भारतीय संविधान के नीति - निर्देशक तत्व

 भारतीय संविधान के नीति - निर्देशक तत्व



 निर्देशक सिद्धान्त अथवा तत्व ( Directive Principles ) भारतीय संविधान में इन सिद्धान्तों को इस प्रकार लिखा है , " इस भाग में अन्तर्विष्ट उपबन्ध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे किन्तु फिर भी उनमें अधिकाधिक तत्व देश हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्त्तव्य होगा । ” के शासन में मूलभूत अत : भारतीय संविधान में उल्लेखित नीति निर्देशक तत्व कोई वैधानिक कानून नहीं है लेकिन भारत सरकार नये कानूनों का निर्माण करते समय इन नीति निर्देशक तत्वों को ध्यान में रखेगी।

 1. राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति सिद्धान्त - राज्य अपनी नीति का , विशिष्टतया , इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से 

( i ) पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो

 ( ii ) समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियन्त्रण इस प्रकार वटा जिसके द्वारा सर्वोत्तम रूप से सामूहिक हित हो सके ।

 ( iii ) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार की हो जिसमें धन और उत्पादन के साधनों का अ जनता के लिये अहितकारी केन्द्रीयकरण न हो । 

( iv ) पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले । 

( v ) पुरुष एवं स्त्री श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की कोमल अवस् का दुरुपयोग न हो और आर्थिक कारणों से मजबूर होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हों । 

( vi ) बालकों को स्वतन्त्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधायें दी जायें और बालकों तथा कम आयु के व्यक्तियों की नैतिक तथा आर्थिक शोषण से रक्षा की जाये । 

( vii ) राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधि व्यवस्था इस प्रकार कार्य करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय आसानी से प्राप्त हो और विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने के लिये कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाये । इसके अतिरिक्त निःशुल्क न्याय व्यवस्था प्रदान की जाये । 

2. कुछ दशाओं में काम , शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर , काम पाने के , शिक्षा पाने के और वेकारी , बुढ़ापा , बीमारी तथा अन्य अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त करने का प्रभावपूर्ण प्रवन्ध करेगा । 

3. ग्राम पंचायतों का संगठन - राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिये कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियाँ और अधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन को इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिये आवश्यक हैं । 

4. श्रमिकों के लिये निर्वाह मजदूरी आदि - राज्य , उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि , उद्योग या अन्य प्रकार के सभी श्रमिकों को कार्य , निर्वाह मजदूरी , शिष्ट जीवन स्तर और अवकाश का सम्पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने वाली कार्य की दशायें तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा और विशेष रूप से ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सामूहिक आधार पर बढ़ाने का प्रयास करेगा । इसके अतिरिक्त उद्योगों के प्रवन्ध में श्रमिकों की भागीदारी के लिये भी वह प्रयास करेगा ।

 5. काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता का प्रवन्ध - राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिये प्रबन्ध करेगा ।

 6. अनुसूचित जातियों , अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी हितों के लिए व्यवस्था- राज्य जनता के कमजोर वर्ग के , विशेष रूप से , अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी हितो की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय एवं सभी प्रकार के शोषण से उनकी रक्षा करेगा ।  

7. बालकों के लिये निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रबन्ध - राज्य , इस संविधान के प्रारम्भ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने की व्यवस्था करने का प्रयास करेगा । 

8. नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता - राज्य , भारत के समस्त राज्य क्षेत्र नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता लागू करने का प्रयास करेगा ।

 9. पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा जन स्वास्थ्य का सुधार करना राज्य का कर्त्तव्य - राज्य अपने लोगों को पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और जन - स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्त्तव्यों में रखेगा और राज्य , विशेष रूप से , मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक दवाइयों के , दवाओं के रूप में प्रयोग से भिन्न , उपयोग को रोकने का प्रयास करेगा । 

10. राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों , स्थानों और वस्तुओं की रक्षा - राष्ट्रीय महत्व वाले कलात्मक या ऐतिहासिक अभिरुचि वाले प्रत्येक स्मारक या स्थान या वस्तु की हर प्रकार से रक्षा करना राज्य की बाध्यता होगी । 

11. कार्यपालिका से न्यायपालिका की पृथकता - राज्य की लोक सेवाओं में , न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करने के लिये राज्य कदम उठायेगा ।

 12. कृषि और पशुपालन संगठन - राज्य , कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दूध देने वाले और यातायात में काम आने वाले पशुओं को नस्लों के सुधार तथा उनके वध पर प्रतिबन्ध लगाने का प्रयास करेगा । इसके अतिरिक्त राज्य , देश के पर्यावरण और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा । 

13. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि - राज्य 

( i ) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का 

( ii ) राष्ट्रों के बीच न्याय संगत और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाये रखने का

 ( iii ) संगठित लोगों के एक - दूसरे से व्यवहारों में अन्तर्राष्ट्रीय विधि और सन्धि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का , और

 ( iv ) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने के लिये प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा ।


भारतीय संविधान में शिक्षा से सम्बन्धित प्रावधान

 भारतीय संविधान में शिक्षा से सम्बन्धित प्रावधान 



                                                 भारत के संविधान में शिक्षा सम्बन्धी धारायें ( Provisions of Education in Indian Constitution ) भारत के संविधान में शिक्षा के विषय में निम्नलिखित व्यवस्थायें निहित हैं 

1. निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा - संविधान की 45 वीं धारा के अनुसार राज्य 14 वर्ष की आयु पूरी करने तक सभी वालकों हेतु संविधान लागू होने से 10 वर्ष के भोज निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करने का प्रयत्न करेगा । 

2. धार्मिक शिक्षा - संविधान की 21 वीं धारा के अनुसार , किसी धर्म विशेष के प्रचार के लिए कर या दान देने के लिये किसी व्यक्ति को मजबूर नहीं किया जा सकता । भाग 28 1 के अनुसार , पूरी तरह राज्य के धन से चलने वाली किसी शिक्षण संस्था में धार्मिक शिक्ष नहीं दी जायेगी । धारा 22 ( 2 ) के अनुसार , सहायता प्राप्त या राज्य से मान्यता प्राप्त शिक्ष संस्थाओं के किसी सदस्य को उस संस्था द्वारा चलाये जाने वाले किसी धार्मिक अनुष्ठान भाग लेने के लिये मजबूर नहीं किया जा सकता । धारा 28 में कहा गया है कि अन्य धनें के अनुयायियों को उनकी सहमति लिये बिना धार्मिक अनुदेशन नहीं देना चाहिये । 

3. दृश्य सामग्री - धारा 49 के अनुसार , राज्य प्रत्येक स्मारक या संसद द्वारा राष्ट्र महत्व के घोषित स्थान व वस्तुओं का संरक्षण करे

 4. अल्पसंख्यकों की शिक्षा - धारा 30 में कहा गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी इच्छानुसार शैक्षिक संस्थायें स्थापित करने व उनका प्रशासन करने का अधिकार है व अनुदान देते समय इन स्कूलों के साथ इस कारण भेदभाव नहीं किया जा सकता वे धार्मिक समुदाय द्वारा चलाये जा रहे हैं ।

 5. पिछड़े वर्ग की शिक्षा - पिछड़े वर्गों की शिक्षा सम्बन्धी संवैधानिक धारायें  कही गई बातें निम्नलिखित हैं 

( i ) धारा 17 - अस्पृश्यता निवारण व किसी भी रूप में अस्पृश्यता का प्रयोग निष्ठ  

( ii ) धारा 24-14 वर्ष से कम आयु वाले किसी बालक को किसी कारखाने , खान या अन्य खतरनाक रोजगार में काम करने हेतु नियुक्त नहीं किया जा सकता है ।

 ( iii ) धारा 23- मनुष्यों के क्रय - विक्रय व वेगार पर प्रतिबन्ध लगा रहेगा । 

( iv ) धारा 15 - हिन्दुओं के समस्त सार्वजनिक धार्मिक संस्थानों के द्वार पिछड़े वर्ग के लिये खुले रहेंगे । 

( v ) धारा 16 व 335 - राज्यों को सार्वजनिक नौकरियों में स्थान आरक्षित करने की छूट रहेगी ।

 ( vi ) धारा 46 पिछड़े वर्गों के शैक्षणिक व आर्थिक हिनों के विस्तार तथा उन्हें सामाजिक अन्याग व सभी प्रकार के शोषण से सुरक्षा मिलेगी ।


 6. कृषि शिक्षा - अनुच्छेद 45 में कहा गया है कि यदि राज्य चाहे या वह यह उत्तरदायित्व उठाने के लिये सक्षम हो तो वह आधुनिक व वैज्ञानिक दृष्टि से कृषि व पशु पालन का संगठन करके , नस्लों का संरक्षण व सुधार करने के लिये कदम उठा सकता है ।

 7. भाषा अनुदेशन- संविधान की 350 - A धारा के अनुसार , प्रत्येक राज्य तथा राज्य में प्रत्येक स्थानीय निकाय प्राथमिक स्तर पर अल्पसंख्यक समूहों के बालकों के लिये मातृभाषा में अनुदेशन के लिये पर्याप्त सुविधायें प्रदान करेगा । धारा 351 के अनुसार , यह संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा के प्रसार व विकास को प्रोत्साहित करे ताकि वह भारत की संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके । 

8. केन्द्र व राज्य शैक्षिक दायित्व - भारत के संविधान में केन्द्र व राज्य सरकार के शैक्षणिक दायित्व स्पष्ट रूप से परिभाषित किये गये हैं । केन्द्र सरकार शिक्षा सुविधाओं के समन्वय , उच्च वैज्ञानिक व तकनीकी शिक्षा के स्तरों के निर्धारण तथा हिन्दी व अन्य समस्त भारतीय भाषाओं में शोध कार्य व उनकी प्रगति के लिये उत्तरदायी है । संघीय क्षेत्रों की शिक्षा व केन्द्रीय विश्वविद्यालयों पर केन्द्र का सीधा नियन्त्रण है । देश के अन्य क्षेत्रों में शैक्षिक प्रशासन का उत्तरदायित्व राज्य पर है । 

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 



 राष्ट्रीय शिक्षा नीति -1986 [ National Policy of Education - 1986 ] 

जनवरी सन् 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व . श्री राजीव गाँधी ने घोषणा की है कि राष्ट्र के लिये एक नई शिक्षा नीति तैयार की जायेगी । नई शिक्षा नीति के निर्माण से पूर्व भारत सरकार ने अगस्त 1985 में ' शिक्षा की चुनौती : नीति सम्बन्धी परिप्रेक्ष्य ' ( Challenge of Education : A Policy Prespective ) नामक दस्तावेज शिक्षा नीति का अन्तिम कथन नहीं है वरन् यह राष्ट्रव्यापी विचार - विमर्श के लिये आधार तैयार करने वाला दस्तावेज है । यह नई शिक्षा नीति के निर्माण कार्य को सुविधाजनक बनायेगा । इस दस्तावेज पर सम्पूर्ण समाज में पर्याप्त विचार - विमर्श हुआ और विभिन्न वर्गों - बौद्धिक , सामाजिक , राजनैतिक , व्यासायिक , प्रशासकीय आदि ने अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कीं । 1986 में भारत सरकार ने शिक्षा नीति , 1986 का प्रारूप तैयार करके जारी किया । इस शिक्षा नीति को कुल बारह खण्डों में विभक्त किया गया

 ( 1 ) प्रस्तावना , 

( 2 ) शिक्षा का सार तथा भूमिका ,

 ( 3 ) राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था 

, ( 4 ) समानता के लिये शिक्षा , 

( 5 ) विभिन्न स्तरों पर शिक्षा का पुनर्गठन

 ( 6 ) तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा , 

( 7 ) शिक्षा व्यवस्था को कारगर बनाना ,

 ( 8 ) शिक्षा की विषय - वस्तु तथा प्रक्रिया को नया मोड़ देना ,

 ( 9 ) शिक्षक , 

( 10 ) शिक्षा का प्रवन्ध , 

( 11 ) संसाधन तथा समीक्षा तथा 

( 12 ) भविष्य । इन खण्डों के विभिन्न विन्दुओं में निहित नीतिगत विचार निम्नांकित हैं : प्रस्तावना मानव इतिहास के आदिकाल से शिक्षा का विविध भाँति विकास एवं प्रसार होता रहा है । प्रत्येक देश अपनी सामाजिक - सांस्कृतिक अस्मिता को अभिव्यक्ति देने और पनपाने के लिये और साथ ही समय की चुनौतियों का सामना करने के लिये अपनी विशिष्ट शिक्षा प्रणाली विकसित करता है लेकिन देश के इतिहास में कभी - कभी ऐसा समय आता है जब मुद्दतों से चली आ रही प्रक्रियाओं को एक नई दिशा देने की जरूरत हो जाती है । आज वही समय है । हमारा देश आर्थिक तथा तकनीकी लिहाज से उस मुकाम पर पहुँच गया जहाँ अब तक के संचित साधनों का इस्तेमाल करते हुए समाज के हर वर्ग को फायदा पहुँचाने के प्रश्न को सुनिश्चित करें । शिक्षा उस लक्ष्य तक पहुँचने का प्रमुख साधन है । इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने जनवरी 1985 में यह घोषणा की थी कि एक नई शिक्षा नीति निर्मित की जायेगी । शिक्षा की मौजूदा हालत का जायजा लिया गया और देशव्यापी बहस इस पर हुई । विभिन्न स्त्रोतों से सुझाव व विचार प्राप्त हुए , जिन पर मनन चिन्तन हुआ । 1968 की शिक्षा नीति तथा उसके बाद 1968 की शिक्षा नीति स्वतन्त्रता के बाद के शिक्षा इतिहास में एक अहम् कदम थी । उसका उद्देश्य था

 ( i ) राष्ट्र की प्रगति को बढ़ाना ,

 ( ii ) सामान्य नागरिकता व संस्कृति और राष्ट्रीय एकता की भावना को सुदृढ़ करना ,

 ( iii ) शिक्षा प्रणाली का सर्वागीण पुनर्निर्माण , 

( iv ) प्रत्येक स्तर की शिक्षा की गुणवत्ता को उठाना , 

( v ) विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का विकास करना , 

( vi ) नैतिक मूल्यों को विकसित करना तथा 

( vii ) शिक्षा और जीवन में गहरा सम्बन्ध कायम करना ।

 ( i ) पूरे देश में इस नीति के लागू होने पर निम्नांकित परिणाम निकले शिक्षा की समान संरचना तथा 10 + 2 + 3 की प्रणाली को अपनाना , 

( ii ) विद्यालयी पाठ्यक्रम में छात्र - छात्राओं को एक समान शिक्षा की व्यवस्था ,

 ( iii )विज्ञान एवं गणित को अनिवार्य विषय बनाना , कार्यानुभव को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करना , 

 ( iv ) स्नातक स्तर पर पाठ्यक्रम बदलने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई , स्नातकोत्तर शिक्षा तथा शोध के लिये उच्च अध्ययन केन्द्र स्थापित किए ( vi ) तथा ( vii ) शिक्षित जनशक्ति की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए महत्वपूर्ण कद उठाए गए । परन्तु उपर्युक्त उपलब्धियाँ स्वयं में महत्वपूर्ण है , किन्तु यह भी सच है कि 1962 की शिक्षा नीति के अधिकांश सुझाव कार्यरूप में परिणित नहीं हो सके , क्योंकि क्रियान्वयन की पक्की योजनाएँ नहीं बनीं , न स्पष्ट दायित्व निर्धारित किये गये और न ही वित्तीय एवं संगठन सम्बन्धी व्यवस्थाएँ हो सकीं । परिणाम यह हुआ कि विभिन्न वर्षों तक शिक्षा को पहुँचाने , उसका स्तर सुधारने और विस्तार करने तथा आर्थिक साधन जुटाने जैसे महत्वपूर्ण काम नहं हो पाये और आज इन कमियों ने एक बड़े अम्बार का रूप धारण कर लिया है । इन समस्याओं का हल निकालना समय की आवश्यकता है । वर्तमान स्थिति ने शिक्षा को एक दुराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है । अब न तो अब तक होते आए सामान्य विस्तार से और न ही सुधार के वर्तमान तौर - तरीकों या रफ्तार से काम चल सकेगा । भारतीय विचारधारा के अनुसार मनुष्य स्वयं में बेशकीमती सम्पदा है , अमूल्य राष्ट्रीय संसाधन है । आवश्यकता इस बात की है कि उसका पालन - पोषण गतिशील एवं संवेदनशील हो । प्रत्येक व्यक्ति का अपना विशिष्ट व्यक्तित्व होता है । जन्म से मृत्युपर्यन्त जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में उसकी अपनी समस्याएँ एवं आवश्यकताएँ होती हैं । विकास की इस पेचीदा और गतिशील प्रक्रिया में शिक्षा अपना उत्प्रेरक योगदान दे सके , इसके लिए बहुत सावधान से योजना बनाने तथा उस पर पूरी तरह से अमल करने की आवश्यकता है । आज भारत राजनैतिक तथा सामाजिक दृष्टि से ऐसे दौर से गुजर रहा है जिससे परम्परागत मूल्यों ( Traditional Values ) को ह्रास का खतरा पैदा हो गया है और समाजवाद , धर्मनिरपेक्षता , लोकतन्त्र तथा व्यावसायिक नैतिकता के लक्ष्यों की प्राप्ति में बराबर बाधाएँ आ रही हैं । ग्रामों में दिन - प्रतिदिन की सहूलियतों के अभाव में पढ़े - लिखे युवक ग्रामों में रहने के लिए तैयार नहीं हैं . इसलिए ग्रामीण तथा नगरीय जीवन के अन्तर को कम करने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के विविध तथा व्यापक साधन उपलब्ध कराने की बहुत आवश्यकता है । आने वाले दशकों में जनसंख्या की बढ़ती हुई गति पर काबू करना होगा । इस समस्या . के समाधान के लिए महिलाओं को साक्षर तथा शिक्षित करना होगा । अगले दशकों के नवीन तनावों से निपटने के लिए मानव संसाधनों को नवीन ढंग से विकसित करना होगा । अतः इन् नवीन चुनौतियों तथा सामाजिक आवश्यकताओं से निपटने के लिए भारत सरकार ने एक नई शिक्षा नीति के प्रारूप में राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का ढाँचा तैयार किया गया । 

 भूमिका ( The Essence and Role of Education )

 1. हमारे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ' सबके लिये शिक्षा ' नितान्त आवश्यक है । यह हमारे भौतिक तथा आध्यात्मिक विकास की बुनियादी आवश्यकता है ।

 2. शिक्षा संस्कृत बनाने का माध्यम है । यह हमारी संवेदनशीलता और दृष्टि को प्रखर बनाती , जिससे राष्ट्रीय एकता पनपती है , वैज्ञानिक स्वभाव ( Scientific Temper ) के अमल की सम्भावना बढ़ती है और समझ एवं चिन्तन में स्वतन्त्रता आती है । साथ ही शिक्षा हमारे संविधान में प्रतिष्ठित समाजवाद , धर्मनिरपेक्षता तथा लोकतंत्र के लक्ष्यों की प्राप्ति में अग्रसर होने में हमारी सहायता करती है ।

 3. शिक्षा द्वारा आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न स्तरों के लिये आवश्यकतानुसार जनशक्ति का विकास होता है । शिक्षा के आधार पर ही अनुसन्धान तथा विकास को सहारा मिलता है जो राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता की आधारशिला है ।

 4. यह कहना सही होगा कि शिक्षा वर्तमान तथा भविष्य के निर्माण का मुख्य साधन है । यही सिद्धान्त राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निर्माण की धुरी माना गया है । राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली ( National System of Education ) जिन सिद्धान्तों पर राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की परिकल्पना की गई है वे हमारे सिद्धान्त में निहित हैं । इस शिक्षा - प्रणाली की प्रमुख बातें इस प्रकार हैं 

1. राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का मूलमंत्र यह है कि एक निश्चित स्तर तक प्रत्येक छात्र को विना किसी जाति - पाँत , धर्म , स्थान या लिंगभेद के लगभग एक जैसी अच्छी शिक्षा उपलब्ध उक्त लक्ष्य को प्राप्त करन के लिए सरकार उपयुक्त रूप से वित्तपोषित कार्यक्रमों को करेगी । सन् 1968 की नीति में अनुशंसित सामान्य स्कूली प्रणाली ( Common प्रारम्भ School System ) को क्रियान्वित करने की दिशा में प्रभावी कदम उठाये जायेंगे । 

2. राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के अन्तर्गत सम्पूर्ण देश के लिए 10 + 2 + 3 की संरचना को स्वीकार किया गया है । इस ढाँचे के पहले दस वर्षों के सम्बन्ध में यह प्रयास किया जाएगा कि उसका विभाजन इस प्रकार हो प्रारम्भिक शिक्षा ( Elementary Education ) में 5 वर्ष का प्राथमिक स्तर तथा 3 वर्ष का उच्च प्राथमिक स्तर तथा उसके बाद 2 वर्ष का हाईस्कूल ।

 3. राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली पूरे देश के लिए एक राष्ट्रीय शिक्षाक्रम ( Curriculum ) के ढाँचे पर आधारित होगी जिसमें एक ' सामान्य - केन्द्रिक ' ( Common Core ) होगा और अन्य तत्वों के बारे में लचीलापन होगा जिन्हें स्थानीय पर्यावरण तथा परिवेश के अनुसार ढाला जा सकेगा । ' सामान्य केन्द्रिक ' में भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन का इतिहास संवैधानिक जिम्मेदारियाँ ( constitutional Obligations ) तथा राष्ट्रीय अस्तिमा ( National Identity ) से सम्बन्धित तत्व होंगे । इन तत्वों को इस प्रकार से सँजोया जायेगा जिससे राष्ट्रीय मूल्यों को विकसित किया जा सके । इन राष्ट्रीय मूल्यों में निम्नलिखित बातें शामिल होंगी भारत की समान सांस्कृतिक धरोहर , लोकतन्त्र , धर्मनिरपेक्षता , स्त्री - पुरुषों के बीच पर्यावरण का संरक्षण , सामाजिक समता , सामाजिक अवरोधों को दूर करना , सीमित समानता , परिवार का महत्व तथा वैज्ञानिक स्वभाव का विकास । सभी शैक्षिक कार्यक्रम धर्मनिरपेक्ष के मूल्यों के अनुरूप आयोजित किये जायेंगे ।

 4. नवीन शिक्षा - प्रणाली आने वाली सन्तति में विश्वव्यापी दृष्टिकोण को सुदृढ़ बनारे साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग और शान्तिपूर्ण सह - अस्तित्व की भावना का विकास करे । 

5. समानता के उद्देश्य को साकार बनाने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली में सभी के शिक्षा का समान अवसर ही उपलब्ध नहीं कराया जायेगा वरन् सभी को शिक्षा में सफल प्राप्त करने के समान अवसर प्रदान किये जायेंगे । अतः राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य है कि सामाजिक माहौल तथा जन्म के संयोग से उत्पन्न पूर्वाग्रहों तथा कुण्ठाओं को समाप्त किया जाय । 

6. प्रत्येक चरण पर दी जाने वाली शिक्षा का न्यूनतम स्तर निर्धारित किया जायेगा । ऐसे उपाय भी किये जायेंगे कि विद्यार्थी देश के विभिन्न भागों की संस्कृति , परम्पराओं तथा सामाजिक व्यवस्था को समझ सकें । युवा वर्ग को अपनी कल्पना और सूझबूझ के अनुसार देश कि महिमा तथा गरिमा पहचानने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा । 

7. देश में सम्पर्क भाषा को बढ़ावा देने के लिए प्रयास किया जायेगा । 

8. उच्च शिक्षा , सामान्य तथा खासतौर से तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने की योग्यता रखने वाले प्रत्येक छात्र को बराबर के मौके दिये जाने की व्यवस्था की जायेगी । साथ ही एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाकर अध्ययन करने की सुविधा दी जायेगी । विश्वविद्यालयों तथा उच्च शिक्षा की अन्य संस्थाओं में सार्वदेशिक स्वरूप पर बल दिया जायेगा ।

 9. शोध , विकास तथा विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा के विषयों में देश के विभिन्न संस्थाओं के बीच व्यापक ताना - बाना ( Network ) स्थापित करने के लिए विशेष व्यवस्था की जायेगी जिससे वे अपने - अपने साधन सम्मिलित कर राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में भाग ले सकें । 

10. शिक्षा के पुनर्निर्माण के लिए शिक्षा में असमानताओं को कम करने के लिए , प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण के लिए प्रौढ़ साक्षरता के लिए , वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी पर होगा । अनुसन्धान के लिए इस प्रकार के अन्य लक्ष्यों के लिए साधन जुटाने का दायित्व समूचे राष्ट्र

 11. आजीवन शिक्षा शैक्षिक प्रक्रिया का मूलभूत लक्ष्य है और सार्वजनिक साक्षरता उसका विभिन्न अंग । युवा वर्ग , गृहणियों , किसानों , मजदूरों , व्यापारियों आदि को अपनी पसन्द व सुविधा के अनुसार अपनी शिक्षा जारी रखने के अवसर प्रदान किये जायेंगे । इसलिए भविष्य शिक्षा प्रणाली के महत्वपूर्ण अंग होंगे । में खुली शिक्षा ( Open Education ) तथा दूरस्थ शिक्षण ( Distance Learning ) राष्ट्रीय महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी आगे आने वाले वर्षों में निम्नलिखित संस्थाएँ राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली के विकास में 

1. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग 

2. अखिल भारतीय तकनीकी परिषद् 

3. भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् 

4. भारतीय चिकित्सा परिषद्

 5. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद्

 6. राष्ट्रीय शैक्षिक नियोजन तथा प्रशासन संस्थान 

7. अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी 


                                शिक्षा संस्थान उपर्युक्त सभी संस्थाओं को एक समेकित योजना के द्वारा जोड़ा जायेगा ताकि इनमें आपस में कार्यात्मक सम्बन्ध स्थापित हो तथा अनुसन्धान और स्नातकोत्तर शिक्षा के कार्यक्रम मजबूत बन सकें । समानता के लिए शिक्षा ( Education for Equality ) नई शिक्षा नीति विषमताओं को दूर करने पर विशेष बल देगी और अब तक वंचित रहे लोगों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के समान अवसर मुहैया करेगी 

1. महिलाओं की समानता हेतु शिक्षा ( Education for Women's Equa lity ) - इसके लिये अग्रलिखित कदम उठाये जायेंगे 

( i ) शिक्षा का उपयोग महिलाओं की स्थिति में बुनियादी परिवर्तन लाने के लिये एक साधन के रूप में किया जायेगा ।

 ( ii ) महिलाओं से सम्बन्धित अध्ययन को विभिन्न पाठ्यचर्याओं के भाग के रूप में • प्रोत्साहन दिया जायेगा और शिक्षा संस्थाओं को महिला विकास के सक्रिय कार्यक्रम शुरू करने के लिए प्रेरित किया जायेगा । 

( iii ) महिलाओं में साक्षरता प्रसार को तथा उन रुकावटों को दूर करने को जिनके कारण लड़कियाँ प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रह जाती हैं , सर्वोपरि प्राथमिकता दी जायेगी । 

( iv ) लड़के और लड़कियों में किसी प्रकार का भेद - भाव न बरतने की नीति पर पूरा जोर देकर अमल किया जायेगा ताकि तकनीकी और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में पारम्परिक रवैयों के कारण चले आ रहे लिंग मूलक विभाजन ( Sex Stereotyping ) को खत्म किया जा सके तथा गैर - परम्परागत आधुनिक काम - धन्धों में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ सके । इसी प्रकार मौजूदा और नई प्रौद्योगिकी में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जायेगी 

। 2. अनुसूचित जातियों की शिक्षा ( Education of Scheduled Castes ) अनुसूचित जातियों के शैक्षिक विकास पर बल दिया जायेगा जिससे वे गैर - अनुसूचित जाति के लोगों के बरावर आ सकें । इस मकसद के तहत नई नीति में उपाय सोचे गये हैं 

( i ) निर्धन परिवारों को इस प्रकार का प्रोत्साहन दिया जाये कि वे अपन बच्चों को 14 वर्ष की आयु तक नियमित रूप से स्कूल भेज सकें 

। ( ii ) सफाई कार्य , पशुओं की चमड़ी उतारने तथा चर्म शोधन जैसे व्यवसायों में लगे परिवारों के बच्चों के लिए मैट्रिक - पूर्व छात्रवृत्ति योजना पहली कक्षा से शुरू की जायेगी । 

( iii ) अनुसूचित जातियों के शिक्षकों की नियुक्ति पर विशेष ध्यान देना ।

 ( iv ) जिला केन्द्रों पर अनुसूचित जातियों के छात्रों के लिए छात्रावासों की सुविधाएं क्रमिक रूप से बढ़ाना ।

 ( v ) स्कूल भवनों , बालवाड़ियों तथा प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों का स्थान चुनते समय अनुसूचित जाति के व्यक्तियों की सहूलियत पर विशेष ध्यान देना ।[ 

  ] ( vi ) अनुसूचित जातियों के लिए शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम तथा ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारण्टी के कार्यक्रम के साधनों को f उपयोग करना । 

( vii ) अनुसूचित जातियों की शिक्षा की प्रक्रिया में समावेश बढ़ाने हेतु लगातार नवीन तरीकों की खोज जारी रखना ।


 ( स ) अनुसूचित जनजातियों की शिक्षा ( Education of Scheduled Tribes ) — इन जनजातियों को अन्य लोगों की बराबरी पर लाने के लिए निम्नलिखित कदम | तत्काल उठाये जायेंगे - 

( i ) आदिवासी इलाकों में प्राथमिक शालाएँ खोलने के काम को प्राथमिकता दी जायेगी । 

( ii ) आदिवासी भाषाओं के माध्यम से प्रारम्भ में शिक्षा दी जायेगी ।

 ( iii ) पढ़े - लिखे प्रतिभाशाली आदिवासी युवकों को प्रशिक्षण देकर अपने क्षेत्र में हो शिक्षक बनने के लिये प्रोत्साहन दिया जायेगा । 

( iv ) बड़ी संख्या में आश्रमशालाएँ तथा आवासीय विद्यालय खोले जायेंगे । 

( v ) उच्च शिक्षा के लिये दी जाने वाली छात्रवृत्तियों में तकनीकी तथा व्यावसायिक पढ़ाई के लिये अधिक महत्त्व दिया जायेगा ।

 ( vi ) आँगनवाड़ियाँ , अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र तथा प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र आदिवासी बहुल इलाकों में प्राथमिकता के आधार पर खोले जायेंगे ।

 ( vii ) आदिवासियों की समृद्ध सांस्कृतिक अस्मिता तथा विशाल सृजनात्मक प्रतिभा के बारे में चेतना सभी स्तरों के पाठ्यक्रमों का अनिवार्य अंग होगी ।


 ( द ) शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए दूसरे वर्ग तथा क्षेत्र ( Other Educationally Backward Sections and Areas ) - शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े हुए सभी वर्गों को विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में , समुचित प्रोत्साहन दिया जायेगा । पहाड़ी और रेगीस्तानी जिलों में , दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में और टापुओं में पर्याप्त संख्या में शिक्षा संस्थाएँ खोली जायेंगी ।

 ( य ) अल्पसंख्यक ( Minorities ) - अल्पसंख्यकों के कुछ वर्ग तालीमी दौड़ में काफी पिछड़े और वंचित हैं । सामाजिक न्याय और समानता का तकाजा है कि ऐसे वर्गों की तालीम पर पूरा ध्यान दिया जावे । संविधान में उन्हें अपनी भाषा और संस्कृति की हिफाजत करने तथा अपनी शैक्षिक संस्थाएँ कायम करने और उन्हें चलाने के जो अधिकार दिये गये हैं , वे भी इनमें शामिल हैं । साथ ही पाठ्य पुस्तकें तैयार करने में और सभी स्कूली क्रियाकलापों में वस्तुगतता रखी जावेगी तथा सामान्य केन्द्रित शिक्षाक्रम ' ( Core के लिये सभी सम्भव प्रयास किये जायेंगे । Curriculum ) के अनुरूप राष्ट्रीय लक्ष्यों तथा आदर्शों के आधार पर एकता को बढ़ावा देने


 ( र ) विकलांग ( Handicapped ) — शारीरिक तथा मानसिक दृष्टि से विकलांगों को • शिक्षा देने का उद्देश्य यह होना चाहिये कि वे समाज के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चल सकें । इस सम्बन्ध में निम्नलिखित उपाय किये जायेंगे बच्चों के साथ हो । ( i ) विकलांगता अगर हाथ - पैर की या मामूली सी है , तो ऐसे बच्चों की पढ़ाई आम 

( ii ) गम्भीर रूप से विकलांग बच्चों के लिये छात्रावास वाले विद्यालयों की व्यवस्था की जायेगी । ऐसे विद्यालय जिला मुख्यालयों पर स्थापित किये जायेंगे  

( iii ) विकलांगों के लिये व्यावसायिक प्रशिक्षण की पर्याप्त व्यवस्था की जायेगी । किया जायेगा ।

 ( iv ) विकलांगों की शिक्षा के लिये स्वैच्छिक प्रयासों को हर सम्भव तरीके से प्रोत्साहित 

( v ) शिक्षकों , मुख्यतः प्राथमिक कक्षाओं के शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी उनकी सहायता कर सकें । नया रूप दिया जायेगा ताकि वे विकलांग बच्चों की कठिनाइयों को ठीक तरह से समझकर R1 प्रौढ़ शिक्षा ( Adult Education ) प्रौढ़ शिक्षा के वर्तमान कार्यक्रमों का पुनरावलोकन करके उन्हें मजबूत बनाया जायेगा । समूचे देश को निरक्षरता उन्मूलनों के लिए तैयार करना होगा । विभिन्न पद्धतियों तथा माध्यमों का उपयोग करते हुए प्रौढ़ तथा सतत् शिक्षा का एक व्यापककार्यक्रम कार्यान्वित किया जायेगा । इसके अन्तर्गत निम्न प्रकार के कार्यक्रम आयेंगे 

( i ) ग्रामीण क्षेत्रों में सतत् शिक्षा केन्द्रों की स्थापना 


( ii ) नियोजकों , मजदूर संगठनों तथा सम्बन्धित सरकारी एजेन्सियों के द्वारा श्रमिकों की शिक्षा ।

 ( iii ) उच्च शिक्षा की संस्थाओं द्वारा सतत् शिक्षा ।

 ( iv ) जन - शिक्षण तथा समूह शिक्षण के साधन के रूप में रेडियो , दूरदर्शन तथा फिल्मों का उपयोग ।

 ( v ) दूर - शिक्षण ( Distance Learning ) के कार्यक्रम । 

( vi ) स्वाध्याय और स्वयं - शिक्षण ( Self Learning ) में सहायता की व्यवस्था ।

 ( vii ) आवश्यकता और रुचि पर आधारित व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम । 

( viii ) छात्रों के समूहों तथा संगठनों का सृजन

 ( ix ) पुस्तकों के लेखन व प्रकाशन को तथा पुस्तकालयों और वाचनालयों को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन । •



 विभिन्न स्तरों पर शिक्षा पुनर्गठन ( Reorganisation of Education at Different Stages ) 1. शिशुओं की देखभाल तथा शिक्षा ( Early Childhood Care and Education ) - बच्चों के विकास के विभिन्न पहलुओं को अलग - अलग करके नहीं देखा जा सकता । पौष्टिक भोजन व स्वास्थ्य को और बच्चों के सामाजिक , मानसिक , शारीरिक , नैतिक तथा भावनात्मक विकास को समेकित रूप में देखना होगा । इस दृष्टि से निम्नलिखित पर बल दिया जायेगा

 ( i ) शिशुओं की देखभाल और शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जायेगा और इसे समेकित बाल विकास सेवा कार्यक्रम ( Integrated Child Development Services Programme ) से जोड़ा जायेगा ।

 ( ii ) प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण के सन्दर्भ में शिशुओं की देखभाल के केन्द्र खोले जायेंगे । 

( iii ) शिशुओं की देखभाल और शिक्षा के केन्द्र पूरी तरह बाल केन्द्रित होंगे । 

( iv ) इस कार्यक्रम में स्थानीय समुदाय का पूरा सहयोग लिया जायेगा । 

( v ) शिशुओं की देखभाल और पूर्व प्राथमिक शिक्षा के कार्यक्रमों को पूरी तरह समेकित



 2. प्रारम्भिक शिक्षा ( Elementary Education ) - प्रारम्भिक शिक्षा की नई दिशा में दो बातों पर बल दिया जायेगा किया जायेगा ।

 ( क ) 14 वर्ष की अ

वस्था तक के सब बच्चों को विद्यालयों में भर्ती तथा उनका विद्यालय में टिके रहना , तथा (

 ख ) शिक्षा की गुणवत्ता में काफी सुधार । 

( i ) विद्यालय के वातावरण को प्यार , अपनत्व तथा प्रोत्साहन से युक्त बनाया जायेगा । 

( ii ) बालक की शिक्षा पद्धति को बाल केन्द्रित तथा गतिविधि पर आधारित किया जायेगा ।

 ( iii ) प्राथमिक स्तर पर बच्चों को किसी भी कक्षा में फेल न करने की प्रथा को जारी किया जायेगा ।

 ( iv ) मूल्यांकन वर्ष भर में फैला दिया जायेगा । 

( v ) शिक्षा की व्यवस्था में से शारीरिक दण्ड को सर्वथा हटा दिया जायेगा । 

( vi ) प्राथमिक विद्यालयों में आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जायेगी । 1986 की कार्य योजना में इसके तहत ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड की योजना को लागू किया गया । 


अनौपचारिक शिक्षा ( Non - Formal Education ) - ऐसे बच्चे जो बीच में स्कूल छोड़ गये हैं या जो ऐसे स्थानों पर रहते हैं जहाँ स्कूल नहीं है या जो काम में लगे हैं और वे लड़कियाँ जो दिन के स्कूल में पूरे समय नहीं जा सकतीं , इन सबके लिये एक विशाल और व्यवस्थित अनौपचारिक शिक्षा का कार्यक्रम चलाया जायगा । 

( i ) अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों में सीखने की प्रक्रिया को सुधारने के लिये आधुनिक टेक्नोलॉजी के उपकरण की सहायता दी जायेगी ।

 ( ii ) इन केन्द्रों के लिये अनुदेशकों के रूप में काम करने के लिये स्थानीय युवकों व युवतियों को चुना जायेगा ।

 ( iii ) इस धारा ( अनौपचारिक ) में शिक्षा प्राप्त करने के लिए बच्चे योग्यतानुसार औपचारिक धारा के विद्यालयों में प्रवेश पा सकेंगे । 

( iv ) अनौपचारिक धारा की शिक्षा को औपचारिक धारा की शिक्षा के के लिये प्रयास किये जायेंगे । समतुल्य बनाने

 ( v ) ' राष्ट्रीय केन्द्रिक शिक्षाक्रम ' की भाँति का अनौपचारिक शिक्षा पद्धति के लिये भी एक शिक्षाक्रम तैयार किया जायेगा । परन्तु यह शिक्षाक्रम छात्रों की आवश्यताओं पर आधारित होगा । 

( vi ) छात्रों को उच्च कोटि की शिक्षण सामग्री मुफ्त दी जायेगी । को स्थान दिया जायेगा । 


( vii ) अनौपचारिक शिक्षा के कार्यक्रम में खेल - कूद , सांस्कृतिक कार्यक्रम , भ्रमण आदि 

( viii ) अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों के संचालन का कार्य स्वयंसेवी संस्थाएँ तथा पंचायती राज की संस्थाएँ करेंगी परन्तु वित्त व्यवस्था सरकार द्वारा की जायेगी । यह सुनिश्चित किया जाएगा कि 1990 तक जो बच्चे 11 वर्ष के हो जायेंगे उन्हें विद्यालय में 5 वर्ष की शिक्षा या औपचारिक धारा में इसकी समतुल्य शिक्षा अवश्य मिल जाये । इसी प्रकार 1995 तक 14 वर्ष की अवस्था वाले सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा दी जायेगी ।


 3. माध्यमिक शिक्षा ( Secondary Education ) - माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर छात्रों को विज्ञान , मानविकी और सामाजिक विज्ञानों की विशिष्ट भूमिकाओं का ज्ञान होने लगता है । इसी अवस्था पर बच्चों को इतिहासबोध तथा राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य सही ढंग से दिया जा सकता है । साथ ही उन्हें अपने संवैधानिक दायित्वों तथा नागरिकों के अधिकारों से भी परिचित कराना चाहिये । अच्छे पाठ्यक्रम द्वारा उनमें चेतन रूप से कार्यशीलता तथा करुणाशील सामाजिक संस्कृति के संस्कार डाले जायें । इस स्तर पर विशेष संस्थाओं में व्यवसायों की शिक्षा के द्वारा और माध्यमिक शिक्षा की पुनर्रचना के द्वारा देश के आर्थिक विकास के लिये जनशक्ति जुटाई जाये । माध्यमिक शिक्षा को सुलभ तथा उसके दृढ़ीकरण करने के लिये निम्नांकित कदम उठाये जायेंगे मूल्यवान गति निर्धारक विद्यालय - यह एक सर्वमान्य बात है कि जिन बच्चों में विशेष प्रतिभा या अभिरुचि हो , उन्हें अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराकर अधिक तेजी से आगे बढ़ने के अवसर दिये जाने चाहिये । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये देश के विभिन्न भागों में एक निर्धारित ढाँचे पर गति - निर्धारक विद्यालयों की स्थापना की जायेगी । इनमें नई - नई पद्धतियों को अपनाने और प्रयोग करने की छूट रहेगी । आमतौर पर इन विद्यालयों का उद्देश्य होगा कि वे समता और सामाजिक न्याय के साथ शिक्षा में श्रेष्ठता लाएँ । अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिये इन विद्यालयों में आरक्षण रहेगा । इन विद्यालयों में देश के विभिन्न भागों के मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चे एक साथ रहकर सीखेंगे जिससे उनमें राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास होगा । इन विद्यालयों में बच्चों को अपनी क्षमताओं के पूरे विकास का अवसर मिलेगा । ये विद्यालय समूचे देश में विद्यालय सुधार के कार्यक्रम में उत्प्रेरक का काम करेंगे । ये विद्यालय आवासीय तथा निःशुल्क होंगे । अब तक ऐसे 400 से अधिक गति - निर्धारक ( नवोदय विद्यालय ) स्कूल स्थापित किये जा चुके हैं । व्यावसायीकरण - शिक्षण के प्रस्तावित पुनर्गठन में व्यवस्थित तथा सुनियोजित व्यावसायिक शिक्षा के कार्यक्रम को दृढ़ता से क्रियान्वित करना बहुत ही जरूरी है । इससे व्यक्तियों के रोजगार पाने की क्षमता बढ़ेगी । आजकल कुशल कर्मचारियों की माँग और आपूर्ति में जो असन्तुलन है वह समाप्त होगा और ऐसे छात्रों को एक वैकल्पिक मार्ग मिल सकेगा जो इस समय बिना किसी विशेष रुचि या उद्देश्य के उच्च शिक्षा की पढ़ाई किये जाते हैं । व्यावसायिक शिक्षा अपने में शिक्षा की एक विशिष् धारा होगी जिसका उद्देश्य कई क्षेत्रों के चुने गये काम - धन्धों के लिये छात्रों को तैयार करना होंगा । ये कोर्स आमतौर पर सेकंडरी शिक्षा के बाद दिये जायेंगे । लेकिन इस योजना को लचीला रखा जायेगा ताकि आठवीं कक्षा के बाद भी छात्र ऐसे कोर्स ले सकें । औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान भी बड़ी व्यावसायिक शिक्षा के ढाँचे के अनुसार चलेंगे ताकि इनमें प्राप्त सुविधाओं का पूरा लाभ उठाया जा सके । स्वास्थ्य नियोजन तथा स्वास्थ्य सेवा प्रबन्ध को उस क्षेत्र के लिये आवश्यक जनशक्ति प्रशिक्षण से जोड़ा जाना चाहिये । इसके लिए स्वास्थ्य सम्बन्धी व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की आवश्यकता होगी । प्राथमिक तथा मध्य स्तर पर स्वास्थ्य की शिक्षा पाने से व्यक्ति परिवार तथा समाज के प्रति प्रतिबद्ध होगा । इससे उच्चतर माध्यमिक स्तर पर स्वास्थ्य से सम्बनि व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में छात्रों की रुचि बढ़ेगी । कृषि , विपणन , सामाजिक सेवाओं आदि के क्षेत्र में भी इसी प्रकार के पाठ्यक्रम तै किये जायेंगे । व्यावसायिक शिक्षा में ऐसी मनोवृत्तियों , ज्ञान और कुशलताओं पर बल रहे जिससे उद्यमोपन तथा स्वरोजगार की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा । 

( i ) विकलांगों के लिये समुचित कार्यक्रम शुरू किये जायेंगे ।

 ( ii ) व्यावसायिक पाठ्यचर्याओं या संस्थाओं को स्थापित करने का दायित्व सरक और सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के नियोजकों पर होगा । 

( iii ) सरकार स्त्रियों , ग्रामीण तथा जनजातियों के छात्रों और समाज के वंचित करें की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आवश्यक कदम उठायेगी 

1 ( iv ) व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के स्नातकों को ऐसे अवसर दिये जायेंगे जिनके फलस्वरूप वे पूर्व निर्धारित शर्तों के अनुसार व्यावसायिक विकास कर सकें , कैरियर में तरक पा सकें और सामान्य तकनीकी एवं उच्चस्तरीय व्यवसायों के कोर्सों में प्रवेश पा सकें ।

 ( v ) नवक्षाक्षर लोगों , प्राथमिक शिक्षा पूरी किये हुए युवाओं , स्कूल छोड़ जाने वाले और रोजगार में या आंशिक रोजगार में लगे हुए व्यक्तियों के लिए भी अनौपचारिक लचीले और आवश्यकता पर आधारित व्यावसायिक कार्यक्रम चलाये जायेंगे इस सम्बन्ध में महिलाओं पर विशेष ध्यान दिया जायेगा ।

 ( vi ) उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों की अकादमिक धारा के स्नातक यदि चाहें तो उनके लिये उच्चस्तरीय पाठ्यक्रमों का प्रबन्ध किया जायेगा ।

 ( vii ) यह प्रस्ताव है उच्चतर माध्यमिक स्तर के छात्रों का दस प्रतिशत 1990 त और 25 प्रतिशत 1995 तक व्यावसायिक पाठ्यचर्या में आ जायें ।

 ( viii ) व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का पुनरीक्षण नियमित रूप से किया जायेगा ।

 ( ix ) माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रमों के विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिये सरकार अपने अधीन की जाने वाली भर्ती की नीति पर भी पुनः विचार करेगी । 


4. उच्च शिक्षा ( Higher Education ) - उच्च शिक्षा से लोगों को इस बात का अवसर मिलता है कि वे मानव जाति की सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक , नैतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में आई हुई समस्याओं पर विचार कर सकें । विशिष्ट ज्ञान तथा कौशलों के प्रसारण द्वारा उच्च शिक्षा राष्ट्र के विकास में सहायक बनती है । अतः समाज के जीवन में उसकी निर्णायक भूमिका है । शैक्षिक पिरामिड के शीर्ष पर होने के नाते समूची शिक्षा व्यवस्थ के लिये शिक्षक तैयार करने में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान है । ज्ञान के अभूतपूर्व विस्फोट को देखते हुए उच्च शिक्षा को अधिक गतिशील बनाना होगा । साथ ही अनजाने अध्ययन क्षेत्रों में निरन्तर कदम बढ़ाने होंगे । प्रचलित उच्च शिक्षा संस्थाओं ( विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों ) को दृढ़ करने तथा उनकी सुविधाओं के विस्तार के लिये कार्य करना होगा । अनुबन्धन को घटाकर बड़ी संख्या में कॉलेजों को स्वायत्तता देने को प्रोत्साहित किया जायेगा स्वायत्तता तथा स्वतंत्रता के साथ जवावदेही भी अवश्य रहेगी । 

 ( i ) विशिष्टीकरण की माँग को उत्तम ढंग से पूरा करने के लिये पाठ्यक्रमों औरकार्यक्रमों को नये सिरे से तैयार किया जायेगा  सम्पन्न करने के लिये शिक्षा परिषदें बनायी जायेंगी ।

( ii) राज्य स्तर पर उच्च शिक्षा का नियोजन तथा उच्च शिक्षा संस्थाओं में समन्वय ।

( iii ) शिक्षा के स्तर पर निगरानी रखने के लिये विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( U.G.C. ) तथा उक्त परिषदें समन्वय पद्धतियाँ बनायेंगी । 

( iv ) शिक्षा संस्थाओं में न्यूनतम आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था की जायेगी और शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश उनकी ग्रहण क्षमता के अनुसार किया जायेगा । 

v ) शिक्षण विधियों को बदलने के प्रयास किये जायेंगे ।

( vi ) दृश्य - श्रव्य साधनों तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का प्रयोग प्रारम्भ किया जायेगा ।

 ( vii ) विश्वविद्यालयों में अनुसन्धान के लिये अधिक सहायता दी जायेगी तथा उसकी उच्च गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिये कदम उठाये जायेंगे । 

( viii ) भारत विद्या ( Indology ) , मानविकी तथा सामाजिक विज्ञानों में अनुसन्धान के लिये पर्याप्त सहायता दी जायेगी ।

 ( ix ) अन्तरविधि अनुसन्धान ( Interdisciplinary Research ) का विकास करने की दृष्टि से सामान्य , कृषि , चिकित्सा , कानून तथा अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में उच्च सिक्षा के लिये एक राष्ट्रीय निकाय स्थापित किया जायेगा ।

( x ) इस बात का भी प्रयास होगा कि भारत के प्राचीन ज्ञान के भण्डार में पैठा जाये और उसे समकालीन वस्तुस्थिति से जोड़ा जाये ।


 खुला विश्वविद्यालय तथा दूरस्थ अध्ययन

 ( i ) उच्च शिक्षा के लिये अधिक अवसर देने तथा शिक्षा को जनतांत्रिक बनाने की दृष्टि से खुले विश्वविद्यालय की प्रणाली शुरू की गई है ।

 ( ii ) इन उद्देश्यों के लिये 1985 में स्थापित इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय खुला विश्वविद्यालय को सुदृढ़ किया जायेगा । ( iii ) इस प्रबल साधन का विकास एवं विस्तार सावधानी से और सोच - समझकर करना होगा । डिग्री को नौकरी से अलग करना 

1. कुछ चुने हुए क्षेत्रों में डिग्री को नौकरी से अलग करने के लिये कदम उठाये जायेंगे ।

2. डिग्री को नौकरी से अलग करने की योजना उन सेवाओं में शुरू की जायेगी जिनमें विश्वविद्यालय की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये । इस योजना को लागू करने से विशेष कार्यों अपेक्षित कुशलताओं पर आधारित पाठ्यक्रम बनने लगेंगे और इससे उन प्रत्याशियों के साथ अधिक न्याय हो सकेगा जिनके पास विशेष काम करने की क्षमता तो है लेकिन उन्हें वह काम इसलिये नहीं मिल सकता क्योंकि उसके लिये स्नातक प्रत्याशियों को अनावश्यक रूप से तरजीह दी जाती है ।

 3. नौकरियों को डिग्री से अलग करने के साथ - साथ क्रमिक रूप में एक राष्ट्रीय परीक्षण सेवा शुरू की जायेगी । इसके द्वारा स्वैच्छिक रूप से विशिष्ट कामों के लिये प्रत्याशियों की उपयुक्तता की जाँच की जायेगी और इससे देशभर में समतुल्य योग्यताओं के मानक स्थापित हो सकेंगे ।

 4. विशिष्ट व्यावसायिक क्षेत्रों जैसे इंजीनियरी , चिकित्सा , कानून , शिक्षण आदि में इस अस्ताव को लागू नहीं किया जा  जहाँ विशेषज्ञों की सेवाओं की आवश्यकता होती है , अकादमिक अर्हताओं की आवश्यकत बनी रहेगी । ग्रामीण विश्वविद्यालय ग्रामीण विश्वविद्यालय के नवीन ढाँचे को सुदृढ़ किया जायेगा और इसे महात्मा गाँध के शिक्षा सम्बन्धी क्रान्तिकारी विचारों के अनुरूप विकसित किया जायेगा । 


तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा ( Technical and Management Education ) • तकनीकी तथा प्रबन्ध शिक्षा का पुनर्गठन करते समय नई शताब्दी के आरम्भ में जिस प्रकार की परिस्थिति की सम्भावना है , उसे ध्यान में रखना होगा ! अर्थव्यवस्था , सामाजिक वातावरण , उत्पादन तथा प्रबन्धकीय प्रक्रियाओं में सम्भावित परिवर्तन , ज्ञान में तेजी से होते फैलाव तथा विज्ञान एवं तकनीकी में होने वाली प्रगति को इस सन्दर्भ में देखना होगा । 

( i ) अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढाँचे तथा सेवा क्षेत्रों के साथ - साथ असंगठित ग्रामीण क्षेत्र में भी उन्नत प्रौद्योगिकी तथा प्रवन्धकीय जनशक्ति की बेहद आवश्यकता है । अतः सरकार को इस ओर ध्यान देना होगा ।

 ( ii ) वर्तमान तथा उभरती प्रौद्योगिकी दोनों में सतत् शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जायेगा । 

( iii ) जनशक्ति सूचना प्रणाली को विकसित तथा सुदृढ़ किया जायेगा । 

( iv ) संगणक साक्षरता ( Computer literacy ) के कार्यक्रम स्कूल स्तर से ही बड़े पैमाने पर आयोजित किये जायेंगे ।

 ( v ) औपचारिक पाठ्यक्रमों में दाखिले की वर्तमान कड़ी शर्तों के कारण साधारण लोग में अधिकांश को आज तकनीकी तथा प्रवन्धकीय शिक्षा नहीं मिलती । ऐसे लोगों के लिये दूर शिक्षण सुविधाएँ जिनमें जनसंचार माध्यम का उपयोग भी शामिल है , प्रदान की जायेगी । तकनीकी तथा प्रवन्ध शिक्षा कार्यक्रम , पॉलिटेकनीक शिक्षा सहित लचीली मॉड्यूलर पद्धति के अनुसार चलेंगे । इनके लिये पर्याप्त मार्गदर्शन और परामर्श सेवा भी उपलब्ध करायी जायेगी । 

( vi ) महिलाओं , आर्थिक तथा सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों एवं विकलांगों के लाभ के लिये तकनीकी शिक्षा के लिये समुचित औपचारिक तथा अनौपचारिक कार्यक्रम तैयार किये जायेगे

 ( vii ) स्वयं रोजगार को छात्रगण जीविका विकल्प के रूप में स्वीकार करें । अ इसके लिये उन्हें उद्यम - विषयक ( Entrepreneurship ) प्रशिक्षण दिया जायेगा जिसको व्यवस्था डिग्री तथा डिप्लोमा स्तर पर मॉड्यूलर तथा वैकल्पिक कोर्सों द्वारा दी जायेगी । 

( vii ) पाठ्यक्रम को अद्यतन बनाने की सतत् आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये नवीनीकरण द्वारा नई प्रौद्योगिकियों और विषयों को शुरू करना होगा तथा पुराने तथा अर्थहो विषयों को क्रमशः हटाया जायेगा । 

( ix ) प्रवन्ध शिक्षा की प्रासंगिकता को मुख्यतः गैरनियमित तथा कम व्यवस्थित क्षेत्र में बढ़ाने के उद्देश्य से प्रबन्ध शिक्षा प्रणाली द्वारा भारतीय अनुभव एवं अध्ययन पर दस्तावेज जानकारी तैयार की जायेगी और ऊपर बताये गये क्षेत्रों के लिये उपयुक्त ज्ञान एवं शिक्ष कार्यक्रमों का भण्डार तैयार किया जायेगा ।

 ( x ) व्यावसायिक शिक्षा तथा उसके विस्तार पर बल देने के लिये व्यावसायिक शिक्षा , शैक्षिक प्रौद्योगिकी पाठ्यक्रम विकास आदि के लिये अनेक शिक्षकों व पेशावरों की आवश्यकत होगी । इस माँग को पूरा करने के ये कार्यक्रम शुरू किये जायेंगे  

( xi ) ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ पॉलिटेक्नीकों ने सामुदायिक पॉलिटेक्निकों की प्रणाली के माध्यम से कमजोर वर्गों को उत्पादक व्यवसायों में प्रशिक्षण देना शुरू किया है । इस प्रणाली का मूल्यांकन किया जायेगा और उसे समुचित रूप से मजबूत बनाया जायेगा ताकि इनकी गुणवत्ता और प्रसार को बढ़ाया जा सके ।

 ( xii ) शिक्षा की प्रक्रियाओं के नवीकरण के साधनों के रूप में सभी उच्च तकनीकी जनशक्ति उपलब्ध कराना , जो शोध और विकास में उपयोगी साबित हो सके । 

( xiii ) प्रौद्योगिकी में होने वाले परिवर्तनों पर नजर रखने तथा नये आविष्कारों का अनुमान लगाने के लिये भी उपयुक्त व्यवस्था की जायेगी ।

 ( xiv ) इस क्षेत्र में विभिन्न स्तरों पर काम करने वाली संस्थाओं और उनका उपयोग करने वाली प्रणालियों के बीच सहयोग , सहकार्य तथा आदान - प्रदान के रिश्ते कायम करने के अवसरों का पूरा लाभ उठाया जायेगा । उपयुक्त रख - रखाव तथा रोजमर्रा के जीवन में नये - नये प्रयोग करने और उन्हें सुधारने की मनोवृत्ति को व्यवस्थित ढंग से विकसित किया जायेगा ।

 ( xv ) तकनीकी तथा प्रबन्ध शिक्षा खर्चीली होती है । लागत के हिसाब से इसको कारगर बनाने तथा उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिये निम्नलिखित उपाय किये जायेंगे

 1. आधुनिकीकरण को उच्च प्राथमिकता दी जायेगी और पुरानापन हटाया जायेगा । इसको कार्यात्मक दक्षता बढ़ाने के लियये अपनाया जायेगा । 

2. जो संस्थाएँ समाज को और उद्योगों को अपनी सेवाएँ देने की क्षमता रखती हैं , उन्हें ऐसे अवसर देकर अपने लिये संसाधन जुटाने के लिये प्रोत्साहित किया जायेगा । उन्हें अद्यतन शिक्षण संसाधनों , पुस्तकालयों तथा कम्प्यूटर सुविधाओं से सज्जित किया जायेगा । 

3. पर्याप्त छात्रावास व्यवस्था , विशेषत : लड़कियों के लिये की जायेगी । खेलकूद , रचनात्मक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिये सुविधाएं बढ़ाई जायेंगी ।

 4. प्रशिक्षकों की भर्ती में अधिक प्रभावी प्रक्रियाओं का प्रयोग किया जायेगा । वृत्तिका विकास के अवसरों , सेवा शर्तो , कन्सलटेन्सी के मानदण्डों तथा अन्य सुविधाओं को सुधारा जायेगा । 

5. शिक्षकों को बहुमुखी भूमिकाएं निभानी होंगी- शिक्षण , अनुसन्धान शिक्षण सामग्री तैयार करना तथा संस्था के प्रबन्ध में हाथ बँटाना , संकाय सदस्यों के लिये सेवा पूर्व तथा सेवाकालीन प्रशिक्षण अनिवार्य होगा । 

6. स्टाफ विकास कार्यक्रम राज्य स्तर पर समेकित तथा क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित किये जावेंगे ।

 7. तकनीकी संस्थानों और उद्योगों के बीच सक्रिय कार्य सम्बन्ध स्थापित करने का . प्रयास किया जायेगा । 

8. संस्थाओं और व्यक्तियों के उत्कृष्ट कार्य को मान्यता दी जायेगी और पुरस्कृत किया जायेगा ।

 9. घटिया स्तर की संस्थाओं का उभरना रोका जायेगा ।

 10. चुनिन्दा संस्थाओं को शैक्षिक , प्रशासनिक तथा वित्तीय स्वतंत्रता विभिन्न हदों तक दी जायेगी लेकिन साथ ही जिम्मेदारी के समुचित निर्वाह के लिये जवाबदेही की व्यवस्था की जायेगी ।

 11 तकनीकी शिक्षा का सम्बन्ध उद्योग , अनुसन्धान तथा विकास संगठनों से , प्रा और सामुदायिक विकास कार्यक्रमों से तथा पूरक स्वरूप वाले अन्य शिक्षा क्षेत्रों से स्थापि किया जायेगा ।

 12. व्यावसायिक संघों को प्रोत्साहित किया जायेगा और उन्हें इस योग्य बनाया जाये कि वे तकनीकी और प्रबन्ध शिक्षा की प्रगति में अपनी भूमिका निभा सकें ।

 13. अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद ( All India Council for Technic Education - AICTE ) को संवैधानिक निकाय ( Statutory Body ) बनाया जायेगा । परि इस प्राधिकार के द्वारा तकनीकी शिक्षा का नियोजन करेगी ।

 ( i ) स्तरों तथा मानदण्डों का निर्धारण और अनुरक्षण तथा प्रत्यायन करेगी , 

( ii ) प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों के लिये वित्तीय व्यवस्था करेंगी ,

 ( iii ) अनुश्रवण व मूल्यांकन करेगी , 

( iv ) प्रमाणन एवं पुरस्कारों का समकक्षता का निर्वहन करेगी तथा 

( v ) तकनीकी एवं प्रबन्ध शिक्षा के बीच समन्वय स्थापित करेगी । 

14. शिक्षा प्रमाणों को बनाये रखने तथा अन्य अनेक माकूल कारणों को ध्यान रखकर तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के व्यापारीकरण को रोका जायेगा । इसके विकल के रूप में स्वीकृत मानदण्डों और सामाजिक लक्ष्यों के अनुरूप इन क्षेत्रों में निजी व स्वैच्छि प्रयासों को शामिल करने की एक नई पद्धति तैयार की जायेगी ।



 शिक्षा व्यवस्था को कारगर बनाना ( Making the System Work ) शिक्षा व्यवस्था को कारगर बनाने के लिये निम्नलिखित युक्तियाँ अपनायी जायेंगी ।

( i ) अध्यापकों को अधिक सुविधाएँ तथा साथ ही उनकी अधिक जवाबदेही । 

( ii ) छात्रों के लिये सेवा में सुधार तथा साथ ही उनके सही आचरण पर बल । 

( iii ) शिक्षा - संस्थाओं को अधिक सुविधाएँ दिया जाना ।

 ( iv ) राष्ट्रीय तथा राज्य स्तर पर तय किये गये मानदण्ड के आधार पर शिक्षा संस्थाओं के कार्य के मूल्यांकन की पद्धति का सृजन । 


शिक्षा की विषय - वस्तु तथा प्रक्रिया को नया मोड़ देना ( Reorienting the Content and Process of Education ) . इस समय शिक्षा की औपचारिक पद्धति और देश की समृद्ध एवं विविध सांस्कृतिक परम्पराओं के बीच एक खाई है जिसे पाटना अनिवार्य है । आधुनिक टेक्नोलॉजी की धुन में यह नहीं होना चाहिए कि नई पीढ़ी भारतीय इतिहास तथा संस्कृति के मूल से ही कट जाये । संस्कृतविहीनता , अमानवीयता तथा अजनवीकरण ( Alienation ) के भाव से हर कीमत पर वचना होगा । परिवर्तनपरक टेक्नोलॉजी और सतत् चली आ रही देश की सांस्कृतिक परम्परा में एक सुन्दर समन्वय स्थापित करना होगा । शिक्षा की पाठ्यचर्या तथा प्रक्रियाओं को सांस्कृतिक विषय - वस्तु के समावेश द्वारा अधिक से अधिक रूपों में समृद्ध किया जायेगा । इस बात का प्रयास होगा कि सौन्दर्य सामंजस्य तथा परिष्कार के प्रति बच्चों की संवेदनशीलता वढ़े । सांस्कृतिक परम्परा में निष्णात व्यक्तियों को शिक्षा में सांस्कृतिक तत्वों का योगदान करने के लिए आमंत्रित किया जायेगा । इस कार्य में लिखित दोनों परम्पराएँ शामिल होंगी । सांस्कृतिक परम्परा को कायम रखने तथा आगे बढ़ाने के लिए परम्परागत तरीकों से पढ़ाने वाले गुरुओं तथा उस्तादों की सहायता की जायेगी और उनके कार्य को मान्यता दी जायेगी । संस्थाओं के बीच सम्पर्क स्थापित किया जायेगा । ललित कलाओं , संग्रहालय , विज्ञान , लोक विश्वविद्यालय प्रणाली के और कला , पुरातत्व , प्राच्य अध्ययन आदि की उच्च साहित्य आदि विशिष्ट विषयों पर उचित ध्यान दिया जायेगा । इन क्षेत्रों में शिक्षण , प्रशिक्षण और अनुसन्धान की अधिक व्यवस्था की जायेगी ताकि उनके लिये आवश्यक विशेष योग्यता प्राप्त व्यक्तियों की कमी को पूरा किया जाता रहे । मूल्यों की शिक्षा इस बात पर गहरी चिन्ता प्रकट की जा रही है कि जीवन के लिये आवश्यक मूल्यों का ह्रास हो रहा है और मूल्यों पर से ही लोगों का विश्वास उठता जा रहा है । शिक्षा क्रम में ऐसे परिवर्तन की आवश्यकता है जिससे सामाजिक और नैतिक मूल्यों के विकास में शिक्षा एक सशक्त साधन बन सके । हमारा समाज सांस्कृतिक रूप से बहुआयामी है , इसलिये शिक्षा के द्वारा उन सार्वभौमिक और शाश्वत मूल्यों का विकास होना चाहिये जो हमारे लोगों को एकता की ओर ले जा सके । इन मूल्यों से धार्मिक अंधविश्वास , कट्टरता , असहिष्णुता , हिंसा और भाग्यवाद का अन्त करने में सहायता मिलनी चाहिये । इस संघर्षात्मक भूमिका के साथ - साथ मूल्य शिक्षा का एक गम्भीर सकारात्मक दृष्टिकोण भी है जिसका आधार हमारी सांस्कृतिक विरासत , राष्ट्रीय लक्ष्य तथा सार्वभौम दृष्टि है जिस पर आमतौर से बल दिया जाना चाहिये । 

( i ) 1968 की शिक्षा नीति में भाषाओं के विकास के प्रश्न पर विस्तृत रूप से विचार किया गया था । अब इस नीति को अधिक सक्रियता तथा सोद्देश्यता से लागू किया जायेगा । 

( ii ) पुस्तकों के विकास के साथ - साथ मौजूदा पुस्तकालयों के सुधार के लिए तथा नये पुस्तकालयों की स्थापना के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जायेगा । प्रत्येक शिक्षा संस्था में पुस्तकालय की सुविधा के लिये प्रावधान किया जायेगा और पुस्तकालयाध्यक्षों के स्तर को सुधारा जायेगा । 

( iii ) आधुनिक संचार प्रौद्योगिकी से यह सम्भव हो गया है कि पहले की दशाब्दियों में शिक्षा को जिन अवस्थाओं और क्रमों से गुजरना पड़ता था उनमें से कइयों को लाँघकर आगे बढ़ा जाये । इस प्रौद्योगिकी से देश और काल के बन्धनों पर काबू पाना सम्भव हो गया है । हमारा समाज दो खण्डों में बँटा न रहे , इसके लिये आवश्यक है कि शैक्षिक प्रौद्योगिकी सम्पन्न वर्गों के साथ - साथ उन क्षेत्रों में पहुँचे जो इस समय अधिक से अधिक अभावग्रस्त हैं । 

( iv ) शैक्षिक टेक्नोलॉजी के द्वारा मुख्य रूप से ऐसे कार्यक्रमों का निर्माण होगा प्रासंगिक हों और सांस्कृतिक रूप से संगत हों । इस उद्देश्य के लिये देश में विद्यमान संसाधनों का उपयोग किया जायेगा । 

( v ) शैक्षिक प्रौद्योगिकी का प्रयोग उपयोगी जानकारी के लिए , अध्यापकों के प्रशिक्षण तथा पुन : प्रशिक्षण के लिए , शिक्षा की गुणवत्ता ( Quality ) को सुधारने के लिए तथा कला एवं संस्कृति के प्रति जागरूकता और स्थायी मूल्यों के संस्कार उत्पन्न करने के लिए किया जायेगा । औपचारिक तथा अनौपचारिक ( Non - formal ) दोनों प्रकार की शिक्षा में इसका ( Technology ) प्रयोग होगा । मौजूदा व्यवस्थाओं ( Infrastructure ) का अधिक से अधिक उपयोग उठाया जायेगा । जिन ग्रामों में बिजली नहीं वहाँ प्रोग्राम चलाने के लिए बैटरी अथवा सौर ऊर्जा पैक से काम लिया जायेगा । 

( vi ) बच्चों के लिए उच्च कोटि के कार्यक्रमों तथा उपयोगी फिल्मों के निर्माण के लि सक्रिय अभियान लाया जायेगा । कार्यानुभव 

( 1 ) कार्यानुभव ( Work Experience ) को सभी स्तरों पर दी जाने वाली शिक्षा MP एक आवश्यक अंग बनाया जायेगा । 

( 2 ) कार्यानुभव की गतिविधियाँ छात्रों की रुचियों , योग्यताओं और आवश्यकताओं आधारित होंगी । 

( 3 ) शिक्षा के स्तर के साथ ही कुशलताओं तथा ज्ञान के स्तर में वृद्धि होती जायेगी इसके द्वारा प्राप्त किया गया अनुभव आगे चलकर रोजगार पाने में बहुत सहायक होगा ।

 ( 4 ) माध्यमिक स्तर पर दिये जाने वाले पूर्व - व्यावसायिक कार्यक्रमों से उच्च माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रमों के चयन में सहायता मिलेगी । शिक्षा और पर्यावरण पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने की अति आवश्यकता है और यह जागरूक बच्चों से लेकर समाज के सभी आयु वर्गों तथा क्षेत्रों में फैलनी चाहिये । पर्यावरण के प्रति जागरूकता विद्यालयों तथा कॉलेजों की शिक्षा का एक अंग होनी चाहिए । 


इसे शिक्षा की पूरी प्रक्रिया में समाहित किया जायेगा । गणित - शिक्षण 

( 1 ) गणित को एक ऐसा साधन माना जाना चाहिये जो बच्चों को सोचने , तर्क करने विश्लेषण करने तथा अपनी बात को तर्कसंगत ढंग से प्रकट करने में समर्थ बना सकता है । एक विशिष्ट विषय होने के अलावा गणित को ऐसे किसी विषय का सहवर्ती माना जाना चाहिए जिसमें विश्लेषण तथा तार्किकता की आवश्यकता होती है ।

 ( 2 ) गणित शिक्षण को इस प्रकार से पुनर्गठित किया जायेगा कि यह आधुनिक टेक्नोलॉजी के उपकरणों से जुड़ सके । संगणक शिक्षा अब विद्यालयों में कम्प्यूटरों का प्रवेश होने लगा है । इससे शैक्षिक कम्प्यूटरों के प्रयोग का मौका मिलेगा और कार्य कारण सम्बन्ध को और चरों की पारस्परिक क्रिया को समझने तथा सीखने की प्रक्रिया को नवीन दिशा मिलेगी ।


 विज्ञान शिक्षा 

1. विज्ञान शिक्षा को सुदृढ़ किया जायेगा ताकि छात्रों में जिज्ञासा की भावना , हो सकें । सृजनात्मकता , प्रश्न करने का साहस और सौन्दर्य बोध जैसी योग्यताएँ एवं मूल्य विकसित

 2. विज्ञान शिक्षा के कार्यक्रमों को इस प्रकार बनाया जायेगा कि उनसे छात्रों में समस्याओं को सुलझाने और निर्णय करने की योग्यताएँ उत्पन्न हो सकें और वे स्वास्थ्य , कृषि उद्योग और जीवन के अन्य पहलुओं के साथ विज्ञान के सम्बन्ध को समझ सकें । जो लोग  अब तक औपचारिक शिक्षा के दायरे के बाहर रहे हैं उन तक विज्ञान की शिक्षा को पहुँचानेका हर सम्भव प्रयास किया जायेगा  ।


खेल और शारीरिक शिक्षा  की कार्यसिद्धि 

1. खेल और शारीरिक शिक्षा सीखने की प्रक्रिया के अभिन्न अंग हैं और उन्हें छात्रों के मूल्यांकन में शामिल किया जायेगा । 

2. शारीरिक शिक्षा और खेल - कूद की राष्ट्रव्यापी अधोरचना ( Infrastructure ) को शिक्षा व्यवस्था का अंग बनाया जायेगा ।

 3. इस अधोरचना के तहत खेल के मैदानों तथा उपकरणों की व्यवस्था की जायेगी और शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों की नियुक्ति होगी । 

4. भारत के पारस्परिक खेलों पर उचित बल दिया जायेगा ।

 5. सभी विद्यालयों में योग की शिक्षा की व्यवस्था के लिये प्रयास किये जायेंगे और इस दृष्टि से शिक्षक शिक्षा में योग की शिक्षा भी शामिल की जायेगी । 


युवा वर्ग की भूमिका • 

1. शैक्षिक संस्थाओं के माध्यम से और उनके बाहर भी युवाओं को राष्ट्रीय तथा सामाजिक विकास के कार्य में सम्मिलित होने के अवसर दिये जायेंगे । राष्ट्रीय सेवा योजना , राष्ट्रीय कैडेट कोर आदि में से कसी एक में भाग लेना अनिवार्य होगा । 

2. संस्थाओं के बाहर भी युवाओं को विकास , सुधार और विस्तार के कार्य शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा । 

3. राष्ट्रीय सेवाकर्मी योजना को सुदृढ़ किया जायेगा । 

मूल्यांकन प्रक्रिया  में 

1. विद्यार्थियों के कार्य का मूल्यांकन सीखने तथा सिखाने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है । एक अच्छी शैक्षिक नीति के अंग के रूप में शिक्षा में गुणवत्ता सुधार के लिये परीक्षाओं का उपयोग होना चाहिये । 

2. परीक्षा में इस प्रकार सुधार किया जायेगा जिससे कि मूल्यांकन की एक वैध तथा विश्वसनीय प्रक्रिया उभर सके और वह सीखने और सिखाने की प्रक्रिया में एक सशक्त साधन के रूप में काम आ सके ।

 क्रियात्मक रूप में इसका अर्थ होगा

 1. अत्यधिक संयोग ( Chance ) तथा आत्मगतता ( Subjectivity ) के अंश को समाप्त करना ।

 2. रटाई पर जोर को हटाना । 

3. ऐसी सतत् और सम्पूर्ण मूल्यांकन प्रक्रिया का विकास करना जिसमें शिक्षा के शास्त्रीय ( Scholastic ) तथा शास्त्रेत्तर ( Non - Scholastic ) पहलू समाविष्ट हो जायें और जो शिक्षण की पूरी अवधि में व्याप्त रहे । 

4. शिक्षकों , छात्रों तथा माता - पिता के द्वारा मूल्यांकन की प्रक्रिया का प्रभावी प्रयोग । 

5. परीक्षाओं के आयोजन में सुधार । 

6. परीक्षा में सुधार के साथ - साथ शिक्षण सामग्री और शिक्षण विधि में भी सुधार ।

 7. माध्यमिक स्तर से क्रमबद्ध रूप में सेमेस्टर प्रणाली का प्रारम्भ । 

8. अंक के स्थान पर ' ग्रेड ' का प्रयोग तथा 

9. संस्थागत मूल्यांकन की प्रणाली को सरल बनाया जायेगा और बाहरी परीक्षाओं की प्रचुरता को कम किया जायेगा ।किसी समाज में शिक्षकों के स्तर से उसकी सांस्कृतिक - सामाजिक , दृष्टि का पता लगता है । कहा गया है कि कोई भी राष्ट्र अपने शिक्षकों के स्तर से ऊपर नहीं उठ सकता । सरकार और समाज को ऐसी परिस्थितियाँ बनानी चाहिये जिनसे अध्यापकों को निर्माण और सृजन की बढ़ने की प्रेरणा मिले । शिक्षकों को इस बात की आजादी होनी चाहिए कि वे नये प्रयोग कर सकें और सम्प्रेषण की उपयुक्त विधियाँ और अपने समुदाय की समस्याओं और क्षमताओं के अनुरूप नये उपाय निकाल सकें । शिक्षकों को भर्ती करने की प्रणाली में इस प्रकार परिवर्तन किया जायेगा कि उनका चयन उनकी योग्यताओं के आधार पर व्यक्ति - निरपेक्ष रूप से और उनके कार्य की अपेक्षाओं के अनुरूप हो सके । शिक्षकों का वेतन और सेवा की शर्तें उनके सामाजिक और व्यावसायिक दायित्व के अनुरूप हों और ऐसी हों जिनसे प्रभावशाली व्यक्ति शिक्षक - व्यवसाय की ओर आकृष्ट हो ।


 यह प्रयास किया जायेगा कि पूरे देश में , सेवा शर्तों में और शिकायतें दूर करने की व्यवस्था में समानता का वांछनीय उद्देश्य प्राप्त किया जा सके । 

( i ) शिक्षकों की तैनाती और तबादले में व्यक्ति निरपेक्षता लाने के लिए निर्देशक सिद्धान्त बनाये जायेगे ।

 ( ii ) उनके मूल्यांकन की एक पद्धति तय की जायेगी जो खुली ( Open ) आँकड़ों एवं तथ्यों पर आधारित होगी और जिसमें सबका योगदान होगा । 

( iii ) ऊपर के ग्रेड में तरक्की के लिये शिक्षकों को उचित अवसर दिये जायेंगे । 

( iv ) जवाबदेही ( Accountability ) के मानक तय किये जायेंगे । 

( v ) अच्छे कार्य को प्रोत्साहित किया जायेगा और निष्क्रियता को निरुत्साहित । 

( vi ) शैक्षिक कार्यक्रमों के बनाने और उन्हें क्रियान्वित करने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका बनी रहेगी । 

( vii ) व्यावसायिक प्रामाणिकता की हिमायत करने , शिक्षक की प्रतिष्ठा को बढ़ाने और व्यावसायिक दुर्व्यवहार को रोकने में शिक्षक संघों को अहम् भूमिका निभानी चाहिए । शिक्षकों के राष्ट्रीय संघ शिक्षकों के लिये एक व्यावसायिक आचार संहिता बना सकते हैं और उसका अनुपालन करा सकते हैं ।


 शिक्षकों की शिक्षा 

1. शिक्षकों की शिक्षा एक सतत् प्रक्रिया है और इसके सेवापूर्व और सेवाकालीन अंशों को अलग नहीं किया जा सकता । पहले कदम के रूप में शिक्षक - शिक्षा की प्रणाली को आमूल बदला जायेगा । 

2. शिक्षकों की शिक्षा के नये कार्यक्रम में सतत् शिक्षा पर और इस शिक्षा नीति की नई दिशाओं के अनुसार आगे बढ़ने की आवश्यकता पर बल होगा ।.

 3. जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान ( DIET ) स्थापित किये जायेंगे जिनमें प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों की और अनौपचारिक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा के कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण किया जायेगा । की व्यवस्था होगी । इन संस्थानों की स्थापना के साथ ही घटिया प्रशिक्षण संस्थाओं को बन्द 

4. कुछ चुने हुए माध्यमिक शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेजों का दर्जा बढ़ाया जायेगा ताकि ये राज्य शैक्षिक अनुसन्धान एवं प्रशिक्षण परिषदों के पूरक के रूप में काम कर सकें । 

5. राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद को सामर्थ्य और साधन दिये जायेंगे जिससे यह परिषद और पद्धतियों के बारे में मार्गदर्शन कर सकें । शिक्षक - शिक्षा की संस्थाओं को मान्यता देने के लिये अधिकारिक हो और उनके शिक्षाक्रम 

6. शिक्षक - शिक्षा की संस्थाओं और विश्वविद्यालयों के शिक्षा विभागों के आपस में मिलकर काम करने की व्यवस्था की जायेगी । शिक्षा का प्रबन्ध ( The Management of Education ) शिक्षा की आयोजना ( Planning ) तथा प्रबन्ध की व्यवस्था के पुनर्गठन को उच्च प्राथमिकता दी जायेगी । इस सम्बन्ध में जिन सिद्धान्तों को ध्यान में रखा जायेगा , वे निम्नांकित हैं 

( i ) शिक्षा की आयोजना तथा प्रवन्ध का दीर्घकालीन परिप्रेक्ष्य तैयार करना और उसे देश की विकासात्मक और जनशक्ति विषयक आवश्यकताओं से जोड़ना ; 

( ii ) विकेन्द्रीकरण तथा शिक्षा संस्थाओं में स्वायत्तता की भावना उत्पन्न करना ;

 ( iii ) लोकभागीदारी को प्रधानता देना , जिसमें गैर - सरकारी एजेन्सियों का जुड़ाव तथा स्वैच्छिक प्रयास शामिल है ; 

( iv ) शिक्षा की आयोजना और प्रबन्ध में अधिकाधिक संख्या में महिलाओं को शामिल करना ; 

( v ) प्रदत्त उद्देश्यों और मानदण्डों के सम्बन्ध में जवाबदेही के सिद्धान्त की स्थापना । 


राष्ट्रीय स्तर 

1. केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड ( CABE ) शैक्षिक विकास का पुनरावलोकन करेगा , ' शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिये आवश्यक परिवर्तनों को सुनिश्चित करेगा और कार्यान्वयन सम्बन्धी देखरेख में निर्णायक भूमिका अदा करेगा । बोर्ड उपयुक्त समितियों के माध्यम से एवं मानव संसाधन विकास के विभिन्न क्षेत्रों के बीच सम्पर्क एवं समन्वयन के लिये बनाये गये प्रक्रमों के माध्यम से कार्य करेगा । केन्द्र तथा राज्यों के शिक्षा विभागों को सुदृढ़ बनाने के लिये व्यावसायिक दक्षता रखने वाले व्यक्तियों को लाया जायेगा ।

 2. शिक्षा के प्रबन्ध के उपयुक्त ढाँचे के निर्माण के लिये तथा इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में लाने के लिये भारतीय शिक्षा सेवा का एक अखिल भारतीय सेवा के रूप में गठन किया जाये । इस सेवा से सम्बन्धित बुनियादी सिद्धान्तों , कर्त्तव्यों तथा नियोजन की विधि की बाबत निर्णय राज्य सरकारों के परामर्श से किया जायेगा । 


राज्य स्तर 

1. राज्य सरकारें केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की तरह के राज्य शिक्षा सलाहकार वोर्ड ( SABE ) स्थापित करेंगी ।

 2. शैक्षिक आयोजकों , प्रशासकों तथा संस्थाओं के प्रशिक्षण की ओर विशेष ध्यान दिया जायेगा । इस प्रयोजन के लिये मुनासिव चरणों में संस्थागत प्रबन्ध किये जाने चाहिये ।


 जिला तथा स्थानीय स्तर 

1. उच्चतर माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का प्रबन्ध करने के लिये जिला शिक्षा बोर्डों ( District Board Education ) की स्थापना की जायेगी तथा राज्य सरकारें यथाशीघ्र सम्बन्ध में कार्यवाही करेंगी । 

 2. शैक्षिक विकास के विभिन्न स्तरों पर आयोजन , समन्वयन , मानीटरिंग तथा मूल्यांकन में केन्द्रीय , राज्य , जिला तथा स्थानीय स्तर की एजेन्सियाँ सहभागिता निभायेंगी ।

 3. संस्थाध्यक्षों के चयन तथा प्रशिक्षण की ओर विशेष ध्यान दिया जायेगा ।

 4. विद्यालय संगमों ( School Complexes ) को विकसित किया जायेगा ताकि शिक्षा संस्थाओं के आपसी ताने - बाने ( Network ) का माध्यम बने तथा शिक्षकों को व्यावसायिक दक्षता बढ़ाने और उनके द्वारा कर्त्तव्यनिष्ठा के मानदण्डों के पालन में सहायक हो । साथ ही विद्यालय संगमों के द्वारा सम्बन्धित संस्थाओं के लिये अनुभवों का आपसी आदान - प्रदान करना तथा एक दूसरे की सुविधाओं में साझेदारी का रिश्ता बनाना सम्भव हो सके । वे निरीक्षण कार्य की भी अधिकांश जिम्मेदारी संभालेंगे । 

5. गैर सरकारी तथा स्वैच्छिक प्रयासों को जिनमें समाजसेवी सक्रिय समुदाय में शामिल हैं , प्रोत्साहन दिया जायेगा और वित्तीय सहायता भी उपलब्ध करायी जायेगी वरा कि उनकी प्रबन्ध व्यवस्था ठीक हो । साथ ही ऐसी संस्थाओं को रोका जायेगा जो शिक्षा को व्यापारिक रूप दे रही हैं । 


संसाधन तथा समीक्षा ( Resources and Review ) शिक्षा आयोग ( 1964-66 ) , राष्ट्रीय शिक्षा नीति , 1968 और शिक्षा से सम्बन्धित अन्य सभी लोगों ने इस बात पर बल दिया है कि हमारे समतावादी उद्देश्यों , व्यावहारिक तथा विकासोन्मुख लक्ष्यों को तभी प्राप्त किया जा सकता है जबकि इस कार्य के स्वरूप और आयामों के अनुरूप शिक्षा में पूँजी निवेश हो । जिस हद तक सम्भव होगा , इन विभिन्न तरीकों से साधन जुटाए जायेंगे - चंदा इकट्ठा करना , इमारतों का रख - रखाव तथा रोजमर्रा काम में आने वाली वस्तुओं की पूर्ति में स्थानीय लोगों की मदद लेना , उच्च शिक्षा स्तर पर फीस बढ़ाना तथा उपलब्ध साधनों का बेहतर उपयोग करना । वे संस्थाएँ जो अनुसंधान में या वैज्ञानिक जनशक्ति के विकास के क्षेत्र में काम कर रही हैं , अपने काम का उपयोग करने वाली एजेंसियों पर उपकर या प्रभार लगाकर कुछ साधन जुटा सकती हैं । इन एजेंसियों में सरकार और उद्योगों को शामिल किया जा सकता है । ये सभी उपाय न केवल राज्य संसाधनों पर बोझ को कम करने के लिये किये जायेंगे , अपितु शैक्षिक प्रणाली में जनता के प्रति जवाबदेही की व्यापक भावना को पैदा करने के लिये भी कारगर होंगे , यथा - प्रारम्भिक शिक्षा का सार्वजनीकरण , निरक्षरता , निवारण , देशभर में सभी वर्गों के लिये समान शैक्षिक अवसर प्रदान करना , शिक्षा की सामाजिक दृष्टि से प्रासंगिकता बढ़ाना , शैक्षिक कार्यक्रमों की गुणवत्ता और कार्यात्मकता में वृद्धि करना , ज्ञान तथा वैज्ञानिक क्षेत्रों में स्वयं - स्फूर्त आर्थिक विकास के लिए प्रौद्योगिकी का विकास , राष्ट्रीय अस्मिता बनाए रखने के लिए अनिवार्य माने गये मूल्यों के प्रति चेतन जागरूकता पैदा करना । शिक्षा में आवश्यक पूँजी न लगाने या अपर्याप्त मात्रा में लगाने के हानिकारक परिणाम वास्तव में बहुत गम्भीर हैं । इसी तरह , व्यावसायिक तथा तकनीकी शिक्षा और अनुसंधान को उपेक्षा से होने वाली हानि अस्वीकार्य होगी । इन क्षेत्रों में पूरी तरह संतोषप्रद स्तर के कार्य का निष्पादन न होने से हमारे देश की अर्थव्यवस्था से अब तक समय - समय पर गठित  • संस्थाओं के नेटवर्क को पर्याप्त मात्रा में और तत्परता से आधुनिक बनाने की जरूरत होगी क्योंकि ये संस्थाएं बड़ी तेजी से पुरानी पड़ती जा रही हैं । इन अनिवार्यताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा को राष्ट्रीय विकास और पुनरुत्थान के लिये पूँजी लगाने का एक अत्यंत आवश्यक क्षेत्र माना जायेगा । राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में यह निर्धारित किया गया था कि शिक्षा पर होने वाले निवेश को धीरे - धीरे बढ़ाया जाए ताकि वह यथा शीघ्र राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत तक पहुँच सके । चूँकि तब से अब तक शिक्षा पर लगी पूँजी का स्तर उस लक्ष्य से काफी कम रहा है , अत : यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि अब इस नीति में निर्धारित कार्यक्रमों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अधिक दृढ़ संकल्प दर्शाया जाए । यद्यपि समय - समय पर विभिन्न कार्यक्रमों की प्रगति के जायजे के आधार पर वास्तविक आवश्यकताओं का अनुमान लगाया जायेगा , इस नीति के कार्यान्वयन में पूँजी निवेश जिस हद तक जरूरी होगा , उस हद तक सातवीं पंचवर्षीय योजना में ही बढ़ाया जायेगा । यह सुनिश्चित किया जायेगा कि आठवीं पंचवर्षीय योजना से शुरू करके वह राष्ट्रीय आय के 6 प्रतिशत से सर्वदा अधिक हो । समीक्षा - नई शिक्षा नीति के विभिन्न पहलुओं के कार्यान्वयन की समीक्षा प्रत्येक पाँच वर्षों में अवश्य ही की जायेगी । कार्यान्वयन की प्रगति और समय - समय पर उभरती हुई । प्रवृत्तियों की जाँच करने के लिये मध्यावधि मूल्यांकन भी होंगे । भविष्य ( The Future ) भारत में शिक्षा का भावी स्वरूप इतना पेचीदा है कि उसके बारे में स्पष्ट रूपरेखा बना सकना सम्भव नहीं । फिर भी , हमारी उन परम्पराओं को देखते हुए कि जिन्होंने हमेशा बौद्धिक और आध्यात्मिक उपलब्धियों को महत्व दिया है , इसमें किसी तरह का शक नहीं कि हम अपने उद्देश्यों को हासिल करने में कामयाब होंगे । सबसे बड़ा काम है शैक्षिक पिरामिड की बुनियाद को सुदृढ़ बनाना , उस बुनियाद को जिसमें इस शताब्दी के अन्त तक लंगभग सौ करोड़ लोग होंगे । यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जो इस पिरामिड के शिखर पर हों , वे विश्व में सर्वोत्तम स्तर के हों । अतीत में इन दोनों छोरों को हमारी संस्कृति के मूल - स्त्रोतों ने भली - भाँति सिंचित रखा , लेकिन विदेशी आधिपत्य और प्रभाव के कारण इस प्रक्रिया में विकार पैदा हो गया । अब मानव संसाधन विकास का एक राष्ट्रव्यापी प्रयास पुनश्च शुरू होना चाहिये जिसमें शिक्षा अपनी बहुमुखी भूमिका पूर्ण रूप से निभाए ।।


कोठारी कमीशन ने शिक्षा के पाठ्यक्रम

कोठारी कमीशन ने शिक्षा के पाठ्यक्रम की किन - किन सम्भावनाओं प अपने विचार रखे हैं ? 



 विद्यालय का पाठ्यक्रम ( School Curriculum ) शिक्षा का आधार पाठ्यक्रम रहा है । इसी पाठ्यक्रम के द्वारा हम अपेक्षित उद्देश्यों क पूर्ति करना चाहते हैं । शिक्षा शास्त्री इस बात पर जोर देते हैं कि शिक्षा का माध्यम जि पाठ्यक्रम को बनाया गया है , उसने निष्क्रियता उत्पन्न की है । कमीशन ने पाठ्यक्रम की स सम्भावनाओं पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया है ।

 1. पाठ्यक्रम में सुधार की आवश्यकतायें भारतभूमि ही ऐसी भूमि है जहाँ पर राष्ट्र नियोजक , शिक्षा और उसके पाठ्यक्रमों में आयोजना से परे उस निमाण में लगे हैं जिससे जनता को विशेष लाभ होने वाला नहीं है • विदेशों में शिक्षा तथा पाठ्यक्रम पर पहले ध्यान दिया जाता है । देश की आवश्यकतानुसार् पाठ्यक्रम में अनुसंधान होता है और अपने यहां एक प्रकरण निकाल कर दूसरा प्रकरण जोड़ने का नाम ही पाठ्यक्रम सुधार कहलाता है । शिक्षा आयोग ने पाठ्यक्रम में सुधार हेतु इस प्रकार सुझाव दिये हैं ।

1. विश्वविद्यालयों में शिक्षा विभाग अनुसंधान के आधार पर पाठ्यक्रम का निर्माण करें ।

 2. समय - समय पर इन अनुसंधानों में आवर्तन ( Revision ) होते रहने चाहिये ।

 3. पाठ्य पुस्तकों तथा पाठ्य - सामग्री का निर्माण किया जाये । 4. सेवाकालीन पाठ्यक्रम के द्वारा अध्यापकों में उद्भावना उत्पन्न हो । 

5. स्कूलों में नये पाठ्यक्रम प्रयोग करने की स्वतन्त्रता होनी चाहिये । यह कार्य ट्रेनिंग कॉलेजों में सम्बद्ध स्कूलों में होना चाहिये । 

6. स्टेट बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन को सभी विषयों में पाठ्यक्रम , बनाकर सभी सुविधाओं वाले स्कूलों में उनका प्रयोग करना चाहिए । 

7. विभिन्न विषयों की अध्यापक परिषदें , नेशनल कौसिल तथा स्टेट इन्स्टीट्यूट्स आदि के सहयोग से पाठ्यक्रम बनाये जायें । 


2. पाठ्यक्रम का संगठन आयोग इस बात को अनुभव करता रहा है कि स्कूल शिक्षा के पहले सात वर्षों में सबके लिये सामान्य शिक्षा का एक अविभाजित पाठ्यक्रम निर्धारित होना चाहिए । पहली से दसवीं कक्षा तथा पाठ्यक्रम की एक अविछिन्न धारा चलेगी जिसकी समाप्ति पहली वाह्य या सार्वजनिक परीक्षा से होगी और इस सामान्य क्रम में किसी प्रकार धारांकन ( Streaming ) या विशेषीकरण नहीं होगा । अन्तःप्रमुख संस्तुतियाँ इस प्रकार हैं

 1. अव्यवसायिक स्कूलों में 10 वर्ष का सामान्य शिक्षा का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाय । 

2. उस अवस्था के अन्त में पाठ्यक्रम की उपलब्धि के स्तर का पता लगा लिया जाए । 

3. प्राइमरी स्तर पर विषयों का वोझ न लादा गया । केवल भाषा , गणित तथा वातावरण का ज्ञान करने वाले विषय पढ़ाये जायें । 

4. हायर प्राइमरी स्तर का पाठ्यक्रम विस्तृत और गहरा हो जाना चाहिए । शिक्षण पद्धतियाँ विधिवत् इस्तेमाल की जायें । 

5. लोअर सेकेण्डरी स्तर पर विस्तार तथा गहराई के साथ पढ़ाया जाय । 

6. हायर सेकेण्डरी स्तर पर विषयों में वैभिन्य ( Diversification ) हो जाये । 

7. हायर प्राइमरी में प्रतिभावान वालकों को अधिक सुविधा देनी चाहिए । उन्हें एक विषय और या उसी विषय को अधिक गहराई के साथ पढ़ाया जा सकता है । 

8. सेकेण्डरी स्तर पर दो प्रकार के कोर्स हों- ( i ) सामान्य ( Ordinary ) , ( ii ) उन्नत ( Advance ) । 



3. भाषा शिक्षण 

1. नई भाषा नीति शिक्षण के सम्बन्ध में होनी चाहिये । 

2. भाषा नीति इस प्रकार हो- . 

( 1 ) मातृभाषा के बाद हिन्दी को संघ की भाषा मान लिया जाये ।[ समावेशी विद्यालय का सूचन 

( 2 ) अंग्रेजी व्यावहारिक ज्ञान छात्रों के लिये उपयोगी है ।

 ( 3 ) भाषा का विकास अध्यापक और उसके गुणों पर आधारित है ।

 ( 4 ) कक्षा VII - X तक तीन भाषायें बालक को आ जानी चाहिए ।

 ( 5 ) दो अतिरिक्त भाषायें । 

( 6 ) हिन्दी तथा अंग्रेजी वहाँ लागू की जायें जहाँ उनकी आवश्यकता है या प्रेरणा है । 

( 7 ) किसी भी स्तर पर चार भाषायें अनिवार्य की जायें । 



3. त्रिभाषी सूत्र ( Formula ) इन सिद्धान्तों पर आधारित हो

 ( 1 ) मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा । 

( 2 ) केन्द्र सरकार की सरकारी तथा सह - सरकारी भाषा ( जब तक चले ) । 

( 3 ) एक आधुनिक भारतीय या योरोपीय भाषा जो 

( i ) तथा ( ii ) में न आई हो जो शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रयोग की जाती हो । 



1. लोअर प्राइमरी स्तर पर सामान्य रूप से एक भाषा पढ़ाई जाये । वह मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा हो । 

2. हायर प्राइमरी स्तर पर दो भाषायें पढ़ाई जायें , मातृभाष या क्षेत्रीय भाषा एवं सरकारी भाषा ।

3. लोअर सेकेण्डरी स्तर पर तीन भाषायें पढ़ाई जायें- ( i ) मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा , ( ii ) सरकारी या सह - सहकारी भाषा ( iii ) आधुनिक भारतीय भाषा । 


5. आधुनिक साहित्यिक भाषाओं ( अंग्रेजी को छोड़कर ) का अध्ययन चुने हुए स्कूलों में कराया जाये । अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी तथा अंग्रेजी शिक्षा की व्यवस्था की जाये ।


 6. हिन्दी या अंग्रेजी को सरकारी तथा सह - सरकारी भाषा के रूप में तीन और छः वर्ष तक पढ़ाया जाना चाहिए । 


7. उच्च शिक्षा में भाषा का अध्ययन अनिवार्य न हो । 


8. राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के प्रसार तथा प्रचार के प्रयत्न किये जायें लेकिन अनिच्छुक व्यक्तियों पर इसका अध्ययन न थोपा जाये । 


9. देवनागरी तथा रोमन लिपि में अच्छा साहित्य प्रकाशित किया जाये । 

10. अंग्रेजी शिक्षा पाँचवीं कक्षा से पहले आरम्भ न की जाए । 

11. शास्त्रीय भाषा ( संस्कृत , अरबी , फारसी ) को आठवीं कक्षा में विकल्प भाषा के रूप में लागू किया जाये । 


4. विज्ञान तथा गणित की शिक्षा विज्ञान तथा गणित शिक्षण सामान्य शिक्षा के रूप में हर छात्र को पढ़ाये जायें । ( i ) विज्ञान शिक्षण ( Science Teaching ) 

1 लोअर प्राइमी स्तर पर विज्ञान की शिक्षा वातावरण की शिक्षा के रूप में दी जाये । कक्षा VI में रोमन अंक , चार्ट , नक्शों आदि का ज्ञान कराया जाये । की योग्यता उत्पन्न होनी आवश्यक है । •

 2. हायर प्राइमरी स्तर पर तर्क का विकास होना चाहिये । तर्क तथा निष्कर्ष निकालन 

3. लोअर प्राइमरी स्कूल में लाइन्स कॉर्नर ( विज्ञान कोना ) तथा अपर प्राइमरी में प्रयोगशाला एवं व्याख्यान कक्ष होना आवश्यक है । 

4.लोअर सेकेण्डरी स्तर पर विज्ञान को मस्तिष्क के अनुशासन के रूप में विकसित किया जाये । करनी चाहिये ।

 5. लोअर सेकेण्डरी स्तर पर प्रतिभावान बालकों के लिये एडवांस कोर्स की व्यवस्था

 6. विज्ञान की शिक्षा कृषि तथा टेकनॉलोजी को जोड़ने वाली होनी चाहिए । ( ii ) गणित शिक्षण ( Maths Teaching ) RE

( 1 ) मानसिक विकास के लिये गणित शिक्षण पर पूरा ध्यान देना आवश्यक है ।

 ( 2 ) शिक्षा के सभी स्तरों पर गणित के पाठ्यक्रम को आधुनिकतम रूप दिया जाये । 

( 3 ) गणित तथा विज्ञान शिक्षण की पद्धतियाँ नवीनतम हों । ( ii ) 


सामाजिक अध्ययन तथा समाज विज्ञान ( Social Studies & Social Sciences ) न 

( 1 ) सामाजिक अध्ययन अच्छी नागरिकता के लिये अनिवार्य है । इसका पाठ्यक्रम राष्ट्रीय एकता तथा मानव एकता ( Unity of Man ) पर बल दे । 

 ( 2 ) सभी स्तरों पर सामाजिक अध्ययन की पद्धति में वैज्ञानिक भावना होनी चाहिये । अनुभव ( Work Experience ) कार्य कार्य - अनुभव से तात्पर्य है पिछले अनुभवों से लाभ उठाना तथा शिक्षा को उत्पादन चे के साथ जोड़ना । कार्य - अनुभव के द्वारा देशों में खाद्यान्नों में आत्म - निर्भरता , आर्थिक विकास , रोजगार , सामाजिक राष्ट्रीयता एकता , राजनैतिक विकास , औद्योगिक प्रगति सम्भव है । इसीलिए कमीशन ने शिक्षा में उत्पादकता पर जोर देते हुए निम्नलिखित सिफारिशें की हैं 


1. प्राथमिक स्तर पर कार्य अनुभव कार्यक्रम लागू हो । सेकेण्डरी स्तर पर यह कार्यशाला के रूप में कार्य करे । यह कृषि , उद्योग आदि के कार्य की व्यवस्था करे । 


2. जहाँ पर कार्यशाला न हो , वहाँ यन्त्रों तथा औजारों के सैट दिये जायें । 

3. अध्यापकों का प्रशिक्षण , कार्यशालाओं का प्रवन्ध एवं साहित्य का निर्माण हो । कमीशन ने कार्य - अनुभव की परिभाषा इस प्रकार की है- स्कूल - घर , दुकान , खेत , कारखाने या किसी अन्य जगह उत्पादन में शामिल होना " हमारे देश में महात्मा गाँधी द्वारा बेसिक शिक्षा के रूप में एक क्रान्तिकारी प्रयोग शुरू किया गया था । कार्य अनुभव की परिकल्पना वास्तव में उसी तरह की है । इसका वर्णन इस तरह भी किया जा सकता है कि औद्योगीकरण के मार्ग पर खड़े समाज के लिये जिस शिक्षा की कल्पना उन्होंने की थी , उसी की यह पुनर्व्याख्या है । 


( v ) समाज सेवा ( Social Service ) 

( 1 ) सामुदायिक विकास के लिये समाज सेवा कार्यक्रम लागू किया जाये । यह शिक्षा के सभी स्तरों पर हो । 

( 2 ) श्रम तथा समाजसेवा कार्यों के शिविरों की व्यवस्था हो । ( vi ) शारीरिक शिक्षा ( Physical Education ) मानसिक चैतन्य , शारीरिक योग्यता , कुशलता को बनाये रखने के लिए तथा चरित्र के निर्माण के लिये शारीरिक शिक्षा दी जाय । बालक के विकास के सिद्धान्तों पर आधारित इस शिक्षा में परिवर्तन भी किये जा सकते हैं ।

 ( vii ) नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों की शिक्षा ( Moral & Spiritual Education ) 

( 1 ) संगठित रूप में नैतिक शिक्षा देकर आध्यात्मिक मूल्यों का निर्माण होना चाहिये । इसमें प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष विधियों का प्रयोग किया जाना चाहिये । 

( 2 ) नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों के विकास के लिये टाइम - टेबिल में एक यादें पीरियड अवश्य हों । विषय पाठ्यक्रम से सम्बन्धित हो । 

( viii ) रचनात्मक क्रियाएँ ( Creative Activities ) 

( 1 ) सरकार को कला शिक्षण की सम्भावनाओं का अध्ययन करने के लिए एक समिति का निर्माण करना चाहिये । 

( 2 ) स्थानीय समुदायों की सहायता से देश के हर भाग में बाल - भवनों ( Children's Home ) की स्थापना करनी चाहिए । 

( 3 ) चुने हुए विश्वविद्यालयों में कला विभाग खोले जायें । 

( 4 ) आत्माभिव्यक्ति ( Self - expression ) के लिए सहभागी ( Co - curricular ) क्रियाओं का संगठन करना चाहिये । 


( ix ) लड़के - लड़कियों के पाठ्यक्रम में अन्तर ( Difference between the curriculum of Boys & Girls ) हंसा मेहता समिति की रिपोर्ट के अनुसार लिंग ( Sex ) के आधार पर पाठ्यक्रम में भेद न हो । गृह विज्ञान लड़कियों के लिये हो , पर वह अनिवार्य न हो । संगीत तथा ललित कलाओं , विज्ञान तथा गणित की शिक्षा के लिये प्रोत्साहन दिया जाये ।


 ( x ) नये पाठ्यक्रम तथा बुनियादी शिक्षा ( New Curriculum and Basic Education ) बुनियादी शिक्षा का आधार उत्पादन है । उत्पादन क्रियाओं से पाठ्यक्रम आगे बढ़े । वालक समुदाय के सम्पर्क में आये । वह इस प्रकार का रूप ग्रहण कर ले कि शिक्षा के सभी स्तरों पर शिक्षा प्रणाली निश्चितें हो जाये । शिक्षा की सभी अवस्थाएँ बुनियादी हों । बुनियादी शिक्षा के नाम से शिक्षा की अलग श्रेणी या वर्ग न बने । 


शिक्षा नीति ( Educational Policy )

 शिक्षा नीति ( Educational Policy ) कीजिये । .



                                                                         शिक्षा संस्थान 10 + 2 + 3 पर कोठारी शिक्षा आयोग के विचारों को व्यक्त उत्तर शिक्षा प्रणाली : संरचना और स्तर कोठारी कमीशन ने देश की शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन करने के क्रान्तिकारी सुझाव दिये हैं । ये सुझाव निश्चय ही उपयोगी होंगे यदि भारत सरकार इन्हें ज्यों का त्यो मान ले । कमीशन ने शिक्षा के स्तर पर विचार करते हुए चार बातों पर अधिक जोर दिया है

 ( 1 ) शिक्षा के पिरामिड के विभिन्न कोण और उनका आपसी सम्बन्ध ।

 ( 2 ) विभिन्न अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा का कुल समय । 

( 3) प्राप्त सुविधाओं का उपयोग । 

( 4 ) अध्यापकों के गुण , पाठ्यक्रम , अध्यापन - पद्धति , मूल्यांकन तथा भवन एवं साधन । ये चारों बातें शिक्षा के सम्पूर्ण ढाँचे का निर्माण करती हैं । शिक्षा के ढाँचे के निर्माण हेतु कुल शिक्षा का समय तथा साधन पर विचार करना आवश्यक है । विद्यार्थियों के बौद्धिक स्तर का निर्माण करने के लिये विद्यालय स्तर पर दो बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है 

( 1 ) उपयोग की वृद्धि अर्थात् साधन जुटाना , 

( 2 ) विद्यार्थियों में गुणों का विकास । 


1. नवीन शिक्षा संरचना शिक्षा आयोग ने शिक्षा में अपेक्षित सुधार करने के लिए शिक्षा प्रणाली में इस प्रकार नवीन संरचना को स्थान दिये हैं नवीन शिक्षा संरचना इस प्रकार होनी चाहिए 

( 1 ) एक से तीन वर्ष तक की पूर्व विद्यालय शिक्षा ।

 ( 2 ) 10 वर्ष की सामान्य शिक्षा जिसमें 7 से 8 वर्ष की प्रथमिक शिक्षा भी है । इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है । 4 या 5 वर्ष की निम्न प्राथमिक ( Lower primary ) और 2 या 3 वर्ष की उच्च ( Higher primary ) प्राथमिक अवस्था । इसके पश्चात् निम्न माध्यमिक स्तर पर 3 या 2 वर्ष की सामान्य ( General ) शिक्षा या 1 से 3 वर्ष की व्यावसायिक ( Vocational ) शिक्षा दी जाये । 

( 3 ) उच्च शिक्षा की अवस्था में 2 वर्ष की सामान्य शिक्षा या 1 से 3 वर्ष तक की व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए । इसका प्रतिशत 50 कर दिया जाये ।

 ( 4 ) पहली उपाधि ( Degree ) के लिये उच्च शिक्षा का समय 3 वर्ष या अधिक होना चाहिये । इसमें विभिन्न पाठ्य - क्रम हों जो दूसरी डिग्री तथा अनुसंधान में सहायक हो ।

 ( 5 ) विद्यालय में प्रवेश लेते समय बालक की आयु 6 वर्ष से कम न हो । 

( 6 ) सार्वजनिक परीक्षा ( Public Examination ) 10 वर्ष की शिक्षा के पश्चात् होनी चाहिए । 

( 7 ) सामान्य शिक्षा की अधिकता कक्षा IX में होनी चाहिए और कक्षा X में विशेषीकरण ( Specialisation ) को प्रोत्साहन देना चाहिए ।

 ( 8 ) माध्यमिक विद्यालय दो प्रकार के हों 

 ( i ) दस वर्ष का शिक्षण देने वाले । 

( ii ) 11 या 12 वर्ष का शिक्षण देने वाले 


( 9 ) हर हाई स्कूल को उच्चतर माध्यमिक ( Higher Secondary ) स्कूल परिवर्तित करने में अधिकता बरतनी चाहिए । इनमें यह ध्यान रखा जाय कि बड़े विद्या के ही स्तर को ऊँचा उठाया जाये । यह प्रगति विद्यमान स्कूलों की 25 प्रतिशत होनी चाहिए संकोच नहीं करना चाहिए । जो हायर सेकेन्डरी स्कूल आशा के अनुसार कार्य नहीं कर रहे हैं , उनका स्तर गिरा देगे

( 10 ) हायर सेकेण्डरी की कक्षा X में नया पाठ्यक्रम लागू किया जाय । कक्षा ) तथा XII में विभिन्न पाठ्यक्रम के विशेषीकरण की व्यवस्था की जाय । कक्षा ( Transitional ) काल की स्थिति में रहेगी । जिन विद्यालयों में समेकित ( integrate पाठ्यक्रम की व्यवस्था IX , X , XI कक्षाओं में है , वहाँ कक्षा XII खुलने तक विशेष व्यव करनी होगी । 



2. प्री- यूनिवर्सिटी कोर्स का स्थानान्तरण शिक्षा के इस स्वरूप को देखते हुए यह तो सोचना पड़ता है कि प्री - यूनिवर्सिटी पाठ्य क्रम का क्या होगा ? इस सम्बन्ध में कमीशन के सुझाव इस प्रकार हैं 

( 1 ) प्री - यूनिवर्सिटी कोर्स 1975-76 तक यूनिवर्सिटी तथा कॉलेजों से हटा क का पाठ्य - क्रम होना चाहिए । सेकेण्डरी स्कूलों में रख दिया जाय । 1985-86 तक हर हालत में 2 वर्ष का उच्च शिक्ष 

( 2 ) यूनिवर्सिटी तथा कॉलेजों से प्री - यूनिवर्सिटी कोर्स को हटाकर स्कूलों के साथ मिलाने की जिम्मेदारी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ( U.G.C. ) उठाये । 

( 3 ) साथ ही साथ राज्य के शिक्षा विभागों द्वारा हायर सेकेण्डरी कक्षायें चुने हुए स्कूल में आरम्भ कर दी जानी चाहिये । ये स्वयंचालित ( Self Contained ) इकाई के रूप में और इन्हें यथा - विधि आवर्तित ( Recurring ) अनुदान मिलना चाहिए । के लिए पुनर्गठित किया जाना चाहिए ।

 ( 4 ) सेकेण्डरी एजूकेशन बोर्ड को हायर सेकेण्डरी शिक्षा की जिम्मेदारी को निभाने 

( 5 ) चौथी योजना में प्राप्त सुविधाओं का उचित उपयोग किया जाना चाहिए । इस म अग्रगामी ( Pilot ) योजनाओं के रूप में चुने हुये स्कूलों में ये प्रयोग किये जायें । " 

( 6 ) इस समय को सामान्य रूप से पाँचवी पंचवर्षीय योजना में लागू करना चाहिए और इसको अन्तिम रूप सातवीं पंचवर्षीय योजना में मिल जाना चाहिए । 



3. विश्वविद्यालय स्तर पर पुनर्गठन विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षा के पुनर्गठन हेतु आयोग ने ये सुझाव प्रस्तुत किये हैं ।

( 1 ) विश्वविद्यालय में पहली डिग्री के लिये 3 वर्ष से अधिक समय नहीं लगना चाहिये । 

( 2 ) दूसरी डिग्री प्राप्त करने के लिये 2 या 3 वर्ष का अन्तर पर्याप्त है । चलना चाहिए । 

( 3 ) कुछ विश्वविद्यालयों को 3 वर्षीय ग्रेजुएट स्कूल , मास्टर्स डिग्री कोर्स के निमित 

( 4 ) पहली डिग्री के लिए 3 वर्ष का विशेष कोर्स होना चाहिए । इस समय विश्वविद्यालयों में कुछ विशेष विषयों में त्रि - वर्षीय कोर्स आरम्भ करना चाहिए ।

 ( 5 ) नये तथा पुराने पाठ्यक्रमों के मध्य उचित संतुलन होना चाहिए । 

( 6 ) जो छात्र 3 वर्षीय कोर्स लें , उन्हें छात्र - वृत्ति आदि देकर आकर्षित करना चाहिए । 

( 7 ) उत्तर प्रदेश में त्रिवर्षीय डिग्री कोर्स , त्रिवर्षीय ग्रेजुएट स्कूलों की स्थापना से होना चाहिए । ये स्कूल कुछ विशेष विश्वविद्यालयों में कुछ विशेष विषयों में होने चाहिए । अन्य कॉलेजों में 15-20 वर्ष में यह त्रिवर्षीय पाठ्य - क्रम लागू किये जा सकते हैं । 4. सुविधाओं का उपयोग जहाँ एक भौतिक सुविधाओं के उपयोग का प्रश्न है , वे यदि पूरी तरह से उपयोग की जाएँ तो निसन्देह शिक्षा के गठन तथा स्तर में परिवर्तन आयेगा । 



इस हेतु आयोग की संस्तुतियाँ इस प्रकार हैं

 ( 1 ) योजनाओं में विद्यमान सुविधाओं को सघन ( Intensive ) रूप से उपयोग करने पर बल दिया जाना चाहिये । 

( 2 ) पढ़ाई के दिनों की संख्या इस प्रकार रखी जाय- स्कूल- 39 सप्ताह , पूर्व प्राथमिक- 36 सप्ताह , कॉलेज -38 सप्ताह । 

( 3 ) शिक्षा मंत्रालय को राज्य सरकार तथा यू.जी.सी. के साथ मिल कर छुट्टियों के लिए एक कैलेन्डर बना लेना चाहिए । पढ़ाई के दिनों का जो नुकसान परीक्षाओं या अन्य कारणों से हो जाता है , 21 दिन तथा 26 दिनों से ( क्रमश : स्कूल तथा कॉलेजों में ) अधिक नहीं होना चाहिए । •

 ( 4 ) अवकाश का पूरा उपयोग विद्यार्थियों के साथ हो । यह उपयोग अध्ययन में भाग लेने , समाज सेवा शिविरों में जाने , उत्पादक ( Production ) अनुभव , साक्षरता अभियान आदि के अध्ययन से हो । 

( 5 ) स्कूलों में कार्य के दिनों की संख्या बढ़ाई जा सकती है । कॉलेजों में स्वयं - अध्ययनै ( Self Study ) पर बल देना चाहिए । 

( 6 ) शिक्षा संस्थाओं में प्राप्त सुविधाओं , जैसे- पुस्तकालय , प्रयोगशाला , कार्यशाला ( Workshop ) , हस्तकला - केन्द्र ( Craft - sheds ) आदि के उपयोग पर पूरा - पूरा बल दिया जाना आवश्यक है ।



 5. गतिशील तथा विकासशील स्तर आयोग का आज की स्थिति में विचार है- कुल मिलाकर स्थिति प्रकाश और अन्धकार की सम्मिलित तस्वीर है जिसमें उत्थान और पतन , किन्हीं क्षेत्रों में सुधार तथा अन्य किन्हीं में स्तरों का पतन , यह सब कुछ एक साथ देखने को मिलता है । अत : आयोग द्वारा प्रस्तावित सुझाव इस प्रकार हैं 

( 1 ) शिक्षा के सभी स्तरों पर सघन रूप से स्तर को ऊँचा उठाने के प्रयत्ल होने चाहिए । स्कूल के पहले 10 वर्षों में बालक में गुणात्मक विकास हो जिससे इस स्तर पर शिक्षा में अपव्यय ( Wastage ) की संभावना कम रहे । कक्षा X पास करने के पश्चात् यही प्रयत्न सेकेण्डरी तथा उच्च शिक्षा में ही हों । 

( 2 ) प्राथमिक तथा सेकेण्डरी कक्षा के अन्त में राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी मशीनरी का निर्माण किया जाय जो राष्ट्रीय स्तर की परिभाषा कर सके , उनकी पुनरावृत्ति और मूल्यांकन कर सके ।

 ( 3 ) स्तर को उठाने के लिए उचित सहयोग तथा सम्बद्धता ( Co - ordination ) आवश्यकता है । यह सम्बद्धता शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर होनी चाहिए यह उस पृथकता में समाप्त कर दे जिससे शिक्षण संस्थायें ग्रसित हैं । इस दृष्टि से कमीशन का विचार है 

( i ) विश्वविद्यालय तथा कॉलेजों को स्कूलों की कुशलता बढ़ाने में विभिन्न उपयो से योग देना चाहिए ।

 ( ii ) विद्यालय संगमों ( Complexes ) का निर्माण होना चाहिए । ये संगम इस प्रक के होने चाहिये कि एक सेकेण्डरी स्कूल आस - पास के प्राइमरी स्कूलों को प्रभावित कर सके इस प्रकार सभी विद्यालय , विकास के लिए एक समूह का निर्माण कर लेंगे । - इन संगमों का निर्माण करने से पहले हम सोच लें कि भारत में 26000 सेकेण्ड स्कूल हैं जिनमें से 14000 ग्रामीण क्षेत्रों में हैं । इसी प्रकार ग्राम क्षेत्रों में लगभग 6500 , इमरी तथा 3,60,000 लोअर प्राइमरी स्कूल हैं । यों इस मील की परिधि में 26 प्राइम तथा 1 सेकेण्डरी स्कूल हैं । प्राइमरी स्कूलों में सुविधायें नहीं के बराबर हैं । अतः सेकेण्डर स्कूल के हैडमास्टर को प्रसार सेवा ( Extension Service ) का काम करना चाहिए । 


6. पार्ट टाइम शिक्षा आज हमारी शिक्षा तीन मुख्य सारणियों में विभक्त हैं 

( 1 ) प्री - स्कूल शिक्षा , जिसमें कोई औपचारिक शिक्षा नहीं होती । 

( 2 ) स्कूल शिक्षा , जिसमें शिक्षा होती है , काम नहीं । 

( 3 ) स्कूल के बाद की शिक्षा , जिसमें काम होता है , शिक्षा नहीं । इसीलिए हम शायद भूल जाते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य समस्त जीवन भर प्राप्त नह किया जा सकता । यह तो जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है । अतः शिक्षा जैसे भी प्राप्त क गई हो , उसे पूरे समय की शिक्षा की भाँति महत्व देना चाहिए । 


7. एकरूपता अतः आज भारत में शिक्षा के विभिन्न स्तर तथा रूप प्रचलित है । आयोग का विच है कि शिक्षा में एकरूपता के बिना अपेक्षित विकास नहीं हो सकता । शिक्षा के विभिन्न स् तथा उपस्तरों पर एकरूपता का होना आवश्यक है । 

प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनीकरण

  प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनीकरण





 प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनिकरण हेतु समस्याएँ ( Problems of Universalist of Primary Education ) शिक्षा सामाजिक परिवर्तन तथा विकास का सबसे सशक्त अहिंसक कारक है । शिक्षा के माध्यम से सामाजिक बुराईयां - अंधविश्वास , रूढ़िवाद आदि को समाप्त किया जा सकता है तथा व्यक्ति / समाज का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है । फलतः संसार में अनेक राष्ट्रों ने सार्वभौमिक अनिवार्य शिक्षा व्यवस्था प्रारंभ की । शिक्षा प्रसार एवं प्रसार से अल्पावधि में ही वे विकासशील देशों की श्रेणी में आ गए । भारत एक विशाल राष्ट्र है जिसमें नाना प्रकार की विशेषताएँ है । हिमालय की घाटियों में दुर्गम स्थान है , तो रेगिस्तानी देश भी है । पिछड़ी एवं जन - जातियों में अंघ - विश्वास एवं रूढ़िवादी का जोर है , तो आधुनिक परिवारों के विचार पूर्णतया वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है । एक ओर विज्ञान अट्टाविकायों में विलासितापूर्ण जीवन किलकारियां मारता है , तो दूसरी ओर नंगे बालक भूख से झटपटा कर मौत के मुँह में समा रहे हैं । शिक्षा नाम की बात ही दूसरी है । ऐसी परिस्थितियों में शिक्षा के सार्वजनिकरण के क्रम में देश के सामने अनेक समस्याएँ हैं । . स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात् जनता द्वारा चयनिक सरकार का ध्यान शिक्षा की ओर गया । भारतीय संविधान की 45 वीं धारा के निर्देशानुसार अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था 6-14 आयु वर्ग के बालकों - बालिकाओं के लिए प्रावधान रखा गया है । किन्तु क्या , संविधान होने के 55 वर्ष पश्चात् भी हमारी सरकार अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था लागू कर पाई ? स्वर्गीया प्रधान मंत्री इन्दिरा गाँधी के शब्दों में " प्रजातंत्र के सफल संचालन हेतु शिक्षा ( साक्षरता ) अनिवार्य शर्त है । " 6-14 आयु वर्ग के बालकों लिए हमारी सरकार निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा लागू क्यों नहीं कर सकी , आइए हम उन समस्याओं पर विचार करें । ये समस्याएँ निम्नांकित हैं 

( 1 ) आर्थिक समस्याएँ ( Economical Problems ) :

 ( क ) अभिभावकों की आर्थिक समस्याएँ- भारत की अधिकांश जनता गरीबी रेखा से निम्न स्तर की है । निर्धन अभिभावक माता - पिता अपने बच्चों को विद्यालय नहीं भेज़ पाते है । शिक्षा पर होने वाला व्यय यथा - पौशाक , पाठ्य - पुस्तक एवं सहायक ( अधिगम ) सामग्री , का भार वहन करना उनकी सीमा से बाहर की बात होती है । इसके स्थान पर वे निर्धन माता पिता बालकों को अर्थोपार्जन का एक माध्यम बनाते हैं । गाँवों में पशु चराना , खेतों में छोटा देखभाल उनका मुख्य कार्य होता है । शहरी क्षेत्र में निर्धनता की समस्या और भी अधिक मोटा कार्य करना , माता - पिता के खेतिहार कार्य में लगे होने के समय छोटे भाई - बहिनों की • उजागर होती है । गंदी बस्तियों के बालक कमरे के ढेर अथवा कचरा - पात्रों से कागज , पोलीथीन के टुकड़े , फटे - चिथडे एकत्रित करते , चाय की दुकानों पर कार्य करते अथवा भिक्षावृत्ति करते हुए साधारणतया दिखलाई पड़ते है । निर्धनता के इस ताण्डव नृत्य के कारण अभिभावक उन मासूम बच्चों को अर्थोपार्जन संबंधी कार्यों में लगाना अच्छा समझते है , २ कि विद्यालय भेजना । 

( ख ) केन्द्रीय सरकार के समक्ष आर्थिक समस्या- भारत ने प्राथमिक शिक्षा के राज्यों का विषय बना रखा है । फलतः राज्यों में होने वाला शिक्षा व्यय का केन्द्रीय सरका कुछ हिस्सा ही राज्य सरकारों को देती है । वास्तव में देखा जाए तो शिक्षा का विषय केन्द्रीय सरकार का होना चाहिए । शिक्षा को केन्द्रीय सरकार सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करे । किन अब समस्या के कारण केन्द्रीय सरकार शिक्षा पर होने वाले व्यय का कुछ अंश देकर अफ उत्तरदायित्व से मुक्ति कर लेती है । परन्तु 2004-2005 से केन्द्र सरकार द्वारा प्रवर्तित ' सर्व शिक्षा अभियान प्रारम्भ किया गया है । जिसका उद्देश्य है 1. 6-14 आयु वर्ग के सभी बच्चों तक शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना । 2. सभी नामांकित बच्चों के वर्ष 2007 तक 5 वर्षीय प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करना । 3. सभी नामांकित बच्चों को वर्ष 2010 तक 8 वर्षीय प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण कराना । 4. सभी बच्चों का सार्वभौम ठहराव वर्ष 2010 तक सुनिश्चित करना । ( ग ) विद्यालय संबंधी 5. जीवनोपयोगी सन्तोषजनक स्तर की गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध कराना । ( 1 ) विद्यालय भवनों का अभाव- एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में वर्तमान विद्यालय भवनों में 33 प्रतिशत भवन ही ऐसे है जिन्हें किसी प्रकार उपर्युक्त कहा जा सकता है , अर्थात् 67 प्रतिशत भवन अनुपयुक्त है । ये अनुपयुक्त भवन अंधकार से पूर्ण , घुटन से युक्त तथा वर्ष भर सीलन युक्त रहते हैं । इनमें दुर्गन्ध युक्त वातावरण रहता है , न ही प्रकाश की व्यवस्था है और न स्वच्छ एवं ताजा वायु की । बालकों को भेड़ - बकरियों के समान कक्षा कक्ष रूपी बाड़े में बैठा दिया जाता है जिसमें न तो आसन व्यवस्था ही है और न ही अन्य शैक्षिक सुविधाएं । खेल संबंधी सुविधाएँ तो दिशा - स्वप्न मात्र है । स्थानीय संस्थाएँ तथा दानी महानुभाव अपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण उपयुक्त भवनों का निर्माण नहीं करवा पाते है । फलतः मंदिरों , मस्जिदों , अनाथालयों , धर्मशालाओं , टूटे - फूटे पुराने भवनों वृक्षों के नीचे विद्यालय चलते है जिनमें आए दिन किसी न किसी कारण अवकाश करना पड़ता है और वर्षा बनी रहती है । में भवनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की समस्याएँ वरावर ऋतु 

( 2 ) शैक्षिक समस्या- भारत में अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति अति शोचनीय है । आर्थिक कठिनाइयों के कारण विद्यालय

 छात्रों को शैक्षिक सुविधाएँ नहीं जुटा पाते हैं , इस प्रकार शैक्षिक समस्याएँ निम्नलिखित हैं 

( अ ) विद्यालय में पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जाती है । प्राथमिक शिक्षा में अध्यापक छात्र अनुपात 1:40 का है जो कि शैक्षिक दृष्टि से अनुपयुक्त है । एक शिक्षक 40 बालकों को शिक्षण कार्य नहीं करा सकता है । 

( ब ) प्राथमिक विद्यालयों में शैक्षिक सहायक ( अधिगम ) सामग्री का नितान्त अभाव होता है । पाठ्य - पुस्तकें ही एक मात्र शिक्षा का आधार होती है । शिक्षक सहायक / अधिगन सामग्री के अभाव में मौखिक ही समस्या का समाधान करता है । 

( स ) अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की व्यवस्था नहीं है । फलतः भवन की सफाई से लेकर आम समस्त कार्य छोटे - छोटे बालकों को ही करने पड़ते है । अतः उनका ध्यान शिक्षा से हट जाता है । है 

( द ) प्राथमिक विद्यालय में पुस्तकालय तो है ही नहीं । परिणामत : विद्यार्थियों के साथ साथ शिक्षक की भी कूपमण्डूक जैसी स्थिति हो जाती है । उसके ज्ञान का क्षेत्र विस्तृत नहीं हो पाता है ।


 ( 3 ) अन्य समस्याएँ 

( क ) अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों में स्थानीय व्यक्तियों की शिक्षक पद पर नियुक्ति की जाती है । इन नियुक्तियों में पूर्णत : राजनीति कार्य करती है । परिणामतः शिक्षक विद्यालय की ओर ध्यान नहीं देता है । बस अपना निजी कार्य खेती - बाड़ी , दुकानदारी या अन्य कार्य करता है । न तो समय पर विद्यालय आता है और न पूर्ण समय विद्यालय में रूकता है । यहाँ तक कि छात्रों से निजी घरेलू , कार्य करवाता है । फलतः अभिभावक विद्यालय से बच्चे को पृथक् कर लेते हैं । 

( ख ) सरकार की वर्तमान नीति के अनुसार प्रत्येक 500 जनसंख्या की आबादी के पीछे एक प्राथमिक विद्यालय होना चाहिए । किन्तु अभी देश में लगभग 3.50 लाख ग्राम ऐसे है जिनकी आबादी 500 से कम है । परिणामतः इनके बच्चों को अन्य स्थानों पर पढ़ने जाना पड़ता है । 2 वन , नाले , नदी , दूरी तथा छोटे - छोटे बालक आदि कारणों से अन्य गाँव में जाकर बालक के लिए पढ़ाना संभव नहीं है । अतः ऐसे क्षेत्र के बालक शिक्षा से वंचित रह जाते हैं । परिणामतः अभिभावक छोटे बालक को विशेषतः वालिकाओं को इतनी दूर भेजना उचित नहीं समझते और ये बालक शिक्षा से वंचित ही रह जाते हैं । 


( 2 ) राजनैतिक समस्याएँ ( Political Problems ) 

( क ) देश का विभाजन - भारत को स्वतंत्रता तो अवश्य मिली किन्तु ब्रिटिश सरकार चलते - चलते देश का दो टुकड़ों में विभाजन कर गई और साम्प्रदायिक की आग भड़का गई । फलतः आजादी पश्चात् सरकार देश का विभाजन , साम्प्रदायिक दंगे , काश्मीर समस्या , आंतरिक समस्याएँ , जातीयता , प्रान्तीयता , चीन का आक्रमण , पाकिस्तान का आक्रमण आदि में व्यस्त रहने के कारण शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दे पाई । परिणामतः शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय एवं आशातीत प्रगति नहीं हो सकी । 

( ख ) भ्रष्ट राजनीति- हमारे देश की वर्तमान राजनीति का कोई मानदंड नहीं है और न कोई चरित्र , स्वार्थपूर्ति ही सर्वोच्च मापदंड है और वही सबसे बड़ा नेता है जो सर्वाधिक चाल चल कर अपना उल्लू सीधा कर सकें । परिणामतः शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में राजनीति व्याप्त है जो निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट हो जाएगी 

( 1 ) शिक्षक स्थानान्तरण- वर्तमान सरकार एवं नेताओं का एक मात्र कार्य शिक्षक का स्थानान्तरण है । राजस्थान तो इस कार्य में अग्रणी है । शिक्षकों को फुटबॉल बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना उनका मुख्य कार्य है । 

( 2 ) विद्यालय स्थापना- किसी गाँव , ढाणी , मोहल्ला या गली में विद्यालय खुलना चाहिए अथवा नहीं , वह भी स्थानीय नेता पर निर्भर करता है । विरोधी पक्ष के बालकों को  शिक्षा से वंचित रखना तथा उनके गाँव अथवा गली में विद्यालय न खुलवाना उसके शतरंज के पैतरे की मुख्य चाल होती है । सरकार भी इस कार्य में उसकी मददगार होती है ।

 ( 3 ) विद्यालय व्यवस्था में हस्तक्षेप- स्थानीय भ्रष्ट नेता विद्यालय व्यवस्था में हस्तक्षेप करते रहते हैं । परिणामतः प्रधानाध्यापक शैक्षिक प्रगति हेतु स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाता है । यदि कोई उत्साही प्रधानाध्यापक स्थानीय नेताओं को मुंह नहीं लगाता है , ले उसके लिए ये सिरदर्द बन जाते हैं और उसके विरुद्ध नाना प्रकार की शिकायतें उच्चाधिकारियों को करते हैं । उच्चाधिकारी भी उनके प्रभाव एवं अपनी कुर्सी - बाधाओं के कारण कानों में तेल डालकर स्थानीय नेताओं को प्रसन्न करने के लिए उनकी इच्छानुसार कार्य कर देते हैं । 

( 3 ) सामाजिक समस्याएँ ( Social Problems )

 ( 1 ) अशिक्षित अभिभावक - अधिकांश बालकों के अभिभावक स्वयं अशिक्षित है । फलतः वे शिक्षा के महत्व से अपरिचित है । वे अपने बालकों को शिक्षा दिलाने में कोई रुचि नहीं रखते और प्राय : ये भाग्यवादिता का सहारा लेते हैं । अशिक्षित अभिभावक बालकों की शिक्षा के लिए अभिशाप सिद्ध होते हैं और वे सम्पन्न होते हुए भी वालकों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं देते हैं । 

( 2 ) बाल विवाह - छोटे - छोटे बालकों को विवाह बंधन में बांध दिया जाता है । राजस्थान में तो बाल - विवाह का अत्यधिक प्रचलन है । यहाँ तो समाज के कर्णधार भी बाल विवाह में येन - केन - प्रकारेण योग देते हैं । परिणामतः वाल - विवाह के कारण उन वालकों की शिक्षा का कोई प्रश्न नहीं उठता है । 

( 3 ) जाति -प्रथा- जाति प्रथानुसार शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार ब्राह्मण वर्ग का है । गाँवों में आज भी यह विचार क्रियाशील है । शुद्र अथवा वर्तमान हरिजनों को शिक्षा प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है । दूर - दराज के 

( 4 ) पुत्र एवं पुत्री में भेद- हमारे देश में पुत्र को अत्यधिक महत्व दिया जाता है । तथा पुत्री को पराया धन समझ कर उसका तिरस्कर किया जाता है । ग्रामीण क्षेत्रों में यह भेद स्पष्टतया दृष्टिगोचर होता है । फलतः बालिकाओं की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया । जाता तथा अधिकांश अभिभावक बालिकाओं को पढ़ाने को हेय दृष्टि से देखते है । 

( 5 ) अन्य कारण - विद्यालय भवनों की दूरी , शिक्षकों का अभाव , विद्यालय में सुविधाओं का न होना , बालिका विद्यालयों में पुरुष शिक्षक की नियुक्ति , निर्धनता , रूढ़िवादिता नहीं हो पा रहा है । आदि अनेक ऐसे सामाजिक कारण है , जिनकी वजह से प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनिकरण

 ( 4 ) भौगोलिक समस्याएँ ( Geographical Problems ) भारत एक विशाल देश है । जिसमें दुर्गम रेगिस्तान , अगम्य पर्वतमालाएं तथा भीषण जंगल है । इस भौगोलिक विविधता के परिणामस्वरूप ही शिक्षा को अनिवार्य नहीं बनाया जा सका और इसके प्रसार में अनेक कठिनाइयां है । पर्वतीय क्षेत्र में आवागमन के कारण बालक एक स्थान से दूसरे स्थान पर शिक्षा ग्रहण करने नहीं जा सकता है । विशाल मरुस्थल में गांव और आवादी छितरी हुई है । प्रत्येक ढाणी में विद्यालय नहीं है । अतः मरूस्थलीय प्रदेश में विशेषत : ग्रीष्मकाल में जब अंघड चलते है , बालकों का शिक्षा ग्रहण करने एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना संभव नहीं है । असम , नागालैण्ड आदि ऐसे प्रदेश है जहाँ जंगलों , नालों आदि जाना एक टेढ़ी खीर हैं । की बाहुतायत है और जंगली पशु विचरण करते हैं । ऐसी परिस्थितियों में बच्चे का विद्यालय  

( 5 ) शैक्षिक समस्याएँ ( Educational Problems ) : 

( 1 ) दोषपूर्ण पाठ्यक्रम- शिक्षा जगत में प्रचलित पाठ्यक्रम अति दोषपूर्ण है । इस पाठ्यक्रम में स्थानीय आवश्यकताओं पर कोई बल नहीं दिया गया है । राजस्थान में राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान ( S.IE.R.T. ) इस कार्य को करती है । पाठ्यक्रम में पुस्तकीय ज्ञान पर बल दिया गया है । साथ ही संपूर्ण राजस्थान में एक - सा ही पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया है । क्षेत्रीय भिन्नता , स्थानीय परिस्थितियों आदि का कोई ध्यान नहीं रखा गया है । वर्तमान पाठ्यक्रम न तो जीवन से संबंधित है और न व्यावहारिक ही है । पाठ्यक्रम में न तो सरलता ही है और न ही आकर्षण ही । रचनात्मक क्रियाओं को इसमें कोई स्थान नहीं दिया गया है । यदि यह कहा जाए कि पाठ्यक्रम केवल साक्षर बनाने का कार्य करता है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । 

( 2 ) शिक्षकों का अभाव - प्राथमिक पाठशालाओं में शिक्षकों की नितांत कमी रहती है । एक अध्यापकीय पाठशालाएं तो और भी अधिक समस्याग्रस्त होती हैं । परन्तु राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के परिप्रेक्ष्य में ' ब्लैक बोर्ड आपरेशन ' के तहत प्रत्येक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक कार्यरत है । साधारतः अध्यापक छात्र का अनुपात 1 : 40 का है । परिणामतः शिक्षक समस्त छात्रों को मात्र घेर कर ही बैठता है और उन्हें भाग्य के भरोसे छोड़ देता है । 

( 3 ) योग्य शिक्षकों की अनुपलब्धता- योग्य , अनुभवी एवं शिक्षा के क्षेत्र में रूचि रखने वाले व्यक्ति शिक्षा क्षेत्र में कम ही आ पाते हैं जो आ जाते हैं , देर - सवेर अन्य सेवाओं के क्षेत्र में चले जाते हैं । कारण कि शिक्षकों की सेवा स्थिति , वेतनमान आदि अन्य सेवाओं से कम आकर्षक है । जब तो इस क्षेत्र में वही व्यक्ति आते हैं , जिन्हें अन्य क्षेत्रों में स्थान नहीं मिलता हैं अत : योग्य शिक्षकों को आकर्षित करने के लिए उनकी सेवा शर्तों के सुधार , आकर्षक , वेतनमान , पहाड़ी , रेगिस्तानी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में पृथक् से भत्ता आदि देना चाहिए । ताकि योग्य , अनुभवी एवं अच्छे व्यक्ति शिक्षा जगत की ओर आकर्षित हो सकें ।

 ( 4 ) सहायक ( अधिगम ) सामग्री का अभाव - प्राथमिक विद्यालयों में सहायक ( अधिगम ) सामग्री नाम मात्र को उपलब्ध होती है और वह भी बाबा आदम के जमाने की । परिणामत : शिक्षक विद्यार्थी को सब कुछ मौखिक ज्ञान देता हैं व्यावहारिकता के अभाव में छात्रों की रूचि , जिज्ञासा शान्त नहीं हो पाती और वे पाठशाला से जी चुराने लगते हैं । आधुनिक तकनीकी आधारित उपकरण , यन्त्र व साधनों को प्रयुक्त किया जाए ।

 ( 5 ) अमनोवैज्ञानिक शिक्षण पद्धतियाँ- शिक्षा के क्षेत्र में जो भी शिक्षण विधियाँ प्रचलित हैं , ज्यादातर पाश्चात्य है । भारतीय परिस्थितियों में उनकी सफलता संदिग्ध है । शिक्षाशास्त्रियों को भारतीय परिवेशानुसार शिक्षण - पद्धतियों की खोज करनी चाहिए । ताकि वे भारतीय विद्यालयों में सफल हो सके । शैक्षिक नवाचारों पर आधारित नवीनतम प्रविधि अपनायी जाए । उपर्युक्त शैक्षिक समस्याओं के अतिरिक्त अन्य समस्याएँ भी हैं जैसे बालक को रूचि , अभिरूचि का ध्यान नहीं रखना , शिक्षा का जीवन से संबंधित न होना , व्यक्तिगत - भिन्नता को नजरन्दाज कर देना आदि । 

( 6 ) अन्य समस्याएँ ( Other Problems ) - ऊपर कुछ समस्याओं का मोटे रूप मे ही वर्णन किया गया है इनके अतिरिक्त अन्य समस्याएँ भी है , जो निम्नलिखित हो सकती 

1. अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या । 

2. भाषायी भिन्नता की समस्या । 

3. शिक्षा संबंधी प्रचार एवं प्रसार में कमी । 

4. शिक्षा के अलावा अध्यापकों को अन्य कार्यों में नियुक्त कर देना । 

5. बालक को घर पर अध्ययन की सुविधा प्राप्त न होना । 

6. शिक्षा में रोचकता का अभाव , आदि ।

 प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु सुझाव ( Suggestions for Universalization of Primary Education ) प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु निम्नांकित सुझाव दृष्टव्य हैं

 1. शिक्षा के लिए आवंटित बजट में सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा हेतु आर्थिक धनराशि निर्धारित की जाए ताकि प्राथमिक विद्यालयों की संख्या निरंतर बढ़ती जाए और प्रत्येक बालक को अपने निकट ही विद्यालय उपलब्ध हो सकें । रोजस्थान सरकार का यह प्रयास है कि राज्य में प्रति 250 आबादी रहने वाले सामान्य ग्राम तथा प्रति 150 आबादी वाले दूरस्थ गांवों के लिए प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध करा दिए है । 

2. दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों हेतु राजस्थान में चल रही ' शिक्षाकर्मी योजना ' के अन्तर्गत विद्यालय तथा ' प्रहर पाठशालाओं से नामांकन बढ़ा है । अतः इस योजना का सर्वत्र विस्तार किया जाए । 

3. राजस्थान राज्य की भांति सर्वत्र बालिकाओं का प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने हेतु ' सरस्वती योजना ' का प्रसार किया जाए ।

 4. प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने हेतु छात्र - छात्राओं को निःशुल्क पाठ्य पुस्तकों का वितरण किया जाए तथा मध्याह्न भोजन की व्यवस्था की जाए । राजस्थान में ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं तथा " शाला प्रवेश उत्सवों का आयोजन कर सभी बच्चों को प्राथमिक शालाओं में प्रविष्ट कराने का कार्य हो रहा है ।

 5. माता - पिता तथा अभिभावकों को अपने बालक - बालिकाओं को शिक्षित करने के महत्व समझने हेतु प्रौढ़ शिक्षा का कार्यक्रम तेजी से चलाया गया है । राजस्थान में “ लोक किया जा रहा है । ऐसे कार्यक्रम अन्यत्र भी चलाए जाएं । जुम्बिश ” नामक योजना के अंतर्गत " सम्पूर्ण साक्षरता ” कार्यक्रम इसी उद्देश्य से क्रियान्वित

 6. प्राथमिक शिक्षा अत्यधिक प्रसार के लिए ' गुरू - मित्र योजना ' की क्रियान्वित तथा प्राथमिक शिक्षा में गुणात्मक सुधार किया जा सकता है । की जा रही है । जिससे प्राथमिक स्तर पर नामांकन एवं ठहराव को सुनिश्चित किया जा सकेगा 

7. सर्वशिक्षा अभियान - भारत में 6 से 14 वर्ष की आयुवर्ग के प्रत्येक छात्र / छात्रा नुमति प्राप्त की । को 2010 तक अनिवार्य रूप से कक्षा 1 से 8 तक की अनिवार्य शिक्षा दी जा सके । इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए केन्द्र सरकार ने 93 वें संविधान संशोधन को 2002-2003 में राष्ट्रपति से र कारयुक्त शिक्षा प्रदान करना । 

8. वर्ष 2010 की समाप्ति तक इन बच्चों को उपयोगी एवं समुचित गुणवत्ता और संस्कार युक्त शिक्षा प्रदान करना है