असहयोग आन्दोलन और मध्यप्रदेश की महिलाएँ

 असहयोग आंदोलन 

 असहयोग आन्दोलन और मध्यप्रदेश की महिलाएँ देश में घटित होने वाली अनेक सत्याग्रह के सिद्धांतों व उद्देश्यों को जन - जन तक पहुंचाने के लिये सम्पूर्ण देश का दौरा प्र घटनाओं से क्षुब्ध होकर गांधी जी ने सन् 1920 में असहयोग आन्दोलन का शंखनाद किया और किया । इसी कड़ी में गांधी जी की मध्यप्रदेश की दस यात्राएं हुई , जिसमें इन्दौर नगर का सौभाग्य रहा कि गांधी जी का यहाँ सन् 1918 में प्रथम आगमन हुआ । यद्यपि गांधी जी का इन्दौर विशुद्ध रूप से साहित्यक था , फिर भी इस समय तक गांधी जी के राजनीतिक विचारों का प्रकाश प्रारम्भ प्रदाम में आना प्रारम्भ हो गया था और उनके असहयोग , अहिन्सा व रचनात्मक कार्यक्रम सम्बंधी दृष्टिकोण • सम्पूर्ण देश में फैलने लगा था । यही वजह था कि नागपुर अधिवेशन में उनके प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए गांधी जी को देश का सर्वमान्य नेता और स्वतंत्रता आन्दोलन का कर्णचार प्रमाणित कर लिया गया । गांधीजी के असहयोग आन्दोलन कार्यक्रम के निर्णय से सम्पूर्ण देश में एक नयी लहर का संचार हुआ । गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रमों का प्रस्ताव बनाया और देश वासियों से आव्हान भी किया कि इस अहिंसात्मक आन्दोलन को तब तक चलाया जाए जब तक कि स्वराज्य प्राप्त न हो जाये । परिणाम स्वरूप देश की जनता की ओर से भी भरपूर सहयोग मिला और देश के कोने - कोने में शांत जुलुस , विदेशी वस्त्रों की होली जलाना , सूत कातना , शराब की दुकानों में पिकेटिंग करना , सरकारी स्कूल व कॉलेज के बहिष्कार आदि के कार्यक्रमों की शुरुआत होने लगी । मध्यप्रदेश के सभी वर्गों के लोगों ने जहाँ इस आन्दोलन में बढ़ - चढ़कर भाग लिया , वहीं यहाँ की महिलाओं ने भी घर की चहार दिवारी से बाहर निकलकर गांधीजी के साथ हो चल और असहयोग सत्याग्रह में शामिल हो गई । इसी श्रृंखला में गांधीजी का रायपुर आगमन हुआ और वहाँ उन्होंने महिलाओं की एक सभा को सम्बोधित किया । जिसमें गांधी जी ने महिलाओं से तिलक स्वराज्य कोष में धन राशि जमा करने की अपील की । परिणाम स्वरुप महिलाओं ने लगभग के दो हजार रुपये मूल्य के सोने , चाँदी के गहने एकत्रित कर बापू के चरणों में अर्पित किये । रायपुर में गांधी जी के भाषण का इतना प्रभाव पड़ा कि महिलाओं ने गाँव - गाँव जाकर असहयोग आन्दोलन का प्रचार करने लगीं । इससे यहाँ असहयोग आन्दोलन तीव्रतर होती चली गई और एक ओर तो जहाँ महिलाओं ने अंग्रेजी कानूनों का उल्लंघन कर वस्त्रों की होली जलायी , तो दूसरी ओर विद्यार्थियों द्वारा सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार किया और अनेक लोगों ने उपाधियों की तिलांजली दे दी । असहयोग आन्दोलन में यद्यपि रायपुर की अनेक महिलाओं ने भाग लेकर , जुलूस निकालकर , धरने व प्रदर्शन कर गिरफ्तारियाँ दीं जिनमें श्रीमती भागीरथी तथा श्रीमती रुकमणि बाई का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है । श्रीमती भागीरथी बाई स्वतंत्रता के इस आन्दोलन में भूमिगत रहकर कार्य करते हुए अंग्रेजी शासन की प्रताड़ना की शिकार होती रहीं । वहीं श्रीमती रुकमणी बाई का योगदान भी कुछ कम नहीं था । श्रीमती रुकमणी बाई ने इस आन्दोलन में अपना सहयोग देते हुए अनेक जुलूसों का नेतृत्व किया , शराब के दुकानों पर घरने दिये , जिससे अंग्रेजों द्वारा यह गिरफ्तार कर ली गई और उन्हें एक वर्ष की कठोर कारावास की सजा दी गई । जेल से रिहा होने के बाद वह राष्ट्रीय आन्दोलन में पुनः सक्रिय हो गई । इसी दौरान रायपुर जिले की प्रथम महिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ .  राधा बाई ने जिले में नागरिक जागरण के कार्य में संलग्न हो गई थी । महात्मा गांधी अपनी मध्यप्रदेश यात्राओं के दौरान रायपुर के बाद धमतरी और कद भी गये , वहाँ के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया । अपने भाषण के दौरान वहाँ गांधी जी ने का था कि " देश की उन्नति तभी सम्भव है जब इस देश की महिलाएं जागृत होंगी । " इस यात्रा के दौरान महात्मा गांधी जी को यहाँ की महिलाओं ने तिलक स्वराज्य फंड के लिये है शक्ति रुपये - पैसे व जेवर अर्पित किये । पया तत्पश्चात महात्मा गांधी जी का अगला पड़ाव छिंदवाड़ा में हुआ । यहाँ की महिलाओं ने गांधी जी के भाषण का रसास्वादन किया और तिलक स्वराज्य फंड हेतु आमूषण व रुपये की थैली भेंट की । नागपुर कंग्रेस अधिवेशन के बाद महात्मा गांधी जी माता कस्तूरवा , भगवानदीन , अर्जुन सेठी का सिवनी में आगमन हुआ , जहाँ ब्रिटिश सरकार और उनके अत्याचारी नीतियों के विरुद्ध भाषण देने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लि गया । जिसका सिवनी के जनता पर विपरीत प्रभाव पड़ा और यहाँ के छात्रों व महिलाओं ने काले झंडे लेकर प्रदर्शन जुलूस निकाले । इसके बाद गांधीजी जबलपुर पहुचें । यहाँ गांधी जी के दर्शन करने व उनके भाषण सुनने वाली महिलाओं की अपार समूह एकत्रित हुई थी । सभा में जब गांधी जी ने तिलक स्वराज्य फंड के लिये महिलाओं से उनके में गहने मांगे तब उन्हें काफी मात्रा में गहने मिले । जबलपुर की इस यात्रा में गांधी जी को लगभग बीस हजार रुपये की दान राशि प्राप्त हुई । महात्मा गांधी के आगमन के पश्चात यहाँ असहयोग कार्यक्रम अपने पूरे जोश पर आ चुका था । इन क्षेत्रों में जहाँ पुरुष व छात्र वर्ग का उल्लेखनीय योगदान रहा है , वहीं इस क्षेत्र की महिलाओं ने भी इतिहास को अपने से रिक्त नहीं रहने दिया । स्व . श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान ने असहयोग आन्दोलन में भले ही प्रत्यक्ष भाग नहीं लिया था , किन्तु अपनी ओजस्वी कविताओं के माध्यम से राष्ट्रीयता की भावना को जागृत करने में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया । " खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी " की कवियित्री श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान की इस कविता ने महिलाओं में एक नयी चेतना का विकास भी किया था । श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान के अतिरिक्त श्रीमती गुजरिया बाई एवं श्रीमती तुलसा बाई के नाम भी इस क्षेत्र में उल्लेखनीय है । श्रीमती गुजरिया बाई का जन्म सन् 1894 में सतना के मरजूबा नामक ग्राम में हुआ था । आपके पिता का नाम श्री बाबादीन उमराव घा तथा आपकी शिक्षा प्राथमिक तक भी पूरी नहीं हो सकी थी । किन्तु आपकी रुचि स्वतंत्रता के कार्यों में बहुत अधिक थी । मध्यप्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सैनिक जबलपुर सम्भाग के अनुसार तो श्रीमती गुजरिया बाई एवं श्रीमती तुलसा बाई जी ने केवल भारत छोड़ो आन्दोलन में ही भाग लिया था किन्तु प्राप्त जानकारियों से जो नयी जानकारी सामने आई उसके अनुसार इन दोनों  ही महिलाओं ने असहयोग आन्दोलन में भी अपना योगदान दिया और सप्त सूत्रीय कार्यक्रम के अनुसार शराब की दुकानों पर धरने दिये , विदेशी वस्त्रों की होती जलायी और पुलिस की लाठियाँ भी खाईं । श्रीमती तुलसा बाई दुबे , गांधी गंज कटनी की निवासी थी तथा इनका जन्म सन् 1890 में हुआ था एवं इनके पति रामकृष्ण दुबे थे , जिन्होंने श्रीमती तुलसा बाई को आन्दोलनों में भाग लेने में योगदान दिया । सन् 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स का भारत आगमन हुआ , तब सम्पूर्ण भारत में उत्तेजना को लहर फैल गई और देश के कोने - कोने में इसके विरोध में प्रदर्शनों का दौर शुरू हुआ । खंडवा में इसकी प्रतिक्रिया में महिलाओं ने एक विशाल जुलूस का आयोजन किया । जिसमें पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया । इसी दौरान गांधी जी की भोपाल यात्रा हुई । भोपाल में गांधी जी ने एक सभा को सम्बोधित किया , तत्पश्चात यहाँ के लोगों ने तिलक कोष के लिये 1035 रुपये की थैली भेंट की । गांधी जी के इस यात्रा का यहाँ के लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा और लोग असहयोग आन्दोलन में खुलकर सामने आने लगे । यहाँ महिलाओं में बाई अम्मान का महत्वपूर्ण स्थान है , जिसने गाँव - गाँव घूमकर महिलाओं में जागृति लाने का कार्य किया । अब तक असहयोग आन्दोलन अपने चर्मोत्कर्ष तक पहुंच गया था और स्वतंत्रता संग्राम के इस महायज्ञ में देश के हर कोने में पुरुषों के समान महिलाओं ने बढ़ - चढ़ कर भाग ले रही थी । भोपाल सम्भाग के खरगोन , खण्डवा , घार , झाबुआ आदि स्थानों में महिलाओं ने महिला परिषदों का गठन किया और वे शराब के दुकानों पर पिकेटिंग , जुलूस और प्रभात फेरी जैसी गतिविधियाँ संचालित करने लगीं । उज्जैन सम्भाग की महिलाओं ने तो केवल सत्याग्रह में ही भाग नहीं लिया बल्कि उन्होनें कई बार जेल की यात्राएं भी की । इस तरह मध्यप्रदेश की महिलाओं ने यह साबित कर दी कि नारी केवल लज्जाशील पनि , प्रेमिका , बेटी या बहू मात्र नहीं हैं , बल्कि अवश्यकता पड़ने पर वह रण क्षेत्र में चंडी की तरह लक्ष्य प्राप्त करना भी जानती हैं । इस बात की पुष्टि सतना के गाँव बिनेका की श्रीमती तुलसी बाई ने कर दी , जिसने असहयोग आन्दोलन में जुलूस निकालने , घरना देने , विदेशी वस्त्रों की होली जलाने और स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों की गुप्त रूप से मदद देने के कारण एक वर्ष की सजा काटी । सतना के ही दूसरी क्रांतिकारी महिला थी श्रीमती वीर कुंवर , जिसने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रियता के साथ कार्य किया । इसके अतिरिक्त श्रीमती शांति बाई पत्नि श्री सीताराम प्रसाद का नाम उल्लेखनीय है जिहोने असहयोग सत्याग्रह में सक्रिय योगदान दिया । स्वतंत्रता की इस आन्दोलन में इसी तरह सागर , दमोह , पन्ना , छतरपुर तथा टीकमगढ़ का भी योगदान रहा , किन्तु सन् 1920 के अन्दोलन के दौरान महिलाओं के नाम उन क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं हो सके ।