पिछड़े बालक से आप क्या समझते हैं ? इनकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं ? आप इनकी शैक्षिक व्यवस्था किस प्रकार से करेंगे ?
What do you understand by Back ward Children ? What are their child characteristics ? What educational Provisions would you make for such children ?
पिछड़े बालक का अर्थ ( Its Meaning ) . विशिष्ट बालकों ( Exceptional Children ) में एक वर्ग पिछड़े बालकों . ( Backward Children ) का भी होता हैं । वे पिछड़े बालक कौन होते हैं ? इनसे क्या अभिप्राय है ? इसे स्पष्ट करने के लिये निम्नलिखित परिभाषायें दी गई हैं
बर्ट ( Burt ) के अनुसार , “ पिछड़ा हुआ बालक वह है जो स्कूल के जीवन के मध्य में अपनी आयु स्तर की कक्षा से एक नीचे की कक्षा का कार्य करने में असमर्थ हो ।
”शौनल ( Schonell ) के अनुसार , " पिछड़ा हुआ बालक वह है जो अपनी आयु के अन्य बालकों की तुलना में अत्यधिक शैक्षणिक दुर्बलता का परिचय देता है ।
" बर्टन हाल ( Burton Hall ) के अनुसार , " सामान्यत : पिछड़ेपन का प्रयोग न बालकों के लिये होता है जिनकी शैक्षणिक उपलब्धि उनकी स्वाभाविक योग्यताओं के स्तर से कम
टी.के.ए. मेनन ( T.K.A.Menon ) के अनुसार , " भारतीय परिस्थिति में पिछड़ा बालक वो है जो अपनी कक्षा की औसत आयु से एक वर्ष से अधिक बड़ा हो । " बालक जिनकी 85 पिछड़े बालकों को शैक्षणिक उपलब्धि ( Educational Quotient ) या शिक्षा अंक के आधार पर परिभाषित किया गया हैं ।
बर्ट ( Burt ) के अनुसार से कम शैक्षणिक उपलब्धि ( E.Q. ) या शिक्षा अंक होता है वे पिछड़े बालक होते हैं । शैक्षणिक - लब्धि ( E.Q. ) का अर्थ है कि विद्यार्थियों का स्कूली - विषयों का ज्ञान उनकी आयु के स्तर के अनुसार है या नहीं । शैक्षणिक - लब्धि ( Educational Quotient ) को जानने का सूत्र निम्नलिखित है E.A. E.Q. = x 100 C.A. जहाँ , E.Q. = Educational Quotient ( शैक्षणिक लब्धि ) E.A. = Educational Age , i.e. ( शैक्षणिक आयु ) C.A. = क्रमानुसार या वास्तविक आयु ( Chronological Age ) शिक्षालव्धि या शिक्षा अंक ( E.Q. ) मालूम करने का उदाहरण इस प्रकार है । मान लीजिए एक बालक की क्रमानुसार या वास्तविक आयु ( Chronological Age ) 10 वर्ष है । उसकी गणित में मानसिक आयु 8 वर्ष के एक बालक के समान है और अन्य पढ़ाई में 6 वर्ष के समान हैं । गणित में मानसिक आयु और अन्य पढ़ाई में मानसिक आयु की औसत ( E.Q. = 826 = 7 ) = 7 7 वर्ष आती है तो शिक्षा - लब्धि शिक्षा - लब्धि = x100 E.A. C.A. Education Attainment . Chronological Age 7 x 100 = 70 अतः उस बालक की शिक्षा - लब्धि 70 हुई । अतः यह बालक पिछड़े बालकों की श्रेणी में रखा जायेगा । पिछड़े वालक शहरों की अपेक्षा गाँवों में अधिक पाये जाते हैं । शहरों में शिक्षा के साधन अधिक होने के कारण और सामाजिक जागरूकता के कारण ही ऐसा होता हैं । इसके लिये उत्तरदायी अन्य कारण भी हो सकता हैं , जैसे - कम बुद्धि - लब्धि ( Low Intelligence Quotient ) , वातावरण का प्रभाव ( Environmental Effects ) , शारीरिक दोष ( Physical Defects ) , स्कूल से भागना ( Truancy ) आदि । संक्षेप में , पिछड़ा हुआ बालक वह है जो अपनी ही आयु वर्ग के विद्यार्थियों की तुलना में शैक्षणिक दुर्बलता का प्रदर्शन करता हो । इस वर्ग के विद्यार्थियों की अपनी ही विशेषतायेंहोती हैं । इस समस्या पर नियन्त्रण पाने के लिये उनकी विशेषताओं का अध्ययन करना भी आवश्यक हैं । इसके अतिरिक्त बालकों के इस पिछड़ेपन के विभिन्न कारणों को जानना भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कारणों को जाने बिना इनके लिये शिक्षा के विशेष उपाय करना कठिन होगा ।
पिछड़े बालकों के विशेषतायें और कारण निम्नलिखित हैं पिछड़े बालकों की विशेषतायें ( Characteristics of Backward Children )
पिछड़े बालकों की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित हैं
( 1 ) पिछड़े हुए बालक मन्द गति से सीखते हैं । इनकी तुलना में सामान्य बालकों का अधिगम तीव्र और शीघ्र होता है । इस दोष के कारण बालक सामान्य बालकों के साथ समायोजन नहीं कर पाते । उनके साथ कार्य करने में पिछड़े बालक असुविधा महसूस करते हैं ।
( 2 ) अपनी उम्र के वर्ग के बच्चों की तुलनी में शैक्षिक क्षेत्र में ये बालक काफी पिछड़े हुए होते हैं । यही कारण होता है कि ऐसे बालक एक ही कक्षा में कई - कई साल लगा देते हैं । शिक्षा के क्षेत्र में इस दोष को प्रवाह - विहीन ( Stagnation ) कहा जाता है । इस प्रवाह विहीनता के पिछड़ेपन के अतिरिक्त और भी बहुत कारण हो सकते हैं ।
( 3 ) पिछड़ेपन और बुद्धि - लब्धि में सम्बन्ध होना आवश्यक नहीं । क्योंकि पिछड़े हुए बालकों के अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहीं भी बुद्धि - लब्धि शब्द का प्रयोग नहीं होता , केवल शैक्षणिक लब्धि ( E.Q. ) का प्रयोग होता हैं । पिछड़ेपन में बुद्धि - लब्धि का कोई स्तर निश्चित नहीं होता जिसके आधार पर पिछड़े वालकों का वर्गीकरण किया जा सके ।
( 4 ) पिछड़े हुए बालकों की शैक्षणिक उपलब्धि उसकी योग्यताओं को देखते हुए बहुत कम प्रतीत होती हैं । जितना कुछ वह प्राप्त करने की क्षमता रखता है उतना वह प्राप्त नहीं कर पाता । शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ बालक पूर्णतया असफल रहता हैं ।
( 5 ) पिछड़े वालक केवल शिक्षा के क्षेत्र में ही अपनी आयु वर्ग के बालकों से निम्न कोटि के नहीं होते बल्कि ऐसे बालक अपनी आयु वर्ग के वालकों से कम आयु के बालकों के साथ भी कार्य करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं या कठिनाई महसूस करते हैं ।
( 6 ) इन बालकों की I.Q.75-90 के वीच होती हैं ।
( 7 ) ऐसे बालकों के लिये विशेष कक्षाओं की व्यवस्था करनी होती हैं ।
( 8 ) इन बालकों का ध्यान एवं रुचि थोड़े समय तक ही बनी रहती हैं ।
( 9 ) ये बालक अधिक समय तक अपनी एकाग्रता को कायम नहीं रख सकते ।
( 10 ) ये बालक शैक्षणिक ( Academic ) तथा सामाजिक कार्य - कलापों में भाग लेने के लिये अपने आप को समर्थ नहीं मानते ।
( 11 ) किसी भी समस्या में उलझ कर रह पाते हैं ।
( 12 ) किसी समस्या पर सूक्ष्म रूप में ( Abstractly ) विचार नहीं कर सकते ।
( 13 ) ये बालक स्वतन्त्र रूप से ( Independently ) कार्य करना अच्छा समझते हैं ।
( 14 ) ये बालक निर्देशों ( directions ) का खुशी से पालन करते हैं ।
( 15 ) इनमें साधारण - सी बातों या नियमों को समझने की भी क्षमता नहीं होती .
( 16 ) ये वालक असामाजिक एवं अपराध क्रियाओं में लिप्त रहते हैं ।
( 17 ) ये बालक वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते ।
( 18 ) उपेक्षित महसूस करने पर हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं ।
( 19 ) अपनी आलोचना सहन नहीं कर पाते ।
( 21 ) इनकी तर्क एवं विवेक शक्ति निम्न स्तर की होती हैं ।
( 20 ) ये अन्तर्मुखी ( Introvert ) होते है तथा इनके मित्रों की संख्या सीमित होती हैं ।
( 22 ) समाज तथा स्वयं के प्रति यथार्थ दृष्टिकोण नहीं अपनाते ।
( 23 ) ये शीघ्र निर्णय नहीं ले पाते हैं ।
( 24 ) दूरदर्शिता की कमी ( Lack of foresightedness ) होती हैं ।
( 25 ) इनमें असन्तोष की भावना शीघ्र ही प्रबल हो जाती है ।
( 26 ) शीघ्रता एवं शुद्धता से कार्य करने की क्षमता निम्न स्तर की होती हैं ।
( 27 ) निराशावादी होते हैं ( Passimist ) ।
( 28 ) अध्यापक के स्नेह एवं सहानुभूति की लालसा रखते हैं ।
पिछड़ेपन के कारण ( Causes of Backwardness ) पिछड़े बालकों के पिछड़ेपन के कई कारण हो सकते हैं जिनका वर्णन निम्न प्रकार से है
( 1 ) शारीरिक कारण ( Physical Causes )
( 2 ) मानसिक या वौद्धिक कारण ( Mental Causes )
( 3 ) वातावरण सम्बन्धी कारण ( Environmental Causes )
( 4 ) सामाजिक और सांस्कृतिक कारण ( Social and Cultural Causes )
( 5 ) अन्य कारण ( Other Causes )
1. शारीरिक कारण ( Physical Causes ) पिछड़ेपन का एक कारण वालक के शारीरिक दोषों का होना हो सकता हैं । इन शारीरिक दोषों के कारण वे पढ़ाई की ओर ध्यान नहीं दे पाते । इन शारीरिक दोषों में निम्नलिखित प्रमुख ( 1 ) ज्ञानेन्द्रियों में दोष ( Defects in Sense organs ) ( 2 ) बोलने में दोष ( Defective Speech ) ( 3 ) मस्तिष्क पर चोट ( Brain Injury ) ( 4 ) ग्रन्थियों का दोषपूर्ण कार्य ( Defective Working of Glands ) ( 5 ) कमजोर स्वास्थ्य ( Weak Health )
2. मानसिक कारण ( Mental Causes ) - वैसे कम बुद्धि - लुब्धि ( I.Q. ) पिछड़ेपन का कारण नहीं होती , लेकिन कई बार बहुत कम बुद्धि वाले व्यक्ति सामान्य बालकों की तुलना में बहुत पिछड़ जाते हैं । मानसिक कारणों से बुद्धि की कमी और अभिरुचि की कमी हो जाती हैं । वर्ट ( Burt ) के अनुसार कम बुद्धि ही पिछड़ेपन का एकमात्र कारण हो सकती हैं । व्यावहारिक रूप से भी यही बात अधिक उचित लगती हैं ।
3. वातावरण सम्बन्धी कारण ( Environmental Causes ) - पिछड़ेपन के लिये वातावरण का योगदान भी किसी से कम नहीं रहता । बालक के समायोजन में वातावरण ही अधिक महत्वपूर्ण होता हैं । निम्नलिखित प्रकार का वातावरण पिछड़ेपन के लिये उत्तरदायी होता हैं ।
( i ) पारिवारिक वातावरण ( Family Environment ) - विकसित परिवार का वातावरण बालक को पिछड़ेपन से पहले ही थाम लेता हैं । घर में सभी सदस्य शिक्षित होने से बालकों की समस्याओं और आवश्यकताओं को भली - भाँति समझते हैं । घर में यदि बालकों की आवश्यकताओं और रुचियों का पूर्ण ध्यान रखा जाये तो बालकों के पिछड़ेपन को नियन्त्रितकिया जा सकता है । परिवार की आर्थिक स्थिति , घरेलू झगड़े , माता - पिता का अशिक्षित होना व माता - पिता का अनैतिक प्रवृत्ति का होना बालकों के पिछड़ेपन के लिए काफी होता है ।
( ii ) स्कूल का वातावरण ( School Environment ) - स्कूल की परिस्थितियों बालक के पिछड़ेपन को बढ़ा देती हैं । स्कूल की दोषपूर्ण परिस्थितियों की रचना निम्नलिखित कारणों से होती है ( 1 ) स्कूल में दोषपूर्ण पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियों का प्रयोग । ( 2 ) अध्यापकों का विद्यार्थियों के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया ( 3 ) अध्यापकों और विद्यार्थियों के सम्बन्धों में तनाव । ( 4 ) स्कूलों में अनुशासनहीनता । ( 5 ) विद्यार्थियों को स्कूल की गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरणा में कमी ( 6 ) स्कूलों में सहगामी क्रियाओं का अभाव । ( 7 ) विद्यार्थियों के प्रति अध्यापकों की लापरवाही का प्रदर्शन ।. ( 8 ) अयोग्य अध्यापकों की नियुक्ति । ( 9 ) शैक्षणिक निर्देशन की कमी । ( 10 ) स्कूल में अनुपस्थित रहना ।
4. सामाजिक और सांस्कृतिक कारण ( Social and Cultural Causes ) - बालक घर या स्कूल में ही बन्द होकर नहीं रहता । वह समाज में रहकर समाज का भी हिस्सा बनता है । अतः सामाजिक प्रभाव उसके विकास पर स्वाभाविक है । परिवार के रीति - रिवाज आदि बालक के विकास को प्रभावित करते हैं । बालक के पिछड़ेपन में यह बात बहुत महत्व रखती है कि वह समाज के किस वर्ग का सदस्य है और समाज के किन वर्गों के साथ उसका सम्बन्ध है । सामाजिक - सम्पर्कों की श्रेष्ठता बालक के विकास को प्रभावित करती है । उदाहरणार्थ , छोटे - छोटे उद्योगों वाले माता - पिता ( धोबी , कुम्हार , बढ़ई आदि ) बालकों की शिक्षा के महत्व को न समझते हुए ही उनकी शिक्षा के लिये गम्भीर नहीं होते । माता - पिता की इस अरुचि के परिणामस्वरूप वालक को स्कूली जीवन में किसी प्रकार का आकर्षण दिखाई नहीं देता । वह स्कूल तथा कक्षा से भागने की फिकर में रहता है । यही प्रवृत्ति उसे अन्य बालकों की तुलना में पछाड़ देती है । 5. अन्य कारण ( Other Causes ) - बालकों के पिछड़ेपन के लिये अन्य बहुत से कारण हैं जो अपना प्रभाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वालकों पर डालते हैं । जैसे - आस पड़ोस , मित्र - मंडली , रेडियो , सिनेमा , टेलीविजन , समाचार - पत्र , क्लब , धार्मिक संस्थायें , पत्र पत्रिकायें आदि । कई बार इनका प्रभाव उचित पड़ता है और कई बार यही संस्थायें बालकों को सही रास्ते से भटका देती हैं । पिछड़े बालकों की समस्यायें ( Problems of Backward Children ) पिछड़े बालकों की भी अपनी कई प्रकार की समस्याएं होती हैं जिनका सामना अध्यापक को कक्षा में करना पड़ सकता है ।
इन समस्याओं का वर्णन नीचे दिया गया है
1. स्कूली सम्बन्धी समस्याएँ ( Problems Related to School ) - पिछड़े हुए बालक सीखने में मन्द होते हैं । अतः वे सारी कक्षा के बच्चों के सीखने की गति के साथ नहीं चल सकते । सामान्य बच्चों को उनके साथ कार्य करने में असुविधा होती है । उसमें वे असफल रहते हैं । शैक्षिक दृष्टि से जो उपलब्धि हो सकती है उसमें वे असफल रहते हैं । अपनी आयु के बच्चों से वे पढ़ाई के मामले में काफी पीछे रह जाते हैं । कई बार तो ये अपने से कम आयु के विद्यार्थियों के साथ भी कार्य नहीं कर सकते हैं । परिणामस्वरूप वे भिन्न भिन्न परीक्षाओं में सफल नहीं हो पाते । इसी कारण स्कूलों में प्रवाह - हीनता ( Stagnation ) आती है । इस प्रकार के वातावरण में पिछड़े बालक स्वयं को समायोजित महसूस नहीं करते ।
2. सामाजिक समस्यायें ( Social Problems ) - पिछड़े हुए बालकों में होन ग्रन्थियों ( Inferiority Complexes ) के कारण उनकी सामाजिक - समायोजन की समस्यायें बढ़ जाती हैं । वे समाज में स्वयं को ढाल नहीं सकते । समाज से परे रहते हैं । उनके मित्र या दोस्त भी कम होते हैं । कई बार तो वे समाज - विरोधी तत्वों से मिलकर समाज विरोधी व्यवहार करने लगते हैं । समाज विरोधी कार्य करने वालों और अपराध प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों की पृष्ठभूमि में उनका पिछड़ापन ही छुपा होता है । पिछड़े वालकों को समाज के . अनुरूप लिए एक चुनौती हो सकती है । सामाजिक वातावरण को सुधारने का उत्तरदायित्व भी अध्यापक पर ही रहता है ताकि पिछड़े हुए वालक समाज में उचित प्रकार से स्थापित होकर समाज के लिए लाभकारी सिद्ध हों । ढालने की समस्या अध्यापक ।
3. संवेगात्मक समस्यायें ( Emotional Problems ) - पिछड़े हुए वालकों में होन ग्रन्थियों के कारण हीन भावना घर कर जाती है । शैक्षिक और सामाजिक वातावरण में असफलताओं का मुँह देखते रहने से उनका जीवन निराशा का शिकार हो जाता है । उन्हें कई बार अपमान सहना पड़ता है । संवेगात्मक अस्थिरता आनी आरम्भ हो जाती है और यह स्थिति यदि जारी रहती है तो उनका संवेगात्मक संतुलन बिगड़ जाता है । परिणामस्वरूप और कई तरह की समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं । उनका मन किसी भी कार्य में नहीं टिकता । ऐसे वातावरण में बालक सभी की दृष्टि में गिर जाता है और उसे स्नेह व प्यार नहीं मिलता । परिणामस्वरूप उसमें असुरक्षा की भावना जागृत हो जाती है । उपरोक्त समस्याओं के अध्ययन से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि पिछड़े हुए बालक कक्षा में सामान्य वालकों के साथ शैक्षिक दृष्टि से मिलकर नहीं चल सकते । प्रत्येक क्षेत्र में वे उनसे पिछड़ जाते हैं । उन्हें अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है साथ ही अध्यापक को भी सक्रिय होकर रहना पड़ता है तथा हर कदम पर इस प्रकार के बालकों की ओर व्यक्तिगत ध्यान देने की आवश्यकता रहती है । पिछड़े बालकों की शिक्षा ( Education of Backward Children ) स्टोन्स के शब्दों में— “ आजकल पिछड़ेपन के क्षेत्र में किया जाने वाला अधिकांश अनुसंधान यह सिद्ध करता है कि उचित ध्यान दिये जाने पर पिछड़े बालक शिक्षा में प्रगति कर सकते हैं । ” कक्षा में अध्यापक को पिछड़े बालकों की उपस्थिति के कारण कई प्रकार की समायोजन सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है । अतः इन समस्याओं के निवारण के लिये विशेष शिक्षा कार्यक्रमों की आवश्यकता पड़ती है । स्कूल में अध्यापक इस सम्बन्ध में क्या कर सकता है । इसका वर्णन निम्न प्रकार से किया जा सकता है
1. व्यक्तिगत ध्यान ( Individual Attention ) - पिछड़े वालकों की ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है , क्योंकि ये बालक सामान्य बालकों से पहुत पीछे रह जाते हैं । और अध्यापक द्वारा दिया गया सामूहिक निर्देशन समझ नहीं पाते । इसके अतिरिक्त इनमें हीनभावनाओं की ग्रन्थियाँ भी विकसित हो जाती हैं जिसके कारण ये बालक अध्यापक के पास जाते हुए झिझकते हैं या डरते हैं । अतः इनकी ओर दोनों व्यक्तिगत ध्यान देकर इन्हें पिछड़ेपन से मुक्ति दिलाई जा सकती है
2. हस्त उद्योग ( Handi crafts ) - पिछड़े बालक चूँकि शैक्षणिक तौर पर पीछे जाते हैं जिसकी वजह से वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाते , अत : उन्हें हस्त उद्योगों का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये । इससे उनमें आत्मविश्वास जागेगा और स्कूल की शिक्षा पूरी करने के पश्चात् वे किसी व्यवसाय को शुरू करके स्वयं को स्थापित कर सकते हैं और अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं ।
3. पिछड़ेपन के कारणों की खोज करना ( Search of Causes Responsible for Backwardness ) पिछड़ेपन की रोकथाम करने से पहले इसके लिये उत्तरदायी कारणों का पता लगाया जाना अति आवश्यक है । पिछड़ेपन की जांच हम वुद्धि - परीक्षणों द्वारा उपलब्धि परीक्षणों द्वारा विशिष्ट योग्यताओं का मूल्यांकन , बालक की शारीरिक क्षमताओं और कुशलताओं की जांच द्वारा वालक के शैक्षणिक इतिहास ( Educational History ) के अध्ययन द्वारा बालक के परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के अध्ययन द्वारा कर सकते हैं । इनकी जाँच करने के वाद ही पिछड़ेपन के कारणों को निर्धारित किया जा सकता है और तभी शिक्षा की योजना को कोई निश्चित स्वरूप प्रदान किया जा सकता है ।
4. घर और स्कूल में बालकों को समायोजित करने में सहायता ( Help to adjust in School and at Home ) -घर और स्कूल में कुसमायोजित वालकों के पुनः समायोजन में अध्यापक सहायता कर सकता है । उन्हें स्नेह , प्यार और सुरक्षा की आवश्यकता होती है जो समयानुसार पूरी की जानी चाहिये । अध्यापक उनके माता - पिता के साथ सम्पर्क स्थापित करके और उनके मानसिक तनावों को दूर करके उनका समायोजन करने में सहायक सिद्ध हो सकता है ।
5. विशेष स्कूलों या कक्षाओं की व्यवस्था ( Provision for Special School or Special Classes ) - पिछड़े वालकों की शिक्षा के लिये विशेष स्कूलों या विशेष कक्षाओं की व्यवस्था से भी इस समस्या पर नियन्त्रण पाया जा सकता है । इन बालकों को सामान्य बालकों से अलग कर दिया जाय तो अध्यापक इनकी ओर विशेष ध्यान दे सकता है । लेकिन इस सुझाव की आलोचना भी की गई है । विद्वानों के अनुसार यह कदम मनोवैज्ञानिक नहीं होगा । इससे पिछड़े बालकों को सामान्य या प्रतिभाशाली बालकों से कुछ सीखने या उनका अनुसरण करने का अवसर कभी नहीं मिल पायेगा । उन्हें अलग करके उन्हें इस बात का बार बार अहसास होता रहेगा कि वे पिछड़े हुए वालक हैं और उनमें हीन भावना विकसित हो जायेगी । पिछड़े वालकों को सामान्य या प्रतिभावान बालकों के सम्पर्क में अवश्य रखना चाहिये ।
6. विशिष्ट पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ ( Special Curriculum and Special Teaching Methods ) - पिछड़े बालकों की शिक्षा के लिये सामान्य पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ सफल नहीं हो सकतीं । इनके लिये विशेष प्रकार का पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियाँ प्रयोग की जानी चाहिये । इनकी विशेष शिक्षा के लिये विशेष प्रकार के प्रशिक्षित अध्यापकों की नियुक्ति की जानी चाहिये । पुस्तकीय ज्ञान की अपेक्षा हस्त - कार्यों पर अधिक बल दिया जाना चाहिये ।
7. स्कूल से भागने की प्रवृत्ति को रोकना ( Checking of Truancy ) — पिछड़े बालक प्राय : स्कूल से भागने की प्रवृत्ति के शिकार हो जाते हैं क्योंकि स्कूल में उनकी असफलताओं के कारण उनकी रुचि खत्म होनी शुरू हो जाती है । इस प्रकार की प्रवृत्ति पर नियन्त्रण करके उन्हें उचित राह पर लाने का प्रयत्न करना चाहिये ।
8. पाठ्यान्तर क्रियाओं की व्यवस्था ( Provision of Co - curricular Activi ties ) - बालकों के पिछड़ेपन पर नियन्त्रण पाने के लिए पाठ्यक्रम के अतिरिक्त अन्य पाठ्यान्तर क्रियाओं की व्यवस्था भी होनी आवश्यक है ताकि पिछड़े वालक अन्य योग्यताओं का विकास कर सकें । स्कूल वातावरण में इससे उनकी रुचि बढ़ेगी ।
9. शिक्षा मनोवैज्ञानिकों की सहायता लेना ( Help from Educational Psychologists ) – पिछड़े वालकों की शिक्षा के लिये अनुभवी शिक्षा मनोवैज्ञानिकों की सेवायें ली जा सकती हैं । ये शिक्षा मनोवैज्ञानिक वालकों और उनके माता - पिता को उचित राय देकर उन्हें पिछड़ेपन से मुक्ति दिला सकते हैं ।
10. निर्देशन सेवाओं की व्यवस्थआ ( Provision of Guidance Services ) - पिछड़े बालकों की शिक्षा के लिये स्कूलों में निर्देशन सेवाओं का संगठन बहुत लाभकारी और प्रभावपूर्ण कदम हो सकता है । स्कूलों में शैक्षिक और व्यावसायिक ( Educational and Vocational Guidance ) निर्देशन की व्यवस्था की जा सकती है । इन सेवाओं का प्रचार पिछड़े वालकों के माता - पिता तक भी किया जाना चाहिये । इन सेवाओं से वालक अपनी शैक्षिक और व्यावसायिक समस्याओं का समाधान करके सामान्य वालकों की पंक्ति में शामिल हो सकता है ।
11. वातावरण से सम्बन्धित कारकों पर नियन्त्रण ( Control of Environs mental Factors ) - बालक के सामाजिक , पारिवारिक , मानसिक , संवेगात्मक वातावरणों में आवश्यक सुधार करके भी इनके पिछड़ेपन की रोकथाम की जा सकती है , जैसे - इन बालकों के संगी - साथी , समुदाय , आस - पड़ोस , सामान्य आदतें , पढ़ाई का ढंग , माता - पिता की शिक्षा इत्यादि । उपरोक्त सुझावों को व्यवहार में लाकर अध्यापक पिछड़े हुए बालकों को उनके विकास के लिये अवसरों की रचना कर सकता है , लेकिन इस कार्य में अकेला अध्यापक अधिक कुछ नहीं कर सकता । समाज के सभी वर्गों के लोग ऐसी गम्भीर समस्या का सामना करने के लिए अध्यापक का साथ दे सकते हैं , जैसे- माता - पिता , मनोवैज्ञानिक , सामाजिक कार्यकर्ता व अन्य सरकारी वर्ग के सदस्य । -