशनी
बालक को टेलीफोन घण्टो
की सूचना दे
सकती है ।
आजकल बालकों के
लिए टेलीफोन , टाइपराइटर और
कम्प्यूटर यन्त्र बनाया गया
है । इसमें
टेलीफोन पर वार्ता टाइप
होकर स्क्रीन में
देखी जाती है
। इससे बधिर
वालक टेलीफोन पर
वार्ता कर सकते
हैं । इसी
प्रकार के अन्य
यन्त्र भी विद्यालयों में
उपलब्ध कराए जा
सकें तो वे
श्रवण बाधित बालकों
के लिए अत्यन्त लाभप्रद होंगे
।
( 2 ) वीडियो टेप्स का
प्रयोग लाभकारी सिद्ध
होगा ।
( 3 ) फिल्म का प्रयोग
किया जाना चाहिए
। और प्रभावशाली होने
चाहिए ।
( 4 ) अनुशीर्षक ( Captioned ) कार्यक्रम जो
टेलीविजन पर दिखाए जाते
हैं वे अधिक
( 5 ) कक्षा - कक्षा
में समूह श्रवण
सहायक ( Group Hearing Aids ) उन सभी वालकों
को प्रदान किए
जाने चाहिए , जो
किसी भी प्रकार
की श्रवण बाधिता
से पीड़ित है
। इन सब
सहायकों का एक ही
प्रवर्धक होता है ।
( 6 ) श्रवण सहायक
वन्दी ( Hearing Aids Vests ) तथा ध्वनिक कान
( phonic ear ) का
प्रयोग किया जाना
चाहिए ।
( 7 ) टेप रिकार्डर में
अध्यापक का व्याख्यान टेप
करके श्रवण बाधित
बालकों को दिया
जाना चाहिए ताकि
समय मिलने पर
सुविधानुसार वे अपनी गति
के अनुसार पाठ
समझ सकें ।
किया जाता है
तो यह अत्यन्त अच्छा
होगा ।
( 8 ) अध्यापक द्वारा
यदि ओवरहेड योजना
( Overhead projector ) का
प्रयोग
( 9 ) श्रवण बाधित
वालकों का अजायवघर , ऐतिहासिक इमारतें , प्रसिद्ध स्थान
, मिल आदि सूचनाप्रद स्थानों में
घुमाने अवश्य ले
जाना चाहिए और
प्रत्येक बालक का ध्यान
विशेष वस्तुओं की
ओर आकर्षित किया
जाना चाहिए ।
शैक्षिक पर्यटन की व्यवस्था की
जाए
4. पृथक् कक्षाएँ ( Segregated Classes ) कुछ श्रवण
बाधित बालक ऐसे
होते हैं , जो
श्रवण बाधिता से
पीड़ित जन्म के
कुछ वर्षों बाद
होते हैं , तथा
जो भाषा ज्ञान
प्राप्त कर चुके होते
हैं । ऐसे
बालकों को शिक्षित करना
अपेक्षाकृत सरल है ।
साथ ही ऐसे
बालकों को भी
शिक्षित करना सरल है
, जो बधिर अथवा
गम्भीर रूप से
बाधिता से पीड़ित
है । कम
गम्भीर रूप से
पीड़ित बालक अपनी
शिक्षा का सामान्य कक्षा
में प्राप्त कर
सकते हैं ।
बशर्ते उन्हें कुछ
विशेष सुविधाएँ यथा
नोट लेने वाले
सहायक , ध्वनि प्रवर्धक यन्त्र
, प्रशिक्षित अध्यापक आदि प्रदान किए
जाएँ । इन
बालकों की अधिगम
कमियों को पृथक्
कक्षाएँ आयोजित करके दूर
किया जा सकता
है । इन
पृथक् कक्षाओं में
प्रशिक्षित अध्यापक अन्य अध्यापकों के
सहयोग से अपना
कार्य करते हैं
।
5. पृथक् विद्यालय ( Segregated School ) जो बालक
जन्म से श्रवण
बाधित है अथवा
बधिर है , उन्हें
सामान्य बालकों के साथ
बैठाकर शिक्षा नहीं
दी जा सकती
है । अतः
उनके लिए पृथक
विद्यालय बनाए जाने चाहिए
, जहाँ बधिरों को
शिक्षित करने सम्बन्धी उपकरण
, सामग्री , सुविधा और प्रशिक्षित अध्यापको की
व्यवस्था हो ।
6. शिशु कार्यक्रम ( Infant Programme ) एक श्रवण
बाधित वालक की
शिक्षा तब आरम्भ
होती है , जब
वह स्कूल में
प्रवेश लेने जाता
है । वास्तव
में , उसकी शिक्षा
तव से आरम्भ
होनी चाहिए , जब
से वह इस
कमी से पीड़ित
हुआ है ।
अतः विद्यालयों के
कर्तव्य क्षेत्र के अन्तर्गत यह
भी आता है
कि वह शिशुओं
के लिए कार्यक्रम बनाए
ताकि विद्यालय में
प्रवेश के समय
एकाएक समस्या उत्पन्न न
हो ।
7. प्रगतिक्रम (
Progression ) श्रवण
बाधित बालक की
शिक्षा का मुख्य
उद्देश्य उसे सामान्य शिक्षा
की धारा में
लाना है ।
यदि वह एक
पृथक विद्यालय में
अथवा पृथक् कक्षा
में पढ़ता है
तो उसकी शैक्षिक प्रगति
इस पर निर्भर
करती है कि
वह कब तक
इस योग्य हो
जाता है कि
सामान्य कक्षा में बैठकर
लाभान्वित हो सके ।
यह सम्भावना है
कि बधिर और
गहन रूप से
पीड़ित बालक पूर्ण
रूप से सामान्य कक्षा
में नहीं बैठ
सकता । साथ
ही यह भी
आवश्यक है कि
उसे सामान्य कक्षाओं और
सामान्य बालक से अन्तःक्रिया का
अनुभव मिले ।
अतः कुछ विषयों
जिन्हें वह सामान्य बालकों
के साथ पढ़
सकता है , यथा
- कला , शारीरिक प्रशिक्षण में
उसे सामान्य कक्षा
में बैठाया जाए
, जिससे मुख्य धारा
में आ सके
।
8. शैक्षिक और
व्यावसायिक निर्देशन (
Educational and Vocational Guidance ) श्रवण बाधित
वालकों की अभिरूचि , अभियोग्यता को
ध्यान में रखकर
उन्हें शैक्षिक निर्देशन दिया
जाना चाहिए ।
ऐसे बालकों के
व्यवसाय की योजना पूर्व
में बनाना अनिवार्य है
। इन्हें ऐसे
व्यवसायों की आवश्यकता है
, जिनमें कम से
कम शाब्दिक सम्प्रेषण होता
हो । अतः
प्रिटिंग , बिजली सम्बन्धी कार्य
, कौशलयुक्त लकड़ी आदि का
कार्य , खाना पकाने
का कार्य , कलात्मक कार्य
, बढ़ईगीरी आदि कार्य इनके
लिए उपयुक्त होते
हैं । शोध
कार्य , हिसाब - किताब
का कार्य भी
श्रवण बाधित वालक
भली प्रकार कर
सकते हैं ।
आजकल व्यवसायों में
वृद्धि के साथ
श्रवण बाधित बालक
के लिए अपने
अनुरूप व्यवसाय पाना
उतना जटिल नहीं
रह गया है
जितना पूर्व में
था , जब ऐसे
बालकों को समाज
में एक भार
माना जाता था
। इस प्रकार
के कुशलतापूर्वक आयोजित
व्यवस्था श्रवण बाधित बालकों
को न के
शिक्षित करने में सहायक
होगी , बल्कि उनके
भविष्य को भी
सुरक्षित रखने में सफल
होने इस बात
का स्पष्ट प्रभाव
ऐसे बालकों के
सन्तुलित व्यक्तित्व विकास पर स्पष्ट
दृष्टिगोर होगा । व
इन तकनीकों के
अतिरिक्त समाज , राष्ट्र व
परिवार की यह
जिम्मेदारी बनती है कि
वे ऐसे छात्रों को
समायोजित करें व उनकी
इस कमी को
दूर करें या
सुधार कर उनको
कि कलात्मक व
रचनात्मक कार्य की ओर
प्रेरित करें , जिससे वे
भविष्य में सफल
व्यक्ति बर सकें व
अपनी आजीविका स्वयं
चला सकें ।
श्रवण बाधित बालकों की शिक्षा में शिक्षक
की भूमिका
अध्यापक की भूमिका
( Role of Teacher
) सामान्य शिक्षक की कक्षा में भी श्रवण बाधित वालक प्रवेश ले लेते हैं । इसलिए शिक्षक का यह उत्तरदायित्व होता है कि शिक्षक ऐसे बालकों पर ध्यान दें और उन्हें समुचित सहायता प्रदान करें ।
इस सन्दर्भ में निम्नलिखित भूमिकाओं का निर्वाह करना होता है
( 1 ) ऐसे बालकों के व्यवहार के आधार पर उनकी पहचान करें और सामान्य कक्ष में उन्हें आगे की सीटों पर बैठाने की व्यवस्था करें । साथ ही उनके माता - पिता को इसको सूचना दे , जिससे वो उनका चिकित्सा परीक्षण कराए और उपचार की व्यवस्था करें ।
( 2 ) कक्षा में इस प्रकार के बालकों की प्रतिशत बहुत कम होती है , इसलिए वह अन्य सामान्य वालकों की आवश्यकता को भी ध्यान में रखना होता है । इसलिए शिक्षक को कक्षा से अलग उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उनकी सहायता करें , जिससे वह कक्षा में कठिनाई का अधिक अनुभव न करें ।
( 3 ) शिक्षक को उनके प्रति धनात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए और उनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण
व्यवहार करना चाहिए ।
( 4 ) शिक्षक को कक्षा में ऐसे बालकों को पढ़ने और लिखने का अधिक ध्यान देन चाहिए और शिक्षक से इनकी दूरी अधिक नहीं होनी चाहिए ।
( 5 ) शिक्षक को यह भी देखना चाहिए कि वालक श्रवण यन्त्रों का उपयोग नियमित होता है । रूप से करते हैं , क्योंकि आरम्भ में यन्त्रों की सहायता लेने में बालकों को कठिनाई का अनुभव
( 6 ) शिक्षक को बड़े स्वाभाविक रूप में बोलना चाहिए और बोलने की गति भी तीव्र न हो , क्योंकि श्रवण बाधित बालक धीमी गति से ही सुन और समझ पाते हैं ।
( 7 ) शिक्षक को बोलते समय एक ही स्थान पर खड़ा रहना चाहिए , क्योंकि बोलते समय चलने - फिरने से ऐसे बालकों को अधिक कठिनाई होती है , क्योंकि शिक्षक की वाणी में उतार - चढ़ाव आ जाता है ।
( 8 ) शिक्षक को श्यामपट्ट कार्य के बाद यह देखना चाहिए कि इन बालकों ने श्यामपट्ट से सही लिख लिया है ।
( 9 ) शिक्षकों को नई शब्दावली को पढ़ाने में सावधानी बरतनी चाहिए । बोलना और लिखना दोनों ही कार्यों की सहायता लेनी चाहिए ।बी
( 10 ) शिक्षकों को ऐसे बालकों को अधिक प्रोत्साहन देना चाहिए और अपनी पाठ्यवस्तु में पुनरावृत्ति भी करना चाहिए । शब्दों के उच्चारण में सामूहिक उच्चारण प्रविधि की सहायता लेनी चाहिए । शिक्षक को जहाँ तक संभव हो अपनी पाठ्यवस्तु के प्रस्तुतीकरण में दृश्य सहायक सामग्री का अधिक प्रयोग करना चाहिए । शिक्षण के महत्वपूर्ण बिन्दुओं को श्यामपट्ट पर अंकित करना चाहिए । शिक्षक को पढ़ाते समय अनुकूलित आव्यूहों का प्रयोग करना चाहिए , जिससे श्रवण बाधित शिक्षण का पूरा लाभ उठा सकें । जाता है ?
श्रवण बाधित बालको हेतु किस प्रकार
के शिक्षण आव्यूह का प्रयोग किया
श्रवण बाधित
बालकों हेतु शिक्षण
आव्यूह ( Teaching Strategies for Hearing
Impaired Children ) श्रवण
बाधित बालकों के
शिक्षण हेतु कुछ
सामान्य शिक्षण आव्यूह का
उपयोग किया जाता
है । इन
बालकों के शिक्षण
में निम्नलिखित प्रविधियों को
प्रयोग किया जाता
है
( 1 ) दृश्य प्रस्तुतीकरण मौखिक
पाठ्यवस्तु को सम्मिलित करना
। ( 2 ) छात्रों की एकाग्रता पर
ध्यान देना ।
( 3 ) पाठ के
मुख्य अंश का
शिक्षण कराना ।
( 4 ) प्रस्तुतीकरण का
संक्षेपीकरण करना ।
( 5 ) शाब्दिक प्रस्तुतीकरण स्पष्ट तथा सूक्ष्म करना
।
( 6 ) पाठ्यवस्तु की
पुनरावृत्ति करना ।
( 7 ) बोधगम्यता के
आंकलन हेतु प्रश्न
पूछना तथा
( 8 ) बहु इन्द्रिया आयाम
का उपयोग करना
। श्रवण बाधित
बालकों के लिए
भाषा के कौशल
का विकास करना
चाहिए और भाषा
सम्बन्धी समुचित अधिगम अनुभव
प्रदान किए जाएं
। सम्प्रेषण कौशल
तथा भाषा की
गतिवृद्धि हेतु निरन्तर नियमित
रूप से विद्यालय में
अभ्यास कराया जाए
। जिससे भाषा
की क्षमताओं , बोधगम्यता तथा
सम्प्रेषण कौशल का विकास
किया जा सके
। भूमिका निर्वाह , सामूहिक अभ्यास
, चित्र कार्ड , उदाहरण
, अभ्यास पुस्तिका , ध्वनि
यन्त्रों का उपयोग करना
चाहिए । भाषा
के प्रशिक्षण हेतु
किट्स उपल्बध हैं
, उनका भी उपयोग
किया जा सकता
है । अभिव्यक्ति तथा
लिखित वोधगम्यता के
विकास हेतु सरल
वाक्यों के लिखने तथा
प्रस्तुतीकरण का अभ्यास कराया
जाए । चित्र
काडों को व्यवस्थित करने
का अवसर दिया
जाए । समतुल्य प्रश्नों की
सहायता से क्या
, कब , कहाँ तथा
कैसे प्रश्नों का
अभ्यास कराया जाए
। कक्षा में
टंगे हुए चार्टों की
सहायता से भाषा
में गति का
विकास किया जा
सकता है ।
गणित की योग्यता के
विकास हेतु प्रशिक्षण में
सिक्कों , प्लास्टिक किल्पो बॉक्स , रेखाएँ
, अर्घ अमूर्त सामग्री का
अधिगम में सुविधा
हेतु उपयोग किया
जा सकता है
। इस प्रकार
के वालक संख्यात्मक योग्यता , अमूर्त
चिन्तन तथा प्रत्यात्मक योग्यता में
सामान्य बालकों से कम
नहीं होते हैं
। मौखिक अभिव्यक्ति मन्द
होती है ।
वाणी के उपचार
में इन बालकों
की गति एवं
ध्वनि का प्रारूप का
विकास पुनर्बलन प्रविधि से
किया जा सकता
है । वाणी
के उपचार में
बन्द सम्प्रेषण का
उपयोग अधिक प्रभावशाली होता
है । श्रवण
यन्त्रों के उपयोग से
कक्षा में सामान्य बालकों
के साथ पढ़
लिख सकते हैं
तथा पाठ्यवस्तु को
बोधगम्य करते हैं ।
कक्षा शिक्षण में
सामूहिक तथा व्यक्तिगत रूप
में श्रवण यन्त्रों का
उपयोग किया जा
सकता है ।