व्यक्तिगत विभिन्नताओं के प्रकार

 व्यक्तिगत विभिन्नताओं के प्रकार 


                                                                                ( Kinds of Individual Differences ) व्यक्तिगत भेद का इतिहास बहुत पुराना है । प्राचीनकाल में साधारण और वीर पुरुषों में अन्तर किया जाता था , किन्तु स्पष्ट रूप से व्यक्तिगत भेद के विचार हमारे समक्ष उस समय आए , जब नए प्रकार की परीक्षा का अन्वेषण हुआ । इनके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में व्यक्तिगत भेद पर प्रकाश डाला गया । हम यहाँ पर उन मुख्य क्षेत्रों का , जिनमें व्यक्तिगत भेद पाए जाते हैं , वर्णन करेंगे । 

1. बुद्धि - स्तर पर आधारित विभिन्नता ( Mental Differences ) - व्यक्ति मानसिक दृष्टि से भी भिन्न होते हैं । कोई व्यक्ति प्रतिभाशाली , कोई अधिक बुद्धिमान , कोई कम बुद्धिमान और कोई मूर्ख होते हैं । मानसिक विभिन्नता को समझने के लिये बुद्धि परीक्षाओं की सहायता से बुद्धि लब्धि निकालते हैं । यह देखा गया है कि इसके अनुसार व्यक्ति मूढ़ से लेकर अत्यन्त प्रतिभाशाली तक होते हैं । वेन्टवर्थ ( Wentworth ) का विचार है कि पहली कक्षा के बालकों की ' बुद्धि - लब्धि ' 60 से 160 तक होती है । एक अध्यापक को शिक्षा हर एक बालक की बौद्धिक योग्यतानुसार देनी चाहिए । बहुधा अध्यापक अपने शिक्षण को मध्य वर्ग के ( बुद्धि - लब्धि के अनुसार ) वालकों के अनुकूल बना लेते हैं । इसका तात्पर्य यह है कि शेष बालकों की , जो उच्च या निम्न श्रेणी में आते हैं , उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है । अतएव ऐसे बालक जो साधारण बालकों की श्रेणी में नहीं आते असफलता का अनुभव करने लगते हैं और भावना - ग्रन्थियों के शिकार बन जाते हैं ।यदि एक कक्षा की बुद्धि - लब्धि की माप की जाय तो अधिकतर बालकों की बुद्धि • लब्धि लगभग 100 होगी , कुछ की 130 या अधिक हो सकती है , कुछ की 80 या उससे • भी कम । टरमैन के अनुसार जो वक्ररेखा इस प्रकार के माप द्वारा बनेगी , वह घण्टाकार की होगी । 

2. शारीरिक विकास में विभिन्नता ( Physical Differences ) - शारीरिक दृष्टि से व्यक्तियों में अनेक प्रकार की विभिन्नताएँ देखने को मिलती हैं । यह भिन्नता रंग , रूप , भार , कद , शारीरिक गठन , यौन भेद , शारीरिक परिपक्वता आदि के कारण होती है । कुछ व्यक्ति , काले , गोरे , कुछ लम्बे , कुछ नाटे , कुछ मोटे , कुछ दुबले , कुछ सुन्दर और कुछ कुरुप होते हैं । ( इस प्रकार का वक्र बुद्धि - लब्धि के अनुसार बालकों के विभाजन के सम्बन्ध में आता है । इससे तात्पर्य यह है कि 68.26 % बालक औसत के आसपास होंगे , 2.15 % लगभग निम्न - बुद्धि के और 2.15 % लगभग उच्च - बुद्धि के बालक किसी भी कक्षा में होंगे । ) अध्यापक का कर्तव्य है कि वालकों द्वारा कार्य सम्पादन कराने में उनके शारीरिक विकास को ध्यान में रखें । बालकों में यदि शारीरिक भिन्नता मध्यमान से बहुत अधिक हो तो ऐसे बालकों को उचित निर्देशन दे 

। 3. उपलब्धि में भिन्नता ( Differences in Achievement ) - उपलब्धि परीक्षाओं द्वारा यह पता चलता है कि बालकों की ज्ञानोपार्जन क्षमता में भी विभिन्नता पाई जाती है । यह विभिन्नता गणित तथा अंग्रेजी पढ़ने में बहुत अधिक होती है । उपलब्धि में विभिन्नता उन बालकों में भी पाई जाती है , जिनकी बुद्धि का स्तर समान है । ऐसा बुद्धि के विभिन्न खण्डों की योग्यता में विभिन्नता तथा पूर्व अनुभव या निर्देशन या रूचि के कारण होता है । उपलब्धि की क्षमता में विभिन्नता होने के कारण एक अध्यापक को चाहिए कि वह शिक्षा देने में व्यक्तिगत तथा कक्षा - शिक्षण विधियों के मिश्रण को अपनाए । विभिन्न बालकों को विभिन्न प्रकार के गृह - कार्य देने चाहिए और उन्हें विभिन्न क्रियाओं या कार्य - कलापों को करने देना चाहिए । उपलब्धि यदि वौद्धिक योग्यतानुसार नहीं है तो शिक्षक को चाहिए कि बालक की कठिनाई को मालूम करे । बहुधा ऐसा रुचि की कमी के कारण या संवेगात्मक समस्याओं के कारण या अवसर न मिलने के कारण होता है । कुछ ऐसे भी वालक होते हैं जो अपनी बुद्धि - योग्यता से भी अधिक ज्ञानोपार्जन करने में सफल होते हैं । ये बालक पढ़ने में बहुत समय या शक्ति लगाते हैं और अधिक ज्ञानोपार्जन करने में सफल होते हैं । उनको ऐसा करने की प्रेरणा बहुधा अपने माता - पिता से मिलती है । कभी - कभी ऐसे बालक अधिक मेहनत करते हैं क्योंकि वे किसी और दिशा में अपनी कमी को पूर्ति करना चाहते हैं । यहाँ पर आइजक न्यूटन का उदाहरण उल्लेखनीय है । न्यूटन महोदय ने उस कमी की पूर्ति करने के लिए जो उन्हें अपने एक सहयोगी को , जो उद्दण्ड था , पीटने में असफलता के कारण अनुभव हुई , गणित की ओर ध्यान लगाया । एक कुशल अध्यापक को चाहिए कि वह देखे के किस प्रकार से अधिक ज्ञानोपार्जन असन्तुष्टि की भावना से सदैव के लिए ओतप्रोत न हो जाये । 

4. अभिवृत्ति में विभिन्नता ( Difference in Attitude ) - अभिवृत्ति से तात्पर्य है , • एक सामान्य स्ववृत्ति जो एक समूह अथवा एक संस्था के प्रति होती है ।. व्यक्तियों के विभिन्न संस्था या समूह के सम्बन्ध में विभिन्न रुझान होते हैं । कुछ व्यकि • शिक्षा या समाज के नियमों को अच्छा समझते हैं , कुछ बुरा । शिक्षा के प्रति अभिवृद्धि बुद्धि के स्तर पर निर्भर नहीं है । यह घर के वातावरण पर बहुत अधिक निर्भर रहती है । यदि माता - पिता के शिक्षा की ओर झुकाव अच्छे तथा उचित है तो बालकों के झुकाव भी उसी प्रकार विकसित होगे । भारत में ग्राम निवासी शिक्षा को और से उदासीन रहते हैं और उनकी अशिक्षा का एक बहुत बड़ा कारण है । बालकों की अधिकारियों के प्रति अभिवृत्ति विभिन्नताएँ लिए होती हैं । यह अभिवृति बाल्यकाल में ही बालक सीख लेता है । अधिकारियों के प्रति अभिवृत्ति में अन्तर घर के वातावरण के कारण भी हो सकता है । एक अच्छा शिक्षक उचित प्रकार से अभिवृत्ति को बालकों में विकसित कर सकता है । 

5. व्यक्तित्व विभिन्नता ( Personality Differences ) - प्रत्येक व्यक्ति और बालक के व्यक्तित्व में कुछ न कुछ विभिन्नता अवश्य पायी जाती है । कुछ लोग अन्तर्मुखं ( Introvert ) होते हैं और कुछ बहिर्मुखी ( Extrovert ) । एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से मिलने पर उसकी योग्यता से प्रभावित हो या न हो परन्तु उसके व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता है । यह प्रभाव ऋणात्मक भी हो सकता है और धनात्मक भी हो सकता है । इस सम्बन्ध में टॉयलर ( Tylor ) ने लिखा है- " सम्भवतः व्यक्ति , योग्यता की विभिन्नताओं के बजाय व्यक्तित्व की विभिन्नताओं से अधिक प्रभावित होता है । ” 

6. गत्यात्मक योग्यताओं में विभिन्नता ( Difference in Dynamic Abilities ) — कुछ व्यक्ति किसी कार्य को अधिक कुशलता के साथ और कुछ कम कुशलत के साथ करते हैं । इसका कारण उनमें गत्यात्मक योग्यताओं में विभिन्नता होती है । इस सम्बन्ध में क्रो व क्रो ( Crow & Crow ) ने लिखा है- “ शारीरिक क्रियाओं में सफल होने की योग्यत के में एक समूह के व्यक्तियों में भी बहुत अधिक विभिन्नता होती है । ” 

7. लिंग - विभिन्नता के कारण भेद ( Sex Differences ) - स्त्रियों और पुरुषों में भी व्यक्तिगत विभिन्नता देखने में आती है । स्त्रियाँ कोमलांगी होती हैं , परन्तु सीखने के बहुत से क्षेत्रों में बालकों और बालिकाओं की क्षमता में बहुत अन्तर नहीं होता है । लिंग सम्बन्धं अन्तर के सम्बन्ध में किए गए अन्वेषण अभी विश्वासी परिणाम नहीं देते हैं । अत : इस सम्बन्ध में पूर्ण विश्वास के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता । वर्तमान बुद्धि - परीक्षणों के आधार पर यह विश्वास किया जाता है कि दोनों लिंगों के औसत अंक लगभग समान ही होंगे , किन्तु यह भी देखा गया है कि विभिन्नताओं का फैलाव दोनों लिंगों में विभिन्न होता है । बुद्धि - परीक्षाओं पर कुल अंकों में जो दोनों लिंग प्राप्त करते हैं , यद्यपि समानता होती है , किन्तु यह समानता परीक्षा के विभिन्न भागों पर हो , ऐसा नहीं है । यह लगभग सामान्य रूप से देखा गया है कि भाषा भाग पर लड़कियों के प्राप्तांक लड़क के प्राप्तांकों से अधिक होते हैं और लड़कों के प्राप्तांक गणित वाले भाग पर अधिक हो हैं । स्मृति के परीक्षणों में लड़कियाँ अधिक प्राप्तांक प्राप्त करती हैं ।  इसी प्रकार सामान्य ज्ञानोपार्जन में प्राथमिक स्तर पर अधिकतर यही पाया गया है कि • बालिकाओं का स्तर बालकों से अधिक उच्च था । इस सम्बन्ध में फिफर ( Fifer ) का अध्ययन महत्वपूर्ण है । पॉली ( Pauly ) महोदय का तो यह कहना है कि बालकों की शिक्षा बालिकाओं कारण उनमें हकलाना तथा अन्य दोषों का होना दिया जाता है । की शिक्षा प्रारम्भ करने के 6 माह उपरान्त प्रारम्भ करनी चाहिए । बालकों के निम्न स्तर का बालिकाओं की श्रेष्ठता का कारण वास्तव में उनका भाषा पर अधिकार होता है । वह बालकों से भाषा में श्रेष्ठता बहुत कम आयु से प्रकट करने लगती है । वह उससे पहले बातें करने लगती है और स्पष्ट बोलती है । विद्यालय में आने पर बालकों का विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान अधिक श्रेष्ठ दिखाई पड़ता है । शीघ्र ही वह गणित में भी श्रेष्ठता प्राप्त कर लेते हैं । •


 कार्टर ( Carter ) महोदय के अध्ययन बताते हैं कि बालिकाओं को अध्यापक अपने परीक्षणों में उन प्राप्तांकों से अधिक अंक प्रदान करते हैं जो एक प्रमापीकरण किए हुए ज्ञानोपार्जन परीक्षण पर प्राप्त करेंगे । बालकों को अध्यापक अपने परीक्षणों में तुलनात्मक कम अंक प्रदान करते हैं । सोबेल ( Sobel ) महोदय के अनुसार दोनों लिंगों के प्राथमिक स्तर पर अध्यापक बालिकाओं को ही अधिक अंक प्रदान करते हैं । माध्यमिक स्तर पर स्त्रियाँ तो सदैव बालिकाओं को ही अधिक अंक देती हैं , किन्तु पुरुषों के सम्बन्ध में प्रदत्त सामग्री इतनी निश्चित नहीं कि कुछ पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सके । 

8. जाति या राष्ट्र सम्बन्धी विभिन्नता ( Racial and National Differences ) - जाति या राष्ट्र सम्बन्धी विभिन्नता के सम्बन्ध में किए गए अन्वेषण भी अभी अपूर्ण हैं । इस कारण विश्वासी रूप से इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकते । परन्तु फिर भी विभिन्न राष्ट्र के नागरिकों में विभिन्न प्रकार की योग्यताओं में विभिन्नता पाई जा सकती है । 

9. सामाजिक विभिन्नता ( Social Differences ) - व्यक्तियों में स्पष्ट रूप से सामाजिक विकास में विभिन्नता पाई जाती है । यह विभिन्नता जब बालक एक ही वर्ष का होता है तभी से दृष्टिगोचर होने लगती है । कुछ बालक इतने भीरू होते हैं कि जैसे ही किसी दूसरे परिवार का सदस्य आता है वे अपना मुँह छुपा लेते हैं परन्तु दूसरे प्रकार के बालक उसकी ओर विना झिझक के बढ़ जाते हैं । व्यक्तिगत बालक में चेहरे के भाव को समझने की योग्यता होती है । वालक पढ़ने में भी विभिन्नता प्रकट करते हैं । उनकी लड़ाइयाँ मौखिक गाली - गलौज से लेकर मारपीट , नोंच - खसोट , काटना आदि तक होती हैं । बालकों में अपने मित्र बनाने के सम्बन्ध में भी विभिन्नता पाई जाती है ।

 10. संवेगात्मक विभिन्नता ( Emotional Differences ) - संवेगात्मक विकास विभिन्न बालकों में विभिन्नता लिए हुए होता है जबकि यह भी सत्य है कि मोटे रूप से संवेगात्मक विशेषताएँ बालकों में समान रूप से पाई जाती हैं । हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि क्रोध का संवेग प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अनुभव होता है । इसी प्रकार कुछ व्यक्ति सरल कुछ दुःखी और कुछ प्रसन्नचित्त रहते हैं । संयोगात्मक भिन्नताओं को और कुछ कठोर , संवेगात्मक परीक्षणों द्वारा मापा जा सकता है ।

 11. विशिष्ट योग्यताओं में विभिन्नता ( Difference in Specific Abilities ) - विशिष्ट योग्यताओं की दृष्टि से भी व्यक्तियों में भिन्नता पायी जाती है । कुछ बालक कला कुछ विज्ञान में , कुछ इतिहास में तो कुछ भूगोल में और कुछ गणित में अधिक योग्य होते हैं । यह उल्लेखनीय है कि सभी व्यक्तियों में विशिष्ट योग्यतायें नहीं होती हैं और जिनमें होती हैं उनमें मात्रा में अन्तर अवश्य होता है । उदाहरणार्थ , सभी खिलाड़ी एक स्तर के होते हैं , इसी प्रकार न तो सभी डॉक्टर एक जैसे होते हैं और न सभी अभियंता ही एक के होते हैं । व्यक्ति की विशिष्ट योग्यताओं को जानने के लिए विशिष्ट परीक्षाओं ( Spe Ability Tests ) का प्रयोग करते हैं । व्यक्तिगत विभिन्नता के कारण ( Causes of Individual Differences व्यक्तिगत विभिन्नताओं के प्रमुख कारण निम्न हैं 

1. वंशानुक्रम ( Heredity ) - वंशानुक्रम व्यक्तिगत विभिन्नता का प्रमुख कारण गर्भाधान के समय ही वंशानुगत विशेषतायें बच्चे में प्रवेश हो जाती हैं । इन विशेषताओं आधी माँ के वंश से तथा आधी पिता के वंश से प्राप्त होती हैं । इसी प्रकार कुछ गुण बाद दादी से , कुछ परवावा - परदादी से तथा कुछ परनाना - परनानी से प्राप्त होते हैं । इन सभी कौन से गुण वालक को प्राप्त होंगे यह निश्चित नहीं होता , यह संयोग पर निर्भर करता वंशानुक्रम से बालक को गुण और अवगुण दोनों ही प्राप्त होते हैं , इसीलिये अच्छे माँ - की संतान भी अच्छी होती है और चोर - डकैत की चोर , क्योंकि बिल्ली के बिलोटे ही होते हैं । इसीलिये रंग , रूप में भी वालक माँ - बाप से मिलते हैं । मनोवैज्ञानिक मन ( Mum ने भी वंशानुक्रम को व्यक्तिगत विभिन्नताओं के एक कारक के रूप में स्वीकार किया है उनके विचार में- “ हमारा सबका जीवन एक ही प्रकार आरम्भ होता है । फिर इसका क्या कारण है कि जैसे - जैसे हम बड़े होते जाते हैं , हममें अन्तर होता जाता है ? इसका कारण यह कि हमारा सबका वंशानुक्रम भिन्न होता है । ” 

2. वातावरण ( Environment ) - वंशानुक्रम के बाद वालक पर वातावरण का यह अधिक प्रभाव पड़ता है । वालक जैसे वातावरण में पलता है उसका व्यक्तित्व भी वैसा बनता है । दो जुड़वां बच्चों में से यदि एक का पालन - पोषण झुग्गी - झोपड़ी में हो और दूल का अमीर घराने में तो उनके व्यक्तित्व में जमीन - आसमान का अन्तर देखने को मिलेगा इसी प्रकार एक बालक को साधारण स्कूल में पढ़ाया जाये तथा दूसरे को कान्वेंट स्कूल में तो भी उनके व्यक्तित्व में बहुत अन्तर आयेगा । वालक पर सभी प्रकार के वातावरणों क प्रभाव पड़ता है जैसे- आर्थिक , सामाजिक , सांस्कृतिक तथा भौगोलिक । इसीलिये वातावरण में रहने वाले लोग हृष्ट - पुष्ट , मेहनती तथा गोरे रंग के होते हैं जबकि गर्म वातावरण के लोग ठिगने , आलसी तथा काले रंग के होते हैं । इसीलिये बुरी संगत में पड़कर आदम बुरा तथा अच्छी संगत में आदमी अच्छा वन जाता है । 

3. जाति , प्रजाति एवं देश ( Caste , Race and Country ) - जाति , प्रजाति एवं देश का भी व्यक्तिगत विभिन्नताओं पर पर्याप्त असर पड़ता है । हिन्दू , मुस्लिम , सिख , ईस आदि लोगों के आचार - विचार एवं रहन - सहन में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है । इस प्रकार एक क्षत्रिय युवक को साहसी कार्य करने अच्छे लगते हैं तो एक बनिये के पुत्र को व्यापार करना अच्छा लगता है । एक कायस्थ युवक बौद्धिक कार्य करने में रुचि रखता है । ठीक इसी प्रकार विभिन्न राष्ट्रों जैसे - चीन , भारत , अमेरिका , रूस आदि के लोगों में विभिन्नता आसानी से देखी जा सकती है । एक कश्मीरी एक गुजराती से बिल्कुल अलग दिखा देता है । 

4. आयु एवं बुद्धि ( Age and Intelligence ) - बालक की आयु में वृद्धि होने साथ - साथ उसका शारीरिक , मानसिक तथा संवेगात्मक विकास भी होता रहता है । इसी विक के कारण उनमें व्यक्तिगत विभिन्नता आती रहती है । इसीलिये विभिन्न आयु के बालकों में अन्तर दिखाई देता है । इसी प्रकार बुद्धि के कारण भी बालकों में अन्तर होता है । कुछ बालक तेज बुद्धि के होते हैं , कुछ सामान्य बुद्धि के और कुछ मन्द बुद्धि के अर्थात् सभी बालक समान बुद्धि के नहीं होते हैं । आयु में वृद्धि से बालक की रुचि तथा बुद्धि के अन्तर से बालक की शैक्षिक प्रगति में अन्तर देखने को मिलता है । 

5. परिपक्वता ( Maturity ) परिपक्वता एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति किसी कार्य को करने में स्वयं को सक्षम पाता है । सीखने का आधार भी परिपक्वता ही है । मनोवैज्ञानिकों के अनुसार- " एक वालक तब तक नहीं सीख सकता जब तक वह सीखने के लिए तैयार न हो अथवा परिपक्व न हो । " लेकिन बालक जन्म से समय पूर्ण परिपक्व नहीं होता । परिपक्वता किशोरावस्था में आती है । यह परिपक्वता कुछ बालकों में जल्दी आ जाती है तथा कुछ में देर से आती है । 

6. लिंग - भेद ( Sex - Differences ) - लिंग - भेद के कारण लड़के - लड़कियों की शारीरिक बनावट में तो अन्तर होता ही है , साथ ही , उनके सोचने - विचारने एवं कार्यशैली में भी अन्तर देखने को मिलता है । लड़कियाँ , लड़कों की तुलना में कम शक्तिशाली , स्नेहमयी , कोमल स्वभाव की तथा लज्जाशील होती हैं जबकि लड़के साहसी , उद्दण्ड तथा कठोर स्वभाव के होते हैं । लड़कियों में सामान्य बुद्धि अधिक होती है जबकि लड़कों में विशिष्ट बुद्धि अधिक होती है । इसी प्रकार लड़कियाँ जल्दी परिपक्व हो जाती हैं जबकि लड़के देर से परिपक्व होते . उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त शिक्षा एवं प्रशिक्षण भी व्यक्तिगत विभिन्नताओं को जन्म देते हैं ।