बाल अपराध से
बाल - अपराधी बालक ( Delinquent Children ) विशिष्ट बालकों की श्रेणी में बाल - अपराधी ( Delinquents ) भी शामिल हैं । शिक्ष के क्षेत्र में बाल अपराधों का बहुत अधिक महत्व है । बाल अपराध ( Delinquency ) के सम्बन्ध बालक के व्यक्तित्व के सभी पक्षों से होता है , जैसे - सामाजिक पक्ष , संवेगात्मक पक्ष और मानसिक पक्ष । किसी भी पक्ष में समायोजन करने में यदि बालक असफल रहता है , तो वह बालक बाल अपराधी बन जाता है । अतः इस ओर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है । बाल अपराध क्या है ? ( What is Delinquency ? ) बाल अपराध ( Delinquency ) का शाब्दिक अर्थ है- सामान्य रास्ते से भटक जाना या गिर पड़ना ( To deviate or fall away from the normal path . )
होली ( Healy के अनुसार , " वह बालक जो व्यवहार में सामाजिक मापदण्ड से विचलित हो जाता है या भटक जाता है , बाल अपराधी कहलाता है ।
" सिरिल बर्ट ( Cyril Burt ) , " वह बालक वैधानिक रूप से उस समय अपराधी कहलाता है , जब उसके समाज - विरोधी कार्य इतने गम्भीर हो जाते हैं कि सरकार उन पर नियन्त्रण करने के लिए आवश्यक कार्यवाही करती है या कार्यवाही करने की आवश्यकता अनुभव करती है ।
" न्यूमेयर ( Newmeyer ) के अनुसार , “ समाज विरोधी व्यवहार के कई प्रकार जो व्यक्तिगत तथा सामाजिक विघटन उत्पन्न करें , वाल अपराध कहलाता है ।
" कोल ( Cole ) के अनुसार , " वाल अपराधी वह है जिसमें मूल प्रवृत्यात्मक प्रेरक शक्तिशाली होते हैं और चेतना निर्बल होती है । उसका अहम् तात्कालिक संतोष से शान्त होता है । वह सामान्य व्यवहार के प्रतिमानों को स्वीकार नहीं करता है ।
" हैडफील्ड ( Headfield ) के अनुसार , “ बाल अपराध का अर्थ है - असामाजिक व्यवहार ।
" वेलेन्टाइन– “ मोटेतौर पर , ' वाल अपराध ' शब्द किसी कानून के भंग किये जाने का उल्लेख करता है ।
" स्किनर - “ वाल अपराध की परिभाषा किसी कानून के उस उल्लंघन के रूप में की जाती है , जो किसी वयस्क द्वारा किये जाने पर अपराध होता है ।
" क्लॉसमियर व गुडविन- “ बाल - अपराधी वह बालक या युवक होता है , जो बार बार उन कार्यों को करता है , जो अपराधों के रूप में दण्डनीय हैं ।
" गुड- " कोई भी बालक , जिसका व्यवहार सामान्य सामाजिक व्यवहार से इतना भिन्न हो जाय कि उसे समाज - विरोधी कहा जा सके , वाल अपराधी हैं ।
" उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि बाल अपराध निर्धारित मूल्यों और मान्यताओं के विरुद्ध व्यवहार है जिसे बालक छोटी आयु में ही प्रदर्शित कर देते हैं । बाल अपराधी को आयु सीमा निर्धारित करनी कठिन है । लेकिन इस श्रेणी में अल्प - वयस्क अपराधी शामिल होते हैं । इन्हें किशोर - अपराधी भी कहते हैं । इनके कार्यों में चोरी करना , जुआ खेलना , जेव काटना , सम्पत्ति का नुकसान करना इत्यादि अपराध सम्मिलित हैं । बाल अपराध के खतरेका सामना प्रत्येक समाज को करना पड़ता है । समयानुसार यदि पग न उठाए जायें तो इस प्रकार की समस्या गम्भीर रूप धारण कर सकती है और इसके परिणामों से भी नहीं बचा जा सकता । बाल अपराध के कारण ( Causes of Delinquency ) - मनोवैज्ञानिक ( Psychologist ) बाल अपराध को संवेगात्मक द्वन्द्वों ( Emotional Conflicts ) का परिणाम मानता है । बालक अपराध करके इन द्वन्छों से मुक्ति पाना चाहता है । संवेगात्मक द्वन्द्व वातावरण से समायोजन करने में असमर्थ होने पर उत्पन्न होता है । संवेगात्मक द्वन्द्वों के अतिरिक्त और भी बहुत से कारण हैं जिनसे बाल - अपराध को प्रोत्साहन मिलता है । ये कारण बालक के पारिवारिक , विद्यालय , सामुदायिक , सामाजिक वातावरण और मनोवैज्ञानिक पृष्ठ भूमि से सम्बन्धित होते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है । •
( 1 ) वंशानुक्रम सम्बन्धीं कारण ( Hereditary Causes )
( 2 ) वातावरण सम्बन्धी कारण ( Environmental Causes )
( i ) घर का वातावरण ( Home Environment )
( ii ) स्कूल का वातावरण ( School Environment )
( iii ) समाज का वातावरण ( Social Environment )
( 3 ) शरीर रचना और शरीर विज्ञान सम्बन्धी कारण ( Constitutional and physiological Causes )
( ) मनोवैज्ञानिक कारण ( Psychological Causes )
I. वंशानुक्रम सम्बन्धी कारण ( Hereditary Causes ) - वंशानुक्रम सम्बन्धी सभी अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि वाल - अपराधों में वंशानुक्रम की भूमिका भी होती है ।
डगडेल ( Dugdale ) द्वारा किया गया ड्यूक परिवार का अध्ययन इस तथ्य की पुष्टि करता है और भी बहुत से अध्ययन इस तथ्य की पुष्टि करते हैं । परन्तु कुछ मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकाला है कि अकेले वंशानुक्रम का बाल अपराध में कोई उत्तरदायित्व नहीं होता । इन विद्वानों में विलियम हीले ( William Healy ) , सीरिल वर्ट ( Cyril Burt ) , विंग फील्ड ( Wing field ) आदि शामिल हैं । इन लोगों का मत है कि बाल अपराध में वातावरण भी उतना ही भागीदार है । अतः वंशानुक्रम मूल कारण न होकर एक सहायक तत्व माना जा सकता है ।
2. वातावरण सम्बन्धी कारण ( Environmental Causes ) - वंशानुक्रम और वातावरण के संदर्भ में इस बात का स्पष्ट संकेत है कि केवल वंशानुक्रम ही बालक के विकास के लिये उत्तरदायी नहीं बल्कि वातावरण की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है । बाल अपराधों में भी वातावरण का योगदान रहता है । वातावरण विभिन्न प्रकार का होता है । ( i ) घर का वातावरण ( Home Environment ) - सर्वप्रथम बालक घर के वातावरण में ही पलता है , वहीं सब कुछ सीखता है । अत : उसका प्रभाव बालक के विकास पर स्वाभाविक ही है । कई बार घर का वातावरण ठीक न होने के कारण बालक गलत दिशा की ओर मुड़ जाते हैं । घर के वातावरण को दूषित करने में निम्नलिखित कारण अपना प्रभाव छोड़ते हैं
( 1 ) माता - पिता का वालकों पर नियन्त्रण न रहना ।
( 2 ) घरेलू लड़ाई - झगड़े ।
( 3 ) परिवार में माता - पिता के सम्बन्ध विच्छेद या किसी एक की मृत्यु हो जाना
( 4 ) पारिवारिक निर्धनता
( 6 ) घर में बच्चों के साथ माता - पिता का पक्षपातपूर्ण रवैया
( 6 ) बालकों की रुचियों की ओर ध्यान न देना ।
( 7 ) बालकों को आवश्यक स्वतन्त्रता प्रदान न करना ।
( 8 ) बालकों की बेकारी की समस्या
( 9 ) सौतेले माता - पिता का होना ।
( 10 ) घर के अन्य सदस्यों का अपराधी होना ।
( 11 ) माता - पिता का अनैतिक होना ।
( 12 ) माता - पिता के शारीरिक व मानसिक दोषों के कारण , जैसे- अन्धा , पागल , अपाहिज होना ।
( 13 ) बालकों की आवश्यकताओं को पूरा न कर पाना
( 14 ) परिवारों में अधिक बच्चे होने के कारण । (
16 ) परिवार में बच्चों का स्थान उपरोक्त कारक घर व परिवार के वातावरण पर अपना प्रभाव डालकर बाल अपराधों को प्रोत्साहन देते हैं ।
( ii ) स्कूल का वातावरण ( School Environment ) - घर या परिवार से निकलकर बालक स्कूल के वातावरण में प्रवेश करता है । स्कूल का वातावरण कई प्रकार से बालक को आदर्श लगता है । स्कूल का अध्यापक उसे गुणों से भरपूर लगता है । वह उसका अनुसरण करने का प्रयत्न करता है । स्कूल में सीखो गई बातों को वह दैनिक प्रयोग में लाता है । यदि स्कूल का वातावरण ही दूषित होगा तो उसका समायोजन ( Adjustment ) भी दूषित होना शुरू हो जायेगा । अत : स्कूल का दूषित वातारण भी बाल - अपराध को प्रोत्साहन देता है । स्कूलों के वातावरण के कई पक्ष होते हैं जो निम्नलिखित हैं व्यक्तिगत विभिन्नतायें ( Individual Differences ) - स्कूलों में बालकों की व्यक्तिगत विभिन्नताओं का अध्ययन अति आवश्यक होता है । यदि इनकी व्यक्तिगत विभिन्नताओं की ओर ध्यान नहीं दिया जाता तो वे बाल अपराध की ओर बढ़ सकते हैं । पाठ्य सहगामी क्रियाओं की कमी ( Lack of Co - curricular Activities ) - स्कूलों में सहगामी क्रियाओं की कमी भी बाल अपराध का कारण बन सकती है क्योंकि स्कूलों में खेल - कूद तथा अन्य मनोरंजन के साधनों की कमी के कारण उनका संवेगात्मक विकास नहीं हो पाता और वे बाल - अपराध जैसी गतिविधियों में भागीदार बन जाते हैं । स्कूलों में मार्गदर्शन की कमी ( Lack of Guidance in Schools ) — स्कूल स्तर पर बालकों को मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है । इसकी कमी के कारण वे सही मार्ग से भटक जाते हैं । अत : इन्हें हर कदम पर मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है ।
अध्यापक का व्यवहार और शिक्षण विधियाँ ( Behaviour of Teacher and Teaching Methods ) स्कूलों में बालकों के प्रति सहानुभूति का अभाव और दोषपूर्ण शिक्षण विधियाँ भी बाल - अपराध के लिये उत्तरदायी होती हैं । कई बार तो इस कारण से बालक स्कूल तक छोड़ जाते हैं । कई बार स्कूल से भागने ( Truancy ) की आदत भी पड़ जाती है ।महत्व रखती है । स्कूल किस स्थान पर है , बालकों के घरों से कितनी दूर हैं आदि । बहुत विद्यालयों की स्थिति ( Situation of Schools ) - विद्यालयों की स्थिति भी बहुत दूर स्थित स्कूलों में माता - पिता बालकों पर किसी प्रकार की नजर नहीं रख सकते । बालक अपनी मनमानी करते हैं । कई बार स्कूलों से भागकर वे बुरे कार्यों में मस्त हो जाते हैं । सिनेमा देखने , होटलों में जाकर मौज मनाना आदि उनकी दिनचर्या बन जाती है ।
परीक्षाएँ ( Examinations ) - आजकल परीक्षाओं के कारण भी कई बालक अपराध कर बैठते हैं । अध्यापकों को पीटना , खून करना आदि इन्हीं के कारण होते हैं । ये परीक्षा को हर कीमत पर पास कर लेना चाहते हैं चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी अनैतिक कदम क्यों न उठाना पड़े ।
कठोर अनुशासन ( Strict Discipline ) - स्कूलों में कठोर अनुशासन के कारण भी बाल - अपराध होने की सम्भावना बनी रहती है । अत : आज के युग में बालक के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने की दृष्टि से दण्ड के स्थान पर प्यार व सहानुभूति से काम लेना चाहिए ।
अधिक गृहकार्य ( Excessive Home Work ) -अधिक गृहकार्य के कारण बालक स्कूल जाना छोड़ देता है और वह झूठ बोलने लगता है । अधिक गृहकार्य के कारण वह हर समय तनाव में रहता है तथा उसका स्वभाव क्रोधित व चिड़चिड़ा हो जाता है ।
( iii ) समाज का वातावरण ( Social Environment ) - समुदाय का वातावरण घर और स्कूल के वातावरण के पश्चात् अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है । आजकल इस आधुनिक युग में भी माता - पिता अपने बच्चों के स्वस्थ विकास के लिये उत्तम समुदाय में मकान ढूंढते हैं । आस - पड़ोस का ध्यान रखते हैं । घर बनवाते समय उसकी स्थिति का ध्यान रखते हैं । आज का सामाजिक वातावरण इतना दूषित हो चला है कि इसके प्रभाव से बालक को बचाना मुश्किल है , फिर भी इस बात के भरसक प्रयास किये जायें कि वालक गलत दिशा में न जाये । एक प्रकार से यदि देखा जाये तो बालक के व्यक्तित्व निर्माण में समाज की भूमिका को परिवार में कम नहीं आँका जा सकता , क्योंकि अन्ततः उसके व्यक्तित्व को व स्कूल की तुलना सामाजिक मूल्यों के अनुरूप ही विकसित होना है । वालक पर परिवार में उसके माता - पिता नियन्त्रण रखते हैं ; स्कूल में अध्यापक नियन्त्रण रखते हैं लेकिन समाज में कोई ऐसा सदस्य नहीं होता जो बालक की अवांछित क्रियाओं पर अविलम्ब व प्रभावी ढंग से नियन्त्रण रख सके । इस दृष्टि से बालक के अपराधी बनने में समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है ।
3. शरीर रचना और शरीर विज्ञान सम्बन्धी कारण ( Constitutional and physiological Causes ) - प्रो . उदय शंकर के अनुसार , " शारीरिक अवस्था अथवा कमजोरी , बहुत छोटा या बड़ा कद , शारीरिक अंगों में दोष आदि बच्चों में प्राय : हीन भावना को जन्म देते हैं । परिणामस्वरूप वे अपनी कमियों की क्षतिपूर्ति के लिये अधिक आक्रामक हो उठते हैं और अपराध कार्यों में संलिप्त हो जाते हैं । लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण इस बात के समर्थन के लिये पर्याप्त नहीं जुट पाये । लेकिन इस बात से सभी सहमत हैं कि शारीरिक विकास में कमी और यौन ग्रन्थियों के विकास के कारण बालक काम सन्बन्धी अपराध करने के लिए विवश हो जाते हैं । ”
4. मनोवैज्ञानिक कारण ( Psychological Causes ) - बाल - अपराध के मनोवैज्ञानिक कारण भी होते हैं । इनमें बालकों की मानसिक मन्दता ( Mental) Retardation ) , ग्रन्थियों का विकास ( Development of Glands ) , संवेगात्मक अस्थिर ( Emotional un Instability ) और मानसिक रोग ( Mental Diseases ) आदि शामिल हैं । कई बार उच्च बुद्धि वाले वालक भी बाल - अपराधी बन जाते हैं । अत : यह आवश्यक नहीं कि मानसिक मन्दता से ही बाल अपराध होते हैं । बाल - अपराधों की रोकथाम ( Prevention of Delinquency ) - बाल अपराध की समस्या यदि उचित समय पर नियन्त्रित नहीं की जाती तो यह बहुत गम्भीर रूप धारण कर सकती है । अत : इसकी रोकथाम करनी अति आवश्यक है ।
बाल - अपराध की रोकथाम दो दृष्टियों से की जा सकती है
( 1 ) रोकथाम के प्रयत्न करना ( To Adopt Preventive Measures )
( 2 ) सुधारात्मक प्रयत्न ( To Adopt Curative Measures ) 1. रोकथाम के प्रयत्न ( Preventive Measures ) - बाल अपराध की रोकथाम के लिये निम्नलिखित पग उठाये जा सकते हैं ताकि भविष्य में कोई वालक अपराधी न बन पाये परिवार के वातावरण में सुधार ( Reforms in Home Environment ) - परिवार के दूषित वातावरण में आवश्यक सुधार करने से बाल - अपराध की समस्या का सामना किया जा सकता है । परिवार के वातावरण में सुधार लाने के लिये माता - पिता के सम्बन्धों में अनावश्यक तनाव को दूर करना , अनपढ़ माता - पिता को शिक्षित करना , अनैतिक कार्यों में संलिप्त माता - पिता को बुरे कार्यों से मुक्ति दिलाना अति आवश्यक है । परिवार में बालको की आवश्यकताओं को पूरा करना , परिवार का लोकतांत्रिक वातावरण , पक्षपात रहित व्यवहार आदि परिवार के वातावरण को स्वस्थ बनाने में सहायक हैं । स्वस्थ पारिवारिक वातावरण वाल - अपराधों को निरुत्साहित करते हैं ।
स्कूल के वातावरण में सुधार ( Reforms in School Environment ) - परिवार की तरह स्कूल के वातावरण में भी सुधार करके बाल - अपराधों पर नियन्त्रण किया जा सकता है । इसके लिये पुस्तकालय और वाचनालय का प्रबन्ध , अध्यापक को मधुर व भेदभाव रहित व्यवहार , बालकों की स्वतन्त्रता , स्वच्छ परीक्षा प्रणाली , मार्ग - दर्शन , लचकदार पाठ्यक्रम , धार्मिक व नैतिक शिक्षा और अध्यापक - अभिभावक संघों का संगठन , शिक्षण विधियों में सुधार व स्वस्थ मनोरंजन के प्रबन्ध आदि स्कूल वातावरण को सुधारने में अपना योगदान दे सकते हैं । इन प्रयत्नों से स्कूल वातावरण में अवश्य सुधार होगा । परिणामस्वरूप वाल - अपराधों में कमी आयेगी । स्कूल का स्वच्छ वातावरण बालक के संवेगात्मक विकास को स्थिर करेगा , जो बाल - अपराध की रोकथाम के लिये आवश्यक है ।
समाज के वातावरण में सुधार ( Reforms in Social Environment ) - समाज के वातावरण में सुधार के लिये मान्यता प्राप्त संस्थायें बहुत योगदान दे सकती हैं । समाज में पुस्तकालयों की भूमिका भी बहुत महत्व रखती है । गन्दी तथा औद्योगिक बस्तियों को शहर से दूर रखना चाहिये क्योंकि मनोविज्ञान के अनुसार इस प्रकार की बस्तियां बाल - अपराधो को जन्म देती हैं । समाज में स्वस्थ फिल्में और स्वस्थ तथा शुद्ध राजनीतिक जीवन का प्रदर्शन बाल - अपराधों को नियन्त्रित कर सकता है । इसके साथ ही समाज विरोधी तत्वों से बालकों को दूर रखने का प्रबन्ध होना चाहिये ।
2. सुधारात्मक प्रयत्न ( Curative Measures ) - सुधारात्मक प्रयत्नों में उन पगों को शामिल किया जाता है जो बाल - अपराधियों को उनके अपराधपूर्ण जीवन से मुक्ति दिला Retardation ) , ग्रन्थियों का विकास ( Development of Glands ) , संवेगात्मक अस्थिर ( Emotional Unstability ) और मानसिक रोग ( Mental Diseases ) आदि शामिल हैं । कई बार उच्च बुद्धि वाले वालक भी बाल - अपराधी बन जाते हैं । अत : यह आवश्यक नहीं कि मानसिक मन्दता से ही बाल अपराध होते हैं । बाल - अपराधों की रोकथाम ( Prevention of Delinquency ) - बाल अपराध की समस्या यदि उचित समय पर नियन्त्रित नहीं की जाती तो यह बहुत गम्भीर रूप धारण कर सकती है । अत : इसकी रोकथाम करनी अति आवश्यक है । बाल - अपराध की रोकथाम दो दृष्टियों से की जा सकती है
( मनोवैज्ञानिक विधियाँ ( Psychological Methods ) - बाल अपराधियों का उपचार करने से पहले हमें विभिन्न परीक्षाओं द्वारा वाल - अपराधियों का पता लगा लेना चाहिए । इनमें शारीरिक परीक्षण , मनोवैज्ञानिक परीक्षण और साक्षात्कार आदि विधियों का प्रयोग किया जा सकता है । मनोवैज्ञानिक विधि से उपचार के लिए हमें उसके वातावरण में , जिसमें वह रह रहा हो , आवश्यक परिवर्तन करने चाहिये । उसकी आवश्यकताओं को पूरा करना चाहिये । माता - पिता को इन बालकों के प्रति अपना रवैया भी बदलना होगा । वाल अपराधियों के साथ पूर्ण सहानुभूति व मधुर व्यवहार दिखाया जाना चाहिये । कई बार ऐसे बाल - अपराधियों को उनके दूषित वातावरण से निकालकर नये वातावरण में रखा जाना चाहिये , जैसे बालकों के लिये बनाये गये सुधार गृह आदि ।
मानसिक चिकित्सालय ( Mental Therapy ) इस विधि से बालकों के मन के तनावों और द्वन्द्वों ( Conflicts ) को अप्रत्यक्ष ढंगों से दूर किया जाता है किन्तु इससे एक समस्या ठीक हो जाती है और दूसरी तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न होने की सम्भावना पैदा हो जाती
मनो - विश्लेषण विधि ( Psycho - analytic Method ) इस विधि से बाल अपराधियों के अचेतन मन ( Unconsciouns Mind ) का विश्लेषण किया जाता है । इससे उनकी दबी हुई इच्छाओं और संवेगों का पता लगाकर उनका उपचार किया जा सकता है । लेकिन इस विधि के लिये बहुत अधिक समय चाहिये । बालकों का सहयोग भी अधिक चाहिये , इसके बिना यह विधि सफल नहीं हो सकती क्योंकि कई बार बाल - अपराधी दबी हुई इच्छाओं को प्रदर्शित नहीं कर पाता ।
बाल - न्यायालय ( Special Juvenile Courts ) - वाल - अपराधियों के लिये विशेष बाल - न्यायालय की व्यवस्था की जा सकती है जिनमें विशेष रूप से प्रशिक्षित न्यायाधीशों की नियुक्ति हो । वाल - अपराधियों को जेल में न भेजकर सुधार गृहों में भेजने की व्यवस्था हो और वहाँ पर उन्हें सामाजिक रूप से लाभकारी कार्यों का प्रशिक्षण दिया जाये ।
सुधार - विद्यालयों की व्यवस्था ( Reformatory Schools ) - सुधार - विद्यालयों की व्यवस्था इस दिशा में बहुत बड़ा कदम होगा । इस प्रकार के स्कूलों में अपराधी बालकों की शिक्षा का प्रबन्ध भी होता है और कुछ - कुछ वातावरण जेल जैसा भी रहता है । इनमें अध्यापक भी विशेष रूप से प्रशिक्षित होते हैं । इनका पाठ्यक्रम लचीला होता है । हस्त - कलापों पर अधिक बल दिया जाता है तथा बालकों के मनोरंजन की भी पूरी व्यवस्था होती है । उपरोक्त उपायों पर अमल करके बाल - अपराध की रोकथाम और सुधार सम्बन्धी कार्यों में पर्याप्त सफलता प्राप्त की जा सकती है । इनमें से कुछ कदम उठाये भी गये हैं और इनका प्रभाव भी देखने को मिला है