सविनय अवज्ञा आंदोलन

 

सविनय अवज्ञा आंदोलन

सविनय अवज्ञा आन्दोलन और मध्यप्रदेश की महिलाएँ - असहयोग आन्दोलन के स्थगित होने के कारण कांग्रेस के पास कोई कार्यक्रम नहीं रहा । ऐसी स्थिति में मोतीलाल नेहरू और चित्तरंजन दास आदि नेताओं ने शासन के कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करने के लिये कौंसिल में प्रवेष करने का निश्चय किया । अतः उन्होनें पहली जनवरी सन् 1923 को एक नये दल का गठन किया , जिसका नाम स्वराज्य दल था । यह दल सफलता पूर्वक शासन के कार्यों में व्यवधान उत्पन्न करता रहा । सन् 1925 में श्री चित्तरंजन दास की मृत्यु हो गई , जिसके कारण दल में नेतृत्व का अभाव दिखाई देने लगा । इसी अभाव के कारण यह दल सन् 1925 के निर्वाचन में वांछित सफलता प्राप्त करने में असमर्थ रहा । फलस्वरुप स्वराज्य दल का अस्तित्व समाप्त गया । सन् 1919 के सुधार अधिनियम पर विचार करने के लिये सन् 1927 में साइमन कमीशन की नियुक्ति की गई । इसमें कुल सात सदस्य थे और वे सभी अंग्रेज थे । सन् 1928 में जब यह कमीशन भारत आया तब लोगों ने उसका विरोध किया । कमीशन ने अनेक सिफारिशें की जिसे सभी राजनैतिक दलों ने अमान्य कर दिया । ऐसी स्थिति में तत्कालीन भारत मंत्री लाई बर्किन हेड ने भारतीय नेताओं को यह चुनौती दी कि वे ऐसे संविधान का निर्माण कर प्रस्तुत करें , जो सभी राजनैतिक दलों को मान्य हो सके । राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार की इस चुनैती को सहर्ष स्वीकार कर लिया । अतः इस विधान के निर्माण के लिये पंडित मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई , जिसने पूर्ण उत्तरदायी शासन को आधार मानकर वैधानिक समस्या पर विचार किया । इस समिति ने तीन माह में ही रिपोर्ट तैयार की , जिसे नेहरु रिपोर्ट कहा गया । इसके द्वारा की गई सिफारश इस प्रकार थीं 1 केन्द्र और प्रान्तों के बीच शक्ति विभाजन 2 केन्द्र और प्रान्तों में पूर्ण उत्तरदायी शासन की स्थापना । 3 साम्प्रदायिकता के आधार पर निर्वाचन का अन्त 4 सर्वोच्च न्यालय की स्थापना । मौलिक अधिकारों की घोषणा । 5

इस रिपोर्ट को कांग्रेस ने कुछ संशोधनों के साथ अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी , पर मुस्लिम लीग ने इसका विरोध किया । जिन्ना ने 14 सूत्रीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया । कांग्रेस ने नेहरु रिपोर्ट को 31 दिसम्बर सन् 1929 तक स्वीकार करने का सरकार से अनुरोध किया । सन् 1929 को लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन आरम्भ हुआ जिसकी अध्यक्षता पंडित जवाहर लाल ने की । इसी अधिवेशन में रावी नदी के तट पर तिरंगा झंडा फहराकर पूर्ण स्वायीनता का प्रस्ताव पास किया गया , और यह भी तय किया गया कि प्रति वर्ष 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस मनाया जाये । इस समय देश का आर्थिक और राजनैतिक वातावरण ठीक नहीं था । शासन का दमनचक्र लोगों की नाराजगी का कारण था । लोगों में शासन के विरुद्ध घोर निराशा थी । ऐसी स्थिति में सन् 1930 में कांग्रेस ने गांधी जो को सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारम्भ करने की अनुमति प्रदान कर दी । 12 मार्च सन् 1930 को गांधी जी ने अपनी प्रसिद्ध दांडी यात्रा आरम्भ कर इस आन्दोलन का श्रीगणेश किया । वहाँ नमक बनाकर उन्होनें कानून का उल्लंघन किया । इस आन्दोलन के लिये गांधी जी ने एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया , जिसमें नमक बनाना , महिलाओं द्वारा शराब और विदेशी वस्तुओं की दुकानों पर धरना देना , अस्पृश्यता का त्याग और सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार आदि थे । यह आन्दोलन सारे देश में आरम्भ हो गया , और स्थान - स्थान पर नमक बनाकर ब्रिटिश सरकार की धज्जियाँ उड़ायी जाने लगी । महिलाओं द्वारा शराब की दुकानों पर धरने दिये जाने लगे । छात्रों ने सरकारी स्कूल और कॉलेजों का बहिष्कार किया । देश के सभी नगरों में हड़तालें और प्रदर्शन के दौर शुरू हो गये । सरकार का भी दमन चक्र चला आरै गांधी जी गिरफ्तार कर लिये गये । फिर क्या था ब्रिटिश हुकूमत द्वारा जेल भरे जाने लगे और सत्याग्रहियों की संख्या लगभग एक लाख हो गई । जहाँ सम्पूर्ण देश सविनय अवज्ञा आन्दोलन में बढ़ - चढ़ कर भाग ले रहा था वहीं मध्यप्रदेश के लोगों ने भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ लामबंद हो गये । यहाँ की महिलाओं ने अपने घर परिवार छोड़ कर इस स्वतंत्रता समर में कूद पड़ीं । सर्वप्रथम 21 अप्रेल को दुर्गा बाई जोशी के नेतृत्व में महिला स्वयं सेविकाओं के दल ने नमक कानून की अवहेला की महिलाओं ने न केवल नमक कानून को भंग किया बल्कि जंगल कानूनों के तोड़ते हुए स्वतंत्रता की राह पर निकल पड़ीं , और गली - गली में प्रभात फेरियाँ और जुलूस व प्रदर्शन करने लगीं । सत्याग्रह के लिये दूसरा सवाल आम चुनावों का बहिष्कार करना था , जो 10 नवम्बर को मतदान केन्द्रों पर धरना देकर प्रारम्भ किया गया । नागपुर में लगभग 400 पुरुष स्वयं सेवक एवं 200 महिला स्वयं सेविकाए 500 बालकों की सहायता से समस्त मतदान केन्द्रों पर फैल गई । और लोगों को मतदान न करने के लिये कहने लगीं । जिसमें गिरफ्तार किये गये व्यक्तियों में श्रीमती  अनुसुइया बाई काले भी थीं , जो टाऊन हॉल केन्द्र पर धरना दे रही थीं । इसी तरह की सिवनी रायपुर की महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सविनय अवज्ञा आन्द बघेल जिसने सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी कानून को तोड़ा और में भाग लिया और गिरफ्तार होकर जेल की यातनाएँ झेलीं । इनमें से एक थी श्रीमती केकती ई 6 माह की सश्रम कारावास की सजा भोगी । इनके अतिरिक्त रायपुर क्षेत्र से निम्नलिखित महिलाओं का नाम विख्यात है , जिन्होनें सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सक्रिय रूप से मूल लिया और ब्रिटिश कानून का उलंघन कर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और घरने व प्रदर्श का नेतृत्व कर जेल की सजा भोगीं । 2 माह की कारावास श्रीमती नाहरी बाई पति श्री राम विशाल श्रीमती फूलकुंवर बाई पिता श्री रघुवर द 4 माह 22 दिन की सजा 6 माह का कारावास श्रीमती बेला बाई पति श्री भुजवल सिंह श्रीमती लक्ष्मी बाई पति श्रीगुलाब चंद श्रीमती राधाबाई इन महिलाओं की अप्रतिम शौर्य और साहस से अन्य महिलाएं इतनी प्रभावित हुई कि अपने घर द्वार छोड़कर इनके साथ हो चलीं और जब 28 नवम्बर सन् 1933 को गांधी जी का रायपुर आगमन हुआ तब हजारों की संख्या में महिलाओं ने बापू की अगवानी की रायपुर के पश्चात महात्मा गांधी बिलासपुर पहुंचे तब वहाँ महिलाओं का उत्साह देखने ही बनता था । सभा सम्बोधन के पश्चात यहाँ महिलाओं की ओर से एक हजार रुपये की देवी तिलक स्वराज्य कोष के लिये भेंट की गई । शालिनी सक्सेना ने लिखा है कि " बिलासपुर के इतिहास में इतनी बड़ी सभा पहली बार हुई । " यहाँ महिलाओं ने अपनी आंचल फैलाकर कोप के लिए धन एकत्रित करके गांधी जी को दो हजार रुपये की थैली भेंट की गई । सन् 1933 में गांधी जी का हरिजन दौरा बालाघाट में भी हुआ , जहाँ की महिलाओं ने घन संग्रहित कर गांधी जी को अर्पण किए । अब तक सविनय अवज्ञा आन्दोलन मध्यप्रदेश के कोने - कोने तक फैल चुका था और महिलाओं द्वारा इसे सफल बनाने के लिये दू सहयोग दिया जा रहा था । इसी श्रृंखला में बालाघाट की श्रीमती गंगा बाई चौबे , जिन्होंने सन् 1929 से ही स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना शुरू कर दिया था , ने अपनी शैर्य का परिचय देते हु सन् 1930 में नागपुर में एक सभा की अध्यक्षता की और बंदी बना ली गई । जिसके कारन उन्हें 6 माह का कारावास भी भोगना पड़ा । वह निरंतर अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिये कुछ करती रही , और यही कारण था कि सन् 1932 के आन्दोलन में भाग लेने के कारण 9 माह का कारावास और 100 रुपये अर्थ से उसे दण्डित किया गया । महात्मा गांधी जी का यात्रा बालाघाट से सिवनी फिर छिदवाड़ा , सतपुड़ा , इटारसी , देवरी , अनंतपुर , सागर , कटनी आदि स्थानों से होते हुए जबलपुर पहुँचा , जहाँ उनका जोरदार स्वागत हुआ । तत्पश्चात गांधी जी ने महिलाओं की सभा में धन संग्रह किया । यह वह एक ऐसा दौर था जब महिला शक्ति अपना अमूल्य योगदान देकर एक नया इतिहास रच डाला था । जिनमें से कुछ प्रमुख थीं श्रीमती कमला देवी गुप्ता । सन् 1930 से ही इन्होनें अपने पति श्री छदामी लाल गुप्ता के साथ स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया । जिसके कारण 25 अप्रेल सन् 1932 से 11 दिसम्बर सन् 1932 तक इन्हें कारावास भोगना पड़ा यही नहीं आन्दोलन में भाग लेने के कारण इनके घर का सारा सामान भी कुर्क कर लिया गया था , फिर भी यह निरंतर स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहीं । इन्हीं के नामों के साथ यहाँ जबलपुर के एक छोटे से गाँव रिछाई से श्रीमती केतकी बाई ने नमक आन्दोलन में भाग लेकर 9 दिन का कारावास भोगा । वहीं पाटन के आगासौद से श्रीमती प्यारी बाई ठकुराइन ने भी सन् 1930 में हुए सविनय अवज्ञा आन्दोलन के समय से ही राष्ट्रीय आन्दोलन में अपना सक्रिय योगदान देती रही तथा साथ ही साथ जबलपुर क्षेत्र के महिला वर्ग में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया । सन् 1930 और सन् 1942 में कुल मिलाकर 1 वर्ष 4 माह का कारावास भोगा और महिला जाति को एक नयी प्रेरणा दी । इन्हीं के साथ श्रीमती प्रभावती नामदेव का नाम भी सन् 1932 में तिलक भूमि तलैया पर सभा करने तथा बहादुरी के साथ गिरफ्तार होने के कारण एक अलग ही महत्व रखता है । 2 अक्टूबर सन् 1932 से 17 जून सन् 1932 तक इन्हें कारावास की सजा भुगतनी पड़ी । किन्तु भारतीय महिलाओं का उत्साह फिर भी कम होने के बजाय बढ़ता ही गया । श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान तो भारतीय महिलाओं के लिये एक आदर्श ही बन गईं । इनकी लेखनी में एक जादू था । उनकी कविताएं लोगों में राष्ट्रीयता की भावना व जोश भरने का प्रमुख कार्य करती रहीं । " खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी " की इस कवियित्री ने न केवल स्वयं को लेखनी तक सीमित रखा आपितु सन् 1930 तथा 1942 में जबलपुर में लगभग एक वर्ष से अधिक का कारावास भी भोगा । झंडा सत्याग्रह में नागपुर में इनकी गिरफ्तारी से देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई । सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में केवल पुरुषों का ही योगदान नहीं रहा बल्कि देश के अनेक रमणीयों ने चाहे वह शहरी क्षेत्र के हों या ग्रामीण अंचलों के , इस महान संग्राम में अपने आपको समाहित किया । उदाहरण स्वरुप श्रीमती सोनी बाई गोडिन , जो मूलतः ग्राम बिछिया , मंडला की रहने वाली थी , ने लाम बंदी आन्दोलन में गिरफ्तार होकर 5 माह तक जेल में रहीं । इसी तरह श्रीमती देवू बाई सिवनी के निकट तुरिया नामक स्थान पर हुई गोलीकाण्ड के शिकार हुई । इन्हीं के साथ - साथ श्रीमती मुक्को बाई ग्राम खाम्हा , मण्डला ने भी तुरिया गोली काण्ड में  शहीद हुई । किन्तु फिर भी हमारे इतिहास में ऐसी असंख्य महिलाएं एवं पुरुष हैं , जिन्हें इतिहास के पन्नों में स्थान तक नहीं मिला और जो केवल गुमनामी के अंधेरे में गुम रह गये हैं । लेकिन स्वतंत्रता की बलि देवी पर उनका मूक समर्पण एवं बलिदान अमर है । सन् सन् 1932 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन ने सागर क्षेत्र में भी अपना अक्रामक रूप दिखाया । परिणाम स्वरुप अनेक लोग गिरफ्तार हुए । यहाँ पुरुषों के साथ - साथ महिलाओं ने इस आन्दोलन में बढ़ चढ़कर भाग लिया । जिनमें सर्वप्रथम कमला बाई का नाम उल्लेखनीय है , जिन्होंने 1932 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भाग लिया और 29 फरवरी 1932 से 24 मई सन् 1932 तक का कारावास भोगा । इन्हीं के साथ - साथ दूसरा उल्लेखनीय नाम श्रीमती सुखरानी उर्फ सहौदरा बाई का है जो सागर निवासी श्री मुरलीघर जी की पत्नि थीं , और जिन्होनें निर्भीक होकर सामाजिक गतिविधियों को सक्रियता प्रदान की । गोवा मुक्ति आन्दोलन में दो गोलियाँ भी खाईं और जो भूतपूर्व सांसद सदस्य भी रहीं । सन् 1930 में सविनय अवज्ञा आन्दोलन में राजनीतिक गतिविधियों तैज होने लगी थीं और इसी आन्दोलन के दौरान जब गांधी जी गिरफ्तार किये गये तो इन्दौर शहर में बड़ी व्याकुता और अशान्ति रही और जब प्रतिक्रिया स्वरुप शान्त जुलूस निकाले गये तब महिलाओं ने भी पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर चलीं । जिसमें रुकमणी देवी शर्मा , राबादेवी आजाद , फूल कुंवर चौरड़िया , श्रीमती तुलसी बाई और बैजनाथ की पत्नि जिन्होनें स्वधीनता के इस आन्दोलन में अपने पति के साथ रहकर काम किया । वहीं श्रीमती कावेरी खादीवाला तथा श्रीमती शांताबेन पटेल ने 3-3 माह का कारावास भोगा । क्योंकि सन् 1932 में अजमेर में राष्ट्रीय आन्दोलन में श्रीमती कावेरी देवी ने सक्रिय सहयोग दिया था और श्रीमती शांता बेन पटेल पति श्री चतुर भाई पटेल ने न केवल सन् 1930 से राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लिया आपितु सन् 1932 में विदेशी कपड़ों की पिकेटिंग करते हुए बंदी बनाई गई । इसके साथ ही नमक सत्याग्रह में भाग लिया था , इसीलिये घुलिया में इन्हें 3 माह का कारावास भोगना पड़ा । इसके बाद ये इन्दौर शहर कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं । इस तरह से इस क्षेत्र में महिलाओं के सर्वाधिक नाम उपलब्ध होने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में कितनी सक्रिय थी । श्रीमती राधाबाई मानतीरा पति श्री खूबचंद मानतीरा का जन्म सन् 1902 में हुआ था । इनकी शिक्षा अधिक नहीं हो सकी थी , लेकिन फिर भी स्वतंत्रता संग्राम में इनका सक्रिय सहयोग व लोगों में जागृति फैलाने का कार्य इतना तीव्रतर रहां कि इन्हें दो वर्ष का कारावास भोगना पड़ा । इस दौर में महिलाओं को अनेक यातनाएं सहनी पड़ी और तुरिया गोली हत्या काण्ड में तो अनेक पुरुष के साथ - साथ कई महिलाएं भी शहीद हुई । महिलाओं के साथ अमानुषिक व्यवहार हुआ , किन्तु फिर भी शक्ति के प्रतीक नारी ने स्वयं को अबला नहीं सबला ही साबित किया । वे स्वतंत्रता के इस आन्दोलन में निरंतर भाग लेती रहीं और स्वतंत्रता रुपी इमारत की नीव को मजबूत करती रहीं ।
खण्डवा से श्रीमती कस्तुरी बाई उपाध्याय जो कि श्री किशोरी लाल उपाध्याय की पलि धी का जन्म सन् 1892 में हुआ । आप सक्रिय देश भक्त पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जी की बहन थीं । अतः बचपन से ही इनका झुकाव भी राष्ट्रीय गतिविधियों की ओर ही रहा । सन् 1932 मे जलियाँवाला बाग दिवस कार्यक्रम में भाग लेने पर इन्हें गिरफ्तार कर इन्हें खण्डवा तया नागपुर कारावास भोगना पड़ा । में 4 माह का कारावास तथा 50 रुपये का अर्थ दण्ड देने के बाद भी एक माह का अतिरिक्त जहाँ इस समय पूरा देश परतंत्रता से मुक्ति के लिए प्रयासरत था वहीं नीमच की महिलाओं ने भी स्वधीनता आन्दोलन में खुलकर हिस्सा लिया । अजमेर में सत्याग्रह करने पर नीमच में कई लोगों को जिनमें 6 महिलाएं भी थीं गिरफ्तार की गई । महिलाओं में श्रीमती कमला बाई यादव , श्रीमती चम्पाबाई यादव , श्रीमती जानकी देवी अग्रवाल , श्रीमती रामेश्वरी यादव , श्रीमती लक्ष्मी बाई सागर और श्रीमती सावित्री बाई आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं । क्योंकि इन सभी महिलाओं को सन् 1930 के इस आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने पर 3-3 माह का कारावास भोगना पड़ा था । किन्तु फिर भी इनका उत्साह कम न हुआ और इनके उत्साह के प्रभावस्वरुप शाजापुर में श्रीमती किशोमाई त्रिवेदी , श्रीमती प्रताप भाई और प्रधान बहनों ने सामाजिक दृष्टि से पिछड़े हुए इस क्षेत्र में घर गृहस्थी के जाल को छोड़कर महिलाओं में एक नयी चेतना फूंकी । जहाँ सामाजिक दृष्टि से पिछड़े हुए इस शाजापुर में इतना उत्साह व सक्रियता थी ,, वहीं ग्वालियर क्षेत्र जो कि सदेव से ही गतिविधियों का केन्द्र रहा है , पीछे वह कब रहने वाला था । सन् 1930-31 में यहाँ श्रीमती लक्ष्मीबाई गर्दे ने एक संस्था बनाई जो विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार में लोकप्रिय हुई । इन सबके प्रभाव से रतलाम भी अछूता नहीं रहा । रतलाम में आजादी के आन्दोलन के दौरान श्री दीनदयाल भारतीय , श्रीमती दुर्गा देवी निगम , श्री रतन सिंह और फतेह सिह काफी सक्रिय थे । इसी समय यहाँ महिलाओं की रुचि भी आजादी के आन्दोलन में बढ़ने लगी थी । सार्वजनिक जीवन में इन्हीं दिनों घूंघट प्रथा त्यागकर श्रीमती दुर्गा निगम ने राजनैतिक गतिविधियों में भाग लेना आरंभ किया और उनकी प्रेरणा से क्रांति का ज्वर सर्वोच्च शिखर पर था । ब्रिटिश हुकूमत ने सरदार भगत सिंह और राजगुरु को फंसी पर लटका दिया था । ये समाचार जैसे ही मिला , रतलाम नगर में हड़ताल रखी गई और जुलूस निकाले गए । डॉ ० प्रण शंकर दुबे , श्री लक्ष्मी नारायण व्यास , श्री सौभाग्य मल पोरवाल , श्री रतनलाल पोरवाल तथा श्री दीनदयाल को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया । उन्हें हथकड़ी डालकर शहर में घुमाया गया । इन्हीं गिरफ्तारियों के विरोध में 25 मई सन् 1931 को श्रीमती दुर्गा देवी निगम व श्री देवनंद भाट के नेतृत्व में विशाल चल समारोह निकाला गया , जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं और विद्यार्थियों ने भाग लिया । तत्पश्चात रानी जी मंदिर के पास एक सभा का आयोजन हुआ । इस सभा को तितर - बितर करने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज किया , जिसमें अनेक पुरुष व महिलाएं घायल हुए । सभा बंदी आदेश लागू किये गये और दुर्गादिवी के साथ 12-13 महिलाओं को गिरफ्तार किया गया । श्रीमती दुर्गा देवी निगम की अध्यक्षता में महिलाओं के लिये " स्त्री सेवा दल " की स्थापना की गई । इसी श्रृंखला में कुछ नाम जैसे श्रीमती शांता बाई दुबे तथा श्रीमती चंद्र प्रमा जी के भी हैं । श्रीमती चंद्रप्रभा दुबे जिनका जन्म सन् 1911 में हुआ था तथा यह सन् 1927 से ही राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय रहीं तथा विदेशी वस्त्र बहिष्कार आन्दोलन में सक्रिय रहने के कारण इन्होनें 31 अगस्त सन् 1932 से 8 फरवरी सन् 1933 तक अजमेर में लगभग 6 माह का कारावास भोगा । श्रीमती शांता दुबे ने भी 1931 से सन् 1947 तक स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया , जिसके कारण इन्हें डी ० एफ 0 वकील के सामने कोड़ों से मारा गया तथा सन् 1937 में ही इन्हें नजरबंद रखा गया । तब भी इनका साहस कम नहीं हुआ और फिर शहीद भगत सिंह दिवस में इन्होनें फिर भाग लिया और लाठियाँ खाई । इसके बाद रतलाम व अजमेर में विदेशी माल के बहिष्कार आन्दोलन में भी भाग लिया और अपनी सहनशीलता तथा राष्ट्र के प्रति प्रेम E को प्रकट किया । ' इसी के साथ देवास क्षेत्र में भी महिलाओं में सक्रियता बढ़ी और सन् 1932 के स्वदेशी आन्दोलन में यहाँ की महिलाओं ने न केवल गांधी जी के दांडी यात्रा में शामिल हुए बल्कि इन्होंने शराब की दुकानों में धरना दिया तथा विदेशी वस्तुओं की होली जलायी । इसी श्रृंखला में यहाँ की प्रमुख महिला शांति देवी मालू का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है , जिसने स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रियता से भाग लेकर देवास क्षेत्र को गौरवान्वित किया । इस प्रकार सम्पूर्ण मध्यप्रदेश के कोने - कोने कीमहिलाओं ने सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया । यद्यपि मध्यप्रदेश के जिन अंचलों में महात्मा गांधी जी का पदार्पण हुआ वहाँ सक्रिता सर्वाधिक थी , फिर भी ऐसा बिल्कुल नहीं था कि जिन क्षेत्रों में गांधी जी के चरण स्पर्श नहीं हुआ वहाँ आन्दोलन शिबिल रहा । गांधी जी की आंधी ही इन क्षेत्रों में आन्दोलन को गति देने में सहयोगी रही । जब सम्पूर्ण देश के साथ - साथ समूचा मध्यप्रदेश इस आन्दोलन में अग्रसर था , तब भोपाल का राज्य ही इससे अछूता कैसे रह सकता था । यहाँ सन् 1938 में भोपाल राज्य प्रभा मण्डल की स्थापना की गई । जिसमें नागरिक स्वतंत्रता की माँग प्रस्तावित की गई थी । भोपाल राज्य प्रारम्भ से ही राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है । अतः सन् 1930 में प्रारम्भ हुए आन्दोलन में इसकी सक्रियता स्वाभिक ही था । यहाँ की महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में श्रीमती शांति देवी का नाम उल्लेखनीय है जिनका जन्म जन्म सन् 1907 में हुआ । इनके पति श्री विशम्भर प्रसाद शर्मा थे । सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में शांति देवी सत्त सक्रिय रहीं , फलतः अंग्रेजी शासन द्वारा 16/10/1930 से 8 / 3 / 1931 तक जेल में रखा गया । मध्यप्रदेश के विंध्य का क्षेत्र भी महात्मा गाँधी द्वारा चलाया गया सविनय अवज्ञा आन्दोलन से प्रभावित रहा और यहाँ की महिलाओं ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़ - चढ़कर भाग लिया ।


असहयोग आन्दोलन और मध्यप्रदेश की महिलाएँ

 असहयोग आंदोलन 

 असहयोग आन्दोलन और मध्यप्रदेश की महिलाएँ देश में घटित होने वाली अनेक सत्याग्रह के सिद्धांतों व उद्देश्यों को जन - जन तक पहुंचाने के लिये सम्पूर्ण देश का दौरा प्र घटनाओं से क्षुब्ध होकर गांधी जी ने सन् 1920 में असहयोग आन्दोलन का शंखनाद किया और किया । इसी कड़ी में गांधी जी की मध्यप्रदेश की दस यात्राएं हुई , जिसमें इन्दौर नगर का सौभाग्य रहा कि गांधी जी का यहाँ सन् 1918 में प्रथम आगमन हुआ । यद्यपि गांधी जी का इन्दौर विशुद्ध रूप से साहित्यक था , फिर भी इस समय तक गांधी जी के राजनीतिक विचारों का प्रकाश प्रारम्भ प्रदाम में आना प्रारम्भ हो गया था और उनके असहयोग , अहिन्सा व रचनात्मक कार्यक्रम सम्बंधी दृष्टिकोण • सम्पूर्ण देश में फैलने लगा था । यही वजह था कि नागपुर अधिवेशन में उनके प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए गांधी जी को देश का सर्वमान्य नेता और स्वतंत्रता आन्दोलन का कर्णचार प्रमाणित कर लिया गया । गांधीजी के असहयोग आन्दोलन कार्यक्रम के निर्णय से सम्पूर्ण देश में एक नयी लहर का संचार हुआ । गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रमों का प्रस्ताव बनाया और देश वासियों से आव्हान भी किया कि इस अहिंसात्मक आन्दोलन को तब तक चलाया जाए जब तक कि स्वराज्य प्राप्त न हो जाये । परिणाम स्वरूप देश की जनता की ओर से भी भरपूर सहयोग मिला और देश के कोने - कोने में शांत जुलुस , विदेशी वस्त्रों की होली जलाना , सूत कातना , शराब की दुकानों में पिकेटिंग करना , सरकारी स्कूल व कॉलेज के बहिष्कार आदि के कार्यक्रमों की शुरुआत होने लगी । मध्यप्रदेश के सभी वर्गों के लोगों ने जहाँ इस आन्दोलन में बढ़ - चढ़कर भाग लिया , वहीं यहाँ की महिलाओं ने भी घर की चहार दिवारी से बाहर निकलकर गांधीजी के साथ हो चल और असहयोग सत्याग्रह में शामिल हो गई । इसी श्रृंखला में गांधीजी का रायपुर आगमन हुआ और वहाँ उन्होंने महिलाओं की एक सभा को सम्बोधित किया । जिसमें गांधी जी ने महिलाओं से तिलक स्वराज्य कोष में धन राशि जमा करने की अपील की । परिणाम स्वरुप महिलाओं ने लगभग के दो हजार रुपये मूल्य के सोने , चाँदी के गहने एकत्रित कर बापू के चरणों में अर्पित किये । रायपुर में गांधी जी के भाषण का इतना प्रभाव पड़ा कि महिलाओं ने गाँव - गाँव जाकर असहयोग आन्दोलन का प्रचार करने लगीं । इससे यहाँ असहयोग आन्दोलन तीव्रतर होती चली गई और एक ओर तो जहाँ महिलाओं ने अंग्रेजी कानूनों का उल्लंघन कर वस्त्रों की होली जलायी , तो दूसरी ओर विद्यार्थियों द्वारा सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार किया और अनेक लोगों ने उपाधियों की तिलांजली दे दी । असहयोग आन्दोलन में यद्यपि रायपुर की अनेक महिलाओं ने भाग लेकर , जुलूस निकालकर , धरने व प्रदर्शन कर गिरफ्तारियाँ दीं जिनमें श्रीमती भागीरथी तथा श्रीमती रुकमणि बाई का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है । श्रीमती भागीरथी बाई स्वतंत्रता के इस आन्दोलन में भूमिगत रहकर कार्य करते हुए अंग्रेजी शासन की प्रताड़ना की शिकार होती रहीं । वहीं श्रीमती रुकमणी बाई का योगदान भी कुछ कम नहीं था । श्रीमती रुकमणी बाई ने इस आन्दोलन में अपना सहयोग देते हुए अनेक जुलूसों का नेतृत्व किया , शराब के दुकानों पर घरने दिये , जिससे अंग्रेजों द्वारा यह गिरफ्तार कर ली गई और उन्हें एक वर्ष की कठोर कारावास की सजा दी गई । जेल से रिहा होने के बाद वह राष्ट्रीय आन्दोलन में पुनः सक्रिय हो गई । इसी दौरान रायपुर जिले की प्रथम महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ .  राधा बाई ने जिले में नागरिक जागरण के कार्य में संलग्न हो गई थी । महात्मा गांधी अपनी मध्यप्रदेश यात्राओं के दौरान रायपुर के बाद धमतरी और कद भी गये , वहाँ के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया । अपने भाषण के दौरान वहाँ गांधी जी ने का था कि " देश की उन्नति तभी सम्भव है जब इस देश की महिलाएं जागृत होंगी । " इस यात्रा के दौरान महात्मा गांधी जी को यहाँ की महिलाओं ने तिलक स्वराज्य फंड के लिये है शक्ति रुपये - पैसे व जेवर अर्पित किये । पया तत्पश्चात महात्मा गांधी जी का अगला पड़ाव छिंदवाड़ा में हुआ । यहाँ की महिलाओं ने गांधी जी के भाषण का रसास्वादन किया और तिलक स्वराज्य फंड हेतु आमूषण व रुपये की थैली भेंट की । नागपुर कंग्रेस अधिवेशन के बाद महात्मा गांधी जी माता कस्तूरवा , भगवानदीन , अर्जुन सेठी का सिवनी में आगमन हुआ , जहाँ ब्रिटिश सरकार और उनके अत्याचारी नीतियों के विरुद्ध भाषण देने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लि गया । जिसका सिवनी के जनता पर विपरीत प्रभाव पड़ा और यहाँ के छात्रों व महिलाओं ने काले झंडे लेकर प्रदर्शन जुलूस निकाले । इसके बाद गांधीजी जबलपुर पहुचें । यहाँ गांधी जी के दर्शन करने व उनके भाषण सुनने वाली महिलाओं की अपार समूह एकत्रित हुई थी । सभा में जब गांधी जी ने तिलक स्वराज्य फंड के लिये महिलाओं से उनके में गहने मांगे तब उन्हें काफी मात्रा में गहने मिले । जबलपुर की इस यात्रा में गांधी जी को लगभग बीस हजार रुपये की दान राशि प्राप्त हुई । महात्मा गांधी के आगमन के पश्चात यहाँ असहयोग कार्यक्रम अपने पूरे जोश पर आ चुका था । इन क्षेत्रों में जहाँ पुरुष व छात्र वर्ग का उल्लेखनीय योगदान रहा है , वहीं इस क्षेत्र की महिलाओं ने भी इतिहास को अपने से रिक्त नहीं रहने दिया । स्व . श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान ने असहयोग आन्दोलन में भले ही प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया था , किन्तु अपनी ओजस्वी कविताओं के माध्यम से राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करने में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया । " खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी " की कवियित्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान की इस कविता ने महिलाओं में एक नयी चेतना का विकास भी किया था । श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान के अतिरिक्त श्रीमती गुजरिया बाई एवं श्रीमती तुलसा बाई के नाम भी इस क्षेत्र में उल्लेखनीय है । श्रीमती गुजरिया बाई का जन्म सन् 1894 में सतना के मरजूबा नामक ग्राम में हुआ था । आपके पिता का नाम श्री बाबादीन उमराव घा तथा आपकी शिक्षा प्राथमिक तक भी पूरी नहीं हो सकी थी । किन्तु आपकी रुचि स्वतंत्रता के कार्यों में बहुत अधिक थी । मध्यप्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सैनिक जबलपुर सम्भाग के अनुसार तो श्रीमती गुजरिया बाई एवं श्रीमती तुलसा बाई जी ने केवल भारत छोड़ो आन्दोलन में ही भाग लिया था किन्तु प्राप्त जानकारियों से जो नयी जानकारी सामने आई उसके अनुसार इन दोनों  ही महिलाओं ने असहयोग आन्दोलन में भी अपना योगदान दिया और सप्त सूत्रीय कार्यक्रम के अनुसार शराब की दुकानों पर धरने दिये , विदेशी वस्त्रों की होती जलायी और पुलिस की लाठियाँ भी खाईं । श्रीमती तुलसा बाई दुबे , गांधी गंज कटनी की निवासी थी तथा इनका जन्म सन् 1890 में हुआ था एवं इनके पति रामकृष्ण दुबे थे , जिन्होंने श्रीमती तुलसा बाई को आन्दोलनों में भाग लेने में योगदान दिया । सन् 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स का भारत आगमन हुआ , तब सम्पूर्ण भारत में उत्तेजना को लहर फैल गई और देश के कोने - कोने में इसके विरोध में प्रदर्शनों का दौर शुरू हुआ । खंडवा में इसकी प्रतिक्रिया में महिलाओं ने एक विशाल जुलूस का आयोजन किया । जिसमें पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया । इसी दौरान गांधी जी की भोपाल यात्रा हुई । भोपाल में गांधी जी ने एक सभा को सम्बोधित किया , तत्पश्चात यहाँ के लोगों ने तिलक कोष के लिये 1035 रुपये की थैली भेंट की । गांधी जी के इस यात्रा का यहाँ के लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा और लोग असहयोग आन्दोलन में खुलकर सामने आने लगे । यहाँ महिलाओं में बाई अम्मान का महत्वपूर्ण स्थान है , जिसने गाँव - गाँव घूमकर महिलाओं में जागृति लाने का कार्य किया । अब तक असहयोग आन्दोलन अपने चर्मोत्कर्ष तक पहुंच गया था और स्वतंत्रता संग्राम के इस महायज्ञ में देश के हर कोने में पुरुषों के समान महिलाओं ने बढ़ - चढ़ कर भाग ले रही थी । भोपाल सम्भाग के खरगोन , खण्डवा , घार , झाबुआ आदि स्थानों में महिलाओं ने महिला परिषदों का गठन किया और वे शराब के दुकानों पर पिकेटिंग , जुलूस और प्रभात फेरी जैसी गतिविधियाँ संचालित करने लगीं । उज्जैन सम्भाग की महिलाओं ने तो केवल सत्याग्रह में ही भाग नहीं लिया बल्कि उन्होनें कई बार जेल की यात्राएं भी की । इस तरह मध्यप्रदेश की महिलाओं ने यह साबित कर दी कि नारी केवल लज्जाशील पनि , प्रेमिका , बेटी या बहू मात्र नहीं हैं , बल्कि अवश्यकता पड़ने पर वह रण क्षेत्र में चंडी की तरह लक्ष्य प्राप्त करना भी जानती हैं । इस बात की पुष्टि सतना के गाँव बिनेका की श्रीमती तुलसी बाई ने कर दी , जिसने असहयोग आन्दोलन में जुलूस निकालने , घरना देने , विदेशी वस्त्रों की होली जलाने और स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों की गुप्त रूप से मदद देने के कारण एक वर्ष की सजा काटी । सतना के ही दूसरी क्रांतिकारी महिला थी श्रीमती वीर कुंवर , जिसने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रियता के साथ कार्य किया । इसके अतिरिक्त श्रीमती शांति बाई पत्नि श्री सीताराम प्रसाद का नाम उल्लेखनीय है जिहोने असहयोग सत्याग्रह में सक्रिय योगदान दिया । स्वतंत्रता की इस आन्दोलन में इसी तरह सागर , दमोह , पन्ना , छतरपुर तथा टीकमगढ़ का भी योगदान रहा , किन्तु सन् 1920 के अन्दोलन के दौरान महिलाओं के नाम उन क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं हो सके ।