विशिष्ट बालकों हेतु विभिन्न मूल्यांकन तकनीक एवं प्रविधियों का वर्णन कीजिये । - विशिष्ट बालकों हेतु विभिन्न मूल्यांकन - तकनीक एवं प्रविधियाँ ( Different Procedures and Techniques for Exceptional Children )
मूल्यांकन का उद्देश्य वालक के सभी क्षेत्रों की ( ज्ञानात्मक , भावात्मक तथा क्रियात्मक पक्ष ) की जानकारी प्राप्त करना है । इसके लिए इस प्रक्रिया में विभिन्न विधियों को प्रयुक्त किया जाता है । विशिष्ट बालकों के लिए मूल्यांकन की प्रमुख विधियाँ इस प्रकार हैं
( 1 ) निरीक्षण ( Observation )
( 2 ) रेटिंग स्केल ( Rating Scale )
( 3 ) मौखिक परीक्षण ( Oral Tests )
( 4 ) लिखित परीक्षण ( Written Tests )
( 1 ) निरीक्षण - इस विधि से बालक की बौद्धिक क्षमता का पता लगाया जाता है । वे अपने जीवन में आने वाली समस्याओं का निराकरण कर सकते हैं अथवा नहीं । निरीक्षण उसकी सूचनाओं से यह ज्ञात करता है कि बालक किसी भी परिस्थिति से सामना करने को तैयार है । इसके लिए वह ( शिक्षक ) वृत्तांत अभिलेख , निर्धारण मापनी , समाजमित्ती आदि विधियों का उपयोग कर सकता है । इस विधि को प्रारम्भिक स्तर पर प्रयुक्त करने पर यह प्रभावशाली बन जाती है । अतः यह प्राथमिक स्तर पर बहुत उपयोगी है ।
( 2 ) रेटिंग स्केल - बालक में कितना उन्नयन हुआ है वह अपने समाज , देश की समस्याओं के विषय में कितना जानता है । यह ज्ञात करने के लिए रेटिंग स्केल प्रविधि को प्रयुक्त किया जाता है । बालक किसी भी वस्तु में गुण - दोषों का विश्लेषण ( मूल्यांकन करने में समर्थ हुआ कि नहीं , उसने किन कौशलों को विकसित किया है , यह ज्ञात करने में रेटिंग स्केल प्रविधियाँ महत्वपूर्ण है । इसमें बालक के चिन्तन स्तर को परखा जाता है । अतः यह प्राथमिक स्तर के बालकों के लिए प्रयुक्त नहीं की जा सकती है । इसका प्रयोग उच्च स्तर पर ही किया जाता है ।
( 3 ) मौखिक परीक्षा - शिक्षण को बालक ने कहाँ तक ग्रहण किया है यह ज्ञात करने के लिए उसकी मौखिक जाँच की जाती है । इसमें शिक्षक विषय सम्मत प्रश्न पूछ सकता है । स्पष्टीकरण करवा सकता है । इसमें उसके चिन्तन मनन करनेकी शक्ति को देखना तथा विकसित करना होता है । यह विधि मूल्यांकन की श्रेष्ठ विधि है । बालक के ऊपर शिक्षक का शिक्षण का क्या असर हुआ और नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ यह ज्ञात किया जाता है । बालक मौखिक रूप से ही अपना परिवर्तन प्रदर्शित करता है ।
( 4 ) लिखित परीक्षा - इस प्रविधि में बालक की उच्च चिन्तन शक्ति , कल्पना शक्ति , स्मरण शइक्त को ज्ञात किया जाता है । इसको दो पक्षों में प्रयुक्त कर सकते हैं-
( 1 ) निबन्धात्मक
( 2 ) वस्तुनिष्ठ ।
निबन्धात्मक परीक्षा में बालक को विषय वस्तु पर विश्लेषण करने सम्बन्धी प्रश्न दिये जाते हैं । इन प्रश्नों में क्या तात्पर्य , अभिप्राय , आशय आदि आते हैं । इसमें बालक को अपनी ओर से ही नूतन शब्दों का निर्माण करके उक्त तथ्य का विश्लेषण करना पड़ता है । शिक्षक उसके आलेख को पढ़कर उसका मूल्यांकन करता है । वस्तुनिष्ठ में बालक की स्मरण शक्ति पर बल दिया जाता है । इसमें एक प्रश्न के बहुविकल्प होते हैं जिनमें बालक को प्रकृति पर आधारित सही उत्तर छाँटना होता है । इस प्रकार की परीक्षाओं में विश्वसनीयता और वैधता पाई जाती है । दोनों ही परीक्षाओं के माध्यम से बालक के तर्क पक्ष , चिन्तन पक्ष , स्मृति पक्ष का मूल्यांकन किया जाता है । अत : दोनों ही विधियाँ उपयुक्त हैं । मनोविज्ञान ने मूल्यांकन की उपयुक्त प्रविधियों को अनेक विधियों में विभक्त कर दिया है । इससे बालक का कोई ऐसा पक्ष शेष नहीं रहता जो उसके जीवन से सम्बन्धित हो और जिसका मूल्यांकन नहीं हो । अतः शिक्षा मनोविज्ञान ने उपर्युक्त प्रविधियों को निम्नलिखित विधियों में विस्तार दिया है तथा नामों में भी परिवर्तन किया है ।
( i ) प्रमापीकृत प्रविधियाँ- इस विधि में मनोवैज्ञानिक परीक्षण होता है । बालक की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर परीक्षण किया जाता है । इस प्रकार के परीक्षणों में परीक्षण का अंकन महत्वपूर्ण होता है । बालक का स्थान अंकों के आधार पर निर्धारित किया जाता है । अतः इस विधि में अनेक मनोवैज्ञानिकों का सहयोग है और उन्होंने इस विधि के अन्तर्गत निम्नलिखित परीक्षणों को सम्मिलित किया है ।
( 1 ) बुद्धि परीक्षण ,
( 2 ) व्यक्तित्व परीक्षण ,
( 3 ) अभियोग्यता परीक्षण ,
( 4 ) अभिरुचि परीक्षण , तथा
( 5 ) निष्पत्ति प्रत्यय परीक्षण । उपर्युक्त बुद्धि , व्यक्तित्व , अभिरुचि , अभियोग्यता , निष्पत्ति आदि सभी पक्षों पर प्रयोग करके उनकी विशेषताएँ , नियम , सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है ।
( ii ) अप्रमापीकृत प्रविधियाँ - अप्रमापीकृत प्रविधियाँ छात्र तथा अध्यापकनिष्ठ होती है । छात्र केन्द्र विन्दु होता है । इसके अन्तर्गत निम्नलिखित विधियाँ हैं
( 1 ) संचयी आलेख ,
( 2 ) साक्षात्कार ,
( 3 ) समाजमिति ,
( 4 ) प्रश्नावली ,
( 5 ) प्रक्षेपण प्रविधियाँ ,
( 6 ) प्रगति प्रतिवेदन ,
( 7 ) आत्मकथन ,
( 8 ) निर्धारण मान ।