शिक्षा की प्रवृत्ति

 


                                                                        शिक्षा की प्रवृत्ति 




 . उत्तर स्थानीय स्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में विशेष शिक्षा से सम्बन्धित दायित्व बताइये । स्थानीय स्तर पर विशेष शिक्षा का आयोजन स्थानीय स्तर को शिक्षा के क्षेत्र में विशेष शिक्षा से सम्बन्धित अपने उत्तरदायित्व को पूर्णतः निभाना चाहिए । स्थानीय स्तर के जो उत्तरदायित्व हैं , वे इस प्रकार हैं

 ( 1 ) उत्तरदायित्व का निर्धारण - छोटे जिलों में इसका भार मुख्य प्रशासन अधिकारी के ऊपर होना चाहिए । जैसे - जैसे जिले का आकार बढ़ता है , वैसे - वैसे विशेष शिक्षा का प्रोग्राम जटिल होता जाता है । बड़े जिलों में इसके लिए अधिक उत्तरदायी अधिकारी होने चाहिए । 

( 2 ) विशेष बालकों की आवश्यकताओं की खोज - विशेष बालक - बालिकाओं की शिक्षा आधारभूत सामाजिक सिद्धान्तों पर आधारित है । सामान्य वालक को औसत वालक से भिन्न नहीं समझना चाहिए । उनकी भी वे सब आवश्यकताएँ हैं जोकि अन्य बालकों की हैं । सभी लोगों को विशेष शिक्षा के मूल्य का ज्ञान होना चाहिए । अध्यापकों को वे विधियाँ बता देनी चाहिए । जिनके द्वारा पढ़ाया जायेगा । उन विधियों का पुनर्परीक्षण और पुनर्निरिक्षण करवाना चाहिए । जब बालकों / बालिकाओं को और अधिक विशेष शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती तो उन्हें सामान्य कक्षा में भेज देना चाहिए । पृथकीकरण का दर्शन विद्यार्थी , माता - पिता तथा अध्यापकों को बताना चाहिए । कक्षा का आकार निश्चित करना चाहिए । यह सव बाल 

( 3 ) बालकों की पहचान - प्रशासन को बालकों की पहचान के लिए विभिन्न कि एजेन्सियों की सहायता लेनी चाहिए । स्वास्थ्य विभाग शारीरिक रूप से अयोग्य बालको पहचान कराने में सहायता कर सकता है । जब बालक / बालिकाओं की पहचान हो जाती । जो उनका गहन अध्ययन , करना चाहिए । यदि आवश्यक हो तो उन्हें मनोवैज्ञानिकों , आँसु नाक - कान के विशेषज्ञों को दिखाना चाहिए । बालक के विषय में पूर्ण रिकार्ड रखने चाहिए 

( 4 ) अध्यापकों का चुनाव - अध्यापकों को विशेष वालकों को पढ़ाने का प्रशिक्ष भी देना चाहिए । साधारण बालकों को पढ़ाने का अनुभव विशेष बालकों के अध्यापक लिए बहुत आवश्यक है । एक अच्छे कुशल अध्यापक के लिए केवल प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती । इस बात की ओर भी ध्यान देना चाहिए कि उसका व्यक्तित्व अच् हो ; उसे विशेष बालकों में रुचि हो । विशेष बालकों की समस्याओं को समझने के लिए उसने सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण हो । चूँकि एक अध्यापक को कई वर्ष तक पढ़ाता है तथा कई तरह के बालक एक कक्षा में रहते हैं , अध्यापक को विशेष शिक्षा के अभिमुखीकरण ( Orientation ) कोर्स को पूरा करना चाहिए ।

 ( 5 ) विशेष कक्षाओं का निरीक्षण - छोटे शहरों में विशेष कक्षा के निरीक्षण का कार्य एक सहायक या प्राइमरी निरीक्षक को देना चाहिए । वड़े नगरों में प्रत्येक स्कूल का एक निरीक्षक होना चाहिए । उसे इस क्षेत्र में प्रशिक्षित भी होना चाहिए । इस निरीक्षक को पढ़ाने का अनुभव , इस क्षेत्र में विशिष्टीकरण तथा कम से कम मास्टर डिग्री होनी चाहिए । इसके कार्य - प्रशासन तथा निरीक्षण , दोनों ही हैं । इसे पाठ्यक्रम को तैयार करना , सामान का प्रबन्ध करना , अध्यापकों की नियुक्ति तथा स्थानान्तरण आदि का प्रबन्ध करना चाहिए । इन निरीक्षको को विशेष शिक्षा के क्षेत्र में हुए प्रत्येक परिवर्तन व विकास से अवगत होना चाहिए । इससे वे अपने प्रोग्राम को यथाचित रूप में विकसित कर सकते हैं । विशेष स्कूल के प्रधानाध्यापक को भी विशेष शिक्षा दी जानी चाहिए । अध्यापकों को विशेष वेतन व भत्ते देने चाहिए । उन्हें स्कूल के प्रधानाध्यापक के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए । वे सव कर्त्तव्य निभाने चाहिए जो कि साधारण कक्षा में होते हैं ताकि बालक अपने से औरों के भिन्न न माने । अध्यापकों के होनी चाहिए । लिए सेवा प्रशिक्षण ( In - Service Training ) तथा विस्तार सेवा ( Extension Service )

 ( 6 ) निर्देशन - यद्यपि विभिन्न प्रकार के विलक्षण बालकों की आवश्यकताएँ भिन्न भिन्न होती हैं , उनका मुख्य उद्देश्य एक है - अच्छा सामाजिक एवं व्यक्तिगत सामंजस्य , नागरिक उत्तरदायित्व तथा व्यावसायिक क्षमता निर्देशन देते समय वालक से सम्बन्धित हर रिकार्ड , ( 1 ) सामाजिक सामंजस्य , ( 2 ) रुचि ध्यान । पहलू पर ध्यान देना चाहिए ; जैसे- ( 3 ) शारीरिक दशा ( 4) सीखने की क्षमता , ( 5 ) स्कूल 

( 7 ) पाठ्यक्रम - विशेष बालकों की शिक्षा के उद्देश्य भिन्न होते हैं , अतः उनके पाठ्यक्रम को विशेष रूप से तैयार करना पड़ता है । यह पाठ्यक्रम प्रत्येक बालक के लिए उसकी आवश्यकतानुसार भिन्न होता है । ये सुझाव दिये गये हैं क औसत बालकों के कार्यक्रम में विशेष बालक को भाग लेना चाहिए । एक अध्यापक के लिए यह अत्यन्त कठिन है कि वह हर भिन्न आयु के बालक के लिए पूर्ण विशेष शिक्षा का प्रोग्राम बनाये । बालकों को समूह कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए । अध्यापक को औसत बालकों के अध्यापक से ही सहायता लेनी चाहिए । विभिन्न प्रकार के समूहों के लिए भिन्न - भिन्न कोर्स तथा पाठ्यक्रम सामंजस्य होते हैं । बालकों को जो अन्धे हैं , टंकण - लेखन ( Type - Writing ) या हस्तलिपि ( Manuscript ) लिखना सिखाते हैं । अपाहिज बालकों को विभिन्न प्रकार के कार्य , जैसे - बुनना , कातना , जेवर आदि बनाना बताया जाता है । बहरे बालकों को भाषा का ज्ञान दिया जाता है ।. 

( 8 ) इमारत - इसके लिए अलग इमारत का भी निर्माण कराया जा सकता है । इमारत हवादार और खुली होनी चाहिए । प्रशासन को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इमारत उसी प्रकार की हो , जैसी सामान्य बालकों के लिए है । उसमें बिजली का प्रवन्ध , खिड़कियाँ , अच्छा फर्नीचर तथा खेलने का मैदान अवश्य होना चाहिए । बालक को विशेष शिक्षा के लिए पुरानी इमारत में भेजने से न तो बालक पर ही और न माता - पिता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है । राज्य के शिक्षा विभाग को इमारत बनाने तथा सामान का प्रबन्ध करने में बालकों की समस्त आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए । बालकों की खाने की समस्या का भी समाधान होना चाहिए । यदि बालक बहुत दूर से आते हैं तो दिन में उनके नाश्ते का प्रबन्ध करना चाहिए । इसके लिए माता - पिता की सलाह व सहायता भी ली जा सकती है । बालकों को स्कूल में आने - जाने की सुविधा भी दी जानी चाहिए । इसके लिए स्कूल बस का प्रबन्ध होना चाहिए । 

( 9 ) गाँव के विशिष्ट बालक - इन बालकों को भी विशेष शिक्षा की उतनी ही आवश्यकता है जितनी उन विशिष्ट बालकों को जो शहरों में रहते हैं । पर गाँवों में ये सेवाएँ पहुँचाना बड़ा कठिन है । इन महँगी सेवाओं को गाँवों में दो या तीन बालकों के लिए नियोजित करना कठिन हो जाता है । माता - पिता भी अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए दूर नहीं भेजते हैं । ऐसी दशा में- ( 1 ) गाँव के बालकों के लिए शहरों में छात्रावास का प्रबन्ध करना चाहिए । ( 2 ) उन्हें स्कूल ले जाने के लिए वसों का प्रबन्ध होना चाहिए जो प्रतिदिन विद्यार्थियों को घर वापस छोड़कर भी आये । राज्य सरकर को इस ओर ध्यान देना चाहिए ।