अधिगम बाधित बालकों हेतु विभिन्न आयामों का वर्णन कीजिए । - अधिगम बाधित बालकों हेतु भाषा सम्बन्धी आयाम ( Linguistic Teaching Approach for LD )

 अधिगम बाधित बालकों हेतु विभिन्न आयामों का वर्णन कीजिए । - अधिगम बाधित बालकों हेतु भाषा सम्बन्धी आयाम ( Linguistic Teaching Approach for LD ) 




                 अधिगम असमर्थी बालकों के लिए निम्नलिखित भाषा सम्बन्धी आयामों का प्रयोग किया जाता है ।

( 1 ) नाशिक ध्वनिक ( Nasal )

 ( 2 ) ध्वनिक ( Phonics ) 

( 3 ) भाषा सम्बन्धी ( Linguistic ) 

( 4 ) भाषा सम्बन्धी अनुभव ( Language Experiences ) 

( 5 ) अनुभिक्रमित अनुदेशन ( Programmed Instruction ) 

( 6 ) बहुइन्द्रीय ( Multi Sensory )

 ( 7 ) चित्रों की सहायता ( Audio - visual aids ) ,


 भाषा प्रयोगशाला । उपरोक्त सभी का वर्णन यहाँ इस प्रकार से किया जा सकता है

 ( 1 ) नाशिक ध्वनिक प्रशिक्षण आयाम ( Nasal Teaching Approach ) अधिगम बाधित बालकों के सन्दर्भ में इस आयाम के लाभ तथा सीमाएँ होती हैं लाभ- 

( 1 ) समझने में सरल 

( 2 ) सीमित शब्दावली

 ( 3 ) निपुणता का वर्गीकरण में परिचय 

( 4 ) निपुणता का पुनर्बलन 

( 5 ) निदान तथा मूल्यांकन सामग्री उपलब्ध हो जाती है ।


 सीमाएँ - 

( 1 ) पाठ्य विधि में समिति लचीलापन 

( 2 ) अनुदेशन को प्रोत्साहन नहीं दिया जाता । 

( 3 ) निपुणता के लिए आवश्यक सामग्री की कमी 

( 4 ) प्रक्रियाओं के लिए साधनों की कमी 

( 5 ) श्रव्य अनुदेशन के विश्लेषण तथा संश्लेषण को कोई पसन्द नहीं 

( 6 ) उन्हीं कहानियों तथा विषयों के बार - बार दोहराने के कारण इस आयाम में अधिगम सफलता नहीं मिल पाती है । 

( 2 ) ध्वनियुक्त शिक्षण आयाम ( Phonic Teaching Approach ) अधिगम बाधित बालकों के सन्दर्भ में इस आयाम के निम्न लाभ तथा सीमाएँ हैं लाभ- यह अच्छी श्रव्यात्मक योग्यता वाले बालकों के लिए प्रभावशाली अर्थापन प्रविधि है ।

 सीमाएँ - 

( 1 ) श्रव्यात्मक क्षति वाले विद्यार्थियों के लिए प्रभावशाली नहीं है । 

( 2 ) पृथक् पढ़ाई की जा सकती है ।

 ( 3 ) समझाने की प्रक्रिया पर ध्यान नहीं दिया जाता है ।

 ( 4 ) अंग्रेजी भाषा में अक्षरों व शब्दों में समानता के कारण से भी भ्रम हो सकता है । 

 ( 3 ) भाषा सम्बन्धी शैक्षिक आयाम ( Linguistic Teaching Approach ) 

इस आयाम के लाभ व सीमाएँ निम्नलिखित हैं 

 ( 1 ) प्रारम्भिक अवस्था में ही गलत वर्तनी पर नियन्त्रण हो जाता है । 

( 2 ) धीरे धीरे श्रव्यात्मकता का परिचय 

( 3 ) बार - बार दोहराई तथा अभ्यास किया जाता है । 

सीमाएँ– 

( 1 ) प्रारम्भ में समझने पर कम बल दिया जाता है । 

( 2 ) सामान्य वस्तु के लिए प्रयुक्त शब्दावली का लाभ विद्यार्थियों को शाब्दिक भाषा में नहीं हो पाता है ।

 ( 4 ) भाषा अनुभव शिक्षण आयाम ( Language Experience Teaching Approach ) 


अधिगम बाधित बालकों के सन्दर्भ में इस आयाम के लाभ तथा सीमाएँ होती हैं लाभ-

 ( 1 ) कहानियों से विद्यार्थियों को प्रेरणा मिलती है ।

 ( 2 ) मौखिक भाषा भी प्रयुक्त होते हैं । 

( 3 ) विशिष्ट निपुणता सम्बन्धी विकास सम्मिलित हो सकता है । 

( 4 ) भाषा व कला निपुणता का भी इस आयाम के द्वारा प्रयोग किया जा सकता है , तथा 

( 5 ) अच्छी दृश्यात्मक योग्यता वाले विद्यार्थियों के लिए लाभकारी है । सीमाएँ–

 ( 1 ) विद्यार्थियों के भाषा स्तर से सीमित हो सकता है ।

 ( 2 ) निपुणता सम्बन्धं प्रारूप के लिए व्यवस्थित उपकरण को उपलब्ध नहीं किया जा सकता है ।


 ( 5 ) अभिक्रमित अनुदेशन शिक्षण आयाम ( Programmed Instruction ) अधिगम बाधित वालकों के सन्दर्भ में इस आयाम के लाभ तथा सीमाएँ होती हैं लाभ- 

( 1 ) छोटे अनुक्रमीय पद , 

( 2 ) शीघ्र समझ में आ जाती है , तथा 

( 3 ) सीधे अनुदेशन की कमी ,


 तत्काल पुनर्बलन दिया जाता है । 

सीमाएँ - 

( 1 ) प्रत्यक्ष अनुदेशन की कमी , 

( 2 ) प्रारूप की अनिश्चितता के कारण भ्रम हो सकता है ।


 ( 6 ) बहुइन्द्रीय शिक्षण आयाम ( Multisensory Teaching Approach ) अधिगम वाधित वालकों के लिए प्रयोग में आने वाली इस पद्धति के लाभ व सीमाएँ । निम्नलिखित हैं लाभ-

 ( 1 ) इस पद्धति के माध्यम से मस्तिष्क को सूचना पहुँचाने के लिए एक से अधिक इन्द्रियों का प्रयोग होता है तथा

 ( 2 ) इसके अन्तर्गत विश्लेषण तथा संश्लेषण पद्धति का प्रयोग किया जा सकता है । 


सीमाएँ- 

( 1 ) कुछ कार्यक्रमों में अनुक्रमीय निपुणता विकास की कमी होती है , तथा 

( 2 ) कुछ विद्यार्थियों पर अतिरिक्त इन्द्रिय बोझ पड़ता है ।


 ( 7 ) चित्रों उपयोग का शैक्षिक आयाम ( Review Picture Teaching Approach ) अधिगम बाधित बालकों के लिए प्रयुक्त इस पद्धति के लाभ और सीमाएँ होती हैं चित्र का प्रयोग किया जाता है । लाभ -

 ( 1 ) पाठन की प्रारम्भिक स्थिति को सरल बनाने के लिए शब्द के स्थान पर 

( 2 ) इस पद्धति के अन्तर्गत प्रयुक्त किया जाता है , तथा

 ( 3 ) परम्परागत मुद्रित सामग्री का स्थानान्तरण किया जाता है ।


 ( ब ) अधिगम बाधित बालकों हेतु सुधारात्मक आयाम ( Remedial Approach for LD Children ) इन व्यवस्थाओं से युक्त नियमित कक्षाओं में सामान्य अथवा साधारण रूप से अधिगम बाधित बालक सन्तोषजनक कार्य कर सकते हैं सामान्य कक्षा पाठ्यक्रम में कुछ परिवर्तन किया जा सकता है । कुछ सामान्य सुधारात्मक प्रविधियाँ यह है , परन्तु इन प्रविधियों के साथ - साथ कुछ विशिष्ट सैद्धान्तिक प्रारूप का भी प्रयोग अधिगम बाधित बालक के लिए किया जाना आवश्यक है । 

1. ज्ञानात्मक प्रक्रिया आयाम ( Cognitive Processing Approach ) ज्ञानात्मक प्रक्रिया आयाम के अन्तर्गत यह पता चल जाता है कि बालक कैसे सीखता है तथा कैसे शिक्षण का प्रारूप प्रस्तुत करता है । विकासात्मक आयाम के लिए क्रमयुक्त आयाम पर जोर देता है । इन आयामों में किए जाने वाले परीक्षणों के माध्यम से अधिगम क्षति के अन्य क्षेत्रों का भी पता चलता है , जिनको पढ़ाया जा सकता है । 

2. विशिष्ट प्रविधियों से युक्त आयाम ( Specialized Techniques Approach ) - विशिष्ट प्रविधियाँ इस तथ्य को इंगित करती है कि अध्यापक विशेष समय अन्तराल में बताए गए अनुदेशन तथा उपयोग को प्रयोग करेंगे निपुणताओं में विकासात्मक आयामों में निपुणता में बुद्धि विकसित की जा सकती है । अधिगम बाधित बालकों की चिकित्सा के लिए मुद्रित सामग्री भी प्रयोग की जा सकती है ।

 3. व्यवहार सम्बन्धी आयाम ( Behavioural Approach ) - व्यवहार सम्बन्धी पद्धति अधिगम सम्बन्धी वातावरणीय परिस्थितियों को संलग्न करने के लिए व्यवहार में आवश्यक परिवर्तन से सम्बन्धित है । पुनर्बलन को लागू करके तथा व्यवहार में परिवर्तन करके व मनो उपचार की पद्धति को प्रयोग करके अधिगम बाधित वालकों की समस्याओं के समाधान में सहायता मिल सकती है तथा अध्यापक तथा विद्यार्थियों के मध्य स्वस्थ शैक्षिक प्रणाली में कमियों से सम्बन्ध स्थापित हो सकता है । पाठन असफलता का मुख्य कारण शैक्षिक प्रणाली में दोषों अर्थात् अच्छे शिक्षण का अभाव है बालक के अध्यापक के शिक्षण तथा शैक्षिक वातावरण यह दोनों अधिगम बाधित बालक की चिकित्सा में सहयोग दे सकते हैं ।


अधिगम बाधित बालकों की प्रमुख समस्या क्या हैं ? अधिगम आधारित बालकों के लिए उपचार आयाम बताइए । उत्तर अधिगम बाधित बालकों की समस्याएँ ( Problems of Learning Disabled Children

 अधिगम बाधित बालकों की प्रमुख समस्या क्या हैं ? अधिगम आधारित बालकों के लिए उपचार आयाम बताइए । 



 अधिगम बाधित बालकों की समस्याएँ ( Problems of Learning Disabled Children ) वालक के व्यक्तिगत क्रयाकलापों पर ध्यान दिया जाए तो ज्ञात होता है कि यह सामान्य बालकों के समान ही होते हैं । वह मन्द बुद्धि नहीं होते और न ही उन्हें देखने व सुनने में कोई कठिनाई होती है , परन्तु उनकी मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं विशेषकर बोध में कठिनाइयों के कारण उन्हें बोलने में , पढ़ने में , लिखने में तथा अंकों को सुनने तथा समझने में समस्या होती है । यह समस्या मानसिक मन्द क्रियाओं , भावनात्मक तथा व्यवहार सम्बन्धी कारण हो सकते हैं , लेकिन यह मानसिक मन्दिता , इन्द्रियों के प्रयोग के करने तथा सांस्कृतिक अनुदेशनात्मक अभ्यास के कारण नहीं होती है । वालकों को सामान्य बाधिता तथा गम्भीर रूप से बाधिक वालकों की श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है । सामान्य अधिगम वाधिक बालक नियमित विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं । ऐसे बालक नियमित विद्यालयों में पढ़ना पसन्द करते हैं । ऐसे बालकों को प्रारम्भिक अवस्था में पहचानना कठिन होता है । उनको पढ़ाई में समस्याएँ होती हैं । समस्याएँ अधिगम योग्यता के एक क्षेत्र में हो सकती हैं या एक से अधिक क्षेत्रों में भी हो सकती है , परन्तु यह सामान्य प्रभाव की होती है । यदि बालकों में यह समस्या सामान्य प्रकार से है , तो उनको सही अभ्यास तथा प्रशिक्षण देकर इस समस्या से छुटकारा दिलाया जा सकता है तथा पाठ्यक्रम में कुछ समायोजन करके इन सामान्य अधिगम बाधित बालकों को उच्च कक्षाओं में भी सामान्य बालकों के साथ पढ़ाया जा सकता है । जिन बालकों में अधिगम बाधिता गम्भीर होती है वे पढ़ - लिख नहीं सकते हैं । उनकी यह समस्या मस्तिष्क मन्द क्रिया के कारण हो सकती है । ऐसे बालकों को सामान्य विद्यालयों में परीक्षा देना बहुत कठिन होता है । अधिगम बाधित बालकों की व्यवहार सम्बन्धी विशेषताएँ भी भिन्न - भिन्न होती है , लेकिन उन सबकी बौद्धिक योग्यता तथा उप्लब्धि के बीच सामंजस्यता का अभाव होता है । यह समस्या उनकी होती है , लेकिन उनके सामने अन्य समस्याएँ जैसे  होती है । इन समस्याओं का वर्णन निम्नलिखित है भावनात्मक तथा प्रारम्भिक कुशलता तथा समाज में पूर्ण रूप से समायोजित न हो पाना भी 

1. अवधान का अभाव ( Attention Disorders of LD ) - ध्यान की समस्या अधिगम बाधिता के साथ - साथ उत्पन्न होती है । उन बालकों का ध्यान बहुत कम समय में करती है । केन्द्रित होता है । ध्यान केन्द्रित होने की समस्या विद्यार्थी की परीक्षा देने की योग्यता को प्रभावित 

( 1 ) वह दिए गए समय तक अपना ध्यान नहीं केन्द्रित कर पाते हैं ।

 ( 2 ) वह उपयुक्त को समझ नहीं पाते तथा अनुपयुक्त को नकार नहीं पाते । वे अपने चारों ओर के उद्दीपनों की ओर आकर्षित होते रहते हैं । 

( 3 ) वह एक विषय से ध्यान हटाकर दूसरे विषय पर अपना ध्यान लगा लेते हैं ।

 ( 4 ) वह कम महत्वपूर्ण व्याख्याओं पर बहुत ध्यान देते हैं तथा आवश्यक तथ्यों को कोई महत्व नहीं देते हैं ।


 2. स्मृति समस्या ( Memory Problem ) - अधिकांश से अधिगम बाधित बालक मन्द गति से सीखते हैं । ऐसे बालक न तो कार्य योजना बना पाते हैं और न ही उनको क्रियान्वयन कर पाते हैं । उनकी कुछ विशेषताएँ , जो स्मृति करने से सम्बन्धित होती है

 ( 1 ) स्मृति सम्वन्धी दोष वाले बालकों को सूचनाओं को एकत्र करने तथा पुनः प्राप्त करने में कठिनाई होती है । उनको देखने , सुनने तथा अन्य अधिगम प्रक्रियाओं में भी कठिनाई होती है ।

 ( 2 ) अधिगम बाधित वालकों को लय में पढ़ने से अंकों को क्रमानुसार में तथा शब्दों तथा मुहावरों व लोकोक्तियों को पढ़ने में कठिनाई होती है । 

( 3 ) उनको अक्षरों , शब्दों तथा आकारों को देखने में कठिनाई होती है । 

( 4 ) अल्पावधि तथा दीर्घावधि दोनों प्रकार की स्मृति वाले अधिगम बाधित बालक पढ़ने में कमजोर होते हैं ।

 ( 5 ) वह वर्तमान तथा भूत के अनुभवों के बीच सम्बन्ध नहीं कर पाते हैं ।

 3. अधिगम बाघित बालकों की वाचन सम्बन्धी समस्या ( Reading Problem of LD Children ) - लगभग 80 प्रतिशत से 90 प्रतिशत अधिगम बाधित बालक पाठन सम्बन्धी समस्याओं से ग्रसित होते हैं और उनकी शैक्षिक उपलब्धि बहुत कम होती है । ये समस्याएँ उच्चारण , शब्द के बीच से अक्षरों को छोड़ देने , अन्य अक्षरों को शब्दों में जोड़ देने तथा एक शब्द के स्थान पर अन्य शब्दों को बोलने से सम्बन्धित होती हैं । यह समस्याएँ स्मृति की समस्या , अक्षरों को तथा शब्दों को उल्टा कर देने की समस्या तथा शब्दों की ध्वनि को मिला देने से सम्बन्धित हो सकती है , ये समस्या पाठन सम्बन्धी और समझने सम्बन्धी भी हो सकती हैं । अधिगम बाधित बालक दृश्य वक्ता तथा श्रव्य वक्ता दो प्रकार के होते हैं- दृश्य वक्ता सही शब्दों को गलत क्रम में लिखता है , तथा श्रव्य वक्ता शब्दों की ध्वनि को बढ़ा देता है या खींच देता है । जैसे- ' वह ' को ' वे ' उच्चारित करता है । वह अक्षरों को छोड़ने व जोड़ने तथा शब्दों , अक्षरों के प्रतिस्थापन सम्बन्धी त्रुटि भी करता है । ये त्रुटियाँ किशोरावस्था तक जारी रहती हैं तथा अधिगम बाधिता का कारण बन जाती है ।[ ' 

 4. वाचन सम्बन्धी बाघिता ( Reading Disability ) - यह बाधिता दो प्रकार की होती है । यदि यह सामान्य प्रकार की होती है , जिसको वाचन में कठिनाई होती है , परन्तु यदि क्षति गम्भीर होती है तो व्यक्ति बिल्कुल भी नहीं पढ़ पाता है । वह शब्द बाधित होते नाम से भी प्रचलित है । सामान्य प्रकार की बाधिता वाले वालक प्रायः सामान्य कक्षाओं में पढ़ते हैं । यदि यह समस्या प्रारम्भ में ही पहचान ली जाए तो इस समस्या के समाधान की सहायता की जा सकती है तथा उसको सरलता से सामान्य बालकों के समान बनाया जा सकता है । गम्भीर रूप से बाधित बालकों को चिकित्सा की आवश्यकता होती है 

 5. लेखन सम्बन्धी बाधिता ( Writing Disability ) -लेखन सम्बन्धी बाधिता से ग्रसित बालक स्वयं तुरन्त लिख नहीं पाता है । यह क्षति दो प्रकार की होती है सामान्य तथा गम्भीर । इस बाधिता से सामान्य रूप से प्रभावित वालक साफ - साफ नहीं लिख पाते हैं , वे सामान्य विद्यालयों में पढ़ते हैं । यदि उनकी इस समस्या को आरम्भ में ही पहचान लिया जाए और इस समस्या के निराकरण में उन बालकों की सहायता की जाए तो इस समस्या को दूर किया जा सकता है । जो बालक इस बाधिता से गम्भीर रूप से ग्रसित होते हैं , वे बिना त्रुटि किए लिख सकते हैं । लेकिन स्वयं तुरन्त नहीं लिख पाते हैं , तब ऐसे बालक लिखना नहीं । सीख पाते हैं , तब उनकी लेखन अयोग्यता की समस्या दिखाई देती है । गम्भीर रूप से लेखन बाधित बालकों को शैक्षिक क्षेत्र के अन्य सामान्य बालकों के समान बनने के लिए चिकित्सीय सुविधाओं की आवश्यकता होती है ।

 6. सम्प्रेषण की ग्राह्य करने की समस्या ( Problems in Comprehending Communication ) - इस प्रकार की बाधिता से सम्बन्धित बालकों को लिखकर , बोलकर तथा पढ़कर सम्प्रेषण में कठिनाई होती है , जो इस समस्या से साधारण रूप से प्रभावित होते हैं , उन्हें मौखिक तथा लिखित दोनों प्रकार के शब्दों को समझने में कठिनाई होती है । ऐसे बालक चिन्ह तथा संकेत भी नहीं समझ पाते हैं । यदि समय पर ध्यान दिया जाए तो इन बालकों की ज्ञानात्मक सम्बन्धी समस्या को दूर किया जा सकता है । अन्यथा उच्चारण तथा प्रवाह सम्बन्धी समस्या उत्पन्न हो सकती है । इस बाधिता से गम्भीर रूप से बाधित वालक न तो लिखित तथा मौखिक तथ्यों को समझ पाता है और न ही लिख , पढ़ और बोल सकता है । वह संकेतों तथा चिन्हों को भी नहीं समझ पाता है । ऐसे बालकों की समस्या का उपचार कठिन होता है , उन्हें सघन सुधार हेतु अभ्यासों की आवश्यकता होती है । 

7. संख्यात्मक योग्यता सम्बन्धी समस्या ( Problems of Numerical Ability ) - इस समस्या से प्रभावित बालक संख्याओं को एक - दूसरे से सम्बन्ध नहीं कर पाते हैं । इस कारण उन्हें गणना में तथा साधारण जोड़ घटाने में भी कठिनाई होती है । संख्यात्मक वाधिता भी दो प्रकार की होती है ।

 ( 1 ) सामान्य तथा

 ( 2 ) गम्भीर 

, संख्यात्मक समस्याएँ कठिन प्रतीत होती हैं , परन्तु एक सामान्य बालक उन्हें आसानी से हल कर सकता है । इस समस्या से साधारण रूप से प्रभावित बालक पहले से ही सामान्य कक्षाओं में शिक्षा प्राप्त करते हैं , प्राथमिक स्तर पर ऐसे बालकों की पहचान नहीं हो पाती है , जब वे बालक गिनती सीखते हैं तथा साधारण जोड़ घटाना सीखते हैं तो यह समस्या प्रकट होती है । यदि यह समस्या सही समय पर पहचान ली जाए और इसमें सही संशोधन कर दिया जाए तो वे बालक भी सामान्य बालकों की भाँति सामान्य कक्षाओं में पढ़ सकते हैं , परन्तु यदि समस्या गम्भीर होती है तो बालक गिनतियों तथा उनके बीच सम्बन्ध को भी नहीं याद रख पाता है तथा उनको भी जोड़ घटाने करने में भी असमर्थ रहता है । संख्या सम्बन्धी गम्भीर समस्या का निराकरण कठिन होता है । इसके निवारण के लिए अत्यधिक सुधार हेतु अभ्यास की आवश्यकता होती है । अधिगम बाधित बालकों की कुछ विशिष्ट समस्याएँ होती हैं । इनका वर्णन वर्गीकरण में दिया गया है । अधिगम बाधित बालकों के लिए उपचार आयाम ( Treatment Approaches of LD Children ) अधिगम बाधित बालकों को दो आधारों पर चिकित्सा तथा व्यवस्था की जा सकती है । वह उपचार आयाम निम्नलिखित हैं- नाड़ी चिकित्सा आयाम तथा मनोशैक्षिक आयाम ( हवीट तथा फोरनिस 1984 ) ने सुझाव दिया । 

1. नाड़ी चिकित्सा आयाम ( Neurological Approach ) - नाड़ी चिकित्सा आयाम के अन्तर्गत अधिगम बाधित बालक को न्यूनतम मानसिक मन्दित क्रियाओं से प्रभावित रोगी असमर्थी समझा जाता है । ऐसे बालक को इस प्रकार चिकित्सा देनी चाहिए जैसे किसी अन्य रोग तथा चोट से प्रभावित रोगी को चिकित्सा प्रदान की जाती है । असमर्थी का मुख्य लक्षण यह होता है कि इसमें बालक भावात्मक होता है । इसलिए यह तर्कसम्मत है कि बालक की भावुकता में सन्तुलन करने के लिए उसको सहायता प्रदान करनी होगी । भावुकता के लक्षणों में सन्तुलन करने के लिए कुछ औषधियों के उपयोग की भी सलाह दी जाती है । इन औषधियों का बालक के अधिगम पर क्या प्रभाव पड़ता है ? यह तथ्य शोध कार्यों के परिणामों से स्पष्ट नहीं हुआ है । इन औषधियों का बालक के द्वारा कक्षा में किए जाने वाले व्यवहार पर सकारात्मक प्रभाव हो सकता है क्योंकि ये दवाएँ बालक की क्रिया स्तर को कम कर देती है तथा बालक को अधिक संयत तथा व्यवस्थित बना देती है , लेकिन क्या ये औषधियाँ बालक की अधिगम समस्याओं को दूर करने में भी सहायक होती हैं ? इसलिए इसके लिए व्यवहार सम्बन्धी आयाम या मनोशैक्षिक आयाम जो अध्यापक के ऐसे बालकों के साथ कार्य , उन्हें प्रेरित करने तथा उन्हें उपयुक्त अनुदेशन देने में अध्यापक के प्रभाव पर आधारित है । 

2. मनोशैक्षिक आयाम ( Psycho - Educational Approach ) - मनोशैक्षिक आयाम के अन्तर्गत अधिगम बाधित बालक को रोगी न मानकर ऐसा बालक माना जाता है , जो सब कुछ सीख सकता है । मनोशैक्षणिक आयाम के अनुसार अधिगम बाधित बालकों की पहचान प्रारम्भिक स्तर पर ही शीघ्र कर लेनी चाहिए तथा उनकी चिकित्सीय तथा मनोवैज्ञानिक सहायता के आधार पर पहचान करनी चाहिए ताकि उनकी कठिनाइयों व त्रुटियों को सही प्रकार से समझा जाए तथा उनकी बाधिता के परिमाण के आधार पर उनको नियमित कक्षाओं , संसाधन कक्षों में , विशिष्ट कक्षाओं में तथा विशिष्ट स्कूलों में उपयुक्त अनुदेशन तथा प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा सके । अधिगम बाधित बालकों की शिक्षा व प्रशिक्षण से सम्बन्धित विभिन्न आयाम हैं । इन आयामों को पाँच वर्गों के अन्तर्गत विभाजित किया जा सकता है 

1. प्रशिक्षण प्रक्रिया आयाम ( Process Training Approach ) - इस तथ्य पर आधारित है कि शैक्षिक विषयों को याद करने के लिए आवश्यक मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को समझने की आवश्यकता होती है । अधिगम बाधित बालक की मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएँ सही क्रम में नहीं हो और मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का यह गलत क्रम उसके समझने में , बोलने में , लिखने में , पढ़ने में तथा गणितीय क्षेत्र में आवश्यक होता है । इसलिए यह आवश्यक है कि अधिगम बाधित बालक को मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का भी प्रशिक्षण दिया जाए । जो विभिन्न शैक्षिक विषयों के अन्तर्गत करनी होती है । उदाहरणार्थ , यदि अधिगम बाधित बालक को बोध में कठिनाई के कारण वाचन प्रक्रिया में समस्या आ रही है तो उस बालक को का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा । दृश्य बोध

 2. बहुइन्द्रीय आयाम ( Multisensory Approach ) - बहुइन्द्रीय आयाम इस अनुभव प्रणाली को में क्रियाशील दृश्य श्रव्य तथ्य पर आधारित है कि यदि बालक को एक से अधिक इन्द्री सीखने के होगी तो बालक अधिक सीखने का उत्सुक होगा , इस प्रकार की एक विधि कहते हैं । उदाहरणार्थ- अध्यापक बालक से कहानी सुनाने के लिए कहता है , अध्यापक बालक द्वारा कहे गए शब्दों को लिख लेता है फिर अध्यापक उन शब्दों को श्यामपट पर लिखता है और ये शब्द बालक की पढ़ने की क्रिया में सहायक होते हैं । शब्दों को याद करने के लिए , बालक श्यामपट पर लिखे शब्द को देखता है । अध्यापक उस शब्द को बोलता है । तो बालक उस शब्द को सुनता है तथा शब्द को बोलता है । अन्त में बालक शब्द को पहचान लेता है , वह समझ लेता है । दूरदर्शन अधिक प्रभावशाली होता है । दृश्य - श्रव्य दोनों क्रियाशील रहती हैं । 

3. वातावरण सम्बन्धी आयाम ( Environmental Approach ) -अधिगम बाधित बालक सामान्यतः तोड़ - फोड़ वाले तथा भावात्मक होते हैं । कुछ शिक्षाविद् ऐसे बालको के लिए वातावरण सम्बन्धी आयाम का सुझाव देते हैं । वातावरण सम्बन्धी आयाम के द्वारा कक्षा के वातावरण से उन अनुपयुक्त उद्दीपन को कम किया जा सकता है , जो बालक का अधिगम कार्य से ध्यान हटाती है । कक्षा के वातावरण से हानियों को जहाँ तक हो सके , दूर करने के लिए कक्षा के वातावरण में सुधार किया जा सकता है । 

( 1 ) दीवारों तथा छत की गूंज को ध्वनि नहीं करना ( No Echo ) । 

( 2 ) गलीचा डालना या फर्स डालना । 

( 3 ) पारदर्शी खिड़कियों का होना ।

 ( 4 ) किताब रखने का स्थान तथा अलमारियों की व्यवस्था ।

 ( 5 ) बुलेटिन बोर्ड का सीमित उपयोग करना । 

( 6 ) दीवारों पर टंगे हुए कैलेण्डर , चित्र तथा अन्य वस्तुओं को हटा देना । 

( 7 ) कक्षा के बाहर के वातावरण को ध्वनि रहित व आकर्षण रहित बनाना । 

( 8 ) शिक्षण सामग्री रंगों , आकार व व्यापकता को बढ़ाना । 


4. ज्ञानात्मक प्रशिक्षण आयाम ( Cognitive Training Approach ) अधिकांश अधिगम बाधित बालकों की समस्याओं का समाधान करने में कुछ त्रुटियाँ रह जाती हैं । वे कार्यों , अनुभव न करके कार्य करते हैं तथा अन्य विकल्पों को बिना सोचे समझे शीघ्रता से किसी भी प्रश्न का उत्तर दे देते हैं । उनकी दो पद्धतियाँ उपयोगी होती है । ये पद्धतियाँ निम्न हैं

 ( अ ) ज्ञानात्मक प्रारूप ( Cognitive Modelling ) - ज्ञानात्मक प्रारूप को कभी कभी स्मृति तथा ज्ञानात्मक व्यवहार परिवर्तन आव्यूह समझ लिया जाता है । इस विधि के आधार पर बालक को इस तथ्य की जानकारी दी जाती है कि लोग कैसे सीखते हैं तथा कैसे याद रखते हैं । ज्ञानात्मक प्रारूप के अनुसार अधिगम बाधित बालक के समक्ष उसके सहपाठी का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है , जो उससे अधिक योग्य होता है ताकि वह उस वयस्क अथवा साथी का अनुसरण कर सके तथा उपयुक्त तथ्य सीख सकें । इस पद्धति के द्वाराबी या किसी को ध्यान अधिगम बाधित बालक को यह सिखाया जाता है कि किसी शब्द को पढ़ने से पहले प्रश्न का उत्तर देने से पहले थोड़ा रूकना चाहिए । सारे संकेत तथा सम्भावनाओं से देखना चाहिए तथा फिर ध्यान से किसी प्रश्न का उत्तर देना चाहिए । याद करने के सम्बन्ध में बालकों को छोटे - छोटे खण्डों में सूचनाओं को एकत्र करना , इन सूचनाओं को बार - बार उसके सम्मुख दोहराना तथा उसकी स्मृति को बढ़ाने के लिए साधन का प्रयोग करना सिखाया है । जब अधिगम बाधित बालकों को सीखने तथा याद करने के प्रभावकारी उपाय बताए जाते हैं , तो उनमें आवश्यक सुधार किया जाए । 

 ( ब ) स्वत : अनुदेशन प्रशिक्षण ( Self - Instruction Training ) - इस प्रारूप को स्वयं अनुदेशन प्रशिक्षण के अन्तर्गत समायोजित किया जा सकता है । स्वयं अनुदेशन प्रशिक्षण के द्वारा बालक को स्वयं के शाब्दिक व्यवहार पर नियन्त्रण करने के लिए प्रेरित किया जाता है । उदाहरणार्थ 

( 1 ) अध्यापक स्वयं जोर - जोर से बोलकर कोई कार्य करता है । जैसे गणित की किसी समस्या को हल करना ।

 ( 2 ) बालक उसी कार्य को अध्यापक के निर्देशन पर अभ्यास करता है । 

( 3 ) जब बालक कार्य करता है तो वह अनुदेशनों को स्वयं वाचन करता है , तथा

 ( 4 ) वालक स्वतः अनुदेशन के द्वारा कार्य करके काम पूरा कर लेता है । स्वयं अनुदेशन प्रशिक्षण के माध्यम से बालक को सीखने की परिस्थितियों में अपना कार्य कम करने में तथा ज्ञानात्मक कार्यों के लिए उसको स्वयं के आयाम की जानकारी में सहायता मिलती है ।

 ( 5 ) अन्य विशिष्ट आयाम तथा प्रविधियाँ ( Other Special Approaches and Techniques ) - अधिगम वाधित बालकों में कुछ विशेषताएँ होती हैं , उनमें दृष्टि सम्बन्धी दोष नहीं दिखाई देता है पर उनको दृष्टि बोध , दृष्टि गाह्यता , दृश्य सम्बन्धी वर्णन तथा दृश्य सम्बन्धी स्मृति में कठिनाई होती है । इसी प्रकार अधिगम बाधित बालकों में श्रवण सम्बन्धी दोष नहीं होता पर उन्हें श्रव्यात्मक जानकारी , श्रव्यात्मक अन्तर तथा श्रव्यात्मक स्मृति में कठिनाई होती है , उन्हें ध्यान और स्मृति की समस्या का सामना करना पड़ता है । यह सब कठिनाइयाँ उनकी भाषा को समझने में बाधक होती हैं तथा उनकी वाचन व लेखन योग्यता एवं सुनने के कौशल में अवरोध उत्पन्न करती है । इसलिए अधिगम बाधित बालकों के लिए इन क्षेत्रों में विशिष्ट प्रशिक्षण बहुत उपयोगी होता है । संसाधन विशेषज्ञ अध्यापक अधिगम बाधित बालकों को संसाधन कक्ष में इस प्रकार का विशेष प्रशिक्षण दे सकते हैं । अधिगम बाधित बालकों के लिए निम्न आयाम तथा क्रियाएँ बहुत उपयोगी हैं । 

( अ ) श्रवण का अभ्यास ( Listening Exercise ) - अधिगम बाधित बालकों को सुनने की समस्या होती है तथा इस समस्या के कारण उनकी श्रव्य सम्बन्धी योग्यता की प्राप्ति तथा उनके निर्देशनों को अनुकरण करने सम्बन्धी योग्यता में कठिनाई होती है । ऐसे बालकों के लिए सुनने का अभ्यास लाभकारी होता है । एक अभ्यास के अन्तर्गत कोई व्यक्ति जो उस स्थान पर नहीं दिखाई देता है । विभिन्न ध्वनियाँ बोलता है तथा बालकों से उन ध्वनियों को पहचानने के लिए कहा जाता है । जब वालकों का समूह बाहर घूमने के लिए जाता है तो बालकों से सामान्य ध्वनि सुनने के लिए कहा जा सकता है । जैसे- दौड़ती हुई गाड़ी , छुक छुक करती रेल तथा गाती हुई चिड़िया की आवाज सुनने की समस्या से प्रभावित बालकों को शब्दों को समझने की क्षमता को सुधारने के लिए अध्यापक मौखिक निर्देशन दे सकता है । ये निर्देशन छोटे तथा सामान्य होने चाहिए ताकि बालकों की यह कठिनाई कम हो । बालकों की सुनने तथा समझने की शक्ति को बढ़ाने के लिए पहेलियों की भी सहायता ली जा सकती है ।

 ( व ) अधिगम का विभेदीकरण ( Discrimination Learning ) - अधिगम बाधित बालकों को एक अक्षर से दूसरे अक्षर को अन्तर करने में कठिनाई होती है । ये एक शब्द को दूसरे शब्द से तथा एक संख्या को दूसरी संख्या से अन्तर नहीं कर पाते हैं । बालको की अन्तर सम्बन्धी समस्या को दूर करने के लिए विभेदीकरण अधिगम सहायक सिद्ध होता है । इस अधिगम के अन्तर्गत बालक को दो अक्षरों , शब्दों तथा संख्याओं के बीच समानता तथा असमानताओं के विषय में बतलाना चाहिए तथा फिर बालक को सही उत्तर बतलाना चाहिए । ( जैसे 6-9 तथा 3-8 ) अधिगम वाधित बालकों को अक्षरों , शब्दों तथा संख्याओं को पढ़ाने के लिए प्रारम्भ में इन अक्षरों को नए कागज पर रंगों में बड़े आकार में लिखना चाहिए , बालक इन अक्षरों को शब्दों को तथा संख्याओं को जोर - जोर से बोलकर रट लेते हैं । इन अक्षरों , शब्दों तथा संख्याओं के लिए श्रव्यात्मक तथा दृश्यात्मक ध्यान आवश्यक है । बालकों की दोहराने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ।

 ( स ) दृश्य ग्राह्यता का प्रशिक्षण ( Visual Reception Training ) - श्रव्य ग्राह्यता प्रशिक्षण के अन्तर्गत बालक को सामान्य वस्तुओं की पहचान करवाई जाती है । उन वस्तुओं का नाम बताकर उनका प्रयोग समझाकर तथा वस्तुओं से सम्बन्धित अन्य वस्तु के बारे में बताकर सामान्य वस्तुओं की जानकारी दी जाती है । बालकों से संसाधन कक्ष में शीशे के सामने खड़े होने के लिए कहा जाता है तथा उनसे जो कुछ वे शीशे में देखते हैं उसके बारे में बताने के लिये कहा जाता है । बालकों को कोई चित्र दे दिया जाता है तथा बालकों से उस चित्र के अन्तर्गत चित्रित वस्तु तथा रंग , आकार पृष्ठ भूमि तथा अन्य विवरणों के बारे में बताने के लिए कहा जा सकता है । 

( द ) श्रव्यात्मक - स्मृति प्रशिक्षण ( Visual Memory Training ) - यदि बालकों के नेत्र बन्द करके अपने वस्त्रों तथा वुलेटिन बोर्ड अथवा अन्य बालकों के बारे में बताने के लिए कहा जाए तो बालकों की श्रव्यात्मक - स्मृति विकसित होती है ।

 ( य ) स्थान सम्बन्धी प्रशिक्षण ( Spatial Training ) - बालकों से किसी वस्तु की ऊपर , तल तथा पीछे के बारे में पूछकर तथा ऊपर , नीचे , में छोटा , वड़ा , भारी आदि इन अवधारणाओं के बारे में बताया जा सकता है । 

( र ) श्रव्यात्मक जानकारी प्रशिक्षण ( Auditory Awarness Training ) बालकों से ध्वनियों के बारे में पूछकर जिनको वे सामान्यतः सुनते हैं । बालकों की श्रव्यात्मक जानकारी बढ़ाई जा सकती है । बालक प्रत्येक ध्वनि को पहचान सकते हैं और इसके बारे में बता सकते हैं । अध्यापक किसी बालक के कान से कुछ दूरी पर हाथ की घड़ी रखता है . तथा वालक से घड़ी की आवाज सुनने के लिए कहता है । बालक से कहा जाता है कि यदि वह घड़ी की आवाज न सुन पाए तो हाथ ऊपर उठा दें । इसी प्रकार समय - समय पर बालक से विभिन्न ध्वनियों को सुनने के लिए कहा जा सकता है । 

( ल ) श्रव्यात्मक विभेदीकरण अभ्यास ( Auditory Discrimination Exercise ) – श्रव्यात्मक अन्तर अभ्यास के अन्तर्गत घड़ी को छिपा दिया जाता है तथा बालकसे यह पूछा जाता है कि घड़ी किस दिशा में रखी हुई है । अध्यापक मेज को थपथपा सकता है तथा बालक से सुनने के लिए कहता है तथा फिर स्वयं थपथपाहट को गिनकर बालक से यह पूछता है कि उसने मेज को कितनी बार थपथपाया ? किसी बालक ने नेत्रों पर पट्टी बाँधकर बालक से उसकी कक्षा के सहपाठी की आवाज को सुनकर सहपाठी को पहचानन के लिए कहा जाता है , इस प्रकार के अभ्यास घर में किए जाए । 

( म ) श्रव्यात्मक स्मृति एवं क्रमागत प्रशिक्षण ( Auditory Memory and Sequencing Training ) - स्मृति तथा अनुक्रम के विकास हेतु बालकों के श्रख्यात्मक अनुदेशनों को , फोन नम्बर को दोहराने के लिए कहा जाता है , वे शिशु कविताएँ तथा गीत याद कर सकते हैं तथा उन बातों का याद रख सकते हैं , जो उनसे बाद में पूछी जाएंगी । अध्यापक बालकों को साधारण चुटकुले सुना सकते हैं तथा बालकों से उन्हें दोहराने के लिए कह सकते हैं 


 chapter 1 solution 

 CHAPTER 1 INTEGERS 

EXERCISE 1 A SOLUTION  VIDEO 

EXERCISE 1 A SOLUTION 

EXERCISE 1 A SOLUTION 

EXERCISE 1 A SOLUTION 


Recall All natural numbers, 0 and negatives of counting numbers are called integers. 1, 2, 3, 4, 5, ., etc., are positive integers and-1,-2,-3, -4,-5,..., etc., are negative integers. Zero is an integer which is neither positive nor negative. On a number line, the integer occurring on the right is greater than that on the left and the integer occurring on the left is smaller than the one in the right. 4> 2, 1> 0, 0>-1, -1<0 and-3 <-2. 

• There is no greatest or smallest integer. > Zero is greater than every negative integer and less than every positive integer. 

• Every positive integer is greater than every negative integer. If a and b are two integers such that a> b, then -a<-b. For example, 3 > 2 and -3 <-2. If a and b are two integers such that o< b, then -a >-b. For example, 2 <5 and -2>-5. - The absolute value of an integer a denoted by Ja (a vertical bar on each side of the integer) is its numerical value regardless of its sign. So, 17| = 7, |-7| =7 and 10| = 0. Try these 1. Write the difference between the smallest positive integer and the greatest negative integer. 2. Arrange the following integers in descending order: -5, 3,-1, 2, 4 and -3.


सभी प्राकृतिक संख्याओं को याद करें, 0 और संख्याओं की गणना को पूर्णांक कहा जाता है।  1, 2, 3, 4, 5,।, आदि, सकारात्मक पूर्णांक हैं और -1, -2, -3, -4, -5, ..., आदि, नकारात्मक पूर्णांक हैं।  शून्य एक पूर्णांक है जो न तो सकारात्मक है और न ही नकारात्मक।  एक संख्या रेखा पर, दाईं ओर होने वाला पूर्णांक बाईं ओर से अधिक होता है और बाईं ओर पूर्णांक घटित होता है, जो दाएं में से एक से छोटा होता है।  4> 2, 1> 0, 0> -1, -1 <0 और -3 <-2। 

 • कोई सबसे बड़ा या सबसे छोटा पूर्णांक नहीं है।  > शून्य हर नकारात्मक पूर्णांक से अधिक है और प्रत्येक सकारात्मक पूर्णांक से कम है। 

 • प्रत्येक सकारात्मक पूर्णांक प्रत्येक ऋणात्मक पूर्णांक से अधिक होता है।  यदि a और b दो पूर्णांक हैं जैसे कि a> b, तो -a <-b।  उदाहरण के लिए, 3> 2 और -3 <-2।  यदि a और b दो पूर्णांक हैं जैसे कि o <b, तो -a> -b।  उदाहरण के लिए, 2 <5 और -2> -5।  - पूर्णांक मान का पूर्णांक Ja द्वारा निरूपित (पूर्णांक के प्रत्येक तरफ एक ऊर्ध्वाधर बार) इसका सांकेतिक मूल्य होता है, भले ही इसके चिह्न की परवाह किए बिना।  तो, 17 |  = 7, | -7 |  = 7 और 10 |  = 0. इनका प्रयास करें 1. सबसे छोटे धनात्मक पूर्णांक और सबसे बड़े ऋणात्मक पूर्णांक के बीच का अंतर लिखें।  2. निम्नलिखित पूर्णांकों को अवरोही क्रम में व्यवस्थित करें: -5, 3, -1, 2, 4 और -3।


PROPERTIES OF ADDITION OF INTEGERS :-

Closure property 

The sum of two integers is always an integer, i.e., integers are closed under addition. If a and b are any two integers,

 then                                        à + b is always an integer 

For example: 1. 3 +7 = 10 is an integer. 

                       2.  -7 + (-11) = -18 is an integer. 

                        3.  9 + (-16) = -7 is an integer. 

                       4.  21 + (-8) = 13 is an integer. 

Commutative property 

Two integers can be added in any order, i.e., addition is commutative for integers. If a and b are any two integers, then a + b = b + a

 For example:  1.  (-3) + 8 = 5 and 8 + (-3) = 5 * (-3) + 8 = 8 + (-3) 

         2.  (-7) + (-12) = -19 and (-12) + (-7) = -19 * (-7) + (-12) = (-12) + (-7)

 Associative property 

Three or more integers can be grouped in any order to find their sum, i.e., addition is associative for integers. If a, b and c are any three integers, 

                                                then. (a + b) + c = a + (b+ c)

For example: 

1. [(-4)+(-5)] + 3 = (-9) + 3 =-6, and (4) + [(-5) + 3] = -4 + (-2) = -6

 2. [(-5) + 13] + (-7) = 8 + (-7) = I, and (-5) + [13 + (-7)I = -5 + 6 = 1 


Existence of additive identity 

The sum of any integer and 0 is the integer itself. In other words, 0 is the additive identity for integers. If a is any integer, then

                                                                          a + 0 = 0 + a = a 

 For example: 

1. 8+0=0+8 = 8

2. (-11) + 0 =0+(-11)=-11

 Existence of additive inverse 

For any integer a, there exists its opposite -a that their sum is zero, ie., 

                                                                       a +(-a) = (-a) + a = 0 

Integer a and -a are called opposites or negatives or additive inverse of each other 

For example: 

1. 6+ (-6) = (-6) + 6 0 So, the additive inverse of 6 is -6 and the additive inverse of -6. is 6. 

2. (-13) + 13 = 13 + -13) 0 So, the additive inverse of 13 is-13 and the additive inverse of -13 is 13.


बंद करने वाली संपत्ति का अनुपात के गुण दो पूर्णांकों का योग हमेशा एक पूर्णांक होता है, यानी पूर्णांक इसके अलावा बंद होते हैं।  यदि a और b कोई दो पूर्णांक हैं, 

                                                  तो à + b हमेशा पूर्णांक होता है 

उदाहरण के लिए: 1. 3 +7 = 10 पूर्णांक है।  

                          3. -7 + (-11) = -18 एक पूर्णांक है।  

                           2. 9 + (-16) = -7 पूर्णांक है।  

                            4. 21 + (-8) = 13 पूर्णांक है।  

कम्यूटेटिव प्रॉपर्टी दो पूर्णांकों को किसी भी क्रम में जोड़ा जा सकता है, यानी, पूर्णांक के लिए अतिरिक्त है।  यदि a और b कोई दो पूर्णांक हैं, 

                                                  तो a + b = b + a

 उदाहरण के लिए: 

            1. (-3) + 8 = 5 और 8 + (-3) = 5 * (-3) + 8 = 8 + (  -3) 

              2. (-7) + (-12) = -19 और (-12) + (-7) = -19 * (-7) + (-12) = (-12) + (-7) 

 साहचर्य संपत्ति तीन या अधिक पूर्णांकों को उनकी राशि को खोजने के लिए किसी भी क्रम में वर्गीकृत किया जा सकता है, अर्थात, पूर्णांक के लिए सहयोगी है।  यदि ए, बी और सी कोई तीन पूर्णांक हैं, 

                                                            तो।  (a + b) + c = a + (b + c)

उदाहरण के लिए:

1. [(-4) + (- 5)] + 3 = (-9) + 3 = -6, और (4) + [(-5) + 3] = -4 + (-2)  = -6 

2. [(-5) + 13] + (-7) = 8 + (-7) = I, और (-5) + [13 + (-7) I = -5 + 6 = 1 

अस्तित्व  योगात्मक पहचान किसी भी पूर्णांक और 0 का योग पूर्णांक ही होता है।  दूसरे शब्दों में, 0 पूर्णांकों के लिए योगात्मक पहचान है।  यदि कोई पूर्णांक है, तो उदाहरण के लिए: 

                                                                            a + 0 = 0 + a = a 

1. 8 + 0 = 0 + 8 = 8 

(-11) + 0 = 0 + (- 11) = - 11

 अस्तित्व  additive व्युत्क्रम किसी भी पूर्णांक के लिए, इसका विपरीत-ए मौजूद है कि उनकी राशि शून्य है, अर्थात, 

                                                              a + (- a) = (-a) + a = 0

 पूर्णांक a -a को विपरीत या ऋणात्मक या परिवर्ती कहा जाता है  एक दूसरे के

 उदाहरण के लिए: 1. 6+ (-6) = (-6) + 6 0 तो, 6 का योगात्मक व्युत्क्रम -6 और योजक -6 का व्युत्क्रम है।  है ६. २. (-१३) + १३ = १३ + -१३) ० इसलिए, १३ -१३ का योगात्मक व्युत्क्रम है और -१३ का योगात्मक व्युत्क्रम १३ है।

PROPERTIES OF SUBTRACTION OF INTEGERS 

Closure property of subtraction The difference of two integers is always an integer, i.e., integers are closed under subtraction. If a and b are any two integers, 

then.                                               a -b is always an integer


FOR EXAMPLE                1. 3-8=3+ (-8) = -5 is an integer. 

                                             2. 5-(-3) = 5 +3 = 8 is an integer. 

                                            3. (-3) 6 = (-3) + (-6) =-9 is an integer 

                                            4.-7-(-6) = -7 + 6 =-1 is an integer. 

Commutative property Subtraction is not commutative for integers. If a and b are any two integers,

   then  

     For example: 1. 4- 9 =4 + (-9) =- -5,  

                                and 9-4 =9+(-4)=  5 

                                      4- 9 #  9-4 

                            2. (-5) - 3= (-5) +(-3)= -8,

                                   and 3-(-5) = 3 +5 = 8 

                                            (-5) - 3 # 3-(-5)

                         3. (-7) -(-4) =(-7) +4=-3,

                               and (-4) -(-7) =-4+7=3 

                               (-7)-(-4) #(-4)-(-7) -

Associative property Subtraction is not associative for integers. If a, b and c are any three integers, then (a-b)-ca-(b-c)


 For example: [3-(-4)] - (-5) = [3+ (4)] +(5) = 7+5 = 12, and 3 - [(-4) – (-5)) = 3-[(-4) +5] = 3- 1 =2 : [3 - (-4)] - (-5) + 3 [(-4) –(-5)]


 Subtraction property of zero The result of subtracting zero from an integer is the integer itself. If a is an integer, then If a, b, c are integers and a > b, then



अधिगम असमर्थी बालकों की पहचान किस प्रकार की जा सकती है ? अधिगम असमर्थी बालकों की पहचान ( Identification of Learning Disabled Children

 अधिगम असमर्थी बालकों की पहचान किस प्रकार की जा सकती है ? अधिगम असमर्थी बालकों की पहचान ( Identification of Learning Disabled Children ) 



जब विद्यालय में बालक के सम्मुख पढ़ने - लिखने - समझने तथा संख्यात्मक अयोग्यता सम्बन्धी समस्याएँ आती हैं , तब उनकी अधिगम बाधिता परिलक्षित होती है । ऐसे बालको को कुछ कहानी सुनने की प्रक्रिया के आधार पर बहुत से परीक्षण किए गए हैं । अधिगम आधारों पर पहचाना जा सकता बाधिता तीन संकेतों के आधार पर पहचानी जा सकती है । अधिगम बाधित बालकों को निम्न में याद करने में कठिनाई होती है ।

 ( 1 ) अधिगम बाधित बालक को समय बताने , दिनों को सही महीनों तथा वस्तुओं से पूरा करता है । 

( 2 ) बालक को अपने कार्य को करने में कठिनाई होती है तथा कक्षा कार्य को देर 

( 3 ) पाता है । ऐसा बालक देखने में सुस्त दिखाई देता है तथा प्रश्नों का उत्तर ढंग से नहीं दे 

( 4 ) सही नहीं दोहरा पाता है । यदि उससे मौखिक अनुदेशों को दोहराने के लिए कहा जाए तो वह उन्हें सही

 ( 5 ) के लिए कहता है । घर तथा कक्षा में दिए गए अनुदेशों को समझ नहीं पाता है तथा उन्हें दोहराने

 ( 6 ) कार्यों में बहुत अनियमितता दिखाता है कभी - कभी प्रतिभावान प्रतीत होता है , लेकिन विद्यालय में तथा कक्षा कार्य में उसकी क्रियाएँ निम्न स्तर की होती हैं ।

 ( 7 ) ऐसे बालक थोड़े से परिवर्तन से परेशान हो जाते हैं ।

 ( 8 ) बायें तथा दायें के बीच अन्तर करने में भ्रमित हो जाता है ।

 ( 9 ) अधिगम बालक इतना अधिक उत्तेजित हो जाता है कि वह कक्षा में थोड़े समय भी शान्त नहीं बैठ पाता है । 

( 10 ) पढ़ते समय पंक्तियों को छोड़ देता है या उन्हें दो बार पढ़ देता है ।

 ( 11 ) शब्दों की वर्तनी के अक्षरों को जोड़कर शब्द बनाने में कठिनाई का अनुभव करता है अधिगम बाधित वालक तो कह सकता है , परन्तु ( Beg ) नहीं कह पाता है वह ( Beg ) के स्थान पर ( Bed ) बोल सकता है । 

( 12 ) शब्दों का असंगत अनुमान लगाता है चाहे उनका सही अर्थ हो या न हो । उदाहरणार्थ- ' भूख ' के लिए ' मुख ' कहता है तथा ' क्या ' शब्द के लिए ' किया ' शब्द का प्रयोग करता है । 

( 13 ) शब्द के उलटे अक्षर पढ़ता है ( उदाहरण के लिए , नम को मन पढ़ता है तथा ' लता ' को ' यता ' पढ़ता है ) । 

( 14 ) अक्षरों को गलत क्रम में रखता है ( जैसे- ' लटक ' का ' यटक ' तथा ' पाठ ' को ' पाट ' पढ़ता है ) ।

 ( 15 ) शब्दों को छोटा कर देता है । जैसे- ' झटपट ' को ' पट ' , तथा ' रमण ' को ' मण ' पढ़ता है ।

 ( 16 ) जो शब्द देखने में एक जैसे प्रतीत होते हैं उनको अधिगम बाधित बालक अशुद्ध पढ़ता है । जैसे- ' नटखट ' को ' सटनक ' पढ़ता है । 

( 17 ) स्वयं शब्दों को संकलित करने तथा सही वाक्य बनाने में कठिनाई अनुभव करता 

( 18 ) संख्याओं को गलत पढ़ता है ( 36 को 63 तथा 3 का 8 पढ़ता है ) तथा अक्षरों को गलत क्रम में पढ़ता है । नमक को मनक पढ़ता है । 

( 19 ) लिखने में अशुद्धियाँ करता है ।

( 20 ) शब्दों के अक्षरों को उल्टा लिख देता है । 

( 21 ) शब्दों के अक्षरों में लिखने में अशुद्धियाँ करता है ।

 ( 22 ) अक्षर कम कर देता है जैसे- ' टपक ' को ' टक ' पढ़ता है । 

( 23 ) अतिरिक्त अक्षर जोड़ देता है जैसे- ' बन्द को बदन पढ़ता 

है । 

( 24 ) यदि ध्वनि के आधार पर शब्द लिखने के लिए कहा जाता है तो ध्वनि के अनुरूप अक्षर नहीं लिख पाता है ।

 ( 25 ) जब अक्षरों को बोलने के लिए कहा जाता है तो वर्णमाला से अक्षर नहीं निकाल पाता है । बरों 

( 26 ) यदि अक्षरों का मिलान करने के लिए कहा जाता है तो वह शब्दों का मिलान नहीं कर पाता है ।

 ( 27 ) शैक्षिक विषयों को समझने में भी अधिगम बाधित बालक को कठिनाई आकी है । बालक एक विषय या एक से अधिक विषयों में कमजोर हो सकता है । होई - 


अधिगम बाधित बालकों का वर्गीकरण कीजिए । अधिगम बाधित बालक का वर्गीकरण ( Classification of Learning Disabled Children

 अधिगम बाधित बालकों का वर्गीकरण कीजिए । अधिगम बाधित बालक का वर्गीकरण 


( Classification of Learning Disabled Children ) विश्लेषण तथा लक्षणों के आधार पर ज्ञानात्मक तथा बोधात्मक क्षेत्रों को विभाजित कर सकते हैं तथापि उनकी समस्याओं को स्पष्ट करने वाली दो विस्तृत वर्ग नहीं समझाना चाहिए , 

निम्नांकित में इस दस चुने गए क्षेत्रों का वर्णन किया गया है ।

 1. नेत्र व हाथ की क्रियाओं में सामंजस्य का अभाव ( Eye - Hand Co ordination ) - इस क्षेत्र के अन्तर्गत दृश्य के साथ हाथों के प्रभाव पूर्ण प्रयोग की गति की संचालन करने की योग्यता को सम्मिलित किया जाता है । नेत्र व हाथ की क्रियाशीलता की समस्या से ग्रस्त बालक को धारा प्रवाह लेखन के लिए आवश्यक गति नियन्त्रण में कठिनाई उत्पन्न हो सकती है । ऐसा बालक अच्छी तरह पढ़ सकता है , उच्चारण कर सकता है , समझ सकता है तथा अन्य मौखिक कार्यों में भी अच्छा होता है फिर भी नेत्र व हाथ की कार्यक्षमता की समस्या के कारण वालक को दृश्य प्रत्यक्षीकरण कम हो जाता है , जिससे उसका विद्यालयी क्रियाएँ बाधित होती है , कभी - कभी इसके बहुत परिणाम होते हैं । 

2. आकृति पृष्ठभूमि सम्बन्धी प्रत्यक्षीकरण ( Figure Ground Perception ( FG } ) - इसको चयनात्मक ध्यान भी कहा जा सकता है । इसके अन्तर्गत एक समय में उसी एक उद्दीपन पर ध्यान दिया जाता है जिस पर ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता है तथा अर्थपूर्ण अनुभव ज्ञान प्राप्त करने के लिए वहाँ उपस्थित अन्य उद्दीपन को नकार दिया जाता है । आकृति सम्बन्धी बोध कमजोर बालक को अपने ज्ञान का क्षेत्र संकीर्ण लग सकता है क्योंकि वह उन प्रासंगिक से उद्दीपन प्रासंगिक उद्दीपन को नहीं अलग कर पाता है । कभी कभी वालक को क्रमानुसार उद्दीपन का सामना करना पड़ता है और इसका कोई अर्थ नहीं होता , उसकी बोधात्मक अवस्था भी भ्रमित हो जाती है । ऐसा बालक परिश्रम नहीं कर पाता इसका परिणाम तो अव्यवस्थित क्रियाएँ होती हैं या फिर उसकी शैक्षिक असफलता होती है । 

3. आकृति स्थिरता ( Figure constancy ( FC ) ) - इसके अन्तर्गत बालक की प्रतीक आकृति तथा आकार को इसकी निर्देशन दिशा तथा स्थिति में बदलाव के आधार पहचानने की योग्यता को सम्मिलित किया जाता है । चित्रों , आकार , रेखाचित्र , शब्द प्रतीक तथा आकृतियों को समझने की योग्यता को भी इस क्षेत्र में सम्मिलित किया जाता है । आकृति की स्थिरता बालक के बोध का स्तर ठोस होता है वह सूचना को एक परिस्थिति से दूसरी परिस्थिति में स्थानान्तरित नहीं कर पाता , उसका ध्यान तथ्यों पर आधारित है वह तथ्यों को उसके वास्तविक रूप में ही पहचानता है । यदि किसी वस्तु या चित्र को बदल दिया जाए तो वह उसे नहीं पहचान पाता है ।

 4. आकृति की दूरी ( Position in Space ( SP ) ) - यह निरीक्षण तथा वस्तु के स्थान के बीच सम्बन्ध को जानने की योग्यता से सम्बन्धित है । जैसे यह देखने वाले व्यक्ति के आगे , पीछे , सामने तथा अगला हो सकती है । अन्तर सम्बन्धी स्थिति से प्रभावित वालक को किसी भी तथ्य का सही क्रम जानने में कठिनाई हो सकती है । उसे सही आकृतियाँ बनाने में कठिनाई हो सकती है । उसकी ' म ' और ' य ' एवं ' प ' और ' फ ' तथा ' 14 ' तथा ' 41 ' के बीच अन्तर नहीं मालूम होता । यह नकारात्मकता उसकी पाठन योग्यता को प्रभावित करती है , जिसके परिणामस्वरूप उसकी समझने तथा विषय को प्रकट करने की योग्यता अवरुद्ध हो जाती है । 

5. स्थान सम्बन्धित ( Spatial Relation ( SR ) ) - यह दो या दो से अधिक वस्तु के अपने तथा एक - दूसरे के बीच सम्बन्धों को समझने की योग्यता पर आधारित है जिस बालक को स्थान सम्बन्धित कठिनाई होती है , उसे कार्य करने में शिक्षा के सन्दर्भ में पढ़ने , लिखने , उच्चारण करने तथा निर्देशन न समझ आने सम्बन्धी समस्याएँ हो सकती हैं । 

6. श्रव्य प्रत्यक्षीकरण ( Auditory Perception ( AP ) ) - इसके अन्तर्गत बालक की श्रव्य उद्दीपन को पहचानने तथा सूचना को ग्रहण करने एवं क्रमागत योग्यता को सम्मिलित किया जाता है । श्रव्यात्मक बोध में श्रव्यात्मक अन्तर तथा वालक के स्तरों का व्यवस्था तथा उसकी मौखिक भाषा प्रवाह तथा शब्दों का आकार एवं स्वरूप का संगठन करने की योग्यता भी श्रव्य बोध के अन्तर्गत सम्मिलित की जाती है । 

7. ज्ञानात्मक योग्यता ( Cognitive Abilities ( CA ) ) इस क्षेत्र का सम्बन्ध बालक के उद्दीपन को विपरीत क्रम में मिलाने की योग्यता से है और यह ज्ञानात्मक क्रियात्मक तथा भावात्मक पक्ष के लिए भी है । बालकों की स्वयं की समझने की प्रक्रिया के स्तर को विभिन्न समूहों में विभाजित करने की योग्यता के लिए आवश्यक है । ज्ञानात्मक योग्यता के क्षेत्र के अन्तर्गत बालक की समझने की प्रक्रिया में अनुभव के आधार पर स्मृति तथा जोड़ने को भी सम्मिलित किया जाता है । वालक की उच्च स्तर की प्रक्रियाओं की योग्यताओं तथा उपयुक्त कार्य करने के लिए यह आवश्यक है कि वालक सामान्य वर्ग में सूक्ष्म अन्तर को समझ सकें । 

8. स्मृति ( Memory { M } ) - यह समस्त अधिगम का आवश्यक घटक है यह जो अधिगम किया गया है । उसे याद करने की योग्यता से सम्बन्धित होता है ।

 9. भाषा बोधगम्यता ( Receptive Language ( EL ) ) - भाषा बोधगम्यता के अन्तर्गत दृश्य उद्दीपन की प्रक्रिया के प्रयोग को सम्मिलित किया जाता है । 

10. भाषा की अभिव्यक्ति ( Expressive Language ) - इसके अन्तर्गत बालक की भाषा को सही संकेतों को प्रयोग करने व उसकी भाषा कौशलों के स्वरूप की जानकारी को सम्मिलित किया जाता है । बालक के ग्राह्य बोध को भी भावपूर्ण भाषा क्षेत्र के अन्तर्गत सम्मिलित करते हैं । 

अधिगम असमर्थी बालक किसे कहते हैं ? इनकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए । उत्तर अधिगम असमर्थी बालक का अर्थ ( Meaning of Learning Disabled Children )

 . अधिगम असमर्थी बालक किसे कहते हैं ? इनकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए । उत्तर अधिगम असमर्थी बालक का अर्थ ( Meaning of Learning Disabled Children ) 



बालकों की शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार की कठिनाई एक रहस्य है अर्थात् एक गूढ़ रहस्य है । यह समस्या शिक्षा विडों के लिए नई नहीं है , परन्तु अधिगम असमर्थिता के प्रत्यय का अधूरा इतिहास है । कुछ बालक सामान्य प्रतीत होते हैं , परन्तु लगभग प्रत्येक अवधि में वह अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ बतलाते हैं । वह अक्षरों के क्रम को भली प्रकार से नहीं लिख पाते , परन्तु उसे उलट पलट कर लिख देते हैं । जैसे खाना को नाखा , राम को मरा आदि लिखते हैं । ऐसे बालक शब्दों पर अपना ध्यान एकाग्र नहीं कर पाते । यदि बालकों के आसपास शोर अथवा कोलाहल हो तो बालक पूर्ण रूप से एकाग्रचित्त न होने के कारण त्रुटियों की सम्भावना अधिक हो जाती है । अमेरिका में बाधित बालकों से सम्बन्धित राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने गम्भीर असमर्थिता को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है अधिगम असमर्थी बालक एक अथवा एक से अधिक मनोवैज्ञानिक क्रियाओं में दोष दर्शाते हैं । यह दोष भाषा के लिखने , बोलने अथवा समझने से सम्बन्धित होते हैं । दोषों का आधार सुनना , सोचना , सम्प्रेषण , पढ़ना , लिखना , वर्तनी करना , भाव व्यक्त करना तथा गणित सम्बन्धी अंकों आदि का होता है । इसमें बालक की ऐसी अवस्थाएँ भी सम्मिलित होती हैं जो मस्तिष्क में चोट , मस्तिष्क का सुचारू रूप से कार्य न करना , डिस्लैक्सिया ( dyslexia ) अथवा अफैसिया ( aphasia ) का बढ़ना आदि समस्याओं से सम्बन्धित होते हैं । इसमें अधिगम समस्याएँ सम्मिलित नहीं होती हैं , जो बालक की शारीरिक , श्रवण दृष्टि , मानसिक मन्दिता , हाथ पैरों का सुचारू रूप से कार्य न करना , भावनात्मक विक्षोभ अथवा वातावरण में किसी प्रकार की कमी अथवा अनुपयुक्त आदि समस्याएँ किसी भी प्रकार से प्रभावशाली नहीं होती है । अर्थात् ऐसे बालकों में उपरोक्त समस्याएँ नहीं पाई जाती हैं ।


 अधिगम असमर्थिता की परिभाषा ( Definition of Learning Disability ) अमेरिका ( 1968 ) की अपंगों की राष्ट्रीय सलाहकार समिति के असमर्थिता ” की परिभाषा इस प्रकार दी हैं अनुसार " अधिगम " बालकों की विशिष्ट अधिगम असमर्थिता बालक के द्वारा भाषा को लिखने या बोलने में , मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं में एक अथवा एक से अधिक सुचारू रूप से प्रणाली का कार्य न कर पाना होता है । इस प्रकार की कमियों का मुख्य आधार सुनने , बोलने , समझने , विचार करने , पढ़ने , लिखने , गणना करने तथा शब्दों के विभिन्न वर्तनी दोष करने में कमजोरी का पाया जाना होता है । इस प्रकार की असमर्थता में शारीरिक बाधिता जैसे डिस्लैक्सिया ( dyselxia ) अथवा अफैसिया ( ashasin ) का विकसित होने की दशा से भी तात्पर्य है जिसे इसमें सम्मिलित किया गया है । इसमें अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ सम्मिलित नहीं है. वातावरण का समुचित न होने के कारण होती है । " जो मुख्यतया दृष्टि , अधिगम , हाथ पैर , मानसिक मन्दिता , भावनात्मक विक्षोभ अथवा • 

अधिगम असमर्थी बालकों की विशेषताएँ ( Charasteristics of LD Children )

अधिगम असमर्थी बालकों के मुख्य गुणों के वर्गीकरण करने हेतु अनेक प्रयास किए गए हैं । कलेमेन्ट्स ने ( 1966 ) में अधिगम असमर्थी बालकों का अध्ययन विस्तृत रूप में किया । उन्होंने यह अनुमान लगाया कि अधिगम असमर्थता मानसिक तथा नाडियों के दोषों अथवा नाड़ी संस्थान में किसी प्रकार की क्षति के कारण होता है ।

 ऐसे बालकों में अधिकांश रूप से निम्न विशेषताएँ पाई गई , जो निम्नलिखित हैं 

( 1 ) अधिगम असमर्थी बालकों की वाणी तथा भाषा ( Language and Speech of LD Children ) अधिगम असमर्थी वालकों को भाषा को समझने तथा भाव व्यक्त करने में कठिनाई आती हैं । भाषा के भाव व्यक्त करने में भाषा सीखने की अपेक्षा अधिक कठिनाई होती है । अधिगम असमर्थी बालकों को सुनने तथा स्पष्ट रूप से शब्दों को बोलने में कठिनाई नहीं होती है , परन्तु ऐसे बालकों को वाक्यों को बनाने अथवा वाक्यों को संयुक्त करने में कठिनाई होती है । ऐसे बालक विस्तृत वाक्यों के अर्थ अथवा भाव को समझने अथवा सर्वनाम का प्रयोग करने में कठिनाई नहीं होती । उन्हें कर्म वाक्य ( Passive ) वाक्यों को समझने तथा प्रयोग करने , नकारात्मक तथा भूतकाल वाक्यों में कठिनाई होती है । इसके अतिरिक्त विशेषण तथा क्रिया विशेषण में भी कठिनाई होती है । वह बातचीत करने में असफल रहते हैं तथा तर्क करना या प्रश्न पूछना आदि में भी संकोच करते हैं । जहाँ तक लिखित भाषा का सम्बन्ध है , उन्हें हस्तलिखित कार्य करने में कठिनाई होती है । उन्हें शब्दों के वर्तनी तथा व्याकरण सम्बन्धी कार्य में भी अधिगम असमर्थी बालकों को सामान्य बालकों की अपेक्षा अधिक कठिनाई होती है , जबकि उनका बुद्धि स्तर पर नियन्त्रण रहता है । 

( 1 ) अधिगम असमर्थी बालकों की श्रवण तथा शब्दों को ग्रहण करना , भावों को समझना , यदि कोई विचार या शब्द समझ न आए तो उसके दोहराने के लिए शिक्षक से कहने आदि का साहस नहीं होता है ।

 ( 2 ) वह शब्द ग्रहण तथा देखने में भी कठिनाई होती है अर्थात् वह बोलकर पढ़ना तथा बिना भावों को समझकर पढ़ने में भी कठिनाई होती है ।

 ( 3 ) उनमें भावों को बोलकर समझाने की योग्यता नहीं होती अर्थात् वाक्यों या शब्दों को संयुक्त करना तथा अपने विचारों को व्यक्त करने में भी ऐसे बालक सक्षम नहीं होते हैं । 

( 4 ) उनमें शारीरिक अंगों ( हाथ / पैर ) की समस्या स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है । शब्द की वर्तनी कला , शब्दों को पूर्ण रूप से भूल जाना , अक्षरों का क्रम आदि समझने की योग्यता इस प्रकार के बालकों में नहीं होती है । भाषा कौशलों का अभाव रहता है । 

2. अधिगम असमर्थी बालकों में प्रत्यक्षीकरण तथा कार्य क्षमता ( Perceptual and Motor Ability ) लर्नर ( 1985 ) ने यह स्पष्ट रूप से कहा कि अधिगम असमर्थी बालकों में स्थान सम्बन्धी तथा विभिन्न स्थानों में सम्बन्ध , चित्रों तथा गणित की संख्याओं के देखने में भेद करना , शब्दों या वाक्यों को सुनकर उन्हें क्रमबद्ध करना तथा सुनी हुई बातों को याद करना आदि । कार्यों में भी उन्हें समस्या होती है । इसके अतिरिक्त लर्नर ने अधिगम असमर्थी बालको के बारे में यह भी तथ्य दिया है कि ऐसे बालक सामाजिक ज्ञान तथा इससे सम्बन्धित बोध का न होना भी है । ऐसे बालक शारीरिक कौशल , कलात्मक , शरीरिय तथा शारीरिक प्रतिबिम्ब में समस्या होती हैं तथा ज्यामितिय रचनाओं का अनुकरण नहीं कर सकते । 

( 1 ) ऐसे बालक इन्द्रियों द्वारा किसी वस्तु को पहचानने , भिन्नता तथा अर्थ समझने के अयोग्य होते हैं । 

( 2 ) ज्यामितीय आकृति को बनाने में असमर्थ होते हैं अर्थापन में कठिनाई होती है 

( 3 ) ध्वनि की पहचान नहीं कर पाते आवाज सुनकर समझने में कठिनाई होते हैं , किसी वस्तु को छूकर पहचान करने में भी असमर्थ होते हैं ।

 ( 4 ) इन्द्रियों द्वारा बोध करने के अयोग्य होते हैं । जगह का अभिविन्यास , दिशाएँ , वस्तुओं के सामंजस्य ( co - ordination ) एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना , किसी वस्तु के बारे में विचार करने , भाषा ग्रहण करने की योग्यता आदि के क्षेत्र में ऐसे बालक असमर्थ होते हैं ।

 ( अ ) शारीरिक क्रिया ( Motor Activity ) - इन क्रियाओं में शारीरिक क्रिया के अनुसार परिवर्तन होता है । इनका वर्णन निम्नलिखित हैं।

 ( ब ) संवेगात्मक क्रिया ( Hyper Activity ) - भावात्मक रूप से स्थिर नहीं रहते हैं । एक ही दशा में शान्त रहने के अयोग्य , कक्षा में बहुत अधिक बातें करना अथवा बोलना काम के प्रति लापरवाही भावात्मक क्रिया के विपरीत शब्द - आलसी , शान्त , उदासीन।

 ( स ) शारीरिक अंगों में असामंजस्य ( Incordination ) - शारीरिक रूप से विकृत , हाथ / पैर अथवा शारीरिक अंगों की समन्विता में कमी , दौड़ने , चलने के कार्यों में कमी किसी वस्तु को पकड़ने , कूदने , लिखने , आकृति बनाने , कला आदि में कमी चलने में फिसलना अथवा गिर जाना तथा दूसरे से अनुचित व्यवहार करना । 

( द ) संचयीकरण ( Preservation ) -अस्वेच्छा व्यवहार का जारी रहना , इस प्रकार का व्यवहार बोलने , लिखने , कला , मौखिक पढ़ना , शब्दों की वर्तनी में दोष तथा त्रुटियों को बार - बार दोहराना देखा जा सकता है । 

( 3 ) अधिगम असमर्थी बालकों की सामाजिक तथा संवेगात्मक विशेषताएँ ( Social and Emotional Characdteristis of Lis Children ) ऐसे बालक अन्य व्यक्तियों कीतरफ आकर्षित भी आसानी से नहीं होते हैं तथा यह अपने आपको पीछे भी हटा लेते हैं । ऐसे बालकों को सामाजिक व्यक्ति के साथ - साथ अपने माता - पिता तथा अध्यापकों के साथ विचार - विमर्श करने में समस्या होती है । ऐसे बालकों में सामाजिक निपुणता तथा उनके व्यवहार में भी समस्या होती है अधिकांश अधिगम असमय बालक अपनी निजी समस्याओं के प्रति आन्तरिक चेतना बहुत कम होती है तथा उन्हें भाग्य के ऊपर छोड़ दिया जाता है । ऐसे बालकों में अपने सोचने समझने का स्तर कम होता है । आगे बढ़ने अथवा जीवन में प्रगति करने के विचारों का स्तर निम्न कोटि का होता है तथा बाहरी व्यक्तियों तथा वस्तुओं की सहायता लेकर जीवन पथ पर चलते हैं । 

( 1 ) ऐसे वालक शान्त तथा आज्ञाकारी होते हैं यह पढ़ नहीं सकते हैं तथा दिन में स्वप्न भी देखते हैं । (

 2 ) किसी स्पष्ट कारण के न होते हुए भी ऐसे बालकों को क्रोध अधिक आता है , जो विस्फोट का रूप धारण कर सकता है । 

( 3 ) ऐसे बालक शारीरिक रूप से शिथिल होते हैं तथा उन्हें किसी विशेष विन्दु पर ध्यान स्थिर करने में कठिनाई होती है । 

( 4 ) ऐसे बालक एक वस्तु से दूसरी वस्तु पर शीघ्र बदलते हैं तथा दूसरों के द्वारा किए जा रहे कार्यों पर अपना ध्यान रखते हैं , लेकिन अपने पर ध्यान नहीं । 

( 5 ) वह स्वयं नियन्त्रण के बारे में बाते करते हैं , परन्तु अन्य बालकों के साथ कार्य नहीं कर सकते हैं । 

( 6 ) वह भावनात्मक रूप से अस्थिर स्वभाव के होते हैं । ऐसे बालकों में भावुकता होने का प्रमुख कारण माता पिता पर निर्भर होना तथा बाह्य संसार से सम्बन्धों में कमी होना पाया जाता है । इसके कारण बालकों में घुटन का भाव रहता है । अधिगम असमर्थी बालक विषमांगी समूह बनाते हैं । कुछ बालकों को पढ़ने में समस्या होती है और कुछ को लिखने में कठिनाई होती है । जहाँ कुछ बालक समझने तथा विस्तृत बातों में समस्या का सामना करते हैं तो कुछ वालकों को समय व्यतीत करने में तथा मानचित्र में किसी स्थान को खोजने में समस्या होती है । इस प्रकार इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि अधिगम असमर्थी बालकों की समस्याओं की विशेषताएँ सरलता से नहीं बताई जा सकती हैं । सामान्य रूप से ऐसे बालकों की समस्याएँ भी निम्नलिखित होती हैं

 1. योग्यता स्तर ( Ability Level ) - ऐसे बालकों का योग्यता स्तर औसत के लगभग होता है । यह बालक सामान्य योग्यता स्तर के नीचे तथा ऊपर भी हो सकता है । 

2. क्रियात्मक स्तर ( Activity Level ) - अधिगम असमर्थी बालकों में क्रियात्मक स्तर या तो बहुत अधिक होता है अथवा बहुत कम । यदि कोई वालक का क्रियात्मक स्तर बहुत अधिक है तो उसके व्यवहार की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं । बिना रूके हाथ / पैर अथवा शरीर का कोई अन्य अंग गतिशील रहता है । ऐसे बालक शान्त नहीं बैठ सकते , कक्षा में एक सीट से दूसरी सीट पर बैठते हैं , हाथ या पैर ऊंगलियों को थपथपाते रहते हैं , एक कार्य को छोड़कर दूसरा कार्य करना प्रारम्भ कर देते हैं और यदि किसी बालक का क्रियात्मक स्तर इसके विपरीत है अर्थात् बालक निम्न कोटि के क्रियात्मक स्तर का है तो वह बालक पूर्णतया शान्त रहता है , किसी कार्य के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता , तथा प्रत्येक कार्य बहुत धीमी गति से करता है । 

3. अवधान सम्बन्धी समस्या ( Attention Problems ) -अधिगम असमर्थी बालक का ध्यान किसी कार्य क्षेत्र पर केन्द्रित बहुत कम समय के लिए होता है । अधिक अवधि के लिए किसी भी कार्य पर उनका मस्तिष्क केन्द्रित नहीं रह सकता है । उनका ध्यान समय समय पर भटकता है । उनक ध्यान किसी ऐसे कार्य पर केन्द्रित हो जाता है , जिसे बार - बार किया जाए । यह कार्य मौखिक अथवा शारीरिक अंग से सम्बन्धित हो सकता है । 

4. हाथ पैर अथवा शारीरिक अंग की क्रियात्मक समस्या - अधिगम असमर्थी बालक कुरूप तथा विकृत होते हैं । उनके हाथ , पैर , शरीर के अंगों का सामंजस्य भली प्रकार से कार्य नहीं कर पाता । ऐसे बालकों की कला तथा हस्तलेखन बहत अस्पष्ट होता है । वह व्यवहार तथा नीति में कुशल नहीं होते तथा उन्हें स्पर्श करने की अधिक आवश्यकता होती

 5. दृष्टि प्रत्यक्षीकरण समस्या ( Visual Perceptual Problems ) - अधिगम असमर्थी बालक विभिन्न वस्तुओं में अन्तर नहीं देख पाते । यदि दो वस्तुएँ उन्हें दिखाई जाएँ जो एक समान न हों तो वे दोनों वस्तुओं में भेद समझ पाने में असमर्थ होते हैं । उन्हें आकृति का भी बोध ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है । आकृति एवं पृष्ठभूमि ऐसे बालकों को किसी शब्द अथवा किसी वस्तु का कोई भाग यदि हटाकर दिखाया जाए अर्थात् आधी वस्तु या शब्द दिखाया जाए तो वे उसे पूरा करने में असमर्थ होते हैं । दृश्य समीपता वह वस्तुओं को याद रखने तथा यदि उन्हें विभिन्न वस्तुएँ किसी क्रम में दिखाई जाएं तो उन्हें वस्तुओं का क्रम भी याद नहीं रहता तथा दृश्य स्मृति भी कम होती है । 

6. श्रवण प्रत्यक्षीकरण समस्या ( Auditory Perceptual Problem ) - अधिगम असमर्थी बालक विभिन्न ध्वनियों में भेद स्पष्ट नहीं कर पाते । वह बोले गए शब्दों का अर्थ निकालने में भी असमर्थ होते हैं । वातावरण में विभिन्न प्रकार की आवाजों को पहचानने के अयोग्य होते हैं । यदि विभिन्न वस्तुएँ जो ध्वनि उत्पादक हो , उनमें से कोई एक उनके समक्ष रखी जाए तथा शेष सभी वस्तुएँ छुपाकर रखी जाएँ तब भी वह ध्वनि में भेद नहीं पहचान पाते । यदि किसी शब्द का कुछ भाग वोला जाए तो ऐसे बालक उस शब्द को पूरा नहीं पढ़ सकते हैं । वह किसी सुने गए शब्द अथवा वस्तु की ध्वनि को स्मरण करने में असमर्थ होते हैं तथा विभिन्न ध्वनियों के स्तर याद नहीं कर पाते हैं । 

7. भाषा सम्बन्धी समस्याएँ ( Language Problems ) -अधिगम असमय बालकों के द्वारा शब्दों को बोलने का विकास बहुत मन्द होता है अथवा अधिक समय के पश्चात् होता है । वह शब्दों को स्पष्ट बोलने में असमर्थ होते हैं तथा शब्दों को लययुक्त करके वाक्य बनाने के योग्य नहीं होते हैं । वह दो अथवा दो से अधिक वाक्यों को लययुक्त करने में असमर्थ होते हैं ।

 8. सामाजिक संवेगात्मक व्यवहार सम्बन्धी समस्याएँ ( Social Emotional Behaviour Problems ) -अधिगम असमर्थी बालक प्रकृति से संवेगात्मक होते हैं । वे अपने व्यवहार के परिणाम के बारे में सोचने तथा समझने में असफल होते हैं । कभी - कभी ऐसे बालकों का व्यवहार संवेगात्मक होता है अर्थात् वे वस्तुओं को उठाकर फेंक सकते हैं . अथवा तोड़ - फोड़ कर सकते हैं । उनमें सामाजिक समायोजन की भावना कम होती है । ऐसे बालकों की आयु तथा योग्यता को ध्यान में रखते हुए , उनमें समाज के साथ व्यावहारिकता बहुत निम्नकोटि की होती है । वे परिस्थितियों के परिवर्तन होने पर अपने आपको परिस्थितियो के अनुकूल नहीं बदल सकते हैं । ऐसे बालकों का व्यवहार , सोच आदि समय - समय पर जल्दी - जल्दी बदलते रहते हैं । 

9. अभिविन्यास सम्बन्धी समस्याएँ ( Orientation Problems ) -अधिगम असमर्थी बालकों में स्थान प्रत्यय के विकास की गति बहुत मन्द होती है । उन्हें वस्तुओं के आकार , आकृति में भेद करना , दो वस्तुओं के बीच की दूरी का अनुमान लगाना , किसी वस्तु के दायें तथा वायें भाग के बारे में समझने में कठिनाई होती है । उन्हें समय सम्बन्धी शब्दो का ( जैसे पहले , बाद में और अब , तब अथवा आज और कल ) पूर्ण रूप से ज्ञान नहीं होता तथा इसमें कठिनाई अनुभव करते हैं । 

10. कार्य सम्बन्धी आदतें ( Work Habits ) - अधिगम असमर्थी बालकों को कार्य संयोजन अथवा कार्य व्यवस्था में समस्या होती है तथा कार्य व्यवस्था में यह बालक कमजोर होते हैं । वह मन्द गति से कार्य करते हैं । कार्य करते - करते उस कार्य करने की दिशा से भटक जाते हैं तथा कार्य को लापरवाही से करते हैं ।

11. शैक्षिक असमर्थता ( Academic Disability ) - अधिगम असमर्थी बालकों को पढ़ने लिखने , गणित की संख्याओं , शब्दों की वर्तनी व समय बताने तथा मानचित्र में कोई स्थान ढूँढने आदि कार्य में समस्या आती है । सामान्य रूप से ऐसा कहा जा सकता है कि अधिगम असमर्थी बालकों को अधोलिखित विशेषताएँ होती हैं , परन्तु सभी अधिगम असमर्थी वालक उपरोक्त विशेषताएँ नहीं होती हैं । कुछ बालकों में एक अथवा एक से अधिक ऐसी विशेषताएँ हो सकती हैं ।


दृष्टि बाधित बालकों के शिक्षण में शिक्षक की क्या भूमिका होनी चाहिए ? अध्यापक की भूमिका ( Role of Teacher )

 दृष्टि बाधित बालकों के शिक्षण में शिक्षक की क्या भूमिका होनी चाहिए ? 



अध्यापक की भूमिका ( Role of Teacher ) 

   अध्यापक का अत्यन्त महत्व है । दृष्टि बाधित बालकों के अध्यापकों को आँख की बनावट , सफाई , आँख की सामान्य बीमारियों तथा कठिनाइयों से परिचित होना चाहिए । उसे दवाइयों , रोशनी , शारीरिक सामान तथा शैक्षिक सामान का प्रबन्धन करना चाहिए । पढ़ाई की उचित विधि से परिचित होना चाहिए । उसे मनोवैज्ञानिक तथा शैक्षिक कठिनाइयों के साथ साथ संवेगात्मक कठिनाइयों को पहचानना चाहिए । उसे बालक की वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकताओं को पहचानना चाहिए । उसे बालकों को समस्या सुलझाने की शिक्षा देनी चाहिए । एक अध्यापक बालक में ऐसे गुणों का विकास कर सकता है , जिससे वह अच्छा सामाजिक , शैक्षिक तथा व्यावसायिक समायोजन कर सके । उसे बालक में ऐसी क्षमता उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए कि वह अपनी शारीरिक कमजोरी के हीन विचार को मन में न लाएँ । उसे बालकों के माता - पिता से भी मिलना चाहिए । दृष्टि बाधित बालक अव सामान्य विद्यालयों की कक्षाओं में पढ़ने लगे हैं । इन बालकों के लिए पाठ्यक्रम में थोड़ा सुधार किया जाता है । सामान्य विद्यालयों में स्रोत शिक्षक तथा स्रोत कक्ष की व्यवस्था की जाती है । दृष्टि बाधित बालकों की शिक्षा का उत्तरदायित्व सामान्य शिक्षक और स्रोत शिक्षक दोनों का ही होता है । वास्तव में यह उत्तरदायित्व सामान्य शिक्षक का ही होता है । स्रोत शिक्षक तो उनकी कठिनाइयों और समस्याओं के समाधान में सहायता करता है । इसलिए सामान्य शिक्षक को यह ज्ञान तथा कौशल होना चाहिए कि दृष्टि बाधित बालकों को किस प्रकार पढ़ाया जाए । सामान्य शिक्षा की निम्नांकित बातों का बोध होना आवश्यक होता है 

( 1 ) दृष्टि बाधित बालक को शिक्षा ग्रहण करने का भी वही अधिकार होता है , जितना एक सामान्य वालक को होता है । शिक्षा के समान अवसरों की सुविधा “ संवैधानिक प्रावधान ” है । सामान्य विद्यालयों में दृष्टि बाधितों को प्रवेश नहीं देते हैं । तब उन्हें प्रवेश न देने का कोई औचित्य नहीं बनता है ।

( 2 ) दृष्टि बाधित बालक को सामान्य विद्यालय में प्रवेश देने से पूर्व स्रोत शिक्षक से परामर्श करना चाहिए । शिक्षा के नियोजन हेतु विशिष्ट शिक्षा , विशिष्ट विधियों व प्रविधिय के निर्देशन की आवश्यकता होती है । 

( 3 ) सामान्य शिक्षक को दृष्टि बाधित बालकों हेतु शिक्षण सहायक सामग्री की व्यवस्था करनी चाहिए । इस दिशा में उसे प्रयासरत् भी रहना चाहिए । 

( 4 ) शिक्षक को सामान्य बालकों को कहना चाहिए कि दृष्टि बाधित बालको की प्रत्येक प्रकार की सहायता करनी चाहिए । पढ़ने - लिखने के अतिरिक्त उन्हें चलने - फिरने में भी कठिनाई होती है । 

( 5 ) दृष्टि बाधित बालकों को सामान्य बालकों की भांति अधिगम अनुभव प्रदान किए जाए । समस्याओं का समाधान अलग से किया जाए । 

( 6 ) शिक्षक को सामान्य और दृष्टि बाधित वालकों में अन्तःक्रिया हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए तथा उनसे सम्बन्धों को बढ़ावा देना चाहिए । 

( 7 ) जहाँ तक सम्भव हो विद्यालय की सभी क्रियाओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और अवसर भी दिया जाए ।

( 8 ) दृष्टि बाधितों को सामान्य वालकों जैसे गृह कार्य भी दिए जाए । 

( 9 ) शिक्षक को इन वालकों हेतु कक्षा में समुचित वातावरण और बैठने की सुविधा का ध्यान रखना चाहिए । कक्षा में प्रकाश का ध्यान रखा जाए , आगे की कुर्सियों पर बैठाया जाए । शिक्षण सहायक सामग्री का उपयोग समुचित ढंग से किया जाए , श्यामपट पर बड़े अक्षर लिखे जाए । इन्हें थकावट जल्दी हो जाती है इसलिए कालांश भी अपेक्षाकृत छोटा होना चाहिए ।

 ( 10 ) कक्षा शिक्षण में अधिकांश शिक्षक हाव - भाव , संकेतों तथा अशाब्दिक भाषा उपयोग अधिक करते हैं । दृष्टि बाधित वालक अशाब्दिक भाषा का लाभ नहीं उठा सकते इसलिए उनकी अभिव्यक्ति शब्दों में भी की जाए । व्यावसायिक निर्देशन - दृष्टि बाधित वालकों का शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन आपस में सम्बन्धित है । एक सफल शैक्षिक निर्देशन के लिए आवश्यक है कि बालक के व्यक्तित्व की प्रत्येक बात ध्यान में रखनी चाहिए । उदाहरणार्थ- शारीरिक तथा मानसिक योग्यताएँ तथा अयोग्यताएँ , उसका संवेगात्मक विकास , सामाजिक गुण , इच्छाएँ , रूचियाँ , अभिवृत्तियाँ आदि । यह भी देखना चाहिए कि वालक की इच्छाएँ अपनी हैं अथवा किसी अन्य द्वारा प्रभावित हैं । व्यावसायिक निर्देशन देने के लिए विभिन्न परीक्षण लेने चाहिए । एक सफल निर्देशन के लिए माता - पिता / अभिभावक , अध्यापक , डॉक्टर , मनोवैज्ञानिक , मनोचिकित्सक तथा निर्देशक में सहयोग अनिवार्य है । ऐसा भी पाया गया है कि दृष्टि वाधित वालक जज , वकील , शिक्षक , व्यारी कुछ भी बन सकते हैं । अतः इनके विकास को रोका न जाए व इन्हें पूर्णरूपेण प्रोत्साहित किया जाए । 

शिक्षा की मुख्य धारा में कक्षा प्रबन्धन ( Classroom Management in Mainsteaming ) 

दृष्टि बाधित बालकों की शिक्षा सामान्य विद्यालयों की कक्षा में दी जा सकती है । परन्तु दृष्टि बाधित बालक सुनकर तथा स्पर्श करके ही ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं , जब पाठ्यक्रम समान " ही होता है , परन्तु धनात्मक पाठ्यक्रम को विशेष महत्व दिया जाए । इनके लिए शिक्षण विधिया ऐसी हो , जिससे बहुइन्द्रिय अनुभव दिया जा सके । दृष्टि बाधित बालको हेतु धनात्मक पाठ्यक्रम का उपयोग किया जाए , जिससे उन्हें भीखने में सहायता मिलती है और उनके लिए सुविधाजनक होता है । अतिरिक्त पाठ्यक्रम पाठ्यक्रम के मुख्य क्षेत्र निम्नलिखित होते हैं का उपयोग न किया जाए । कौशलों के विकास से सीखने में सरलता होती है । 

 1. ब्रेल लिपि प्रणाली 

2. सहायक सामग्री का उपयोग 

3. चलने फिरने का प्रशिक्षण देना 

4. सामाजिक कौशलों का विकास 

5. कौशलों का विकास तथा 

6. इन्द्रियों का प्रशिक्षण 

           पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाएँ में मानसिक क्रियाओं जैसे- संगीत , अन्य शैक्षिक प्रतियोगिताओं में सम्मिलित किया जाए । शारीरिक तथा मानसिक क्रियाओं का अभ्यास कराया । नृत्य कौशल भी विकसित किए जा सकते हैं । इन बालकों का प्रशिक्षण समन्वित परिस्थितियों में ही दिया जाए । 

शिक्षण सहायक उपकरणों का उपयोग ( Use of Teaching Equipments ) 

दृष्टि बाधित बालकों के शिक्षण में शिक्षण तकनीकी के विकास ने महत्वपूर्ण योगदान किया है । आंशिक रूप से दृष्टि बाधित बालकों को विशेष लाभ मिलता है । अनेक प्रकार गणना यन्त्रों , घड़ियों , श्रव्य सामग्री यन्त्रों का विकास हुआ है । उत्तल दर्पण , चश्मे अथवा दृष्टि यन्त्रों का भी उपयोग किया जाता है । आकृतियों , अक्षरों चित्रों को बड़ा प्रदर्शित करने यन्त्रों का विकास किया गया है । दृष्टि कैमरा , चलायमान टेलीस्कोप का भी उपयोग करते उपरोक्त विशिष्ट उपकरणों की सहायता से दृष्टि बाधित बालक विद्यालय के वातावरण पर स्वामित्व कर लेते हैं । इन्हें निम्नांकित दिशा में प्रशिक्षण दिया जा सकता है ।

 1 . विद्यालय तथा कक्षा में चलने में निर्देशन दिया जाता है , जिससे वे आराम से अपनी गति विधि कर सके । 

2 . अपना आवश्यकतानुसार वह कक्षा तथा कक्षा से बाहर व अन्दर स्वयं विना सहायता के आ जा सके । 

3 . विद्यालय के अन्य स्थानों पर आने जाने का निर्देशन दिया जाए । 

4. एक ही समय में एक ही गतिविधि को नियन्त्रित कर सकें । 

 5 . इनसे सभी गतिविधियों का अभ्यास कराया जाए । 

6 . इन्हें विशिष्ट विवरण दिया जाए इनकी स्मरण शक्ति अपेक्षाकृत अधिक होती है । व्यक्ति को उसके बोलने से ही पहचान लेते हैं । 

7 . अन्य सहयोगी और साथियों को नाम से ही बुलाना चाहिए क्योंकि वह देख नहीं सकते कि किसे संकेत किया जा रहा है ।

8. जब वह वाहर जाय तथा उन्हें सहायक निर्देशिका ( Buddy ) दी जानी चाहिए ।

 9. विद्यालय में कोई परिवर्तन किया गया है उसकी उन्हें पूरी जानकारी देनी चाहिए । 

दृष्टि बाधित बालकों के शैक्षिक प्रावधान

 दृष्टि बाधित बालकों के शैक्षिक प्रावधान



                                                                       दृष्टि बाधित बालकों को शिक्षा देने का सबसे अच्छा तरीका विशेष कक्षाओं आयोजन है । एक विद्यालय में ऐसे बालकों की संख्या 1 से 500 तक होती है अध्यापन इस बात का निर्णय कर सकता है कि क्या उनके लिए विशेष कक्षा का आयोजन किया ज तथा कौन - कौन - सी सुविधाएँ प्रदान की जाएँ । एक कक्षा से स्कूल , समुदाय तथा समाज का कार्य हो सकता है । इस कक्षा में विभिन्न श्रेणियों के बालक हो सकते हैं । गाँवों में भी आरिक रूप से देखने वाले बालकों के लिए विशेष कक्षा का प्रवन्ध होना चाहिए । अनेक गाँव मिलका इस कक्षा का निर्माण कर सकते हैं । गाँव के बालक नजदीक के शहर भी जा सकते हैं औ अक्सर सम्भव व आवश्यक हो तो छात्र छात्रावास में भी रह सकते हैं । राज्य के शिक्षा निदेशक को चाहिए कि गाँवों में ऐसे अध्यापकों की सहायता करें , जिनकी कक्षा में आंशिक रूप में देखने वाले वालक हैं । यदि राज्य द्वारा शिक्षा का प्रबन्धन नहीं है तो समाज सेवक इसका प्रवन्ध कर सकते हैं । आवश्यक शैक्षिक सामना शिक्षा विभाग द्वारा दिया जा सकता है । बड़े विद्यालयों में प्रत्येक कक्षा में कम से कम एक बालक कम देखने वाला होता है । ऐसी अवस्थ में सबसे पहले प्राथमिक श्रेणियों के विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का आयोजन करना चाहिए । क्योंकि जितनी जल्दी कम देखने वाले वालकों को शैक्षिक सुविधाएँ दी जाएँगी , उतनी हो अधिक सफलता की आवश्यकता होगी । कक्षा व्यवस्था की विधि - चूँकि पृथकीकरण अब आधुनिक शैक्षिक सिद्धान्तों के अनुरूप नहीं है , अतः एक सहकारिता योजना का विकास किया गया है , जिसके द्वारा कम देखने वाले वालक अपने कार्य एक विशेष सामान से युक्त कक्षा में एक योग्य शिक्षक के अन्तर्गत करते हैं । अन्य कार्यक्रमों के लिए अन्य औसत वालकों के साथ मिल जाते हैं । सहकारिता - यदि उपर्युक्त योजना सफलतापूर्वक चलती है , तो बालक के स्वास्थ्य तथा शिक्षा का उत्तरदायित्व अधीक्षक , प्रधानाध्यापक , स्कूल स्वासी सेवा अध्यापक तथा विशेष कक्षा के अध्यापक तथा वालक के माता - पिता पर है । इस सहयोग को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक को शिक्षा के विशेष उद्देश्य से परिचित होना चाहिए । इन सभी को समस्या समाधान में सहयोग देना चाहिए । आंशिक रूप से देखने वाले वालक का विशेष कक्षा तथा सामान्य कक्षा में भली प्रकार स्वागत करना चाहिए । 


                      इससे वह अपनी कठिनाइयों पर विजय पाने में सफल होगा । पाठ्यक्रम - कम देखने वाले और औसत बालकों का पाठ्यक्रम एक - सा होता है । जिससे आँखों पर अधिक जोर पड़े । अध्यापकों को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि ऐसा कोई भी कार्य अधिक नहीं करवाया जाए . शैक्षिक माध्यम तथा संसाधन व्यवस्था ऐसे बालक दृष्टि बाधित कहलाते हैं , उनसे देखने वाले कार्य कम कराने चाहिए । रोशनी पर विशेष ध्यान देना चाहिए । 

इस सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं 

1. शैक्षिक माध्यम - ऐसे बालकों के लिए शैक्षिक माध्यम एक बड़े पैमाने पर है । एक औसत बालक के लिए किताब 10 या 12 अंक के टंकन में होती है , पर आंशिक देखने. वाले कारकों के लिए 18 या 24 अंक के टंकन में होती है । प्रिन्ट साफ तथा विस्तृत होना चाहिए । अनावश्यक टंकन नहीं होना चाहिए । सफेद कागज पर काली स्याही से लिखा होना चाहिए । दो शब्दों के बीच जगह होनी चाहिए । हाशिया होना चाहिए । मानचित्र तथा चित्र होने चाहिए । बड़े सफेद या क्रीम रंग के कागजों पर मोटी तथा गहरी लीड वाली पेन्सिल प्रयोग करनी चाहिए । आर्ट तथा क्राफ्ट के लिए ऐसा सामान प्रयुक्त होना चाहिए कि आँखों पर अधिक जोर न पड़े । मशीनी तरीके , जैसे - टाइपराइटर , रेटियों आदि बड़ी मात्रा में प्रयोग होने चाहिए । टाइपराइटर के दूने की विधि को उपयोग करना चाहिए । 

2. रोशनी - प्राकृति तथा बनावटी दोनों प्रकार की रोशनी सभी बालकों के लिए महत्व रखती है । यह कम देखने वाले वालकों के लिए और भी अधिक महत्व रखती है । ऐसे बालकों का कमरा पूर्णरूप से हर स्थान से रोशनीयुक्त होना चाहिए । कक्षा की छतें , सफेद तथा दीवारें हल्के रंग से रंगी होनी चाहिए तथा उनमें चमक नहीं होनी चाहिए । भूरे तथा हरे बोर्ड में परावर्तन अधिक होता है । अतः उनका प्रयोग करना चाहिए । - 

3. फर्नीचर - एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकने वाला फर्नीचर अधिक अच्छा होता है । इन्हें बालक किसी भी स्थान पर ले जाकर बैठ सकते हैं । फर्नीचर इस प्रकार का हो जो पढ़ते हुए वालक के लिए उपयुक्त हो । इसका रंग हल्का होना चाहिए । 


दृष्टि बाधित बालकों की मुख्य समस्याएँ

  दृष्टि बाधित बालकों की मुख्य समस्याएँ 



दृष्टि बाधित बालकों की अनेक समस्याएँ होती हैं । जैसे- व्यावहारिक समस्याएं अधिगम की समस्याए , स्थानापन की समस्या , समाज में समायोजन की समस्या , कभी - कभी जीविकोपार्जन की समस्या भी होती है । 

यहाँ पर कुछ समस्याओं का विवरण दिया गया है 

( 1 ) बुद्धि - लब्धि स्तर कम होना ( Poor Intelligence )

 ( 2 ) शैक्षिक मन्दिता ( Educationally Retardation )

 ( 3 ) मन्द वाणी विकास ( Slow Speech Development )

 ( 4 ) व्यक्तित्व विक्षिप्त होना ( Personality Disorder )

 ( 5 ) सामाजिक समायोजन की समस्याएँ ( Problem of Social Adjustment ) ।

 इन समस्याओं का संक्षिप्त विवरण यहाँ पर दिया गया है 

 1. बुद्धि - लब्धि स्तर कम होना ( Poor Intelligence ) - शोध अध्ययनों से यह विदित हुआ कि दृष्टि बाधित बालकों का बुद्धि स्तर भी सामान्य से कम होता है । इसलिए समुचित वातावरण तथा अवसर खोजने में भी असमर्थ रहते हैं । बुद्धि परीक्षण पर यह अच्छा नहीं कर पाते हैं । अधिकांश बुद्धि परीक्षण से ज्ञान , अनुभव तथा सूचनाओं पर आधारित प्रश्न सामान्य से निम्न स्तर की होती है । 1 होते हैं , इसलिए इनका बुद्धि - लब्धि स्तर कम होता है । व्यावहारिक दृष्टि में इनकी कार्य शैली

 2. शैक्षिक मन्दिता ( Educationally Retardation ) - दृष्टि बाधित बालक ब्रेल लिपि का उपयोग करने पर भी सामान्य वालकों से शैक्षिक उपलब्धि कम रहती है । दृष्टि बाधित बालक सामान्य बालक से एक या दो वर्ष मन्दित रहते हैं तथा शैक्षिक निष्पत्ति कम रहती है । यह वालक मन्द गति से तथ्यों तथा सूचनाओं को वोधगम्य कर पाते हैं क्योंकि यह अवलोकन नहीं कर सकते न ही अनुकरण कर सकते हैं । ज्ञान के श्रोत श्रव्य तथा स्पर्श इन्द्रियों तक सीमित रहते हैं । पढ़ने की गति मन्द होती है अनुदेशनात्मक प्रक्रिया में सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाते हैं ।

 3. मन्द वाणी विकास ( Slow Speech Development ) - पूर्ण रूप से दृष्टि बाधित बालक वाणी की कला और कौशल का अनुकरण नहीं कर सकते हैं । जो उन्होंने सुना है उसी से वाणी का विकास होता है । वाणी का विकास सार्थक रूप में नहीं होता है । शोध अध्ययन स्पष्ट होता है कि शब्दों के उपयोग एवं उच्चारण में कठिनाई का अनुभव करते हैं ।

 4. व्यक्तित्व विक्षिप्त होना ( Personality Disorder ) - व्यक्तित्व के विकास में वंशानुक्रम तथा वातावरण का विशेष महत्व तथा योगदान होता है । यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है , जीवन के अनुभवों का इसमें सुधार होता रहता है । दृष्टि बाधित बालकों का समुचित वातावरण और जीवन के अनुभव से उनके व्यक्तित्व का विकास अपने ही प्रकार से होता है , जो पूर्णतः सामान्य बालकों से भिन्न प्रकार का होता है । इनके विकास में नाड़ी संस्थान , उनके अनुभव तथा मानसिकता का गहन प्रभाव होता है । इनमें असुरक्षा तथा विक्षिप्तता अधिक रहती है , जो व्यक्तित्व के विकास को प्रभावित करती है ।

 5. सामाजिक समायोजन की समस्याएँ ( Problems of Social Adjustment ) - समाज में दृष्टि बाधितों को हेय दृष्टि से देखा जाता है क्योंकि वह समाज की सहायता चाहते हैं । इन्हें व्यक्तिगत तथा सामाजिक समस्याएँ रहती हैं । इनमें हीन भावना आ जाती है और समाज में समायोजन की कठिनाई भी आती है । मनोवैज्ञानिक इनके समायोजन की समस्याओं के सम्बन्ध में एक मत नहीं है । कुछ शोध अध्ययनों के निष्कर्ष हैं कि इस प्रकार के बालकों का विद्यालय में समायोजन नहीं होता है । अन्य शोध निष्कर्षों में पाया कि विद्यालय में इनका समायोजन उत्तम होता है । उनके साथी तथा सहयोगी पर्याप्त सहायता करते हैं ।


दृष्टि बाधित बाल ( Visually Impaired Children

 दृष्टि बाधित बालक ( Visually Impaired Children)  

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बाधित बालकों का अर्थ ( Meaning of Visually Impaired Children ) दृष्टि बाधित बालक ऐसे बालक होते हैं , जो ठीक प्रकार से देखने में समर्थ नहीं हैं । कुछ बालक मोटे छापे की पुस्तकें पढ़ सकते हैं तथा वे सामान्य वातावरण में शिक्षा कर सकते हैं । लेकिन गम्भीर रूप से दृष्टि बाधित बालक जो वस्तुओं को देखने में असमर्थ्  होते हैं , वे दृश्य ( visual ) विधियों द्वारा शिक्षित नहीं किए जा सकते । उनकी देखने क्षमता स्नेलन चार्ट की सहायता से मापी जाती है । दृष्टि बाधितों की परिभाषा दृष्टि - दोष के रूप में की जाती है । आँखों की दृष्टि योष्ट से तात्पर्य दूर की वस्तुओं को स्पष्ट रूप में देख सकें । इसका परीक्षण ' स्नैलन चार्ट ' किया जाता है । इस चार्ट का विकास हर्वट स्नैलन ने किया । यह फ्रांस निवासी डॉक्टा इस चार्ट का आरम्भ बड़े ' E ' अक्षर से होता है । इससे सामान्य दृष्टि वाला 200 फीट टू से स्पष्ट देख सकता है । यदि कोई व्यक्ति 20 फीट की दूरी स्पष्ट देख सकता है , तब वैधानिक रूप से पूर्ण दृष्टि बाधित कहते हैं । यदि किसी की दृष्टि का आंकलन 20/20 हो तो उसे उत्तम दृष्टि वाला मानते हैं । दृष्टि बाधित से तात्पर्य उसकी दृष्टि की स्थिति में कि उसके देखने की क्षमता कितनी है । विद्यालय के कार्यों को करने में कितना प्रभावित करते है । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि विद्यालय के पढ़ने लिखने के कार्यों को कितनी शुद्ध से कर लेता है । यदि देखने का क्षेत्र सीमित है और उसकी दृष्टि 20/200 उत्तम है , तब ' टूयनल दृष्टि ' कहा जाता है । 


दृष्टि सक्षमता का अर्थ होता है कि वह अपनी दृष्टि का उपयो भली - भाँति कितना कर सकता है । जिन वस्तुओं को देखता है उन सभी सूचनाओं का किल विश्लेषण करके अर्थापन कर लेता है , इसे प्रत्यक्षीकरण भी कहते हैं । दृष्टि बाधित व्यावहारिक रूप में विभिन्न समस्याओं को उत्पन्न करता है । जिन वालको की निम्न दृष्टि होती हैं वे बड़े - बड़े अक्षरों को पढ़ सकते हैं , उन्हें दृष्टि - यन्त्रों का लाभ पढ़ने लिखने में नहीं होता है । इनकी दृष्टि 20/70 से अधिक नहीं होती है । निम्न दृष्टि की परिभाषा देने की स्पष्टता स्नैलन चार्ट से दूरी के रूप में की जाती है । शैक्षिक दृष्टि से पूर्ण रूप से दृष्टि बाधित उनको कहते हैं , जिन्हें ब्रेल लिपित से सीखने लाभ उठा लेते हैं । इन्हें मुद्रित बाधित भी कहते हैं । में सुगमता होती है । आंशिक रूप से दृष्टि बाधित उन्हें कहते हैं , जो मुद्रित पाठ्यवस्तु का दृष्टि बाधिता की परिभाषा डॉक्टरों ने की है , इन्होंने दृष्टि क्षमता के परीक्षण के आधार जाता है । माना है । कानूनी परिभाषा भी दी गई है कि कानून की दृष्टि से किनको दृष्टि बाधित मान कानूनी दृष्टि से पूर्ण दृष्टि बाधित उन्हें मानते हैं- 

( 1 ) जिनकी दृष्टि क्षमता 20/200 तथा इससे कम हो उनकी आँखों में सुधार के बाद उत्तम हो । 

( 2 ) अथवा जिनका दृष्टि का क्षेत्र सीमित हो और 20 ° का कोण बनाती है । उनको आँखें सुधार के बाद उत्तम हो । परिभाषा दो , वह इस प्रकार है भारतवर्ष सरकार के समाज कल्याण मंत्रालय ने ( 1987 ) में दृष्टि बाधितो की 

( अ ) अपनी पूर्ण दृष्टि खो चुके हो । उत्तम हो । स्लैलन चार्ट से परीक्षण हो । 

( ब ) दृष्टि बाधित 6/60 या 20/20 से अधिक न हो और चश्में के प्रयोग से आँख 

( स ) दृष्टि का क्षेत्र सीमित हो और 20 ° का कोण बनता हो और से कम जा सकता है । 


इन परिभाषाओं के आधार पर दृष्टि बाधित बालकों को दो वर्गों में विभाजित किया।

 ( 1 ) पूर्ण रूप से दृष्टि बाधित या अन्धे बालक तथा।

 ( 2 ) आंशिक रूप से या निम्न दृष्टि बाधित शिक्षा की दृष्टि से दृष्टि बाधित बालकों की परिभाषा की गई है- दृष्टि बाधित बालक उन्हें कहते हैं , जिनकी दृष्टि खो चुकी हो और ब्रेल लिपि , तथा अन्य श्रवण शिक्षण सामग्री का लाभ उठा सकते हैं , उन्हें आंशिक रूप से बाधित वालक कहते हैं , जो चश्में की सहायता से मुद्रित पाठ्यवस्तु तथा दृश्य शैक्षिक सामग्री का उयोग कर लेते हैं । दृष्टि बाधित छात्रों की योग्यता एवं अनुभवों का क्षेत्र अधिक विस्तृत होता है । इनकी विद्यालय में विभिन्न प्रकार की समस्याएँ होती हैं । इन्हें चलने - फिरने , पढ़ने , दृश्य सहायक सामग्री के उपयोग में कठिनाई होती है । वह सुनकर और स्पर्श करके ही अनुभव करते हैं । 


दृष्टि बाधित बालकों की विशेषताएँ ( Characteristics of Visually Impaired Children ) दृष्टि का मनुष्य के लिए सबसे अधिक उपयोग है । ज्ञानात्मक पक्ष का विकास दृष्टि के अनुभवों पर ही आधारित होता है । वाधिता से व्यक्ति तीन प्रकार से सीमित हो जाता है । दृष्टि बाधित निरीक्षण के विधि अनुभवों से वंचित रहता है । उसकी योग्यताएँ भी सीमित रहती हैं , क्योंकि वे चल फिर नहीं सकते हैं । वे अपने वातावरण को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं । उनके सम्बन्ध भी सीमित रहते हैं । सामाजिक वातावरण का लाभ नहीं उठा पाते हैं । सामुदायिक अभिवृत्ति और व्यवहार परम्पराओं , विश्वासों एवं संस्कृति पर निर्भर करते हैं । विकास तथा समाज कल्याण के प्रयासों से इस दिशा में प्रगति हुई है । दृष्टि बाधितों को समाज में कोई महत्व नहीं दिया जाता है । इनका स्व - प्रत्यय , व्यक्ति उपलब्धि भी सामान्य निम्न स्तर की होती है । दृष्टि बाघित बालकों की विशेषताओं को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है

 ( 1 ) भाषा का विकास ( Language development )

 ( 2 ) मानसिक योग्यता ( Intellectual ability ) तथा 

( 3 ) सामाजिक तथा कार्य समायोजन ( Social and work adjustment ) 



1. भाषा का विकास ( Language Development  - दृष्टि बाधिता में भाषा का दोष नहीं होता है , क्योंकि यह सुन सकते हैं तथा वोल सकते हैं । बोलना और सुनना भाषा मुख्य कौशल माने जाते हैं । यह भाषा सीखने के लिए अधिक उत्साहित रहते हैं । भाषा क के माध्यम से अपनी बात माता - पिता तथा साथियों से कह सकते हैं । इनमें सम्प्रेषण सक्षमता होती है । सामान्य बालकों से इनके भाषा सीखने का ढंग भिन्न होता है , क्योंकि सामान्य वालक करके अधिक सीखते हैं । दृष्टि बाधित इस प्रकार के अनुभवों से वंचित देखकर अनुकरण रहते हैं । यह शाब्दिक अभिव्यक्ति ही कर पाते हैं । शाब्दिक अभिव्यक्ति में वास्तविकता होती , क्योंकि ज्ञान इन्द्रियों से अनुभव नहीं होता है । दृष्टि बाधित सुनकर ही शब्दों का करता है , क्योंकि दृष्टि इन्द्रिय क्रियाशील नहीं होती है । समस्त जानकारी तथा ज्ञान व इन्द्रिय पर आधारित होता है । किसी वस्तु का सही प्रत्यक्षीकरण नहीं हो पाता है । तथ्या भाषा से प्रगट करता है । उसे रंगों को कोई बोध नहीं हो सकता है । इनकी शाब्दिक अभि आन्तरिक नहीं होती है । इनके अनुभव पूर्ण नहीं होते हैं , उनका प्रत्यक्षीकरण सुनने तथा तक ही सीमित रहता है । 


2. मानसिक योग्यता ( Intellectual Ability ) - दृष्टि बाधित बालक मानसि योग्यता की दृष्टि से सामान्य बालकों से कम नहीं होते हैं । शोध कार्यों से यह विदित हुन कि यदि इन्हें समुचित शिक्षा दी जाए अथवा शिक्षा का अवसर मिल सके , तब इनकी बुद्धि लब्धि अचानक अधिक बढ़ जाती है । ज्ञानात्मक योग्यताएँ भी सामान्य से कम नहीं होती है , यद्यपि इनके सीखने तय प्रत्यक्षीकरण ढंग भिन्न होता है । प्रत्यक्षीकरण के विकास में कमी रहती है और समुचित अधिगम अनुभवों का अभाव रहता है । दृष्टि बाधित बालक दूरी को बोधगम्य नहीं कर पाते हैं क्योंकि वे दूरी नहीं देख सकते हैं । इनमें दूरी का प्रत्यय विकसित नहीं होता है । दूरी के प्रत्यय का बोध दृष्टि इन्द्रिय के स्थान अन्य इन्द्रियों का उपयोग करते हैं । इनमें कभी - कभी दूरी की सौन्दर्यानुभूति का भाव विकसित हो जाता है । यह समय से दूरी का अनुमान लगाते हैं । स्पर्श से भी इन्हें दूरी का बोध होत है । किसी आकाशीय पिण्ड का सही वोध नहीं हो पाता हैं । तारे , चन्द्रमा आदि का वोध नहीं कर पाते हैं । इन्हें हाथी का बोध कराना भी कठिन है । पहाड़ नदियों , झरने तथा भौगोलिक इकाइयों का ज्ञान नहीं दिया जा सकता है । इसी प्रकार अधिक सूक्ष्म जीव - जन्तु का भी बोध है । नहीं होता है । इन्हें सापेक्षिक रूप में इनका ज्ञान दिया जा सकता है तथा बोध कराया जाता दृष्टि बाधित बालकों में प्रत्ययों का विकास स्पर्श अनुभव से होता है । दो भिन्न प्रकार होता है स्पर्श अनुभव होते हैं । प्रथम विश्लेषण स्पर्श अनुभव तथा द्वितीय संश्लेषण स्पर्श अनुभव से 

( 1 ) विश्लेषण स्पर्श अनुभव के अन्तर्गत दृष्टि बाधित किसी वस्तु विभिन्न अंगों का स्पर्श करके मानसिक स्तर पर प्रत्यक्षीकरण करता है ।

 ( 2 ) संश्लेषण स्पर्श अनुभव के अन्तर्गत दृष्टि बाधित अपने हाथों से छोटी - छोटी वस्तुओं को स्पर्श अपने एक अथवा दोनों हाथों से स्पर्श करके अनुभव करता है । भौतिक वस्तुएँ बड़ी होती है , इसलिए संश्लेषण स्पर्श अनुभव उपयोगी होती हैं । सामान्य दृष्टि वाला बालक वस्तु को सम्पूर्ण रूप में भी देखता है और उसको खण्डों में देखता है । दृष्टि बाधित को विश्व ज्ञान तथा बोध करना कठिन होता । है । दृष्टि बाधित बालकों में एकाग्रता का विकास अधिक होता है , देखने से एकाग्रता प्रभावित होती है । सुनने का कौशल उत्तम है । इससे ज्ञानात्मक विकास में स्थानापन्न कई प्रकार से होता है । 3. सामाजिक और कार्य समायोजन ( Social and Work Adjustment ) , दृष्टि बाधितों की व्यक्तित्व की समस्याएँ आन्तरिक नहीं होती हैं । यदि इन बालका मेसुनिश्चित करते हैं । असमायोजन की समस्या सामाजिक कारणों से होती है । यह बालक अपने समायोजन को इनके साथी इन्हें स्वीकार नहीं करते हैं । गम्भीर रूप से दृष्टि बाधित को अक्सर स्वीकार कर लेते हैं , परन्तु कम दृष्टि बाधितों को स्वीकार नहीं करते हैं । बाधिता की गम्भीरता के परिणाम स्वरूप सहानुभूति बढ़ जाती है । माध्यम रूप से दृष्टि बाधितों के व्यवहार अन्य बालकों के प्रति नकारात्मक होते हैं । यह आवश्यक नहीं कि यह बालक पूर्ण दृष्टि बाधितों की भाँति दूसरों पर अधिक निर्भर हो । आश्रित और असहाय होने के कारण समाज का दृष्टिकोध सहानुभूतिपूर्ण होता है और इन्हें स्वीकार करते हैं ।

1992 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रतिपादित उच्च शिक्षा

 1992 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रतिपादित उच्च शिक्षा 



पुनर्संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति -1992 या जनार्दन रेड्डी समिति -1992  जुलाई 1991 में , केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार तथा परिषद ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति समिति की नियुक्ति आन्ध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय जनार्दन रेड्डी की अध्यक्षता में नियुक्त की । इस समिति में विभिन्न राज्यों के छ : शिक्षा मंत्री तथा आठ शिक्षण शास्त्री थे । इस समिति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 एवं आचार्य राममूर्ति समिति 1990 के संदर्भ में पुनर्विचार कर अपने आख्या तथा कार्य योजना प्रस्तुत की । इस समिति ने अपनी रिपोर्ट जनवरी 1992 में प्रस्तुत की इस समिति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 की समीक्षा की तथा यह अनुभव किया कि इस नीति में बहुत मामूली संशोधन की आवश्यकता है । जनार्दन रेड्डी समिति ने यह अनुभव किया कि शिक्षा नीति में बहुत कम परिवर्तन को आवश्यकता है । अतः शिक्षा नीति की कार्य योजना में मामूली सा फेर बदल किया जा सकता । है । 5-6 मई 1992 को इस समिति ने अपनी रिपोर्ट केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार परिषद को परिषद ने इस रिपोर्ट पर अपनी सहमति प्रदान की और भारतीय संसद में इस समिति को सिफारिशों को क्रियान्वित करने का अश्वासन दिया । इस समिति ने 22 कार्यकारी दलं गठित किये । योजना आयोग की सदस्य डॉ . श्रीमती चित्रानायक की अध्यक्षता में एक परिचालन समिति ( Stering Committee ) का भी गठन किया ।


 इस परिचालन समिति तथा कार्यकारी दलों का गठन इस प्रकार है कार्य - कार्यकारी अध्यक्ष 

1 . नारी समानता के लिये शिक्षा - श्रीमती ऊषा पिल्लई

 2. अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्ग - श्री बी.डी. शर्मा

 3 . अल्पसंख्यकों की शिक्षा -श्री अजीज कुरैशी

4 . विकलांगों को शिक्षा - श्री यू.पी. सिंह

5 . प्रौढ़ एवं सतत शिक्षा  -डॉ . रामलाल पारिख -

6. पूर्व बाल्यावस्था की देखभाल  - सुश्री मीनाक्षी आनन्द चौधरी 

7 . प्राथमिक शिक्षा - डॉ . जे . एस . राजपूत

 8. माध्यमिक शिक्षा - डॉ . के भोपालन

9. नवोदय विद्यालय - श्री आर . के . सिन्हा

10. व्यावसायिक शिक्षा - डॉ . टी.वी. सुमंगल

11. उच्च शिक्षा - प्रोफेसर जी.एम. रेड्डी

12. युक्त शिक्षा  - प्रो . वी.सी. कुलानन्दी स्वामी - 

 13. ग्रामीण विश्वविद्यालय / संस्थान - डॉ . एम . आराम

14. तकनीकी तथा प्रवन्धन शिक्षा - प्रो . एन.सी. निगम

15. अनुसंधान एवं विकास- -प्रो . सी . एन . आर . राव

 16. शिक्षा तकनीकी तथा संचार - श्री वाई.एन. चतुर्वेदी

 17. शिक्षा का डिग्री से पृथक्कीकरण तथा जनशक्ति नियोजन -   - प्रो . एस . के . खन्नाबी

18. सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य एवं भाषा विकास - श्री अशोक वाजपेयी

 19. खेल , शारीरिक शिक्षा तथा युवा - - श्री एस , वाई . कुरैशी

 20. मूल्यांकन एवं परीक्षा. - प्रो . पी . एन . श्रीवास्तव

 21. शिक्षक एवं शिक्षक प्रशिक्षण - -डॉ . के . गोपालन

22. शैक्षिक प्रबन्धन -   -  - श्री पी.के. उमाशंकर



 संशोधित कार्य योजना 


1992 जनार्दन रेड्डी समिति द्वारा गठित कार्यदलों ने गहन मंथन करके राष्ट्रीय शिक्षा नीति की कार्ययोजना में इन विषयों को सम्मिलित किया । 


1. नारी समानता के लिये शिक्षा - नारी शिक्षा की समानता एक महत्त्वपूर्ण विषय है । शिक्षा में सामाजिक न्याय तथा समानता के लिये विभिन्न उपायों को अपनाया जाना आवश्यक है । 1991 में नारी साक्षरता का प्रतिशत 39.42 रहा , जबकि पुरुषों का प्रतिशत 63.86 था । महिला शिक्षकों का अनुपात भी ठीक नहीं है । शिक्षा व्यवस्था में क्षेत्रवाद बहुत है । इस दृष्टि से नारी शिक्षा के विकास के लिये ये उपाय बताये गये

 ( i ) वांछित शैक्षिक उपायों तथा उपादानों को अपनाया जाय ।

 ( ii ) शिक्षा को नारी जागृति का साधन बनाया जाय । 

( iii ) ग्रामीण क्षेत्र में नारी की शिक्षा तथा घरेलू काम के मध्य तालमेल हो । 

( iv ) ग्रामीण क्षेत्र में महिला शिक्षिकाओं की व्यवस्था हो उनकी सुरक्षा तथा आवास की व्यवस्था हो ।

 ( v ) 15-35 आयुवर्ग की महिलाओं के लिये सतत् शिक्षा तथा निरौपचारिक शिक्षा कार्यक्रम चलाया जाय । 

( vi ) शैक्षिक वातावरण के निर्माण के लिये प्रिन्ट तथा इलैक्ट्रोनिक साधनों का उपयोग हो । 

( vii ) केन्द्र तथा राज्य स्तर पर पाठ्यक्रम विकास , शिक्षक प्रशिक्षण तथा अनुसंधान की व्यवस्था हो । 


2. अनुसूचित जाति , जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों की शिक्षा - वर्तमान परिस्थितियों का विश्लेषण कर इस वर्ग की शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिये । अधिकतम नामांकन सुनिश्चित किया जाय तथा इन वर्गों के बालकों को प्रोत्साहन दिया जाये । शिक्षा केन्द्र साधनयुक्त हों । आपरेशन ब्लैक बोर्ड आन्दोलन जारी रखा जाय । शिक्षण का न्यूनतम स्तर निर्धारित हो । प्रौढ़ शिक्षा संस्थान प्रोत्साहन , शिक्षण प्रशिक्षण , अन्य पिछड़े वर्गों के लिये विशेष सुविधायें , क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन आवश्यक है । 


3. अल्प संख्यकों की शिक्षा - वर्तमान स्थिति का विश्लेषण उनके विकास के 15 बिन्दुओं में से विन्दु 11 पर विशेष ध्यान दिया जाये । प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठने के लिये . कोचिंग सेन्टर्स स्थापित हों । अल्पसंख्यक प्रधानाचार्यों , शिक्षकों तथा प्रबन्धकों के प्रशिक्षण के लिये एन.सी.ई.आर.टी. विशेष पाठ्यक्रम चलाये । छात्रवृत्तियों तथा अन्य प्रकार की सहायता की व्यवस्था हो । इन वर्गों के लिये यह सब व्यवस्था की जाय जिनका उल्लेख नारी समानता की शिक्षा के लिये किया गया है । 


4. विकलांगों की शिक्षा - विकलांगों की शिक्षा के लिये विभिन्न युक्तियों का निर्माण , विकलांगों की समेकित शिक्षा , विशेष विद्यालय , व्यावसायिक शिक्षा , शिक्षक प्रशिक्षण ,  शिक्षण शैक्षिक तथा व्यावसायिक मार्गदर्शन शिक्षण अभ्यास क्रम तथा प्रक्रिया , जन संचार क उपयोग तथा ब्रेल लिपि में शिक्षण सामग्री की आवश्यकता पर बल दिया गया है । 

5. प्रौद एवं सतत् शिक्षा - जन - शिक्षा अभिक्रम को प्रौदशिक्षा एवं सतत् शिक्षा के लिये अपनाना आवश्यक है । अन्य विभागों से सहयोग लिया जाना चाहिये । शैक्षिक त तकनीकी सहयोग , सतत् शिक्षा के विकास के लिये आवश्यक है ।

 6. पूर्व बाल्यावस्था की देखभाल और शिक्षा - पूर्व बाल्यावस्था की शिक्षा के लिये समन्वित बाल विकास योजना , पूर्व बाल्यावस्था शिक्षा केन्द्र बालवाड़ी , पूर्व प्राथमिक शिक्ष विद्यालय , मातृ एवं शिशु कल्याण केन्द्र खोलने तथा इनके चलाने के लिये योग्य एवं दीक्षि कार्यकर्ताओं की भर्ती पर बल दिया है । 

7. प्राथमिक शिक्षा - निरौपचारिक शिक्षा को प्राथमिक शिक्षा वैकल्पिक साधन के क्रम में स्वीकार करना चाहिये । एन्सर्ट ( NCERT ) को कक्षा एक से बारह तक के पाठ्यक्रम संशोधित कर पाठ्य पुस्तकें तैयार करनी चाहियें , साथ ही सूक्ष्म नियोजन के लिये दिशा निर्देश दिये जाने चाहिये । प्राथमिक स्तर पर साक्षरता अभियोग , बस्ते के बोझ , न्यूनतम अधिगम स्तर अतिरिक्त विद्यालय खोलने पर बल दिया गया है ।

 8. माध्यमिक शिक्षा - रेड्डी समिति के 10 + 2 + 3 शिक्षा प्रणाली के जारी रखने को सिफारिश की । राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रचना विशिष्ट वर्गों की शिक्षा , माध्यमिक स्कूलों का विषय , सामान्य विद्यालयी संरचना ( 5 + 3 + 2 = 10 ) गुणात्मक शिक्षा आधुनिकीकरण पाठ्यक्रम पुनर्रचना पर बल दिया । 

9. नवोदय विद्यालय- प्रतिवर्ष 50 नये नवोदय विद्यालय खोले जायेंगे और प्रत्येक जिले में एक नवोदय विद्यालय हो । 

10. व्यावसायिक शिक्षा - विभिन्न स्तरों पर व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था को जाय । शिशुक्षुत्व शिक्षण , प्रशिक्षण , पाठ्यक्रम , व्यावसायिक तथा शैक्षिक मार्गदर्शन , लड़कियो के लिये व्यावसायिक शिक्षा की सिफारिशें की गई । 

11. उच्च शिक्षा - उच्च शिक्षा के विकास के लिये राज्य उच्च शिक्षा परिषदों ( SCHE ) के गठन , प्रबन्धक सूचना जाली , नये कॉलेजों के कार्यक्रम करने विश्वविद्यालयो के मूलभूत ढंग से अधिकतम उपयोग साधनों से युक्त नये कालेज , प्रवेश , परिश्रम साधनों का एकत्रीकरण तथा उपयोग अन्तर्विश्वविद्यालय केन्द्र स्वावित्तपोषित एवं स्वायत्त संस्थाओं का विकास , शिक्षकों के स्तर में सुधार , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा इग्नू में तालमेल पर बल दिया गया । 

12. मुक्त शिक्षा - मुक्त शिक्षा के विकास के लिये इग्नू द्वारा क्षेत्रों की पहचान तथा विकास , मुक्त अध्ययन के लिये इलेक्ट्रोनिक मीडिया के उपयोग , छात्रों की गतिशीलता तथा राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयों की स्थापना पर बल दिया गया है । 

13. उपाधि तथा रोजगार - कमेटी ने कुछ क्षेत्रों में उपाधि के रोजगार के लिये योग्यता के अनुबन्ध से हटाया है ।

 14. युग्म विश्वविद्यालय तथा संस्थान - ग्रामीण विश्वविद्यालयों तथा संस्थानों को स्थापना पर बल दिया गया है । 

15. अनुसंधान एवं विकास – मुख्य समस्याओं की पहचान , उनके संबंधों तथा शोष कार्यक्रमों के परिपालन तथा संचालन पर समिति ने बल दिया है । 

16. सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य प्राथमिक स्तर पर संस्कृति प्रवेशिक ( Culture Primary ) आरम्भ हो । बालनाट्य आन्दोलन को आरम्भ किया जाय । माध्यमिक स्तर पर सांस्कृतिक विरासत से परिचय कराया जाय । विश्वविद्यालय पर संगीत ललित कला प्रदर्शन कला तथा अनुवाद आदि के पाठ्यक्रम चलाये जायें । 

17. भाषा विकास - त्रिभाषा सूत्र , भाषा कौशल , हिन्दी शिक्षकों की नियुक्ति , विश्वविद्यालयों में आदर्श मूलक सुविधायें , संविधान की धारा 351 का अनुपालन तथा राष्ट्रीय स्तर के भाषा संस्थान के विकास पर बल दिया गया है । 

18. संप्रेषण एवं शिक्षा तकनीकी विश्वविद्यालयों , महाविद्यालयों तथा विद्यालयों में कम्प्यूटर्स की व्यवस्था तथा शिक्षा हो । 

19. खेल , शारीरिक शिक्षा तथा युवा- प्रत्येक विद्यालय में 45 मिनट की योग शिक्षा हो , खेलकूद की व्यवस्था हो । नेहरू युग केन्द्र , राष्ट्रीय सेवा योजना , स्काउट गाइड राष्ट्रीय कैडेट कोर आदि कार्यक्रम चलते रहने चाहिये । 

20. मूल्यांकन एवं परीक्षण सुधार- प्राथमिक स्तर पर प्रधान एवं सतत् मूल्यांकन होना चाहिये । स्कूलों के लिये एन्सर्ट ( NCERT ) आदर्श मूल्यांकन प्रस्तुत करने के लिए उच्च शिक्षा में प्रवेश परीक्षण हों , राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय मूल्यांकन संगठन हो । 

21. शिक्षक प्रशिक्षण केन्द्र द्वारा प्रस्ताविक शिक्षक प्रशिक्षण योजना का आरम्भ हो । राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद इस दिशा में पहल करें । विश्वविद्यालयों , महाविद्यालयों के शिक्षा के प्रशिक्षण विभागों को समुन्नत किया जाये । कम्प्यूटरों के उपयोग , शिक्षकों के दायित्व तथा शिक्षक संघों की प्रासंगिकता पर विचार प्रस्तुत किये जायें । 

22. शिक्षा और प्रबन्ध- शैक्षिक प्रबन्धक के लिये पंचायत राज , राज्य अधिनियम , जिला स्तरीय संस्थाओं , ग्राम शिक्षा कमेटियों और सरकारी संगठनों , राज्य एवं राष्ट्रीय शिक्षा सलाहकार परिषदों के योग , एजूकेशनल ट्रिव्यूनल आदि का गठन प्रभावशाली ढंग से किया जाये । जनार्दन रेड्डी समिति का मूल्यांकन 



★ 1986 की शिक्षा नीति , वास्तव में दलगत राजनीति का शिकार होती रही । राममूर्ति समिति तथा जनार्दन रेड्डी समिति ने 1986 की शिक्षा नीति के विभिन्न पहलुओं पर ही विचार किया और उन्हीं को पुन : प्रस्तुत कर दिया , इस कमेटी ने स्पष्ट कह दिया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में परिवर्तन करने की कोई आवश्यकता नहीं है । इस नीति को निष्ठापूर्वक लागू करने की । कमेटी में नौवीं पंच वर्षीय योजना तथा आगे भी कार्यकारी योजनाओं को लागू करने पर बल दिया ।