शिक्षक की भूमिका ( Role of Teacher )

शिक्षक की भूमिका ( Role of Teacher ) 


सफल शिक्षक के विभिन्न गुणों का वर्णन कीजिये । शिक्षक के व्यावसायिक गुणों का उल्लेख कीजिये । एक आदर्श शिक्षक की प्रमुख विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन कीजिये । अथवा अथवा सफल शिक्षक के किन्हीं चार प्रमुख गुणों का उल्लेख कीजिये । अथवा सफल शिक्षक के सामाजिक गुण पर प्रकाश डालिये । शिक्षक के गुण उत्तर अब हम शिक्षक के मानवीय ( वैयक्तिक ) , व्यावसायिक और नैतिक गुणों पर प्रकाश डालेंगे
1. शिक्षक के वैयक्तिक गुण ( Individualistic Qualities of Teacher )
1. सामाजिकता - शिक्षक में सामाजिकता का गुण अवश्य होना चाहिए । समाज से अलग रहकर वह न तो अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकता है और न छात्रों को नागरिकता की शिक्षा प्रदान कर सकता है । अतः प्रत्येक शिक्षक अपने को समाज के निकट रखे ।
2. उत्तम स्वास्थ्य - आदर्श शिक्षक शारीरिक रूप से पूर्णतया स्वस्थ होता है । बिन अच्छे स्वास्थ्य के कोई भी शिक्षक न तो अपने कर्त्तव्यों का उचित प्रकार से पालन कर सकेगा । और न ही अपने उत्तरदायित्वों को निभा पायेगा । इस प्रकार एक अस्वस्थ शिक्षक शिक्षा विभाग और विद्यालय के लिए बोझ होता है । प्रभावशाली शिक्षण एक स्वस्थ शिक्षक ही कर सकता है ।
3. बुद्धिमान और अध्ययन प्रेमी - शिक्षक को बुद्धिमान तथा अध्ययन प्रेमी होना चाहिए । बुद्धि एक जन्मजात गुण है , जिसका आदर्श शिक्षक में निहित होना आवश्यक है ।
4. संवेगात्मक स्थिरता - छात्रों का भावात्मक विकास करने के लिए शिक्षक में संवेगात्मक स्थिरता का होना परमावश्यक है । प्राय : आर्थिक अभाव , व्यावसायिक कार्याधिकता तथा परिवार का व्यापक उत्तरदायित्व शिक्षक के लिए मानसिक अशान्ति का कारण होता है । चिन्ताएँ शिक्षक में संवेगात्मक अस्थिरता उत्पन्न करती हैं । परिणामस्वरूप वह कक्षा में शिक्षण प्रभावशाली ढंग से नहीं कर पाता तथा विद्यालय में अनेक समस्याएँ खड़ी कर देता है । मानसिक दृष्टि से स्वस्थ तथा संवेगात्मक स्थिरता वाला शिक्षक किसी भी समस्या का ह से समाधान करने , कठिनाई में उत्साह दिखाने , क्रोध और व्याकुलता में शान्ति दिखाने के गुण अपने अन्दर निहित रखता है ।
5. विनोदप्रियता - शिक्षक को हँसमुख तथा विनोदप्रिय होना चाहिए । कक्षा में आवश्यकता से अधिक गम्भीरता वातावरण में नीरसता उत्पन्न कर देती है । एक तानाशाह और कठोरता की मूर्ति बनकर कक्षा में पढ़ाना अनुचित है । भयभीत छात्र अपनी शंकाओं का समाधान करने में भी हिचकते हैं । अतः शिक्षक को पर्याप्त विनोदप्रिय होना चाहिये । उसका विनोदी स्वभाव कक्षा के वातावरण के तनाव को समाप्त कर देता है ।
6. नेतृत्व की योग्यता- शिक्षक में नेतृत्व की योग्यता भी होनी चाहिए , परन्तु उसका नेतृत्व राजनीतिक नेतृत्व न हो , वरन् उसका नेतृत्व उसके चरित्र , प्रभावपूर्ण वाणी , अनुशासनप्रियता , सामाजिकता तथा दूसरों से प्राप्त श्रद्धा और आदर पर निर्भर हो उसे सच्चे रूप में छात्रों का मार्गदर्शक होना चाहिए तथा उनकी विभिन्न कठिनाइयों को हल करने में यथासम्भव सहायता पहुँचानी चाहिए ।

2. शिक्षक के व्यावसायिक गुण ( Vocational Qualities of Teacher ) व्यावसायिक दृष्टि से आदर्श शिक्षक में निम्नलिखित गुणों का होना आवश्यक है
1. शिक्षा के उद्देश्यों के प्रति जागरूक - आदर्श शिक्षक शिक्षा के यथार्थ उद्देश्यों के प्रति पूर्णतया जागरूक रहता है और उन्हें एक पल के लिए भी अपनी दृष्टि से ओझल नहीं होने देता । उसका उद्देश्य छात्रों को केवल पुस्तकीय ज्ञान प्रदान करना मात्र नहीं होता , वरन बालकों की शिक्षा के महानतम् लक्ष्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहयोग देना होता है ।
2. विषय का पूर्ण ज्ञाता- शिक्षक को उस विषय का पूर्ण ज्ञाता होना चाहिए , जिसका कि वह शिक्षण करता है । यदि वह अपने विषय का पूर्ण ज्ञात न हो , तो वह अपने छात्रों का न तो ठीक प्रकार से ज्ञानात्मक विकास कर सकता है , वरन् कभी - कभी तो उसे उनके सम्मुख लज्जित भी होना पड़ सकता है ।
3. प्रयोगात्मक दृष्टिकोण - आदर्श शिक्षक का प्रयोगात्मक दृष्टिकोण होता है । वह शिक्षण की परम्परागत विधियों से ही सन्तोष प्राप्त नहीं करता , वरन् स्वयं भी प्रयोग द्वारा शिक्षण की नवीन विधियों की खोज करता है ।
4. व्यावसायिक प्रशिक्षण - शिक्षक के लिए यह आवश्यक है कि वह पूर्ण व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त किये हो । प्रभावशाली शिक्षण के लिए केवल विषय का ज्ञाता होना आवश्यक नहीं , वरन् शिक्षण विधियों की जानकारी भी आवश्यक हैं । समस्त व्यवसायों के समान अध्यापन भी एक प्रकार का व्यवसाय है जिसके लिए यथायोग्य प्रविधियों एवं कौशल और प्रणालियों के ज्ञान की आवश्यकता है ।
5. व्यवसाय के प्रति निष्ठा- शिक्षक को अपने व्यवसाय या शिक्षण के प्रति निष्ठा और श्रृद्धा की भावना रखनी चाहिए । उसका कर्त्तव्य है कि वह शिक्षण के कार्य को उदात्त व्यवसाय के रूप में स्वीकार करें , उसे एक व्यापार या मजदूरी मानकर न चले । प्रत्येक शिक्षक को अपने व्यवसाय के प्रति उत्साह और उमंग की भावना रखनी चाहिए ।
6. पाठ्य सहगामी क्रियाओं में रुचि - वर्तमान युग में शिक्षक से केवल यह आशा नहीं की जाती कि वह केवल अध्यापन के कार्य में ही निपुणता प्राप्त करे , वरन् उससे यह आशा भी की जाती है कि वह विद्यालय में आयोजित होने वाली विभिन्न पाठ्य सहगामी नाटक , स्काउटिंग , रेडक्रास तथा वाद - विवाद आदि क्रियाओं में छात्रों का मार्गदर्शन करे , परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि उसकी स्वयं की रुचि भी इन क्रियाओं में होनी चाहिए ।

3. शिक्षक के सामाजिक गुण ( Social Qualities of Teacher ) शिक्षक को सामाजिक मधुर सम्बन्धों द्वारा समाज में विश्वास अर्जित करना चाहिए । शिक्षक को उन सामाजिक गुणों को अवश्य ग्रहण करना चाहिए जो कि उसे कक्षा एवं समाज दोनों में सहायता प्रदान करेंगे । इनमें से वह कुछ गुणों को सम्पर्क द्वारा तथा कुछ को प्रशिक्षण द्वारा प्राप्त कर सकता है । ये गुण हैं- सामाजिक चातुर्य , उत्तम निर्णय शक्ति , जीवन के प्रति  आशावादी दृष्टिकोण , परिस्थितियों का सामना करने का साहस , अपनी कमियों को स्वीकार करने की तत्परता एवं मिल - जुलकर कार्य करने की क्षमता आदि ।

4. शिक्षक के नैतिक गुण ( Moral Qualities of Teacher ) एक आदर्श शिक्षक में निम्नलिखित नैतिक गुण होने चाहिए
1. निष्पक्ष एवं न्यायपूर्ण - शिक्षक को निष्पक्ष और न्यायप्रिय होना चाहिए । उसे छात्रों के साथ व्यवहार करने में धनवान , निर्धन या जाति से ऊँच - नीच के आधार पर किसी प्रकार का भेद नहीं करना चाहिये । उसे सभी के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए । उसे सभी के प्रति न्यायोचित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए । ये गुण उसे अनुशासन स्थापना में अत्यन्त सहायक होंगे ।
2. उच्च चरित्र - शिक्षक उच्च चरित्र के बिना कभी भी छात्रों की दृष्टि में आदर का पात्र नहीं हो सकता । शिक्षक को चाहिए कि वह जैसा कहता है , उसका स्वयं आचरण करे । छात्रों के सम्मुख एक आदर्श चरित्र प्रस्तुत करे ।
3. धैर्य और सहनशीलता - धैर्य और सहनशीलता शिक्षक के परमावश्यक गुण हैं । कक्षा में विभिन्न मानसिक स्तर के छात्र होते हैं - कम बुद्धि , मध्यम बुद्धि और तीव्र बुद्धि ऐसी दशा में उन सबको साथ लेकर चलने में अत्यन्त धैर्य और सहनशीलता की आवश्यकता होती है ।
4. देशभक्ति - शिक्षक में देश - भक्ति की प्रवल भावना होनी चाहिए । उसे अपने देश भक्ति के आदर्श को छात्रों के सम्मुख प्रस्तुत कर उन्हें इसके लिए प्रेरित करना चाहिए ।
5. सहयोग की भावना- किसी भी विद्यालय की प्रगति वहाँ के शिक्षक बन्धुओं के आपसी सहयोग पर निर्भर है । अतएव एक शिक्षक में सहयोग की भावना होना अत्यन्त आवश्यक है । शिक्षक को चाहिए कि वह दैनिक कार्य तथा पाठ्येत्तर क्रियाओं में अपने साथियों तथा प्रधानाध्यापक को पूर्ण सहयोग प्रदान करे ।

शैक्षिक नेतृत्व से क्या आशय है ? शैक्षिक नेतृत्व की आवश्यकता एवं महत्व पर प्रकाश डालिए । What do you understand by Educational Leadership ? Throw light on need and importance of Educational Leadership

 

शैक्षिक नेतृत्व से क्या आशय है ? शैक्षिक नेतृत्व की आवश्यकता एवं महत्व पर प्रकाश डालिए । What do you understand by Educational Leadership ? Throw light on need and importance of Educational Leadership 


शैक्षिक नेतृत्व से आशय  ( Meaning of Educational Leadership . ) वास्तव में शैक्षिक प्रशासन के क्षेत्र में सफल प्रशासक बनने के लिये शैक्षिक नेतृत्व की अद्भुत शक्ति को निश्चित रूप से अर्जित करना पड़ता है । जिस प्रकार समाज के अन्य क्षेत्रों में नेतृत्व - शक्ति की महत्ता को सभी स्वीकार करते हैं उसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में “ शैक्षिक नेतृत्व " की परमावश्यकता तथा महत्व को निर्विवाद रूप से माना जाता है । “ शैक्षिक नेतृत्व ” भी प्रभावशाली , आकर्षणपूर्ण तथा अनेक गुणों से युक्त हुआ करता है । “ शैक्षिक नेतृत्व " के लिये जन्मगत अथवा वंशानुक्रम की विशेषताओं को आजकल स्वीकार नहीं किया जाता अपितु व्यक्तित्व सम्बन्धी अनेक गुणों तथा अर्जित योग्यताओं ( Acquired abilities ) को ही शैक्षिक नेतृत्व का आधार स्वीकार किया जाता है । “ यस्य कस्य प्रसूतो अपि गुणवान पूज्येत नरः ” मनुष्य कहीं भी उत्पन्न हो , इसका कोई अर्थ नहीं , गुणवान होने पर ही वह पूज्य होता है । इस सम्बन्ध में “ पंचतन्त्र " की उक्ति भी उल्लेखनीय है- " प्रकाश्यं स्वगुणोदयेन गुणीनां गच्छन्ति किं जन्मना " ( कोई वस्तु गुणों के उदय से ही प्रकाशमान होती है । उसके उत्पत्ति स्थान का कोई महत्व नहीं होता ) । सर्वमान्य मत यह है कि समाज में रहकर अनुकूल परिस्थितियों के मिलने पर तथा आन्तरिक प्रेरणा से उत्साहित होकर कोई व्यक्ति ऐसे गुणों को अपने अन्दर समाहित कर लेता है कि समाज के अन्य व्यक्ति उसे नेता कहने तथा मानने के लिये बाध्य हो जाते हैं । यही प्रक्रिया शिक्षा क्षेत्र में “ शैक्षिक नेतृत्व ” प्रदान करती है । शैक्षिक नेतृत्व ' की अपने सीमित शब्दों में इस प्रकार परिभाषा व्यक्त कर सकते हैं। " शैक्षिक प्रशासन के क्षेत्र में किसी विशिष्ट व्यक्ति का जनतान्त्रिक युक्त तथा सहकर्मियों के हृदय को सर्वांगरूप में जीतने वाला व्यवहार जो वैयक्तिक तथा अर्जित पर आधारित होता है , “ शैक्षिक नेतृत्व " कहा जाता है । " गुणों ' शैक्षिक नेतृत्व ' से परिपूर्ण व्यक्ति , प्रशासन के कार्यों को उसी प्रकार करने में सक्षम होता है जैसा उस शैक्षिक समूह के व्यक्ति कराने की इच्छा रखते हैं । शैक्षिक नेतृत्व के अन्तर्गत कार्यकुशलता , लोकप्रिय व्यवहार तथा सद्भावना आदि का बड़ा मूल्य होता है । “ शैक्षिक नेतृत्व " में ऐसी शक्ति होती है जो अध्यापन की क्षमता में निसन्देह वृद्धि कर देती है । सारांश में कहा जा सकता है कि " शैक्षिक नेतृत्व " में उन सभी कार्यों को करने की क्षमता होती है जो शिक्षा विभाक तथा शिक्षण संस्थाओं को उत्तरोत्तर उन्नति के लिये आवश्यक समझे जाते हैं । नेतृत्व के जितने गुण पहले बताये जा चुके हैं उनका शैक्षिक नेतृत्व में भी होना आवश्यक है । शिक्षण संस्थाओं के प्रशासन तथा पर्यवेक्षण सम्बन्धी सभी कार्यों को सफलता वस्तुतः शैक्षिक नेतृत्व पर ही आधारित होती है ।

शैक्षिक - नेतृत्व की आवश्यकता एवं महत्व ( Need & Importance of Edu . Leadership ) शैक्षिक नेतृत्व का अर्थ स्पष्ट करने के उपरान्त शैक्षिक नेतृत्व की आवश्यकता तथा उसके महत्व पर विचार करना युक्तिसंगत प्रतीत होता है । " नेतृत्व " के सम्बन्ध में विचार करते समय हम यह अध्यन कर चुके है कि कोई भी छोटा अथवा वड़ा समूह नेता के विना नहीं रह सकता । कोई भी समूह अपने कार्यों का सम्पादन नेता के माध्यम से ही करना चाहता है । नेतृत्व युक्त समूह गौरव का अनुभव भी करता है । जिस समूह अथवा समाज का कोई नेता नहीं होता वह समूह दिशाहीन तथा उद्देश्यहीन होता है । आजकल अपने देश में प्रजातन्त्र की स्थापना हो चुकी है । देश में विभिन्न समाजों , सम्प्रदायों , संगठनों तथा संस्थाओं की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है । अतएव नेताओं को संख्या का भी उसी अनुपात में बढ़ना स्वाभाविक है । एक समूह अथवा समाज में कई नेता भी उदित हो जाते हैं परन्तु उन सभी का सर्व प्रमुख नेता एक ही व्यक्ति होता है , अन्य सहनेता कालान्तर में प्रमुख नेता को बातों का ही अनुमोदन करने लगते हैं । इतना निश्चित है कि समाज में नेतृत्व की आवश्यकता निस्सन्देह होती हैं । रहते हैं । परन्तु छात्रों , अध्यापकों तथा संरक्षकों की कार्य क्षमता को उचित दिशा दिखाने के लिये शैक्षिक नेतृत्व की परमावश्यकता होती है । “ शैक्षिक नेतृत्व " को आवश्यकताओं का संक्षेप में इस प्रकार उल्लेख किया जा सकता है ।
1. सामाजिक परिवर्तन के अनुकूल शिक्षा विकास ( Edu development according to Social change ) - समाज सदैव एकसी स्थिति में नहीं रहा करता । समाज की मान्यताओं , मूल्यों तथा धारणाओं में परिवर्तन होता रहता है । शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का साधन माना जाता है , साथ ही शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का अनुगमन भी करना पड़ता है । समाज के अनुरूप किस प्रकार की शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए तथा शिक्षा के उद्देश्य , पाठ्यक्रम , व्यवस्था , शिक्षण विधि आदि में किस प्रकार का परिवर्तन होना आवश्यक है , इन सभी बातों का ज्ञान “ शैक्षिक नेतृत्व " को संभालने वाले व्यक्तियों को हुआ करता है । विद्यालयों , महाविद्यालयों था विश्वविद्यालयों के बड़े - बड़े प्रशासकों का नेता के रूप में यही कर्त्तव्य होता है कि वे शिक्षा को समाज की आवश्यताओं के अनुरूप प्रदान करने की व्यवस्था   करें । वर्तमान युग में शिक्षा के व्यावसायीकरण , तकनीकीकरण , राष्ट्रीयकरण करने में “ शैक्षिक नेतृत्व ” की परमावश्यकता है । विद्यालयों में आवश्यक नीतियों तथा रीतियों का कार्यान्वयन शैक्षिक नेता की कर सकते हैं । इस प्रकार के परिवर्तन को विद्यालय के वातावरण में प्रधानाचार्य के सहयोग से ही अपनाया जा सकता है ।
2. सामूहिक कार्यक्रमों में समन्वय ( Coordination in group - activties ) शैक्षिक समाजों में सभी व्यक्ति एक ही स्वभाव के नहीं होते । विद्यालयों में देखा जाता है । कि कुछ अध्यापक कार्य के प्रति तल्लीन , कुछ उपयोगी तथा उन्नतिप्रद बातों का सदैव विरोध करने वाले , कुछ अर्थोपार्जन को ही अधिक महत्व देने वाले तो कुछ अध्यापक , अध्यापन कार्य के प्रति निष्ठावान् होते हैं । स्वभाव की दृष्टि से भी कुछ विनोदी , परोपकारी तथा मिष्टभाषी होते हैं तो कुछ झगड़ालू , ईर्ष्यालु तथा मितभाषी होते हैं । इस विभिन्नता के रहते हुए भी विद्यालय के सामूहिक कार्य - कलापों में सभी अध्यापकों को एक साँचे में ढालने तथा पारस्परिक एकता एवं सद्भाव को बनाये रखने के लिये किसी एक योग्य नेता की आवश्यकता होती है । विद्यालय के प्रधानाचार्य “ शैक्षिक नेतृत्व " उत्तरदायित्व को समझते हुए इस कार्य का कुशलतापूर्वक सम्पादन कर सकते है । “ शैक्षिक नेतृत्व " की यह अपूर्व विशेषता होती है कि व्यक्तियों की विरोधी विचार धाराओं के होते हुए भी उन्हें एक उद्देश्य तथा एक योजना में तल्लीन रहने के लिये प्रेरित एवं उत्साहित कर देता है ।
3. नियोजन , व्यवस्था तथा संलग्नता की सफलता ( Success in planning , organization and pursuasion ) - शिक्षा के क्षेत्र में नवीन तथा उपयोगी कार्यों के लिये योजना का निर्माण करना होता है , कार्य सफलता के लिये संगठन की आवश्यकता होती है , कार्यान्वयन में कोई व्यक्ति विरोध या उदासीनता न दिखाये , इसके लिये सजग रहना पड़ता है । वास्तव में इन कार्यों को उचित रूप में करने के लिये योग्य नेताओं की दक्षता , प्रवीणता तथा कुशलता की आवश्यकता होती है । नियोजन तथा व्यवस्था के कार्यों में सभी व्यक्तियों के सहयोग को कुशल नेता ही प्राप्त करता है । इसका प्रमुख कारण समूह के व्यक्तियों का नेता में वश्वास तथा उसके प्रति आदर की भावना होती है । विरोध व्यक्त करने वाले व्यक्तियों को नेता अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से शीघ्र ही सहमत कर लेता है तथा कार्य संचालन के लिये सुविधा प्राप्त करता है । कुछ विद्यालय के प्रधानाचार्यों का सर्वगुण सम्पन्न व्यक्तित्व छात्रों तथा अध्यापकों के लिये अत्यन्त आदर्शमय एवं प्रभावयुक्त होता है । इस प्रकार के कार्यों के नियोजन तथा प्रशासन में पूर्णतया सफल होते हैं । शिक्षा विभाग के अन्य अधिकारियों को प्रशासनिक योजनाएं भी तभी सफल होती है जब उनमें शैक्षिक नेतृत्व की योग्यता होती है ।
4. शैक्षिक स्तर की निरन्तर उन्नति ( Continuous progress in Educational Standard ) - शिक्षा के क्षेत्र में नवीन अनुसन्धानों , उपागमों ( approaches ) तथा नई विधियों का बड़ा महत्व होता है । शैक्षिक नेता से यह आशा की जाती है कि वह अद्यतन ( uptodate ) शैक्षिक सामग्री से पूर्णतया परिचित रहे तथा अपने आश्रित व्यक्तियों को भी उनसे अवगत कराये । उत्तम शैक्षिक नेता अपने सहकर्मियों की शैक्षिक योग्यताओं की वृद्धि करने में रुचि लेता है । नेता की प्रेरणा से ही विद्यालय के अध्यापक योग्यता तथा कुशलता प्राप्त करने के लिये लालायित होते हैं । अध्यापकों का व्यक्तिगत रूप से परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की सहायता से अवकाश लेकर अनुसन्धान कार्य करना तथा सभी विषयों पर उत्तमोत्तम ग्रन्थ लेखन का कार्य करना वास्तव में शैक्षिक स्तर को ऊँचा करना है । अनुभव कुछ विद्यालय पढ़ाई उस विद्यालय के प्रधानाचार्य ( नेता ) का परिश्रम ही सर्वोपरि होता है । के आधार पर हम कह सकते हैं कि किसी क्षेत्र में किसी विद्यालय के स्थाई यश के मूल में के क्षेत्र में , कुछ खेलकूद की क्रियाओं में तो कुछ विद्यालय सांस्कृतिक क्रिया कलापों में प्रसिद्ध हो जाते हैं । वास्तव में इन विशिष्ट क्षेत्रों की ख्याति प्रधानाचार्य की विशेष प्रवृत्ति ( attitude ) पर ही अवलम्बित होती है । योग्य तथा कुशल नेता विद्यालय की सर्वागीण उन्नति पर ही अपना ध्यान आकर्षित करते है और ऐसा करने में सफल भी होते हैं । इसके अतिरिक्त शिक्षा विभाग के आदेशानुसार तथा पर्यवेक्षकों के दिये गये सुझावों के अनुसार जैसा शैक्षिक स्तर होना चाहिए उसे निर्मित करने तथा बनाये रखने के लिये योग्य शैक्षिक नेतृत्व की हो आवश्यकता होती है ।
5. सामाजिकता , सामाजिक जागरूकता तथा कार्यारम्भ की प्रवृत्ति का विकास ( Development in Socialibility , social consciousness and Initiation ) - किसी समूह के व्यक्ति पारस्परिक व्यवहारों में सामाजिकता को अपनाये अर्थात् जिन व्यवहारों को समाज में शिष्ट एवं सभ्य कहा जाता , उन्हें अपनाने का प्रयत्न करें , इसके लिये मार्ग प्रदर्शन कुशल नेतृत्व द्वारा ही किया जा सकता है । समाज के नियमों में बँधकर तथा अनुशासन का पालन करते हुए श्रेष्ठ नागरिक के गुणों को निरन्तर सीखना सामाजिक जागरूकता कहलाती है । समाज में क्या भला अथवा बुरा है , इसका भी व्यक्ति को ज्ञान होना चाहिए परन्तु व्यक्ति स्वयं ही इन सभी बातों को नहीं जान सकता । अतएव इन बातों की उचित जानकारी प्राप्त करने के लिये किसी योग्य नेता की आवश्यकता का अनुभव करता है । इसके अतिरिक्त सभी व्यक्तियों में यद्यपि कार्य करने की शक्ति होती है और समय तथा अवसर मिलने पर वे उसका • परिचय भी देते हैं परन्तु किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने की अथवा स्वोयक्रम , उनमें योग्यता और हिम्मत नहीं होती । कार्य में पहल करने तथा अन्य व्यक्तियों को लक्ष्य प्राप्ति में जुटाने की अद्भुत योग्यता नेता में ही होती है । इसमें सन्देह नहीं कि यदि किसी समाज में नेतृत्व शक्ति द्वारा कार्यारम्भ में पहल नहीं की जाती तो वह समाज शक्ति रखते हुए भी सुप्त तथा मृतप्राय हो जाता है । सैनिकों में पराक्रम का अभाव कभी नहीं होता परन्तु अपने नेता , द्वारा कार्यारम्भ करते ही तथा नेता का संकेत मिलेत ही सैनिकों में अद्भुत शक्ति का संचार होने लगता है । एक अन्य सरल उदाहरण से इस बात को और भी अधिक स्पष्ट रूप में समझा जा सकता है । एक विद्यालय के अध्यापक पारस्परिक सद्भावनाओं में वृद्धि करने के लिये विद्यालय के अन्दर किसी गोष्ठी अथवा क्लब की स्थापना करना चाहते हैं , छात्रों तथा अध्यापकों की सुविधा के लिये किसी सहकारी समिति का निर्माण करना चाहते हैं । तथा छात्रों में नैतिकता की भावना को जागृत करने के लिये अनेक योजनाएँ भी बनाते हैं इन कार्यों का संचालन करने के लिये वे अनेक बार विचार - विमर्श करते हैं परन्तु उनका कार्यान्वयन वे तब तक नहीं कर पाते जब तक कोई वरिष्ठ अध्यापक अथवा स्वयं प्रधानाचार्या इन को करने में पहल नहीं करता । कार्यारम्भ होने के पश्चात् तो सभी व्यक्ति सक्रिय हो जाते हैं । इसमें सन्देह नहीं कि विद्यालय में सामाजिक जागरूकता तथा सामाजिकता को अपनाने के लिये शैक्षिक नेतृत्व की परमावश्यकता होती है ।

सहायक सेवाएँ ( Support Services ) समझाइये । पाठ्य सहगामी क्रियाओं से क्या अभिप्राय है ? शालाओं में इनकी उपयोगिता What is meant by co - curricular activities ? Explain their utility in schools .

 

सहायक सेवाएँ ( Support Services ) समझाइये ।  पाठ्य सहगामी क्रियाओं से क्या अभिप्राय है ? शालाओं में इनकी उपयोगिता What is meant by co - curricular activities ? Explain their utility in schools . 

 निम्नलिखित पाठ्यान्तर क्रियाओं में से किन्हीं दो क्रियाओं पर प्रकाश डालिये -
( अ ) छात्र संघ या स्वशासन
( ब ) शैक्षिक परिभ्रमण
( स ) विद्यालय पत्रिका
( द ) नाट्याभिनय
( य ) स्कूल सभा ।

( अ ) छात्र संघ या स्वशासन ( Students Association ) छात्र स्वशासन का अर्थ है विद्यालय प्रबन्ध के लिये इस प्रकार की प्रणाली को अपनाया जाय जिसमें छात्र अधिक से अधिक भाग ले सकें , उसके प्रबन्ध का उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर उठा सकें । गुड के शिक्षा शब्द - कोष में इस प्रकार परिभाषा दी गयी है - " छात्र द्वारा स्वशासन समस्त छात्रों में से स्वयं छात्रों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा विद्यालय में प्रवन्ध एवं आचरण सम्बन्धी मामलों का विनिमय करता है ।
” छात्र स्वशासन के उद्देश्य एवं महत्व
1. आदर्श नागरिकता का विकास - छात्र स्वशासन का प्रमुख उद्देश्य छात्रों में आदर्श जाता है । नागरिकता का विकास करना है । इसके द्वारा छात्रों को प्रजातन्त्रात्मक प्रणाली का ज्ञान कराया
2. नेतृत्व के गुणों का विकास - स्वशासन का अन्य उद्देश्य छात्रों में नेतृत्व की शक्ति का विकास करना है । वे विद्यालय के छात्र संघ के सदस्य वनकर अपनी प्रतिभा का परिचय देने का प्रयास करते हैं तथा अपने साथियों को प्रभावित करके नेतृत्व करने की शिक्षा प्राप्त करते हैं ।
3. उत्तरदायित्व निभाने की क्षमता का विकास - छात्र संघ का संचालन कर छात्रों में उत्तरदायित्व निभाने की क्षमता का विकास होता है । वे सौपे गये कार्यों को ठीक प्रकार से पूरा करने का प्रयास करते हैं । इस प्रकार स्वशासन द्वारा उनमें उत्तरदायित्व निभाने को क्षमता का विकास होता है ।
4. आत्म नियन्त्रण की भावना का विकास - स्वशासन द्वारा बालकों में आत्म नियन्त्रण की भावना का विकास होता है । छात्र समय और धैर्य से छात्र संघ के नियमों का फालन करते हैं तथा अनुशासन के महत्व को समझते हैं । वे अपने साथियों को भी ऐसा ही करने के लिये प्रेरित करते हैं ।
5. पारस्परिक सहयोग की भावना का विकास - स्वशासन छात्रों को परस्पर सहयोग के महत्व का ज्ञान कराता है । वे परस्पर मिलकर काम करना सीखते हैं । विभिन्न समितियों का संचालन करते समय उन्हें यह ज्ञात होता है कि बिना परस्पर सहयोग के कोई कार्य ठीक प्रकार से नहीं हो सकता है ।
6. संगठनकर्ता के गुणों का विकास - स्वशासन छात्रों को संगठन करने की कला में दक्ष करता है । छात्र स्वयं विभिन्न पाठ्य सहगामी क्रियाओं का संचालन कर संगठन और  संचालन की शिक्षा प्राप्त करते हैं ।
7. नैतिक गुणों का विकास- इससे बालकों में नैतिकता के विभिन्न गुणों का विकास होता है । निष्पक्षता , कर्त्तव्य परायणता , सहानुभूति , सद्भावना , धैर्य , ईमानदारी , सहनशीलता आदि गुणों के विकास में स्वशासन का विशेष योगदान रहता है ।
8. अध्यापक छात्रों के सम्बन्धों में मधुरता - स्वशासन सम्बन्धी समस्त क्रियाएँ अध्यापकों के मार्गदर्शन में होती हैं , अतः छात्र उनके सम्पर्क में आते हैं और उनके गुणों से प्रभावित होते हैं ।
9. अनुशासन की समस्या का हल - उचित ढंग से संचालित स्वशासन विद्यालय में अनुशासन की समस्या को जन्म ही नहीं लेने देता । छात्र विद्यालय में अनुशासन स्थापना का उत्तरदायित्व स्वयं अपने ऊपर अनुभव करते हैं , अत : वे ऐसा कोई भी कार्य नहीं होने देते , जिससे विद्यालय में अनुशासनहीनता फैले । छात्र संघ ( परिषद ) का संगठन - स्वशासन को व्यावहारिक रूप प्रदान करने के लिये विद्यालय में एक ' विद्यालय सभा ' होनी चाहिए । जिसके सदस्य छात्रों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि तथा विर्नियुक्त सदस्य हों । विर्नियुक्त सदस्यों की नियुक्ति अध्यापकों के माध्यम से हो । विद्यालय सभा के अधीन 4 मण्डल हों , जिनके सदस्यों का निर्वाचन विद्यालय सभा द्वारा किया जाय ।
इन मण्डलों को निम्नलिखित उत्तरदायित्व सौपे जायें
( 1 ) अनुशासन ,
( 2 ) खेलकूद तथा व्यायाम ,
( 3 ) स्वास्थ्य सम्बन्धी क्रियाएँ , स्वच्छता तथा पौष्टिक आहार ,
( 4 ) सामाजिक कल्याण और उनसे सम्बन्धित क्रियाएँ : जैसे - साक्षरता प्रसार , समाज - सेवा , बाढ़ पीड़ितों की सहायता , शरणार्थियों की सहायता ,
( 5 ) पाठ्य सहगामी क्रियाएँ- इनमें वाद - विवाद , नाटक , प्रिय व्यापार , भ्रमण आदि क्रियाएँ सम्मिलित हैं ।

छात्र संघ ( परिषद ) के संगठन में सावधानियाँ - छात्र संघ ( परिषद ) के संगठन में निम्नलिखित सावधानियाँ ध्यान में रखनी चाहिए
( 1 ) ' छात्र संघ ' ( परिषद ) के हिसाब - किताब की समय - समय पर जाँच की जाय ।
( 2 ) सम्बन्धित अध्यापकों को अपना दृष्टिकोण सहानुभूति और सहयोग का रखना चाहिए । छात्रों के साथ तानाशाही का व्यवहार अनुचित है ।
( 3 ) प्रधानाध्यापक को यह बात ध्यान में रखने की है कि छात्र संघ ( परिषद ) किसी राजनैतिक दल के प्रभाव में न आ जाय ।
( 4 ) छात्र संघ की स्थापना के लिये जो कदम उठाये जायें धीरे - धीरे उठाये जायें । इस कार्य में शीघ्रता नहीं की जाय ।व
( 5 ) छात्र - स्वशासन का स्वरूप विद्यालय की आवश्यकताओं के अनुकूल हो ।
( 6 ) ‘ छात्र - संघ ' ( परिषद ) का स्वरूप न तो अधिक बड़ा हो और न अधिक छोटा ।
( 7 ) परिषद के चुनाव में किसी भी प्रकार का पक्षपात नहीं होना चाहिए । किसी वर्ग को महत्व नहीं दिया जाय ।
( 8 ) विद्यालय की ओर से ' छात्र संघ ' ( परिषद ) को हर प्रकार की सहायता प्रदान  की जाय ।
( 9 ) परिषद के सदस्यों को उत्साहित करने के साथ - साथ उन पर विश्वास भी किया जाय , परन्तु अनुचित कार्यों को तुरन्त रोका जाय ।

( ब ) शैक्षिक परिभ्रमण ( Educational Tour ) परिभ्रमण से हमारा अर्थ उन छोटी यात्राओं से है जो स्थानीय औद्योगिक , ऐतिहासिक , सांस्कृतिक तथा धार्मिक स्थानों को देखने के लिए गठित की जाती हैं । W.M.Gregory ने परिभ्रमण को शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान दिया है । उनके विचार में शिक्षा वास्तविक जीवन से बहुत दूर जा रही है और हमारे शिक्षालय छात्रों को अनुभव द्वारा शिक्षा प्राप्त करने के साधनों का बहुत ही कम प्रयोग करते हैं । उन्हें तो चाहिए कि ' शब्दों ' के स्थान पर अधिक क्रियाओं , वस्तुओं तथा अनुभवों द्वारा शिक्षा पाने के अवसर छात्रों को प्रदान करें । आधुनिक शिक्षालय में बाग का , दुकान का तथा भ्रमण का एक विशेष महत्व हैं । शैक्षिक परिभ्रमण के लाभ- शैक्षिक परिभ्रमण द्वारा छात्रों को निम्नलिखित पहुँचते
1. शिक्षा के काम का पूरक - अजायबघर , किले , मन्दिर , गुफा , पर्वत , नहर , खेत , घाटी आदि का परिभ्रमण सामाजिक ज्ञान का वास्तविक परिचय कराकर कक्षा के कार्य का पूरक सिद्ध होता है । विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए प्रयोगशाला तथा औद्योगिक कारखाने महत्वपूर्ण हैं । परिभ्रमण द्वारा बहुत से विषयों के पाठ रोचक , स्पष्ट , निश्चित तथा वास्तविक बन जाते हैं । विभिन्न विषयों का एक - दूसरे से यथार्थ सम्बन्ध स्थापित हो जाता है ।
2. स्कूलों की क्रियाओं में विभिन्नता आती है - छात्रों में परिभ्रमण द्वारा एक नया उत्साह आता है और कक्षा का नीरस जीवन रोचक बन जाता है ।
3. नेतृत्व के गुणों का निर्माण- परिभ्रमण में छात्रों को अनेक प्रकार के कार्यों का प्रबन्ध करना पड़ता है । प्रबन्ध करने के लिए योग्यता तथा बुद्धि चाहिए तथा छात्रों को स्वयं स्फूर्ति से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है । छात्रों में सहयोग की भावना आती है ।
4. स्थानीय ज्ञान - छात्र अपने वातावरण के बारे में अधिक ज्ञान प्राप्त कर वे स्थानीय वस्तुओं , व्यक्तियों संस्थाओं आदि के सम्पर्क में आते हैं ।
5. छात्रों में तीव्रता आती है - छात्रों की निष्क्रियता दूर होती है । वे कार्य में व्यस्त रहते हैं । उनकी इन्द्रियाँ व्यस्त रहती हैं और वे आविष्कारों का आनन्द लूटते हैं ।
6. सौन्दर्य भावना - परिभ्रमण छात्रों में सौन्दर्य भाव भरते हैं , उनके मन में प्राकृतिक वस्तुएँ देखने की इच्छा बढ़ती है । परिभ्रमण के प्रबन्ध कार्य - परिभ्रमण का पूरा - पूरा लाभ उठाने के लिए यह आवश्यक है कि उनकी योजना ढंग से की जाए । प्रबन्धकों को चाहिए कि परिभ्रमण करने से पहले परिभ्रमण सम्वन्धी स्थानों के बारे में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करें , जिससे उन्हें बालकों के प्रश्नों के उत्तर देने में सुगमता हो । इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि परिभ्रमण के दो लक्ष्य शिक्षा तथा विनोद साथ - साथ होने चाहिए । जहाँ तक सम्भव हो यात्रा - टोली में गायक , कहानी सुनाने वाले , फोटो लेने वाले छात्र होने चाहिए । ज्ञान प्राप्त करना तथा मनोरंजक साथ - साथ होने चाहिए । छात्रों को छोटी - छोटी टोलियों में बाँटकर प्रत्येक टोली का एक नेता नियुक्त करना चाहिए । भ्रमण - यात्रा में First Aid Box अवश्य साथ ले जाना चाहिए । प्रबन्धक इस बात का भी ध्यान रखें कि छात्र अनुशासन में रहें , यद्यपि हँसना - खेलना आदि भी है ।

( स ) विद्यालय - पत्रिका ( School Magazine ) विद्यालय - पत्रिका छात्रों में ' सामूहिक चैतन्यता ' के भाव उत्पन्न करने का प्रमुख साधन है । इससे छात्रों को अपने भाव प्रकट करने का अवसर मिलता है । इसके द्वारा छात्रों की लिखने की शक्ति बढ़ती है । छात्रों में साहित्यिक रुचि उत्पन्न होती है । स्कूल के कार्यों का प्रचार होता है । विद्वता बढ़ती है । स्कूल का इतिहास स्कूल पत्रिका में लिखा रहता है । पत्रिका प्रकाशन के व्यवसाय के लिए छात्रों को प्रारम्भिक ट्रेनिंग मिलती है । अभिरुचियों का विकास होता है । नये छात्रों को स्कूल की परम्पराओं से परिचय प्राप्त होता है । छात्रों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है । अभिभावकों तथा स्कूल में सम्वन्ध स्थापित होता है । सफलता के लिए सहायक बातें- छात्रों के लेख छपने से पहले शुद्ध किये जायें । स्कूल - पत्रिका में विभिन्न विषयों पर लेख छपने चाहिए । कविता , कहानी , निबन्ध , दोहे आदि होने चाहिए । आधुनिक समाचार भी अवश्य होने चाहिए । स्कूल के पाठ्यक्रम सम्बन्धी तथा सहपाठीय क्रियाओं का उल्लेख भी होना चाहिए । छात्रों में से ही सम्पादक चुने जाने चाहिए । लेख लिखने तथा उत्साह बढ़ाने के लिए छात्रों को पारितोषिक दिये जाने चाहिए । जहाँ तक हो सके शिक्षकों द्वारा लिखे हुए लेखों की संख्या कम हो । जिस स्कूल में चन्दे की कमी हो , वहाँ पर Wall Magazine की रचना अवश्य करनी चाहिए । स्कूल - पत्रिका में नामी छात्रों के कारनामे भी छपने चाहिए । अमुक छात्र ने परीक्षा में जिले अथवा राज्य में ऊँचा स्थान प्राप्त किया , अमुक छात्र वाद - विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आया या अमुक बालक जिले की एक मील की दौड़ में द्वितीय रहा आदि समाचार छपने चाहिए । यदि छात्रों के चित्र छप सकें तो बहुत ही अच्छा है विद्यालय की समस्त सभा सोसाइटियों का वार्षिक अथवा अर्द्ध - वार्षिक विवरण पत्रिका में छपना चाहिए । पत्रिका की छपाई अत्यन्त सुन्दर व आकर्षक होनी चाहिए ।

( द ) नाट्याभिनय ( Dramatization ) यह आत्म - अभिव्यक्ति का एक अति सुन्दर साधन है । इसके द्वारा विभिन्न विषयों के ज्ञान में समन्वय स्थापित होता है । नाट्य - अभिनय की तैयारी करते समय छात्रा की बोलने की शक्ति का विकास होता है । इतिहास का अध्ययन किया जाता है । महात्मा बुद्ध , चन्द्रगुप्त , विक्रमादित्य , गाँधीजी के जीवन पर नाटक खेलते हुए छात्र उनके जीवन से परिचय प्राप्त करते हैं । समय - समय पर जो वस्त्र अथवा पोशाक प्रचलित थीं , उनसे परिचित होते हैं । छात्रों का भौगालिक ज्ञान भी बढ़ता है । छात्र संगीत तथा नृत्य कला का प्रदर्शन करते हैं । छात्रों में नाटक की सफलता के लिए अपार उत्साह पाया जाता है वे सहयोग की भावना का महत्व सीखते हैं । छात्रों में सामूहिक चैतन्यता का विकास होता है । प्रत्येक छात्र शिक्षालय का मान बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक उत्साह दिखाता है । - अपनी - अपनी रुचि के अनुसार कार्य करने का अवसर छात्रों को मिल जाता है तथा उनके व्यक्तित्व का विकास होता है ।

( य ) स्कूल सभा ( School Assembly ) स्कूल सभा से हमारा तात्पर्य उस सामूहिक इकाई से है जिसमें शिक्षालय के सारे तथा शिक्षक इकट्ठे होते हैं । प्राय : स्कूल में प्रार्थना सभा के बाद ही शिक्षण कार्य प्रारम्भ किया जाता है । छात्र प्र इस गतिविधि द्वारा निम्नलिखित लक्ष्यों की प्राप्ति हो सकती है न
1. स्कूल में एकात्मकता लाना - स्कूल में कार्य कर रहे सभी वर्गों को एक साथ कार्य करने का अवसर मिलता है । जैसे एक परिवार के सदस्य समय - समय पर विचार विमर्श करते हैं , उसी प्रकार विद्यालय परिवार के सदस्य भी करते हैं ।
2. स्कूल के कार्य का ब्यौरा - सभा में इस बात की चर्चा होती है कि विभिन्न गतिविधियाँ किस प्रकार हो रही हैं । इससे छात्र स्कूल के सम्पूर्ण कार्य के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं ।
3. सामूहिक चेतना - स्कूल सभा द्वारा छात्र स्कूल के लक्ष्य तथा परम्परा से परिचित होते हैं । उनमें सामूहिक चेतना का भाव निर्मित होता है । छात्र स्कूल का संगठित रूप जानने का अवसर प्राप्त करते हैं ।
4. अच्छी आदतों का निर्माण - स्कूल सभा में छात्रों को ऐसी ट्रेनिंग मिल जाती है कि वे सभ्य सभा में बैठ सकें । उनमें धैर्य से वक्ताओं के विचार सुनने का अभ्यास होता है । किस समय पर ताली बजानी चाहिए आदि वातों का ज्ञान उन्हें प्राप्त होता है ।
5. प्रतिभा तथा उपलब्धि का उचित स्थान- ख्याति प्राप्त योग्य तथा प्रतिभासम्पन्न छात्रों के अच्छे कामों की प्रशंसा करके , दूसरे छात्रों में भी उत्साह उत्पन्न होता है ।
6. छात्रों की लज्जा दूर करना- स्कूल सभा के समय छात्र मंच पर आकर अन्य लजीले स्वभाव को दूर करते हैं । छात्रों , अध्यापकों एवं अतिथियों के सामने भाषण देकर अथवा गीत गाकर या और कार्य कर ।
7. प्रशासनिक समस्या को सभा में रखना- कभी - कभी स्कूल की समस्याओं को समस्त छात्रों के सामने रखा जाता है तथा उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया जाता है कि वे इन समस्याओं को दूर करने के लिए अध्यापक वर्ग का हाथ बटाएँ ।
8. छात्रों का ज्ञान बढ़ाना - संसार के बारे में छात्रों का ज्ञान बढ़ाया जा सकता है । अनुभवी तथा प्रसिद्ध व्यक्तियों के भाषण छात्रों का ज्ञान बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं ।
9. छात्रों की रुचियों के विकास के अवसर - सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने से विभिन्न रुचियों वाले छात्र उसमें भाग लेकर अपना विकास करते हैं ।
10. आध्यात्मिकता का भाव - स्कूल सभा में थोड़े समय के लिए प्रार्थना का होना होते हैं । आवश्यक है । इससे छात्रों में ईश्वर देश तथा प्राणीमात्र के प्रति अपने कर्त्तव्य के भाव जाग्रत स्कूल सभा कार्यक्रम के संचालन हेतु मार्गदर्शन संकेत -

निम्नलिखित प्रकार हैं
( 1 ) वर्ष में प्रत्येक छात्र तथा अध्यापक एक कार्यक्रम में अवश्य भाग ले ।
( 2 ) सभा में विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ हों  कार्यक्रम विख्यात व्यक्तियों द्वारा दिखाए जाएँ ।
( 3 ) कभी - कभी मनोरंजन कार्यक्रम भी रखा जाए । अच्छा होगा यदि इस प्रकार के
( 4 ) कार्यक्रम सुनियोजित हों । प्रशिक्षण दिया जाए ।
( 5 ) कार्यक्रम चलाने में छात्रों का सहयोग लिया जाए । कार्यक्रम चलाने में उन्हें
( 6 ) प्रधानाध्यापक अथवा सम्बन्धित शिक्षक द्वारा कार्यक्रम प्रदर्शित होने से पूर्व देख लिया जाना चाहिए , ताकि कोई आपत्तिजनक कार्य प्रदर्शित न किया जा सके ।
( 7 ) सभा में उचित अनुशासनिक वातावरण बना रहना चाहिए । तालियाँ उचित मात्रा में तथा अवसरानुकूल बजानी चाहिए ।
( 8 ) विशेष सभा सप्ताह में एक बार से ज्यादा नहीं होनी चाहिए ।
( 9 ) अच्छे कार्यक्रम पर बल दिया जाना चाहिए ।
( 10 ) जहाँ तक सम्भव हो छात्रों को सभा में प्रताड़ना तथा दण्ड नहीं देना चाहिए ।
( 11 ) कार्यक्रम का समय - समय पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए । प्रधानाचार्य तथा स्कूल सभा - प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते स्कूल के सभी कार्यों का उत्तरदायित्व उसी पर है । परन्तु उसका प्रयत्न होना चाहिए कि निर्देशन उसी का रहे और अध्यापक तथा छात्र अवसरानुकूल कार्यक्रम चलाते रहें । सभा के प्रत्येक कार्यक्रम के बारे में उसे पूरा ज्ञान होना चाहिए । 

भावपूर्ण विद्यालय प्रबन्ध के सिद्धान्त बताइये । Describe principles of effective school managemant

 भावपूर्ण विद्यालय प्रबन्ध के सिद्धान्त बताइये ।  Describe principles of effective school managemant . 

प्रभावपूर्ण विद्यालय प्रबन्धन के सिद्धान्त ( Principles of Effective School Management ) प्रभावपूर्ण विद्यालय प्रवन्ध के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं 

1. आधारभूत दर्शन - विद्यालय के प्रत्येक कर्मचारी वर्ग को शिक्षा एवं विद्यालय के उद्देश्य स्पष्ट हों । यह उचित ही कहा गया है कि " सत्र के आरम्भ में ही प्रत्येक को यह स्पष्ट कर दिया जाये जिससे कोई भी संदेह में न रहे कि विद्यालय क्या करना चाहता है या क्या प्राप्त करना चाहता है । "

 2. प्रजातांत्रिक प्रबन्ध - एक दक्षतापूर्ण प्रबन्ध को प्रजातांत्रिक प्रबन्ध के सिद्धान्तों पर आधरित होना चाहिए जैसी कि चर्चा की गई है । 

3. आँकड़ों का वैज्ञानिक संग्रहण- इसका यह आशय है कि विद्यालय वृत्त ( रिकॉर्ड ) को उचित ढंग से रखा जाये और उन्हें हर प्रकार पूर्ण और शुद्ध होना चाहिए । इस दिशा में कोई कमी सारे संगठन की योजना को उलट सकती है । प्रबन्धक को , जो कि विद्यालय का प्रधान है , विद्यालय प्रवन्ध के इस पक्ष पर विशेष ध्यान देना चाहिए । 

4. पाठ्यक्रम को छात्र के विकास का साधन मानना- छात्र विभिन्न प्रकार की रुचि , योग्यता और सुझाव प्रदर्शित करते हैं , अतः पाठ्यक्रम भी विविध एवं लोचदार होना चाहिए ।

 5. अध्यापक वर्ग के व्यक्तित्व के प्रति आदर - अध्यापक वर्ग के व्यक्तित्व का आदर किया जाना चाहिए । अत्यधिक अनुरूपता अध्यापक वर्ग का यंत्रीकरण कर देती है । तथा पहल शक्ति , उत्साह और प्रयोग करने जैसी आवश्यक विकासशील शक्तियों को हानि पहुँचाती है । 

6. समन्वय - कार्यक्रम का नियोजन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि सभी कर्मचारी एक समन्वित अंग की तरह कार्य करें ।

 7. उत्तदायित्वों में सहभागिता होना- अध्यापक वर्ग का पूर्ण सहयोग एवं सहायता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि विद्यालय का प्रधान नीतियों के निर्माण एवं उनके परिचालन हेतु अध्यापक वर्ग को भी उसमें सम्मिलित करें ।

 8. विद्यालय सामग्री का दक्षतापूर्ण उपयोग - विद्यालय व्यवस्था क्या है ? विद्यालय सामग्री से हमारा आशय भवन , अध्यापक एवं छात्रों से है । विद्यालय के अध्यापक वर्ग के कार्य विभाजन का बंटवारा अध्यापकों की योग्यता और अनुभव के आधार पर किया जाये । एक अच्छी समय - सारणी , प्रधानाध्यापक को विद्यालय भवन का उत्तम उपयोग करने में सहायक होगी । 

9. वित्त का न्याययुक्त उपयोग - विद्यालय अधिकारियों के हाथ में विद्यालय वित्त ट्रस्ट के रूप में है , धन का अपव्यय ही अनेकों समस्याओं का कारण हो सकता है , विशेष रूप से बाल - निधि का जो कि छात्रों में अनुशासनहीनता उत्पन्न कर सकता है । अत : यह बहुत , आवश्यक है कि बाल - निधि को छात्रों के ही हित में व्यय किया जाय । 

10. लक्ष्य निर्धारण तथा योजना - सत्रानुसार कार्यक्रम निश्चित कर लेना चाहिए । सम्पूर्ण वर्ष का पाठ्यक्रम उचित भागों में बाटा जाना चाहिए ।

 11. आवधिक निरीक्षण - आवधिक एवं मासिक निरीक्षण करते रहना चाहिए जिससे छात्रों एवं अध्यापकों की उन्नति का ज्ञान हो सके तथा नीतियों की सफलता पर सोच - विचार किया जाये । 

12. लचीलापन - इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि प्रबन्ध साधन है न कि साध्य , इसे साध्य के ऊपर अधिकार नहीं करना चाहिए । साध्य तो वालगक के व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास है । पाठ्यक्रम अध्यापन - विधि , परीक्षा , समय - सारणी , वास्तव में विद्यालय प्रबन्ध का प्रत्येक पक्ष इस साध्य के लिए लगा है । अत : यह उचित है कि प्रवन्ध को लचीला रखा जाये । एच.जी. स्टीड ( H.G. Stead ) ने ठीक ही कहा है कि प्रबन्ध को तरल होना चाहिए , अध्यापकों को अपनी अध्यापन - विधि का प्रयोग करने का अधिकार होना चाहिए । इसी प्रकार छात्रों को भी अनेक नियम एवं बन्धनों के रूपों को मानने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए । ठीक ही कहा गया है कि स्व - अनुशासन डण्डे से प्राप्त नहीं किया जा सकता , इसे केवल प्रेम और सहानुभूति से प्राप्त किया जा सकता है । इसी प्रकार मासिक परीक्षाओं को भी सव कुछ नहीं समझ लेना चाहिए । ये केवल पूर्व वांछित साध्य के लिए साधन मात्र है । विद्यालय प्रबन्ध जो कि प्रत्येक पक्ष - छात्रों , अध्यापकों और प्रधानाध्यापक का सेवक है , उसे स्वामी का स्थान प्राप्त नहीं होना चाहिए । 

13. अध्यापकों की व्यावसायिक उन्नति - ऐसे मार्ग एवं साधनों की खोज की जानी चाहिए जिससे अध्यापक वर्ग की व्यावसायिक उन्नति हो । 

14. आशावादी सिद्धान्त - सम्पूर्ण प्रबन्ध की भावना मूलत : आशावादी होनी चाहिए ।

15. छात्रों का भाग लेना- विद्यालय कार्यक्रमों में विद्यार्थियों का भाग लेना भी आवश्यक है ।


विद्यालय प्रबन्ध के उद्देश्य तथा क्षेत्र का वर्णन कीजिए । Describe the objectives and scope of school Management .

 विद्यालय प्रबन्ध के उद्देश्य तथा क्षेत्र का वर्णन कीजिए । Describe the objectives and scope of school Management . 


    विद्यालय प्रबन्धन के उद्देश्य ( Aims of School Management ) प्रत्येक संस्था के अपने लक्ष्य और आदर्श होते हैं और उनकी सफलतापूर्वक प्राप्ति के लिए उचित प्रवन्धन की आवश्यकता होती है । विद्यालय एक महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है । अतः इसकी एक सुसंगठित प्रवन्धात्मक व्यवस्था होनी चाहिए । बिना किसी प्रभावशाली प्रबन्ध के विद्यालय जीवन में दुर्व्यवस्था एवं संभ्रान्ति फैल जाने की सम्भावना बनी रहती है । एक प्रभावशाली प्रबन्धन विद्यालय में उचित व्यवस्था करता है । यह उचित व्यक्तियों को उचित स्थान पर , उचित समय में , उचित ढंग से रखता है । 

विद्यालय प्रबन्धन के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं 

1. शिक्षाविदों द्वारा बनाये गये लक्ष्यों की निष्ठापूर्वक पूर्ति- लोकतन्त्र में शिक्षा को प्रजातान्त्रिक आदर्शों की शर्तें पूरी करनी होती हैं । शैक्षिक प्रबन्ध को सामाजिक कूटनीतिज्ञता के रूप में लेना चाहिए , शैक्षिक प्रबन्ध को क्रियाविधिमूलक रूप में नहीं लेना चाहिए । विद्यालय प्रवन्ध के लक्ष्यों को पी.सी.रेन ( P.C. Wren ) के शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है “ छात्र के लाभ हेतु , उसकी मनःशक्ति के प्रशिक्षण , उसकी सामान्य दृष्टि विस्तृत करने , उसके मस्तिष्क को उन्नतिशील बनाने , चरित्र का निर्माण करने एवं शक्ति देने उसे अपने समाज एवं राज्य के प्रति कर्त्तव्य का अनुभव कराने आदि के लिए ही विद्यालय को संगठित किया के लिए तैयार कराने हेतु । " जाये । यही एक उद्देश्य है जिसके लिए छात्र को तैयार किया जाये , न कि उसे माध्यमिक परीक्षा 

2. मिल - जुलकर रहने की कला ( Art of Living Together ) सिखाना विद्यालय जीवन को इस प्रकार संगठित करना है कि जिससे बच्चे एक साथ रहने की कला को ग्रहण करने के लिए तैयार हो सकें । विद्यालय का अपना सामुदायिक जीवन होता है जिसे एक उत्तम नागरिकता के प्रशिक्षण के क्षेत्र के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है । 

3. स्कूल - सम्बन्धी गतिविधियों तथा कार्यों का संचालन तथा संयोजन • शिक्षाशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित उद्देश्यों एवं मन्तव्यों को परिपक्व रूप देने के लिए आवश्यक है कि विविध योजनाओं तथा प्रक्रियाओं का संचालन इस ढंग से किया जाए कि उचित व्यक्ति को सुयोग्य एवं समुचित स्थान मिल सके ताकि कार्य समयानुसार होता रहे ।

 4. विद्यालय में सहयोग की भावना लाना तथा जटिल कार्यों की सुलभता विद्यालय प्रबन्ध में सहयोग की भावना का अपना ही स्थान है । मानवीय स्तर पर शिक्षा प्रबन्ध का सम्बन्ध बालकों , अभिभावकों , शिक्षकों , नियुक्तिकर्त्ता एवं समाज से होता है । साधनों के स्तर पर इसका सम्बन्ध सामग्री एवं उसके उपयोग से होता है । साथ ही सिद्धान्तों , परम्पराओं , नियमों , कानून आदि से भी इसका नाता जुड़ा हुआ होता है । विद्यालय सम्बन्धी अन्य प्रकार की समस्याओं का समाधान करना होता है । विद्यालय प्रबन्ध अपने सकारात्मक रूप स कार्यक्रम को एक विशेष दिशा देकर जटिल कार्य को सुलभ बनाकर भव्य परिणाम के प्रकट करता है । 

5. विद्यालय को सामुदायिक केन्द्र के रूप में बनाना - विद्यालय में इस प्रकार के कार्यक्रम रखे जायें जिनके द्वारा छात्र तथा अभिभावक यह अनुभव करें कि विद्यालय उनका है । विद्यालय समाज सेवा का केन्द्र है । 

6. शिक्षा सम्बन्धी प्रयोग तथा अनुसन्धान के लिए समुचित व्यवस्था करना वर्तमान युग में समाज की प्रगतिशीलता उत्तरोत्तर विकसित हो रही है । प्रवन्धकों का कर्तव्य है कि शिक्षाशास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित नवीन विचारों , धारणाओं एवं प्रयोगों को ध्यान में रखें । विद्यालय की विशेष परिस्थिति के अनुसार उनकी उपयोगिता को परखें तथा समयानुकूल परिवर्तन करके लाभ उठायें । शिक्षा सम्बन्धी प्रक्रियाओं के समय - समय पर संशोधन होने के साथ - साथ यदि समीक्षा भी होती रहे तो श्रेयस्कर होगा । विद्यालय प्रबन्धन का क्षेत्र ( Scope of School Management ) विद्यालय प्रवन्ध का क्षेत्र बहुत विस्तृत है और इसके प्रबन्ध के अन्तर्गत वे सभी शैक्षिक परियोजनाएँ आती हैं जो प्रजातन्त्र की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं । विद्यालय प्रबन्ध विद्यालय प्रणाली के सभी सम्बन्धों से सम्बन्धित है , जैसे प्रधान एवं छात्रों का सम्बन्ध , छात्र एवं अध्यापक वर्ग का सम्बन्ध , विद्यालय एवं समाज का सम्बन्ध , निम्न कर्मचारी एवं अध्यापक वर्ग का सम्बन्ध प्रधानाध्यापक एवं अध्यापक का सम्बन्ध , विद्यालय एवं राज्य अथवा विश्वविद्यालय का सम्बन्ध आदि ।


 इससे निम्नलिखित कार्य सम्बन्धित हैं विद्यालय प्रवन्ध के उद्देश्यों का निर्माण । 

 1.अध्यापक वर्ग के कार्य में समन्वय । 

2. विद्यार्थियों का वर्गीकरण एवं समूहीकरण । 

3.पाठ्यक्रम सहगामी कार्यक्रमों का क्रमिक संगठन । 

4.पाठ्यक्रम नियोजन एवं कार्य विभाजन । 

5 . विभिन्न सेवाएँ , जैसे - भवन एवं उपकरण , प्रयोगशाला , पुस्तकालय , स्वच्छता आदि का प्रबन्ध । 

6. विद्यालय में अनुशासन बनाये रखना । 

7. स्वस्थता एवं स्वास्थ्य शिक्षा के लिए कार्यक्रमों का गठन ककरना । 

8. विद्यालय के कार्यालय की देखभाल । 

9. विद्यालय का बजट बनाना । 

10. गृह , विद्यालय एवं समाज के कार्यों का समन्वय । 

11.. विद्यार्थियों को समाज सेवा कार्यक्रमों में लगाना । 

 12. छात्रों को मिलकर काम करने की कला के प्रशिक्षण की सुविधा 

13. छात्रों की उपलब्धि का मूल्यांकन करना । 

14.. अध्यापकों में कार्य विभाजन इस प्रकार करना कि जिससे प्रत्येक अधिकतम दक्षता प्राप्त कर सके । 

15.. विद्यालय की नीतियों का लोकतान्त्रिक ढंग से निर्माण करना । 

16. विद्यालय की नीतियों के अन्तर्गत अध्यापकों को अपने कर्तव्यों के पालन में अधिक स्वतन्त्रता के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित करना । 

17. शिक्षा को सहकारी उद्योग बनाना जिसमें अध्यापक और छात्र दोनों भाग लें ।

 18. विद्यालय की नीतियों को आधुनिकतम शैक्षिक दर्शन के अनुरूप बनाना ।

 19.अध्यापकों का कक्षा में एवं सम्मेलनों में पर्यवेक्षण करना । 

20.  विभागीय अधिकारियों से सहयोग करना । 

विद्यालय प्रबन्ध ( School Management ) विद्यालय प्रबन्ध से क्या आशय है ? विद्यालय प्रबन्ध का महत्व तथा आवश्यकताएँ बताइये । What do you know about school management ? Describe its need and importance .

विद्यालय प्रबन्ध ( School Management )  विद्यालय प्रबन्ध से क्या आशय है ? विद्यालय प्रबन्ध का महत्व तथा आवश्यकताएँ बताइये । What do you know about school management ? Describe its need and importance . 


विद्यालय प्रबन्धन की अवधारणा  ( Concept of School Management ) विद्यालय प्रबन्धन एक विशेष प्रक्रिया है जिसका कार्य विद्यालय के मानवीय तथा भौतिक संसाधनों को ऐसी गतिशील संगठित इकाइयों में परिवर्तित कर देना है जिनके द्वारा शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इस प्रकार कार्य किया जा सके कि छात्रों का सर्वांगीण विकास तथा जो कार्य कर रहे हैं , उनमें उच्च नैतिक स्तर बनाए रखते हुए उत्तरदायित्व निर्माण की भावना बनी रहे । एक समय था जब प्रबन्धन तानाशाही सिद्धान्तों पर आधारित था , परन्तु अब यह जनतान्त्रिक सिद्धान्तों पर आधारित है । प्रबन्ध में मानवीय सम्बन्धों पर विशेष बल दिया जाता है । विद्यालय प्रबन्धन शब्दावली का प्रयोग प्रथम बार वर्ष 1872 में किया गया । पुस्तक का शीर्षक था ' Practical Hand Book of School Management by Teachers ' . authored by Harding , परन्तु यह शब्दावली प्रचलित न हो पायी । अमेरिका में विद्यालय प्रबन्ध का प्रयोग 20 वीं शताब्दी के आरम्भ में हुआ तथा इंग्लैण्ड में वर्ष 1960 के आस - पास । भारतवर्ष में विद्यालय प्रबन्धन शब्दावली का प्रचलन 20 वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में हुआ । भारत में प्राय : ' विद्यालय व्यवस्था ' , ' विद्यालय संगठन ' तथा ' विद्यालय प्रशासन शब्दावली का प्रयोग किया जाता रहा है । आज भी भारत के अनेक विश्वविद्यालय , बी.एड. के पाठ्यक्रम में इसी प्रकार की शब्दावली का प्रयोग करते हैं यद्यपि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ( University Grants Commission ) ने प्रबन्धन ( Management ) शब्द का प्रयोग किया है । वैसे मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि विद्यालय प्रबन्धन तथा विद्यालय फेर है । संगठन आदि के उद्देश्य , कार्यक्षेत्र तथा गतिविधियाँ एक जैसी ही हैं , केवल शब्दावली का हेर 

1 . विद्यालय प्रबन्धन की विशेषताएँ विद्यालय प्रबन्धन उद्देश्यपूर्ण होता है । ( Characteristics of School Management ) 

2. विद्यालय प्रबन्धन समयानुसार बदलता रहता है । 

3. विद्यालय प्रबन्धन एक सामाजिक प्रक्रिया है ।

 4. विद्यालय प्रबन्धन कला तथा विज्ञान दोनों है ।

 5. विद्यालय प्रबन्धन एक जन्मजात तथा अर्जित प्रतिभा है ।

6 . विद्यालय प्रबन्धन एक व्यवसाय के रूप में भी है ।

 7 . विद्यालय प्रबन्धन एक सामुदायिक उत्तरदायित्व के रूप मे है ।

 8 . विद्यालय प्रबन्धन एक गतिशील प्रक्रिया है । 

9. विद्यालय प्रबन्धन का सम्बन्ध मानवीय तथा भौतिक संसाधनों के अधिकतम उपयोग से है । 

10. विद्यालय प्रबन्धन मानवीय पक्षों के विकास पर विशेष बल देता है ।

 11. विद्यालय प्रबन्धन राष्ट्रीय दर्शन जो कि देश के संविधान में प्रदर्शित रहता है , उसके अनुकूल होता है । 

12. विद्यालय प्रबन्धन की सफलता में प्रभावशीलता तथा व्यावहारिकता का समावेश होता है । 


विद्यालय प्रबन्धन का महत्व तथा आवश्यकता ( Importance and Need for School Management ) 

वर्तमान स्थिति में विद्यालय प्रबन्ध का महत्व और आवश्यकता का अध्ययन हम निम्न महत्वपूर्ण तथ्यों के आधार पर कर सकते हैं

 1. छात्र के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करने हेतु । 

2. शिक्षा की सम्पूर्ण प्रक्रिया को व्यक्ति और समाज दोनों के हित में संचालित करने हेतु । 

3 . शिक्षा की नीतियों और योजनाओं को निर्धारित तथा निर्मित करने , क्रियान्वित करने तथा उनका मूल्यांकन करने हेतु ।

 4 . शिक्षा पर नियन्त्रण रखने तथा पर्यवेक्षण करने हेतु ।

 5 . लोकतन्त्र को सुदृढ़ बनाने की दृष्टि से शिक्षा में लोकतान्त्रिक प्रवन्ध उत्पन्न करने हेतु । 

6 .मानवीय तथा भौतिक साधनों को समन्वयात्मक रूप में क्रियाशील बनाने हेतु । 

7.शिक्षा के निर्धारित उद्देश्यों , मूल्यों , आदर्शों , सिद्धान्तों आदि की प्राप्ति हेतु ।

8. शिक्षा में स्थायित्व और निश्चितता लाने हेतु ।

 9. शिक्षा में व्याप्त अपव्यय एवं अवरोधन को दूर करने हेतु । 

10. शिक्षा में ' अवसरों एवं समानता ' के आधार पर भारत के प्रत्येक नागरिक को समान रूप से शिक्षा प्रदान करने हेतु । 

11. छात्रों तथा शिक्षकों दोनों की उपलब्धियों में वृद्धि करने हेतु । 

12. सामाजिक , आर्थिक , राजनीतिक , सांस्कृतिक और शैक्षणिक दृष्टि से बदलती हुई परिस्थितियों से शिक्षा , विद्यार्थी और शिक्षक को समायोजित करने हेतु । ' 

13. शिक्षा के कार्यों में कुशलता , सुगमता तथा सरलता उत्पन्न करने हेतु ।

 14. शिक्षा से सम्बन्धित अधिकारियों , प्राचार्यों अथवा प्रधानाचार्यों तथा शिक्षकों को निर्देशन देने हेतु । 

15. सहानुभूति , सहयोग , परस्पर के निकट सम्पर्क को प्रोत्साहित करके स्वतन्त्र वातावरण में शिक्षा प्रदान करने हेतु । 

16. विद्यालय में वातावरण मनोवैज्ञानिक बनाने और साधनों , उपकरणों तथा आवश्यक सामग्री को उपलब्ध कराने हेतु । 

17. शिक्षा के विभिन्न स्तरों , पहलुओं तथा साधनों में समन्वय एवं समायोजन स्थापित करने हेतु । का प्रसार व प्रचार करने और विकास का मार्ग प्रशस्त करने हेतु । 

18. विद्यालय के पाठ्यक्रम को निर्धारित करने , उसे चलाने , शिक्षण की नवीन पद्धतियों 

19. वैयक्तिक विभेद के सिद्धान्त के आधार पर शिक्षा की व्यवस्था करके विद्यार्थियों में सामाजिक निपुणता , आत्म - निर्भरता , व्यावसायिक कुशलता , समायोजन को क्षमता तथा आदर्श नागरिकता के गुणों का विकास करने हेतु ।

 20. शिक्षा व्यवस्था अथवा संगठन के कार्य को सुगम बनाने हेतु ।

माता - पिता द्वारा तिरस्कृत बालक के क्या कारण हैं

 माता - पिता द्वारा तिरस्कृत बालक के क्या कारण हैं 

 बालकों के सम्पूर्ण सन्तुलित विकास में माता - पिता का महत्वपूर्ण योगदान होता है । बहुधा माता - पिता तो अपने बच्चों की उचित देख - रेख करते हैं , किन्तु कुछ माता - पिता अपने बच्चों को पसन्द नहीं करते हैं तथा समय - समय पर उनकी निन्दा व अपमान करते हैं , जिसका सीधा प्रभाव बालकों के व्यक्तित्व पर पड़ता है । ऐसे ही वालक को हम तिरस्कृत बालक कहते हैं । 

बॉलवे ( Bowlby , 1933 ) के अनुसार , “ तिरस्कृत बालक संवेगात्मक .. रूप से अस्थिर , क्रोध को रोकने में अयोग्य और अन्य लोगों से व्यर्थ सम्बन्ध वाले होते हैं । माता - पिता के तिरस्कार के कारण ( Causes of Parental Rejection ) जब माता - पिता अपने बच्चों का तिरस्कार करते हैं तो इसके पीछे कई कारण होते हैं । इन बालकों का अध्ययन करने के बाद इनके निम्न कारक पाए गये हैं 

1. जब माता - पिता के आपसी सम्बन्ध ठीक नहीं होते हैं अर्थात् वह स्वयं आक्रामक ( aggressive ) व शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते हैं तो वे अपने बच्चों को तिरस्कृत रूप में देखने लगते हैं ।अधिक होती है तो माता - पिता बच्चों का तिरस्कार करने लगते हैं । 

2. जब परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती है और जहाँ बच्चों की संख्या हो अथवा न हो , तब यदि बच्चे उनकी आशाओं को पूर्ण नहीं करते हैं तो भी बच्चे माता

 3. बहुत से माता - पिता अपने बच्चों से बहुत उम्मीदें लगाते हैं चाहे बच्चों में योग्यता पिता के तिरस्कार के भागी हो जाते हैं । 

4. जब बच्चों के किसी अंग में विकार आ जाता है और वह अयोग्य व अक्षम हो जाता है तो भी माता - पिता अन्य बच्चों की अपेक्षा उस बच्चे का तिरस्कार करने लगते हैं ।

 5. जब माता - पिता और बच्चों के व्यवहार में व्यक्तिगत भिन्नता पायी जाती है तो भी माता - पिता तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं । 

6. यदि बच्चे माता - पिता के व्यक्तिगत जीवन या व्यक्तित्व विकास आदि में बाधा पहुँचाते हैं तो माता - पिता बच्चों का तिरस्कार करने लगते हैं । तिरस्कृत बालकों की पहचान ( Identification of Parentally Rejected Children ) यों तो विभिन्न लक्षणों के प्रकट करने के आधार पर इस प्रकार के बालकों को पहचाना जा सकता है । 


फिर भी वैज्ञानिक ढंग से इन बालकों को समझने एवं ढूँढने के लिए कुछ प्रमुख मानकीकृत परीक्षणों का प्रयोग किया जा सकता है 

1. आर . पी . रोहनर ( 1979 ) माता - पिता स्वीकृत तिरस्कृत प्रश्नावली ( PARQ ) - यह परीक्षण तीन रूपों में है- बालग , माता , प्रौढ़ आदि । इस परीक्षण के प्रश्न तीनों रूपों में एक हैं । तीनों मापनियों में 60-60 प्रश्न हैं । प्रस्तुत मापनी के उत्तर चार रूपों में से देने होते हैं । अंक भी क्रमशः 4 , 3 , 2 , 1 दिए जाते हैं । इस परीक्षण में विश्वसनीयता और आन्तरिक सह - सम्बन्ध ज्ञात किया गया है । इसमें बालक के और प्रौढ़ों के अपने माता के बारे में विचार जाने जाते हैं और एक मापनी में माँ के अपने बच्चों के विषय में विचार जाने जाते हैं । इसका हिन्दी रूपान्तरण जयप्रकाश ( सागर ) एवं महेश भार्गव ( आगरा ) ने किया । 

2. हरीशचन्द्र शर्मा एवं नरेन्द्र सिंह चौहान ( 1976 ) माता - पिता बच्चों की सम्बन्ध सूची ( PCR ) प्रस्तुत परीक्षण बच्चों के माता - पिता के लिए बनाया गया है । इसके द्वारा माता - पिता का बच्चों के प्रति व्यवहार जाना जाता है । इस परीक्षण में आठ परिस्थितियाँ हैं एवं आठों के दो पक्ष हैं । इसमें माता - पिता दोनों को उत्तर देने के लिए अलग - अलग प्रपत्र प्रयोग करते हैं । इस परीक्षण की विश्वसनीयता पुनर्परीक्षण विधि से 200 अभिभावकों के अंगों के आधार पर ज्ञात की , जो कि .72 से 89 तक ज्ञात हुई । 

 3. जी . पी . शैरी एवं जे.पी. सिन्हा ( 1987 ) पारिवारिक सम्बन्ध सूची ( FRI ) - यह परीक्षण विद्यालय एवं कॉलेज के हिन्दी भाषीय छात्रों के लिए बनाया गया है । इस परीक्षण द्वारा छात्रों के पारिवारिक सम्बन्धों के बारे में जान सकते हैं । इस परीक्षण में 150 पद हैं , जिन्हें करने के लिए कोई सीमा निश्चित नहीं है , फिर भी परीक्षार्थी इसे 40-50 मिनट में कर लेता है । यह परीक्षण पारिवारिक स्वीकारोक्ति ( acceptance ) , एकाग्रता ( concentration ) तथा अस्वीकारोक्ति तीन पहलुओं का मापन करता है । इस परीक्षण की विश्वसनीयता पुनर्परीक्षण विधि से ज्ञात की । साथ ही विषयवस्तु वैधता ज्ञात की जो कि .01 स्तर पर सार्थक सिद्ध हुई । इस परीक्षण पर शतांशीय और स्टेनाइन मानक ज्ञात किए गए ।

 4. एन . एस . चौहान एवं सी.पी. कोकर ( 1985 ) माता - पिता का बहु आयापी •• मापनी ( MDP Scale ) - यह परीक्षण बच्चों के माता - पिता के लिए बनाया गया है । इस परीक्षण में 56 पद हैं । इसके द्वारा माता - पिता की बच्चों के प्रति अभिवृत्ति जानी जाती है । इसकी विश्वसनीयता पुनर्परीक्षण विधि से ज्ञात की जो कि 52 से .65 प्राप्त हुई । इसके बाद अर्द्धविच्छित विधि से 69 से .75 ज्ञात की । इस परीक्षण से सम्बन्धित कोई परीक्षण नहीं है , इसलिए इस परीक्षण पर कसौटी सम्बन्धी वैधता ज्ञात की ।

 5. आर . आर . शर्मा ( 1988 ) माता - पिता उत्साहवर्द्धक मापनी ( PES ) - यह परीक्षण हायर सेकेण्डरी के छात्रों के लिए बनाया गया है । इसके द्वारा यह देखा जाता है कि करने की कोई समय सीमा निश्चित नहीं है , फिर भी छात्र इसे 25-30 मि . में पूरा कर लेने • माता - पिता अपने बच्चों का कितना उत्साहवर्द्धन करते हैं । इस परीक्षण में 40 पद हैं । इसको हैं । इस परीक्षण की विश्वसनीयता दो विधियों - पुनर्परीक्षण विधि और अर्द्धविच्छेदित विधि से ज्ञात की , जो कि क्रमशः .76 व .83 ज्ञात हुई । विषय - वस्तु सम्बन्धी वैधता ज्ञात की । इस परीक्षण में शतांशीय मानक भी ज्ञात किए । 

6. नलिनी रॉव ( 1986 ) माता - पिता बच्चों के सम्बन्धों की मापनी ( PCRS ) - यह परीक्षण 12-18 वर्ष के बालकों के लिए बनाया गया है । इस परीक्षण को हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अलग - अलग बनाया गया है । इस परीक्षण में 100 पद है , जिनके द्वारा बच्चों को दोनों माता - पिता के बारे में अलग - अलग विचार प्रस्तुत करने होते हैं । इस परीक्षण की विश्वसनीयता पुनःपरीक्षण विधि से ज्ञात की , जो कि लड़कियों के समूह में 77 से .87 तथा लड़कों के समूह पर 77 से 87 ज्ञात हुई । वैधता ज्ञात की , जो कि .05 स्वर पर सार्थक सिद्ध हुई । माता - पिता में अपने बालकों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति जाग्रत करना ( To Develop Awareness in Parents for Accepting their Children ) . बच्चे अपने माता - पिता के प्यार में अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं । अतः अपन बालकों के प्रति माता - पिता को दया नहीं दिखानी चाहिए और न ही उन्हें वेइज्जत तथा घृणित रूप से देखना चाहिए तथा न ही उन्हें ऐसे वालक होने का दुःख प्रकट करना चाहिए । उन्हें बालकों को वास्तव में प्यार करना चाहिए । न केवल ममता देनी चाहिए , बल्कि उनके सुधार के उपाय भी करने चाहिए । बालक को इस बात का आभास देना चाहिए कि वह परिवार का एक प्रिय सदस्य है , प्रत्येक व्यक्ति उसको चाहता है । माता - पिता को अपने बालक को संवेगात्मक रूप से स्वीकार करना चाहिए । उनके प्रति असन्तोष की भावना नहीं रखनी चाहिए । ऐसी अभिवृत्ति माता - पिता के लिए भी अच्छी होती है । चिकित्सक , मनोवैज्ञानिक , शिक्षा शास्त्री तथा समाज - सेवक को बहुधा उन माता - पिता को शिक्षित करना पड़ता है , जो अपने बालकों को स्वीकार नहीं करते हैं । ऐसी स्थिति में उन विभिन्न विधियों का प्रयोग करना चाहिए • जिससे माता - पिता अपने बालकों को स्वीकार करने लगे । 


अनेक ऐसी विधियाँ हैं , जिनके द्वारा माता - पिता अपने बालकों को वस्तुनिष्ठ रूप से स्वीकार करने लगते हैं

 1. सबसे पहले माता - पिता में यह भावना लानी चाहिए कि कोई भी दुनिया में एक साथ वड़ा विद्वान , खिलाड़ी , वक्ता , संगीतकार आदि नहीं होता है । हमें जो प्राप्त हो गया है । उसी के साथ रहना पड़ता है । यह सत्य है कि कोई व्यक्ति लम्बा होना चाहता है तो कोईछोटा , कोई संगीतकार बनना चाहता है तो कोई सुन्दर । परन्तु प्रौढ़ता का चिन्ह है कि मनुष्य को जो कुछ प्राप्त होता है , उसे स्वीकार कर लेता है । यदि मनुष्य एक - दूसरे को सिर्फ इसलिए है । अतः इन विचारों को ध्यान में रखकर माता - पिता को हमेशा अपने बच्चों को स्वीकार स्वीकार करें कि वह पूर्ण नहीं है तो मनुष्य अकेला रह जाएगा क्योंकि कोई भी पूर्ण नहीं करना चाहिए । 

2. यदि कोई बालक अक्षम भी है तो भी उसके माता - पिता को इस बात से अवगत कराना चाहिए कि उन्हीं की समस्या दुर्लभ या अनोखी नहीं है , बल्कि अनेक माता - पिता के समक्ष यह समस्या है ।

 3. अध्यापक माता - पिता को जीवन का प्रजातान्त्रिक विचार बताकर उन्हें अपने बालकों की ओर उन्मुख कर सकते हैं ।

 4. कुछ माता - पिता जीवन की समस्याओं के प्रति धार्मिक विचार रखते हैं , उन्हें यह बताना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति भगवान का बालक है । अतः उसके प्रति प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि उसका सम्मान करे और उसके विकास का प्रयत्न करें ।

 5. माता - पिता को इस बात से अवगत कराना चाहिए कि बालक की अक्षमता उसकी उन्नति नहीं रोकती , वल्कि हीन भावना मार्ग रोकती है । इस हीन भावना के उत्पन्न होने में माता - पिता का बहुत बड़ा हाथ रहता है , जिससे बालक अति संवेदनशील बन जाता है और उसमें शर्म , स्व- दया आदि दुर्गुण आ सकते हैं । अधिकतर माता - पिता यह चाहेंगे कि उनका बालक अधिक अक्षम न बने । इसके लिए उन्हें बालकों को हीन भावना से बचाना चाहिए ।

 6. माता - पिता को यह भी समझना चाहिए कि वह अपने बच्चों से उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार ही आशा करें । साथ ही इस बात की ओर ध्यान देना चाहि कि उनका बालक क्या बन सकता है ।

 7. माता - पिता को अपने बालकों के लिए यह नहीं सोचना चाहिए कि उनका बालक कभी ठीक नहीं हो पाएगा । उन्हें यह सोचना चाहिए कि यद्यपि बालक का एक अंग नहीं है पर उसके अन्य अंग तो ठीक हैं । उन्हें हमेशा आशावान रहना चाहिए । 

8. जो माता - पिता अपने व्यक्तिगत तनाव का दोषारोपण बच्चों पर करते हैं , उन माता पिता में समझ का विकास करना चाहिए ।

 9. अध्यापक तथा समाज - सेवक को चाहिए कि वह माता - पिता को बालक की सामाजिक , मानसिक , शारीरिक , संवेगात्मक और आर्थिक आवश्यकताओं से अवगत कराए । उन्हें यह भी बताना चाहिए कि बालक अपनी इच्छाओं के अनुसार अपना जीवनयापन करना चाहते हैं । वे दूसरों से प्रशंसा और सुरक्षा चाहते हैं । बालकों की इन विभिन्न आवश्यकताओं के प्रति जागरूक रहना माता - पिता का कर्तव्य है । यदि माता - पिता को उपर्युक्त विधियों से अवगत करा दिया जाए तो जो माता - पिता अपने बच्चों का तिरस्कार करते हैं वह काफी कम हो सकता है ।

विशिष्ट बालकों के माता - पिता ( Parents of Exceptional Children )

 विशिष्ट बालकों के माता - पिता ( Parents of Exceptional Children )  

 बच्चों के माता - पिता बच्चों का सन्तुलित व समन्वित विकास किस प्रकार विशिष्ट बालकों का जिक्र आते ही सबसे पहले उनके अभिभावकों का जिक्र होता है कि ऐसे अभिभावक कौन से होते हैं , इनकी आर्थिक व सामाजिक स्थिति कैसी होती है , | जिससे ये इस प्रकार के बच्चों का सन्तुलित व समन्वित विकास कर सकें । पिछले कुछ समय से इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि बालकों के विकास के लिए अध्यापक तथा माता - पिता में सहयोग होना चाहिए । इसका एक प्रमाण है- माता - पिता अध्यापक आन्दोलन । माता - पिता तथा अध्यापक के सहयोग के क्षेत्र बढ़ गए हैं । अतः अब इस प्रकार की सुविधाएँ बढ़ गयी हैं , जिससे घर तथा स्कूल आपस में निकट आ सकते हैं । अब तो यह सहयोग इस सीमा तक बढ़ गया है कि कुछ इस प्रकार के प्रोग्राम हैं , जिनसे माता पिता को शिक्षित किया जाता है । अमेरिका में इलिनॉयस में बहरे तथा अन्धों के राष्ट्रीय स्कूल में गर्मियों में एक - दो सप्ताह का स्कूल माता - पिता को शिक्षित करने के लिए लगता है । इसका उद्देश्य माता - पिता को अपने अक्षम बालक की समस्याओं को समझने में सहायता देना है तथा उन्हें बालकों की शिक्षा में भली - भाँति सहायक बनाना है । मैनिनसोटा राज्य के सामाजिक रक्षा विभाग से 1945 में एक पुस्तक प्रकाशित की गयी जिसमें कम सीखने वाले वालकों को शिक्षित करने के सुझाव माता - पिता को दिए गए थे । न्यूजरसी में 1943 में मानसिक रूप से पिछड़े बालकों के माता पिता को प्रशिक्षित करने की योजना बनी । इसका उद्देश्य माता - पिता को इस प्रकार प्रशिक्षित करना था कि वे अपने बच्चे को इस प्रकार शिक्षित कर सकें कि वह विद्यालय में कम - से कम समस्याएँ उत्पन्न करें । अब इस योजना ने माता - पिता की शिक्षा का विस्तृत रूप ले लिया है । अमेरिका में अपाहिज बालकों तथा युवकों की राष्ट्रीय संस्था ने हमेशा से माता - पिता की शिक्षा को अपनी सेवाओं का एक अन्तरंग भाग माना है । वह संस्था सुझाव सेवाएँ भी हैं तथा The Crippled Child पुस्तक प्रकाशित करके अपाहिज बालकों के माता - पिता को भेजती है । लॉस एन्जिल्स में जॉन ट्रेसी क्लिनिक , जो कि बहरे बालकों के लिए है , माता पिता को तीन माध्यमों से शिक्षित करती है । 

( 1 ) एक छोटे , प्रयोगात्मक स्कूल द्वारा जो कि बहरे बालकों तथा उनके माता - पिता के लिए है । यहाँ माता - पिता तथा बालक एक साथ प्रवेश करते हैं । माता - पिता अध्यापक को पढ़ाते हुए देखते हैं । उसे खेल के मैदान तथा क्लीनिक में सहायता देते हैं ।

 ( 2 ) बहरे बालकों की , चाहे किसी भी आयु के हों , कक्षाएँ आयोजित करके इसमें सभी बहरे बालकों के माता - पिता को बुलाया जाता है ।

 ( 3 ) पत्राचार पाठ्यक्रम ( Correspondence Course ) द्वारा । यह एक साल का है । इसमें माता - पिता के होठों को पढ़ना , संवेदनाओं को समझना तथा बालकों को बोलने के लिए तैयार करने के क्षेत्र में प्रशिक्षित किया जाता है । इस सबसे विशिष्ट बालकों के शिक्षण में एक नए दर्शन का आभास होता है ।


 इस दर्शन के अनुसार कोई भी बालक , चाहे वह विशिष्ट हो या सामान्य , उसके अध्यापकों के चार समूह होते हैं-

 ( i ) घर के अध्यापक , 

( ii ) खेल के अध्यापक , 

( iii ) स्कूल के अध्यापक ,

 ( iv ) समाज - अध्यापक । मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इन चारों प्रकार के अध्यापको में घर के अध्यापक सबसे प्रमुख हैं । घर के अध्यापक ही इस बात के लिए उत्तरदायी है कि बालक अपने बारे में क्या सोचते हैं तथा दूसरों के प्रति क्या विचार रखते हैं । दूसरों के प्रति उनके व्यवहार को भी माता - पिता ही देखते हैं । स्कूल अध्यापकों द्वारा यह अनुभव किया गया है कि वे बालक जो स्कूल आने से पहले अपने माता - पिता द्वारा पढ़ते हैं वे सीखने के लिए अधिक उत्सुक रहते हैं । यही बात विशिष्ट बालकों के साथ भी है । अतः बालकों को शिक्षा के लिए घर के , स्कूल के तथा समाज के अध्यापकों में मेल होना चाहिए । इसके लिए उन्हें एक - दूसरे को समझना चाहिए तथा शिक्षण के सामान्य उद्देश्य तथा प्रविधियों से परिचित होना चाहिए । अध्यापक तथा स्कूल के अफसर आदि विलक्षण एवं विशिष्ट बालकों के माँ बाप की सहायता उनके बच्चों को समझने में कर सकते हैं । माता - पिता अपने अक्षम बालकों के प्रति निराश हो जाते हैं । इसका परिणाम अच्छा नहीं होता है । यदि वे अधिक उत्साहित और आशावान होते हैं तभी अपने बालकों की सहायता कर सकते हैं । विशिष्ट बालकों के माता - पिता को अपने बच्चों के सुधार का प्रयत्न आरम्भ से ही करना चाहिए । विशिष्ट बालकों की शिक्षा के लिए कार्य करने वालों को माता - पिता की कठिनाई को अवश्य समझना चाहिए । तथा उनकी सहायता करनी चाहिए । के बालकों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति जाग्रत करना विशिष्ट बालकों के माता - पिता की सबसे बड़ी समस्या इन बालकों को संवेगात्मक रूप से स्वीकार करना है । बच्चे अपने माता - पिता के प्यार में अपने को सुरक्षित पाते हैं । अक्षम बालकों के प्रति माता - पिता को दया नहीं दिखानी चाहिए और न ही उन्हें बेईज्जत तथा घृणित रूप से देखना चाहिए । न ही उन्हें ऐसे बालक होने का दुःख प्रकट करना चाहिए । उन्हें वालकों को वास्तव में प्यार करना चाहिए । न केवल ममता देनी चाहिए बल्कि उनके सुधार के उपाय भी करने चाहिए । बालक को इस बात का आभास देना चाहिए कि वह परिवार का एक प्रिय सदस्य है । प्रत्येक व्यक्ति उसको चाहता है । संक्षेप में , माता - पिता को अपने विशिष्ट बालक को संवेगात्मक रूप से स्वीकार करना चाहिए । की जा सकती है ?




मन्दितमना बालकों की शिक्षा व्यवस्था परक निबन्ध लिखिए । अथवा मन्दितमना बालकों की शिक्षा का पाठ्यक्रम किस प्रकार का होना चाहिए ?

 मन्दितमना बालकों की शिक्षा व्यवस्था परक निबन्ध लिखिए । अथवा मन्दितमना बालकों की शिक्षा का पाठ्यक्रम किस प्रकार का होना चाहिए ?

 ( 1 ) बालक को स्वतन्त्रतापूर्वक उत्तरदायित्व के कार्यों को करने के लिए प्रोत्साहित 

( 2 ) उसमें सुरक्षा की भावना को विकसित करना ।

 ( 3 ) उसकी उपलब्धियों पर उसकी प्रशंसा करना । 

( 4 ) वाचन , पठन व लेखन का अनवरत् अभ्यास करना तथा मन्दिता के स्तर के अनुसार अन्य शैक्षणिक योग्यताएं विकसित करना ।

 ( 5 ) अभ्यास के अनुभव की ओर निर्देशित करना । 

( 6 ) बालक को अपने दैनिक कार्यों को स्वयं कुशलतार्वक करने का प्रशिक्षण देना ।

 ( 7 ) अपनी मानसिक आयु से अधिक उच्च मानसिक आयु के बालकों के साथ विभिन्न क्रियाकलापों में भाग लेना उसकी सामाजिक , शारीरिक एवं संवेगात्मक प्रगति के लिए उत्साहवर्धक रहता है । 

( 8 ) व्यावसायिक अभिवृत्ति की ओर उन्मुख करना ।

 ( 9 ) नियमित डॉक्टरी जाँच व मनोवैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर उपचारात्मक व्यायाम व अभ्यास कराना । 

( 10 ) विद्यालयों में इनके लिए विशेष शिक्षा की व्यवस्था करना । 

( 11 ) इनके विकासात्मक इतिहास का अभिलेख तैयार करना ।

 ( 12 ) माता - पिता तथा शिक्षकों द्वारा इस क्षेत्र के विशेषज्ञों से इनके विकास के अधिकतम सम्भव स्तर का ज्ञान प्राप्त करके उसके अनुरूप इनकी विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धि के लक्ष्य निर्धारित करना । 

( 13 ) अवसामान्यता का स्तर अधिक होने पर उचित सुरक्षापूर्ण देखभाल की व्यवस्था करना ।

 ( 14 ) व्यवहार चिकित्सा ( Behaviour therapy ) के द्वारा इनमें वातावरण के साथ अनुकूलन की योग्यता विकसित करना । उपर्युक्त उपायों के द्वारा यद्यपि मन्दितमना बालकों को सामान्य मानसिक योग्यता का बालक नहीं बनाया जा सकता है , फिर भी उनके मानसिक मन्दन के अनुरूप उन्हें समाज में कुछ उपयोगी योगदान देने तथा स्वयं स्वावलम्बी बनने में सहयोग दिया जा सकता है 

मन्दितमना बालकों के लिए शिक्षा व्यवस्था ( Educational Provision for Mentally Retarded Children ) मानसिक मन्दिता बालक के शारीरिक , शैक्षिक , सामाजिक , व्यावसायिक एवं सांवेगिक आदि सभी क्षेत्रों में विकास को किसी न किसी स्थिति तक निश्चित रूप से प्रभावित करती है । मन्दिता की पहचान एवं निदान के पश्चात् बालक को उसकी मन्दिता के स्तर व प्रकृति के अनुरूप शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से विशेष शिक्षा की व्यवस्था निम्न रूपों में की जा सकती है

 - 1. आवासीय विद्यालय ( Residential Schools ) दुःसाध्य रूप से मन्दितमना वालकों को घर अथवा सामान्य विद्यालयों में शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान करना पूर्णतया असम्भव होता है । अतः इन्हें सुसज्जित अस्पताल विद्यालय ( well equipped hospital - cum - schools ) में ही रखा जाना चाहिए , जहाँ पर इनकी देखभाल करने के लिए योग्य परिचारिकाएँ तथा चिकित्सक नियुक्त होते हैं , क्योंकि ये बालक अपने स्वयं के दैनिक कार्यों को भी नहीं कर पाते हैं , इन्हें सम्पूर्ण जीवन ऐसी संस्थाओं में ही व्यतीत करना होता है । कुछ विद्वन परीक्षण एवं शिक्षा ग्रहण करने योग्य ( trainable and educable ) मन्दितमना बालकों के लिए भी पृथक् विद्यालयों की व्यवस्था को उचित मानते हैं । इस प्रकार की व्यवस्था बालकों के समायोजन की दृष्टि से तो उत्तम होती है , किन्तु अन्य क्षेत्रों में बालकों के विकास एवं प्रगति को अवरुद्ध करती है । बालक का सामान्य बालकों से सम्पर्क टूट जाता है और जो अनेक क्रियाएँ वह अनुकरण से सीख सकता है , नहीं सीख पाता । अतः आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था अत्यधिक मन्दिता वाले बालकों के लिए ही उचित रहती है ।

 2. विशेष विद्यालय ( Special Schools ) विशेष विद्यालयों की व्यवस्था अत्यधिक मन्दिता वाले तथा प्रशिक्षण योग्यता मन्दितमना बालकों के लिए आवासीय विद्यालय व्यवस्था से अधिक व्यावहारिक एवं उपयोगी मानी जाती है । इसमें बालक एक निश्चित अवधि के लिए ही विद्यालय जाता है , शेष समय वह अपने परिवारीजनों तथा साथियों के सम्पर्क में ही व्यतीत करता है । इस प्रकार वह विशेष शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने के साथ - साथ सामाजिक रूप से भी प्रगति करता है । इन विद्यालयों में सन्दितमना बालकों की आवश्यकता , योग्यता स्तर तथा आयु के अनुरूप पृथक् प्रकार का कक्षा विभाजन होता है । बालकों की विद्यालयीन आयु ( School - age ) में छूट ( relaxation ) रखी जाती है । इसके अतिरिक्त विशेष रूप से प्रशिक्षित अध्यापकों , परिचायिकाओं एवं समाज सेवियों की सेवाएँ इन विद्यालयों को उपलब्ध रहती हैं । 

3. विशेष कक्षा ( Special Classes ) सामान्य विद्यालयों में न्यून मन्दितमना बालकों के लिए पृथक् रूप से विशेष शिक्षा की व्यवस्था , विशेष कक्षाओं के रूप में की जा सकती है । ऐसे विद्यालयों में जहाँ मन्दितमना बालकों की संख्या अधिक नहीं होती है बालक केवल कुछ समयावधि के लिए विशेष कक्षा में अपनी योग्यता के अनुरूप शिक्षण एवं प्रशिक्षण पाते हैं । शेष समय वे औसत वालकों के साथ ही सामान्य कक्षाओं में रहते हैं । यह व्यवस्था अनुशासन की दृष्टि से दोषपूर्ण रहती है । मन्दितमना बालकों की संख्या अधिक होने पर सामान्य विद्यालयों में ही उनके लिए पूर्णरूप से पृथक् समजातीय ( homogenous ) कक्षा की व्यवस्था सर्वोत्तम शिक्षा व्यवस्था मानी जाती है । इसमें समान वर्ष - आयु एवं मानसिक आयु वर्ग के बालक एक ही कक्षा में पूरी अवधि के लिए रहते हैं । इस प्रकार शिक्षा के द्वारा समान कार्यक्रम निर्धारित करना एवं समान गति से समान लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षण सामग्री व पाठ्यक्रम को व्यवस्थित करना सरल हो जाता है तथा वालक का उसकी योग्यता के अनुरूप विकास उत्तम गति से होता है । मन्दितमना बालकों की शिक्षा ( Education of Mentally Retarded Children ) सभी स्तर एवं प्रकृति के मन्दितमना बालक शिक्षा ग्रहण योग्य नहीं होते हैं । केवल न्यून मन्दित वाले ( बुद्धि लब्धि 50 से 75 ) कुछ प्राथमिक कक्षाओं को पास करने की योग्यता रखते हैं । सीमित मन्दिता वाले ( बुद्धि लव्धि 25 से 50 ) कठिन परिश्रम के पश्चात् केवल पढ़ना व लिखना सीख पाते हैं अन्यथा उन्हें कुछ विना कौशल वाले कार्यों का प्रशिक्षण देना ही सम्भव होता है । जड़ बुद्धि ( बुद्धि लब्धि 25 से कम ) पूरी तरह निर्भर होते हैं तथा स्वयं के कार्य भी नहीं कर पाते हैं । अतः केवल प्रथम दो समूहों के बालकों को शिक्षा प्रदान की जा सकती है - ( I ) शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना बालक ( Educable Mentally Retarded Children ) शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना बालकों की मानसिक आयु औसत बालकों की मानसिक आयु से सार्थक रूप से कम होती है । इसके लिए शिक्षा के उद्देश्य तथा पाठ्यक्रम का निर्धारण उनकी शिक्षा का प्रथम व सबसे महत्वपूर्ण चरण है ।

 1. उद्देश्य एवं लक्ष्य - शिक्षा के उद्देश्य एवं लक्ष्य की दृष्टि से मन्दितमना एवं सामान्य बालकों में कोई अन्तर नहीं होता है । दोनों की शिक्षा के मुख्य व विस्तृत उद्देश्य बालक में

 ( i ) सामाजिक कौशलों ,

 ( ii ) व्यक्तिगत योग्यता ( personal adequacy ) व 

( iii ) व्यावसायिक कौशलों का विकास करना है । यहाँ सामाजिक कौशल से तात्पर्य व्यक्ति / बालक विशेष का अपने साथियों , परिवार , विद्यालय व पड़ोसियों के साथ समायोजन से है । व्यक्तिगत योग्यता का अर्थ बालक में स्वयं सन्तुलित अवस्था में स्वतन्त्रतापूर्वक जीवन व्यतीत कर सकने की योग्यता है । व्यावसायिक कौशल से तात्पर्य वालक की उस योग्यता से है , जिसके द्वारा वह अपने को पूर्ण या आंशिक रूप से उत्पादक क्रिया द्वारा सहारा दे सके । इसके अतिरिक्त किर्क एवं जोनसन ने शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना वालकों के लिए शिक्षा के मुख्य 8 उद्देश्य बताए हैं

 ( 1 ) सामाजिक कौशल का विकास । 

( 2 ) बालक में व्यावसायिक कौशलों का विकास करना । 

( 3 ) उत्तम मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के द्वारा वालक में स्वतन्त्र व्यवहार व संवेगात्मक सुरक्षा का विकास करना । 

( 4 ) उत्तम स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों के द्वारा स्वास्थ्य एवं आरोग्यता की आदतों का विकास करना ।

 ( 5 ) निम्नतम शैक्षिक योग्यता ( पढ़ना , लिखना व सरल गणित ) का विकास करना ।

 ( 6 ) खाली समय में अपने आपको मनोरंजन एवं अन्य क्रिया - कलापों में व्यस्त रखने की समर्थता का विकास ।

 ( 7 ) पाठ्यक्रम के द्वारा उनमें परिवार में अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करने को योग्यता का विकास करना ।

 ( 8 ) सामुदायिक गतिविधियों के द्वारा उन्हें समुदाय का एक क्रियाशील सदस्य बनाना ।



 2. पाठ्यक्रम- अवसामान्य मानसिक विकास होने के कारण शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना बालक , सामान्य बालकों के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम से किसी भी प्रकार कोई लाभ नहीं उठा सकते हैं । अतः इनके मन्दिता के स्तर , आवश्यकताओं तथा शिक्षा के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए इनके लिए पाठ्यक्रम का निर्धारण करना चाहिए । इस प्रकार इसमें केवल शैक्षिक विषयों का समावेश ही नहीं किया जाए , वरन् विभिन्न पाठ्य सहगामी तथा पाठ्यान्तर क्रियाओं और व्यावसायिक विषयों को भी उचित स्थान दिया जाए । इसके अतिरिक्त इनका पाठ्यक्रम अत्यधिक सरल एवं इनकी योग्यता स्तर के क्रम में व्यवस्थित किया जाना चाहिए । ये स्तर निम्न प्रकार से हो सकते हैं

 ( i ) प्राथमिक स्तर पाठ्यक्रम ( Primary Level Curriculum ) - 3 से 8 वर्ष आयु तक इस स्तर के पाठ्यक्रम के मुख्य उद्देश्य वालकों में

 ( अ ) अपनी देखभाल स्वयं करना , 

( व ) समन्वय ,

 ( स ) हस्तादि का प्रयोग ( manipulation of objects ) ,

 ( द ) दूसरों को सम्मान व सहयोग देना , तथा

 ( य ) वाक् शक्ति का विकास करना आदि हैं । इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इन बालकों को वस्त्र पहनना , स्वच्छता , शौच की आदतों आदि का प्रशिक्षण , सामूहिक गान तथा स्पष्ट उच्चारण अभ्यास के द्वारा वाक् - शक्ति का विकास तथा अच्छी आदतों का प्रशिक्षण दिया जाता है ।



 ( ii ) माध्यमिक स्तर पाठ्यक्रम ( Middle Level Curriculum ) – 6 से 18 वर्ष आयु तक इस स्तर के पाठ्यक्रम के अन्तर्गत पठन , लेखन , गणित से लेकर सामान्य कक्षाओं के कक्षा 8 या 9 तक के पाठ्यक्रम के विषयों को कठिनता क्रम से रखा जा सकता है । इसके अतिरिक्त अर्द्ध - कौशल व बिना कौशल के कार्यों का प्रशिक्षण भी इस स्तर पर दिया जा सकता है । खाली समय का सदुपयोग करना सिखाने के उद्देश्य से विभिन्न खेल - कूद , नाटक , कला , हस्तकला , गायन तथा सामाजिक सदस्यता वाले क्रिया - कलापों का प्रशिक्षण दिया जाता है ।



 ( iii ) वयस्क स्तर पाठ्यक्रम ( Adult Level Curriculum ) - 15 वर्ष आयु से स्तर बहुत कम होता अधिक इस स्तर की शिक्षा केवल उन बालकों / व्यक्तियों को दी जाती है , जिनमें मन्दिता का जैसे- मन्द बुद्धि व न्यून बुद्धि वालकों में इनके पाठ्यक्रम में व्यावसायिक कुशलता तथा नागरिकता से सम्बन्धित विषय भी सम्मिलित रहते हैं । 



3. शिक्षक एवं शिक्षण पद्धति- प्रशिक्षण योग्य मन्दितमना बालकों को शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित एवं दक्ष शिक्षकों की आवश्यकता होती है , क्योंकि इन वालकों की अपनी एक विशेष प्रकार की आवश्यकताएँ होती हैं तथा विकास की गति अत्यन्त मन्द होती है । अतः इनके शिक्षक के लिए यह आवश्यक है कि उसे वाल - मनोविज्ञान तथा विभिन्न शिक्षण विधियों एवं तकनीकियों का ज्ञान हो । इसके साथ ही उसके व्यक्तित्व में सहनशीलता एवं धैर्य जैसे गुणों का समावेश हो , जिससे कि वह कक्षा में उत्पन्न किसी प्रकार की समस्या सरलता से हल कर सके । इसके अतिरिक्त , विभिन्न शिक्षण विधियों का प्रयोग पाठ्यक्रम को स्तर के अनुरूप किया जाना चाहिए तथा विधि का चुनाव करते समय बालक की कठिनाइयों , अन्य अक्षमताओं , आवश्यकताओं आदि का ध्यान रखना चाहिए अर्थात् शिक्षण बाल केन्द्रित होना चाहिए । विषय को उदाहरणों , रंगीन चित्रों , कहानियों , कविताओं आदि के माध्यम से रुचिकर ढंग से पढ़ाना चाहिए । विषय - वस्तु को सूक्ष्म इकाइयों में विभक्त करके सामूहिक एवं व्यक्तिगत रूप से पढ़ाना शिक्षण को अधिक प्रभावी बना सकता है ।


 ( II ) प्रशिक्षण योग्य मन्दितमना बालक ( Trainable Mentally Retarded Children ) प्रशिक्षण योग्य मन्दितमना वालक शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना बालकों से बौद्धिक रूप से और भी निम्न होते हैं । अतः उनके समान शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते । इनके लिए शिक्षा की व्यवस्था पृथक् कक्षाओं या विद्यालय में करनी पड़ती है तथा अथक परिश्रम के पश्चात् ये केंवल पढ़ना व साधारण गणित ही सीख पाते हैं । इनकी शिक्षा मुख्य रूप से विभिन्न आदतों तथा कौशलों के प्रशिक्षण पर केन्द्रित रहती है । 


इनकी शिक्षा का प्रावधान करते समय निम्न बातें विशेष तौर पर ध्यान रखने योग्य हैं 

( 1 ) इन बालकों को सही पहचान निदान इनकी शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कारण है । इसके लिए विशेषज्ञों व वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाना ही सर्वोत्तम रहता है । 

( 2 ) इन बालकों की कक्षा का आकार सूक्ष्म ( छः से पन्द्रह बालक तक ) रखा जाए । 

( 3 ) इनको विद्यालय ले जाने तथा विद्यालय से घर लाने के लिए उचित आवागमन के साधन उपलब्ध कराए जाएँ ।

 ( 4 ) जहाँ तक सम्भव हो , एक कक्षा में लगभग एक ही वर्षायु वर्ग के बालक रखे जाएँ । कक्षा अध्यापन में समान आयु एवं समान मानसिक परिपक्वता का ध्यान रखना चाहिए ।

 ( 5 ) उनके लिए पृथक् शिक्षा उद्देश्य निर्धारित किए जायें जो कि उनको आवश्यकताओं व क्षमताओं के अनुरूप हों । 

( 6 ) विशेष रूप से परिमार्जित पाठ्यक्रम का अनुकरण किया जाए । 

( 7 ) इनकी कक्षा अथवा विद्यालयों में विशेष रूप से प्रशिक्षित अध्यापक नियुक्त किए जायें ।

 ( 8 ) इन बालकों के माता - पिता को इनकी विभिन्न क्षमताओं व आवश्यकताओं से रूप से सत्यता के साथ परिचित करा दिया जाए ताकि इनको प्रशिक्षित करने में उनका पूर्ण सहयोग रहे । 




शिक्षा का उद्देश्य - प्रशिक्षण योग्य मन्दितमना बालकों को शिक्षित करने के लिए निर्मित पाठ्यक्रम के तीन सामान्य उद्देश्य होने चाहिए 

( 1 ) स्व - सहायता ( self - help ) की योग्यता का विकास ,

 ( 2 ) घर व समाज में समायोजित होने की क्षमता का विकास तथा 

( 3 ) आर्थिक उपयोगिता ( economic usefulness ) का विकास । पाठ्यक्रम - निम्न मानसिक स्तर के कारण इन बालकों में किसी भी प्रकार के शैक्षिक व व्यावसायिक कौशलों का विकास असम्भव होता है । स्व - सहायता की योग्यता का विकास करना इनकी शिक्षा एवं प्रशिक्षण का मुख्य भाग है । इसके लिए सर्वप्रथम सांवेदिक प्रशिक्षण ( sensory training ) दिया जाता है , जिससे यह छूकर , देखकर , सूँघकर , चखकर तथा सुनकर स्थितियों एवं वस्तुओं में भिन्नता का अनुमान कर सकें । ये स्वयं अनी देखभाल कर सकें । इसके लिए इनको वस्त्र पहनना , उतारना , ठीक प्रकार से भोजन ग्रहण करना , गुसल करना , शौच जाना , स्वच्छ रहना तथा विभिन्न दैनिक कार्यों को नियमित दिनचर्या के साथ पूरा करना सिखाया जाता है । सामाजिक कौशल के नाम पर ये अभिनन्दन करना , उचित समय पर हँसना , बोलना , किसी वस्तु की माँग करना सीख जाते हैं । इसके अतिरिक्त निरन्तर अभ्यास व अथक् परिश्रम के द्वारा इनको अपने साथियों , परिवारीजनों तथा सहपाठियों के साथ समायोजित करना भी सिखाया जा सकता है । इन बालकों में आर्थिक - उपयोगिता ( economic - usefulness ) का विकास करने के उद्देश्य से किसी प्रकार के व्यावसायिक कौशलों का प्रशिक्षण देना असम्भव होता है । लेकिन घर के कार्यों में प्रशिक्षित कर दिए जाने पर वह अपने समय व शक्ति का प्रयोग उपयोगी रूप में कर सकते हैं । इसके लिए इनको कक्षाओं में विभिन्न बिना कौशल ( unskilled ) के कार्यों , जैसे- चीजों को व्यवस्थित करना , कपड़े व वर्तन धोना , सफाई करना , पौधों में पानी देना , सब्जियाँ व फूल चुनना , सरल कटिंग के कार्य करना तथा बाजार से कुछ आसान खरीदारी करना आदि का प्रशिक्षण दिया जा सकता है । मानसिक न्यूनता के कारण इनमें लिखने , पढ़ने व गणित की योग्यता नाममात्र को तथा बहुत विलम्ब से विकसित हो पाती है । अतः पाठ्यक्रम के उच्चतम स्तर पर इनको विभिन्न संकेतों जैसे- ठहरो , खतरा है , सड़क बन्द है , पीछे हटो , वचाओ , विभिन्न वस्तुओं के नाम आदि को पढ़ना तथा अत्यन्त साधारण स्तर के जोड़ , घटाने व . गिनती करने का अभ्यास कराया जा सकता है । शिक्षक इन बालकों की शिक्षा केवल विभिन्न योग्यताओं के प्रशिक्षण को ही अपने में समाहित करते हैं अतः इनके लिए शिक्षक का विशेष योग्यता वाला होना आवश्यक नहीं है , किन्तु उसे मन्दितमना बालकों को शिक्षित एवं प्रशिक्षित करने की विधियों में पूर्ण रूप से कुशल होना चाहिए । इसके अतिरिक्त उसे इन वालकों के मनोविज्ञान का विस्तृत ज्ञान , सामान्य चिकित्सीय ज्ञान तथा निरन्तर परिश्रम की क्षमता व धैर्य शिक्षक के मुख्य लक्षण होने चाहिए ।


मानसिक रूप से पिछड़ापन या मन्द - बुद्धिपन क्या है ? क्या आप इसका कारण बता सकते हैं ? विस्तार से दीजिये । What is Mental Retardation or Dullness ? Can you Account for it ? Write fully . अथवा मन्दबुद्धि बालक किसे कहते हैं ? ऐसे बालक को शिक्षा देने के लिये अध्यापक में कौनसे विशेष गुण होने चाहिये ? Who is called a Mentally Retarded Child ? What special qualities should a teacher possess to teach such children ?

 मानसिक रूप से पिछड़ापन या मन्द - बुद्धिपन क्या है ? क्या आप इसका कारण बता सकते हैं ? विस्तार से  दीजिये । What is Mental Retardation or Dullness ? Can you Account for it ? Write fully . अथवा मन्दबुद्धि बालक किसे कहते हैं ? ऐसे बालक को शिक्षा देने के लिये अध्यापक में कौनसे विशेष गुण होने चाहिये ? Who is called a Mentally Retarded Child ? What special qualities should a teacher possess to teach such children ? 

मानसिक पिछड़ापन  ( Mental Retardation ) मानसिक पिछड़ापन का अर्थ ( Meaning of Mental Retardation ) कुछ बालक विशेष रुप कसे कम बुद्धि के होते हैं । वे मानसिक रूप से इतने उप सामान्य ( Sub - normal ) होते हैं कि कक्षा में अध्यापक द्वारा दिये गये निर्देशन को सुगमता से समझ नहीं पाते । टरमन ( Terman ) के अनुसार 70 से कम बुद्धि - लुब्धि वाले मानसिक • रूप से विकलांग बालक कहलाते हैं ।  ऐसे बालकों की सीमित बुद्धि होने के कारण वे समाज में अपने आपको समायोजित लिए यह जानना आवश्यक है कि मानसिक पिछड़ापन क्या है ? नहीं कर पाते । इनकी ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती हैं । इनके समायोजन के मानसिक रूप से पिछड़ेपन या मंदबुद्धिपन से अभिप्राय उन बालकों से हैं जो किसी भी शारीरिक तथा मानसिक रोग के कारण मंद बुद्धि का प्रदर्शन करते हैं और अपनी आयु के स्तर के अनुसार किसी भी कार्य को करने में असमर्थ होते हैं । इस दोष के कारण इनमें कई प्रकार की हीन - ग्रन्थियाँ ( Inferiority Complex ) पैदा हो जाती हैं । ऐसे बालक हर तरफ से उपेक्षित रहते हैं । मानसिक रूप से पिछड़े बालकों को बुद्धि - लब्धि के आधार पर वर्गीकृत किया जाता हैं । 70 से 80 के बीच बुद्धि - लब्धि ( I.Q. ) वाले बालक इस वर्ग में आते हैं । बुद्धि - लब्धि के आधार पर किया हुआ उपरोक्त वर्गीकरण सभी के द्वारा तय किया हुआ वर्गीकरण नहीं हैं । बुद्धि - लब्धि की सीमायें विभिन्न विद्वानों के अनुसार विभिन्न हैं लेकिन सभी इस बात से सहमत हैं कि इन बालकों का बौद्धिक अथवा मानसिक विकास सामान्य में बालकों की तुलना में बहुत कम होता हैं । ये वालक मानसिक क्रियाओं में सामान्य बालको की बराबरी कभी नहीं कर सकते । अमेरिकन एसोसियेशन ऑफ मेंटल डेफीशियेन्सी ( AMD ) ने मानसिक रूप से मंदित बालक की परिभाषा इस प्रकार दी है- " मानसिक मंदन मुख्य रूप से औसत से कम बौद्धिक कार्य निष्पादन का संकेत देती है जो कि अनुकूलन व्यवहार सम्बन्धी दोषों के साथ साथ ही पाई जाती है और जो कि विकास काल के समय स्फुट होती हैं ।

 " टर्नबुल ने इस परिभाषा में दो मुख्य लक्षणों की ओर ध्यान दिलाया है-

 ( 1 ) उन बौद्धिक कृत्यों की सीमाओं की पहचान कर लेना जैसे कि उनका संकेत सीखने में कठिनाइयों से मिलाया है तथा 

( 2 ) अनुकूल कुशलताओं पर ध्यान केन्द्रित कर लेना जैसे कि सम्प्रेषण , अपनी देखभाल तथा सामाजिक योग्यता । ये लक्षण स्पष्ट कर देते हैं कि मंदिमता को सहायक सेवाओं की आवश्यकता है ताकि वह अपनी कुछ सीमाओं पर विजय प्राप्त कर सके । साथ ही , अपनी वर्तमान आवश्यकताओं की भी पूर्ति कर सकें । 

कुप्पूस्वामी के शब्दों में— “ शैक्षिक पिछड़ापन अनेक कारणों का परिणाम है । अधिगम में मन्दता उत्पन्न करने के लिये अनेक कारक एक साथ मिल जाते हैं । 

" पोलक व पोलक ने लिखा है- “ मन्द - बुद्धि वालक को अब क्षीण - बुद्धि बालक के समूह में नहीं रखा जाता है , जिनके लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता । अब हम यह स्वीकार करते हैं कि उनके व्यक्तित्व के उतने ही विभिन्न पहलू होते हैं जितने सामान्य बालकों के व्यक्तित्व के होते हैं । " 


मानसिक पिछड़ेपन या मंद बुद्धिपन की विशेषतायें ( Characteristics of Mental Retardation or Dullness ) मंद बुद्धिपन या मानसिक रूप से पिछड़े वालकों की मुख्य विशेषतायें निम्नलिखित 

( 1 ) ऐसे बालक सामान्य बालकों की अपेक्षा धीरे - धीरे विकसित होते हैं । उदाहरणार्थ , छ : वर्ष की आयु के मानसिक रूप से पिछड़े बालक का स्तर तीन या चार साल वाले सामान्य बच्चे के स्तर जितना होगा । परिणामस्वरूप उसका स्कूल जाना भी देर से ही होगा ।

 ( 2 ) स्कूलों में उसका अधिगम ( Learning ) बहुत धीमा होगा । 

( 3 ) निरुत्साहित और परेशान होने के कारण बालक में स्कूल के लिए अरुचि ( Disliking ) का विकास होना स्वाभाविक है ।

 ( 4 ) स्कूल की शिक्षा की कमी के परिणामस्वरूप उसका सामाजिक और संवेगात्मक कुसमायोजन हो जाता है ।

 ( 5 ) शारीरिक रूप भी हीन होता है ( Physical Inferiority ) 

( 6 ) निरन्तर अस्वस्थता ( Constant III - health )

 ( 7 ) संवेगात्मक अस्थिरता का होना ( Emotional Instability ) 

( 8 ) अपूर्ण और दोषपूर्ण शब्दावली ( Imperfect and Defective Vocabulary ) 

( 9 ) सीमित और साधारण रुचियाँ ( Limited and Simple Interests )

 ( 10 ) लघु अवधान - विस्तार ( Short Attention Span )

 ( 11 ) धीमी प्रतिक्रियायें ( Slow Reactions )

 ( 12 ) सामान्यीकरण करने सम्बन्धी अयोग्यता ( Inability to Generalize ) 

( 13 ) मौलिकता का अभाव ( Lack of Originality ) 

( 14 ) प्रयोग की दोषपूर्ण आदतें ( Poor Habits of Application 

 ( 15 ) अनैतिकता और अपराध की ओर झुकीव ( Inclination Towards Immorality and Delinquency ) ā

 मानसिक पिछड़ेपन या मंद बुद्धिपन के कारण ( Causes of Mental Retardation or Dullness ) 

मानसिक पिछड़ेपन या मंद बुद्धिपन का कोई एक ही कारण नही होता । यह दोष कई कारणों की प्रक्रियाओं से उत्पन्न होता है । मानसिक पिछड़ेपन के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी कारकों का वर्णन निम्नलिखित हैं 

( 1 ) वंशानुक्रम ( Heredity ) 

( 2 ) शारीरिक कारक ( Physiological Factors )

 ( 3 ) संवेगात्मक कारक ( Emotional Factors )

 ( 4 ) समाजशास्त्रीय कारक ( Sociological Factors ) 


1. वंशानुक्रम ( Heredity ) - यह विचार सदा ही लोकप्रिय रहा है कि मानसिक पिछड़ेपन का मुख्य कारण वंशानुक्रम ही हैं । इस पिछड़ेपन का मुख्य भाग बालकों को उनके माता - पिता के मानसिक पिछड़ेपन से मिलता है । वृद्धिहीनता पूर्वजों में भी होती है और इसका हस्तांतरण बच्चों में भी हो जाता है । इसका कारण गुणसूत्रों ( Chromosomes ) का दोष होता हैं । 


2. शारीरिक कारक ( Physiological Factors ) - मस्तिष्क में कमियों के आ जाने से मानसिक दोष आ सकता है । इसके अतिरिक्त मस्तिष्क कोशिकाओं को बुखार के कारण घाव लगना भी शारीरिक कारकों में शामिल होता है । कई और बीमारियाँ , जैसे मैनिनजाईटिस ( Meningitiis ) , एनसिफलाईटिस ( Encephalitis ) , कनजिनियल सिफलिस ( Congenial Syplis ) , जर्मन मीसलस ( German Measals ) आदि भी मानसिक पिछड़ेपन के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं । इसके अतिरिक्त , ऐपीलैप्सी ( Epilepsy ) , अधरंग ( Paralysis ) , एपोप्लैक्सी ( Apopoexy ) आदि बीमारियाँ भी इस दोष को जन्म देती हैं ।  इन बीमारियों के अतिरिक्त गर्भावस्था के दौरान मां की उप - सामान्य स्थिति चोट , असंतुलन भोजन और कम भोजन के कारण भी मन्द बुद्धिपन जन्म लेता हैं । ( Subnormal Condition ) , जन्म के समय कोई दुर्घटना होना , शैशव काल में सिर पर 

3. संवेगात्मक कारक ( Emotional Factors ) - मानसिक पिछड़ेपन का शैक्षणिक | उपलब्धि का पक्ष गहरे संवेगात्मक कारकों के कारण होता हैं । संवेगो पर नियन्त्रण न कर पाने पर मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और बालक कहीं भी समायोजन नहीं कर पाते । 

4. समाजशास्त्रीय कारक ( Sociological Factors ) - कुछ समाज - शास्त्रियों का मत है कि मानसिक पिछड़ापन परिवार की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप होता है । उपरोक्त कारकों में से कोई भी कारक मानसिक पिछड़ेपन या मन्द बुद्धिपन को उत्पन्न करने के लिए क्रियाशील ( Active ) हो सकता है । ऐसे बालकों का इलाज सम्भव नहीं होता क्योंकि इस प्रकार के पिछड़ेपन के प्रभाव स्थायी होते हैं । शिक्षा के रूप में इन बालकों को उनके समायोजन के लिये उचित प्रशिक्षण दिया जा सकता है । 


मानसिक रूप से पिछड़े बालकों की समस्यायें ( Problems of Mentally Retarded Children ) मानसिक रूप से पिछड़े बालकों को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता इनके स्कूल अथवा समाज में समायोजन के लिए इनकी समस्याओं पर ध्यान देने की अति आवश्यकता है । इनकी मुख्य समस्यायें निम्नलिखित हैं ।

1. समायोजन सम्बन्धी समस्यायें ( Adjustment Problems ) - जैसा कि पहले बताया जा चुका है ऐसे बालक सामान्य बालकों के बीच स्वयं को कुसमायोजित ( Maladjusted ) महसूस करते हैं । समाज , स्कूल तथा समुदाय में इनका समायोजन कठिन होता है । परिवार में समायोजन ( Adjustment at Home ) - माता - पिता को स्वीकार करने से कतराते हैं कि उनका बच्चा मंद बुद्धि है । स्कूल में उसे असफलता का सामना करना पड़ता है । उधर माता - पिता ऊंची - ऊंची आशायें वांधे रहते हैं । लेकिन बच्चों की असफलता के कारण उनकी आशायें मिट जाती हैं और वे सारा क्रोध बच्चों पर निकालते हैं । उन्हें बुरा - भला कहते हैं । घर पर दूसरे सदस्यों की निगाह में भी वह मंद बुद्धि बालक गिर सा जाता है । स्कूल में समायोजन की समस्या ( Adjustment in School ) - स्कूलों और कक्षाओं में भी अध्यापक का व्यवहार ऐसे बालकों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण नहीं रहता । साधारण बालकों की तरह वे सामान्य शिक्षण विधियों से कुछ भी सीख नहीं पाते । सामान्य वालकों से पिछड़ेपन पर अध्यापक उन्हें डांटते हैं और दंड देते हैं । स्कूल की अन्य गतिविधियों में भाग लेने के लिए उन्हें प्रेरित नहीं किया जाता । परिणामस्वरूप ऐसे बच्चों के मन में स्कूल के प्रति और अध्यापक के प्रति घृणा उत्पन्न हो जाती है । समाज में समायोजन ( Adjustment in Society ) - मंद बुद्धि बालकों से समाज के अन्य वर्ग के लोग और बच्चे मेल - जोल बढ़ाना पसन्द नहीं करते । इसका परिणाम यह होता है कि मंद बुद्धि बालकों में हीनता की भावना पैदा हो जाती है और समाज में वे स्वयं को समायोजित नहीं कर पाते ।

 2. संवेगात्मक समस्यायें ( Emotional Problem ) - घर , स्कूल और समाज में संवेगात्मक रूप से ये अपरिपक्व और अविकसित रह जाते हैं । उदाहरणार्थ , छोटी - छोटी बात उचित वातावरण न मिलने के कारण ऐसे बालकों को संवेगात्मक , प्रशिक्षण नहीं मिल पाता । पर डल जाना या रो पड़ना । संवेगात्मक अस्थिरता ( Emotional Unstability ) के कारण उनका कहीं भी समायोजन ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है ।

 3. शारीरिक और मानसिक विकास की समस्या ( Physiological and Mental Development Problem ) - इन बालकों का क्योंकि शारीरिक और मानसिक विकास सामान्य बालकों की तरह नहीं हो पाता जिससे दिनचर्या सम्बन्धी कई क्रियाओं में इनका समायोजन नहीं हो पाता , जैसे - ठीक प्रकार से न बैठ पाना , कम सुनना , आंखों में दोष आ जाना आदि । उपरोक्त समस्याओं की ओर अध्यापक और माता - पिता को अवश्य ध्यान देना चाहिये ताकि ऐसे मंद बुद्धि बालकों का समाज में उचित समायोजन हो सके और वे अपने पैरों पर खड़े हो सकें ।


 मानसिक पिछड़ेपन की रोकथाम और उपचार ( Preventive and Remedial Measures ) मानसिक पिछड़ेपन की रोकथाम के लिए कई तरीके सुझाये पाये गये हैं । इसको रोकथाम के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं 

( 1 ) पृथक्करण ( Segregation ) 

( 2 ) जन्म दर पर नियन्त्रण ( Birth Control )

 ( 3 ) शिक्षा योजना ( Educational Programme )


 1. पृथक्करण ( Segregation ) - इस प्रक्रिया के अन्तर्गत मानसिक रूप से पिछड़े बालकों को सामान्य बालकों से अलग कर दिया जाये और उन्हें विशेष संस्थाओं में रखा जाये । 

2. जन्म दर पर नियन्त्रण ( Birth Control ) - नसबन्दी के अन्तर्गत गम्भीर रूप से मानसिक रूप से पिछड़े माता - पिता की नसबन्दी कर देनी चाहिए ताकि मानसिक रूप से पिछड़े बच्चों का जन्म ही न हो पाये । .

3. शिक्षा योजना ( Educational Programme ) - इसके अन्तर्गत निम्नलिखित कार्य किये जा सकते हैं

 ( i ) व्यक्तिगत ध्यान ( Individual Attention ) - अध्यापक ऐसे बच्चों की ओर विशेष ध्यान देने के लिए तत्पर रहें । इसके लिए कक्षाओं का छोटा होना आवश्यक है । पिछड़ेपन के लिए माता - पिता को शिक्षित करना अति आवश्यक है । उन्हें उनके बच्चे के 

( ii ) माता - पिता को शिक्षित करना ( Education of Parents ) - मानसिक बुद्धि के स्तर से अवगत करवाना चाहिए । इसके लिए उन्हें बताया जाना चाहिये कि वे ऐसे बालकों के साथ कैसा व्यवहार करें । 

( iii ) विशेष स्कूल और अस्पताल ( Special Schools and Hospitals ) - इस प्रकार के बालकों के लिये विशेष स्कूलों और अस्पतालों की व्यवस्था होनी चाहिये ।  

( iv ) विशेष शिक्षण विधियाँ ( Special Teaching Methods ) - मंद स्कूलों और अस्पतालों में इनकी देख - रेख और आवश्यक प्रशिक्षण सम्भव नहीं होता । बालकों के लिए सामान्य शिक्षण विधियाँ सफल नहीं हो सकतीं । अतः इनके लिये विशेष शिक्षण विधियों का प्रयोग करना अति आवश्यक है ।

 ( v ) विशेष पाठ्यक्रम ( Special Curriculum ) - इन बालकों के लिए विशेष पाठ्यक्रम होना चाहिये । सामान्य पाठ्यक्रम इनकी मानसिक योग्यताओं के अनुकूल नहीं होता । • हस्तकलाओं पर अधिक बल देना चाहिये । पुस्तकीय अध्ययन में ये अधिक उन्नति नहीं । कर सकते । हस्त कलाओं के प्रशिक्षण से ये समाज पर बोझ नहीं बन सकते । मानसिक पिछड़ेपन के अध्ययन से यह बात तो स्पष्ट है कि इन बालकों की चिकित्सा करना आसान कार्य नहीं है । साथ ही , उन्हें सामान्य बालकों के समान भी नहीं बनाया जा सकता । लेकिन हाँ , इनके लिए शिक्षण के कार्यक्रम इस प्रकार से अवश्य नियोजित किये जा सकते हैं कि ये बालक समाज में किसी पर बोझ न बनकर पैरों पर खड़ा होना सीख जायें  । 


अधिगम बालकों की शिक्षा में अध्यापक की भूमिका ( Role of Teacher for LD Children )

 अधिगम असमर्थी बालकों की शिक्षा में अध्यापक की भूमिका का वर्णन कीजिए । - 

                                                      अधिगम बालकों की शिक्षा में अध्यापक की भूमिका ( Role of Teacher for LD Children ) अधिगम असमर्थी बालकों की समस्याओं का निराकरण करने में अध्यापक निम्नलिखित योगदान दे सकते हैं और इन भूमिकाओं का निर्वाह कर सकते हैं अधिगम असमर्थी बालकों का प्रबन्धन ( Managing the LD Children ) - अधिगम बाधित बालकों को उनकी बाधिता के अनुरूप एक या अधिक क्षेत्रों में अध्यापक के शिक्षण तथा मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है । विशेषज्ञ अध्यापक की उपस्थिति , अनुपस्थिति इस तथ्य पर निर्भर करती है कि नियमित कक्षा अध्यापक अनुदेशनों को किस सीमा तक प्रयोग करते हैं । यह सत्य है कि नियमित कक्षाध्यापक तथा विशेषज्ञ अध्यापक के बीच सहयोगात्मक कार्य सम्बन्ध होना चाहिए । सामान्य तथा विशेषज्ञ अध्यापक को उनके कार्य क्षेत्र के अनुसार कार्य करना चाहिए । किसको क्या कार्य करना होगा ? इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता है , फिर भी सामान्य अध्यापक अधिगम बाधित बालक की करने में अपना योगदान दे सकते हैं । समस्याओं को दूर कक्षाध्यापक सामान्य तथा बाधित दोनों प्रकार के बालकों का शिक्षण कार्य करता है । 

• उन्हें वालकों की व्यवहार सम्बन्धी विशेषताओं को देखने का अवसर मिलता है , वे अधिगम बाधित बालकों को पहचान सकते हैं तथा पहचान के आधार पर वे अधिगम बाधित बालको को विशेष अध्यापक की सहायता प्रदान कर सकते हैं तथा उनकी कठिनाइयों तथा समस्याओं को दूर करने में सहायक हो सकते हैं । यदि अध्यापक को यह ज्ञात हो कि उनकी कक्षा में अधिगम बाधित बालक है तो उन्हें विशेषज्ञ अध्यापक की सहायता व परामर्श से व्यवस्थित तथा अनुकूल अनुदेशन प्रयोग करने चाहिए । यदि अध्यापक उपलब्ध न हो तो नियमित अध्यापक को स्वयं अनुदेशनों का प्रयोग करना चाहिए । उन्हें इस तथ्य का ध्यान रखना चाहिए कि अधिगम बाधित बालकों को आधारभूत आवश्यक शिक्षण है , जो क्षण अधिगम बाधित बालकों के लिए उपयोगी है । वह सामान्य बालकों के लिए भी उपयोगी होगा । सामान्य तथा अधिगम बाधित वालकों के शिक्षण हेतु बहुत से आयाम हैं । अधिगम बाधित बालक विपरीत विशेषताओं वाले होते हैं । उन्हें विकास के भिन्न भिन्न स्तरों पर अपनी शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न प्रविधियों को आवश्यकता होती है । विद्यालयी स्तर पर बालकों की क्षमताओं को बढ़ाने , उन्हें आत्मनिर्भर बनाने तथा स्वयं कार्य करने की क्षमता का विकास कराने के लिए उन्हें उचित वातावरण प्रदान करना चाहिए , इस स्तर पर सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए , हानिकारक तथा अत्यधिक शीघ्र टूटने वाली सामग्री को वालकों से दूर रखना चाहिए । पूर्व प्रारम्भ स्तर पर बालकों की कक्षा शोर रहित , प्रकाश युक्त तथा साफ सुथरी होनी चाहिए । अधिगम वाधित बालकों को हानि रहित वातावरण में सामान्य शिक्षण तथा विशिष्ट शिक्षण दिया जाना चाहिए । ऐसे बालकों को कक्षा के मध्य में बैठाया जा सकता है ताकि अध्यापक का ध्यान उन पर केन्द्रित रह सकें । यद्यपि वालकों को छोटे - छोटे समूह व्यक्तिगत रूप में कार्य कर सकते हैं फिर भी साथी की सहायता वाले अनुदेशन कार्य तथा विशेष योजना को भी प्रयोग में लाना चाहिए । इसके लिए अध्यापक को अधिगम वाधित बालक के लिए अच्छे सामान्य साथी का चुनाव करना चाहिए । अधिगम बाधित बालकों के शिक्षण के लिए योजना का प्रारूप तथा अनुदेशनीय प्रक्रिया आवश्यक होते हैं । पाठ्यक्रम को क्रम तथा कार्यक्रम के आधार पर तैयार करना चाहिए ताकि अधिगम बाधित वालक इसको पढ़ सके । इस कार्य के लिए विश्लेषण प्रक्रिया उपयुक्त है । इसके आधार पर अध्यापक कार्यों को छोटे - छोटे खण्डों में बाँट सकते हैं तथा प्रत्येक स्तर पर विद्यार्थियों की सहायता कर सकते हैं । अध्यापक को प्रत्येक पाठ्य योजना के अन्त में सारांश प्रस्तुति अवश्य देनी चाहिए ताकि अधिगम बाधित बालक अपनी गति से पढ़ सकें । इससे उन्हें पढ़ने में सहायता मिलेगी । अधिगम बाधित बालकों के खाली समय के सदुपयोग करने के लिए उपकरणों व सामग्री की सहायता ली जा सकती है ताकि वालकों का समय व्यर्थ न हो तथा वह कुछ सीख सकें । अधिगम बाधित बालकों की शैक्षिक क्षति तथा असफलताओं को दूर करने के लिए विभिन्न विशिष्ट शैक्षिक प्रक्रियाएँ हैं , इसमें से एक सामान्य पद्धति अधिगम आव्यूह है । इस पद्धति के अन्तर्गत वालकों को अधिगम प्रक्रिया जिसमें स्वयं अनुदेशन तथा मौखिक रूप के द्वारा अधिगम करने का अवसर मिलता है । 

 अधिगम बाधित बालकों में ज्ञानात्मक योग्यताओं का अभाव होता है , इसलिए अध्यापक स्वयं महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं , लिख सकते हैं तथा स्वयं पढ़ने के लिए कह सकते हैं । अधिगम बाधित बालकों के लिए स्वयं अनुदेशनीय प्रविधियाँ बहुत प्रभावशाली होती हैं । विश्वसनीय मूल्यांकन शिक्षण मूल्यांकन तथा अनुदेशन में प्रगति की व्यवस्था है । यह एक सीधा , लगातार तथा विद्यार्थियों की प्रगति ज्ञान करने का साधन है । इस परिस्थिति में अध्यापक वृहत क्षेत्र में विद्यार्थियों का व्यवहार समझ सकता है । अपनुदेशनात्मक निर्णय लेने में यह अध्यापक के लिए सहायक होता है । पाठ्यक्रम तथा अन्य शिक्षण सामग्री के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि यह बालकों के कार्य करने के स्तर के अनुरूप , उपयुक्त तथा प्रेरणादायक होनी चाहिए । यह संकीर्ण नहीं होनी चाहिए । बालकों को दिए गए कार्य को अधिक प्रेरित करने के लिए अध्यापक को बालक की निपुणता तथा रूचि का प्रयोग करना चाहिए । बालकों का ध्यान करने तथा अधिगम को अधिक रूचिकर बनाने के लिए अध्यापकों को विभिन्न रंगों तथा उदाहरणों का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए । अधिगम असमर्थी बालकों की शिक्षा के लिए बहु इन्द्रिया आयाम का प्रयोग हो सकता है । शब्दों को सुनकर , देखकर , बोलकर आदि के आधार पर फ्रेरानल्ड ( 1943 ) में दृश्य , श्रव्य तथा सौन्दर्यानुभूति का विकास किया । एक बार यदि शब्द ज्ञान में दक्षता प्राप्त कर लें तो सहायता कर सकता है तथा उनकी प्रगति अथवा कमियों के बारे में बता सकता है । इस प्रकार नए शब्दों का शिक्षण किया जा सकता है । वालकों को शब्द अथवा कोई लेखन का संगठन एवं व्यवस्था किस प्रकार किया जाता है । इसके बारे में भी अध्यापक बता सकता है । जब बालक को शब्द ज्ञान हो जाता है तो वह वाक्य तथा कहानी लिखना प्रारम्भ कर देता है तथा धीरे - धीरे पढ़ना भी प्रारम्भ कर देता है । बहु इन्द्रीय कार्य अथवा ज्ञान देने की अनेक विधियाँ हैं । सीधे अनुदेशन देने की क्रिया में निर्धारण अनुदेशन तथा मूल्यांकन का प्रयोग किया जाता है । शिक्षण एक सीधे अनुदेशन की व्यवस्था है , जिसके अन्तर्गत त्रुटियों की कम सम्भावनाएँ हैं । इसके माध्यम से पर्याप्त रूप से अभ्यास होता है तथा शीघ्र ही पृष्ठ - पोषण दिया जाता है । शिक्षण में गणित तथा पाठन सम्बन्धी अंश सम्मिलित रहते हैं । शिक्षण का प्रयोग सर्वप्रथम असुविधात्मक बालकों के लिए किया गया और अब अधिगम असमर्थी बालकों के लिए किया जा रहा है । अधिगम आव्यूह का प्रयोग अधिगम असमर्थी बालकों के अधिगम हेतु सहायता देने में प्रयोग किया जा रहा है । स्कूल व्यवस्था के अन्तर्गत प्रबन्धन कर्ताओं की सहायता के लिए कम्प्यूटर प्राप्त अनुदेशनों को भी सम्मिलित किया जा रहा है । आत्मविश्वास का विकास - अधिगम असमर्थी बालकों की सहायता करने के लिए सबसे उत्तम कार्य बालकों को उनके उत्तरदायित्वों तथा कर्तव्यों का निर्धारण करना और सौंपना है । विशेषतः ऐसे बालकों को जो समस्याओं में उलझे हुए हैं । विद्यार्थियों को पालतू जानवर अथवा पौधे की देखभाल करने का कार्य सौंपना महत्वपूर्ण है । इस प्रकार बालकों के मस्तिष्क पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ता है और वे समझेगे कि उनके लिए विद्यालय की कक्षाओं में उपस्थिति केवल शैक्षिक शक्ति के लिए ही नहीं परन्तु किसी जीव ( पालतू पशु अथवा पौधे ) के जीवन के लिए भी है । अध्यापक का इस प्रकार का व्यवहार बालकों में आत्मविश्वास एक नाटकीय विधि से ओतप्रोत होता है ।