विशिष्ट शिक्षा से आप क्या समझते हैं ? इसकी आवश्यकता क्यों पड़ती अथवा विशिष्ट शिक्षा का अर्थ एवं महत्व बताइये ।
विशिष्ट शिक्षा की आवश्यकतायें ( Needs of Special Education ) यह सत्य है कि पिछड़े हुए एवं प्रतिभाशाली बालकों के उत्थान हेतु विशेष सुविधाओं तथा साधनों की आवश्यकता है । इसलिये विशिष्ट शिक्षा के महत्व को समझा जा सकता है ।
( 1 ) विशिष्ट कक्षायें बाधित बालकों के लिये आवश्यक है क्योंकि उनकी शिक्षा के लिये विशिष्ट विधियाँ तथा प्रविधियों की आवश्यकता होती है ।
( 2 ) प्रतिभाशाली बालकों का बुद्धि स्तर सामान्य बालकों की अपेक्षा ऊँचा होता है इसलिये प्रतिभाशाली बालकों , सामान्य बालकों के साथ समायोजित करने में कठिनाई का सामन् करना पड़ता है । सामान्यतः ऐसा पाया जाता है कि शिक्षक अपनी गति से शिक्षा देता है ज सामान्य बालकों के लिये उपयुक्त है । लेकिन प्रतिभाशाली बालक सामान्य शीघ्र ही अपना कार्य समाप्त कर लेता है । ऐसी परिस्थिति में यह समस्या आती है कि प्रतिभाशाली बालक अपना समय कैसे व्यतीत करे जबकि शिक्षक सामान्य बालकों के उसी कार्य को पूरा करने में व्यस्त रहता है । सामान्यतः प्रतिभाशाली बालक ऐसी परिस्थिति में अनुशासनहीनता तथा उद्दण्डता करने लगते हैं । सामान्य बालकों का पाठ्यक्रम इतना साधारण होता है कि प्रतिभाशाली बालक नीरस हो जाता है तथा कार्य में रूचि खो देता है । प्रतिभाशाली साथ वालक कार्य के प्रति प्रेरित नहीं हो पाते ।
( 3 ) प्रतिभाशाली बालकों को सामाजिक तथा वैयक्तिक आवश्यकताओं को ग्रहण करने के लिये अतिरिक्त सुविधाओं तथा साधनों की आवश्यकता होती है । इसलिये ऐसी सुविधायें प्रतिभाशाली रूप से बाधित बालकों में उनके दोषों को कम करने का प्रयास करती है । ऐसी परिस्थिति में उत्कृष्ट बालक अपनी प्रतिभा के अनुरूप कार्य करने का अवसर पाते हैं । सामान्य कक्षाओं में बुद्धिमान बालक अपने आपको कार्य करने में बाधित पाता है । वह थोड़ी सी इच्छाशक्ति से प्रतिभाशाली बालकों की श्रेणी में स्थान बना सकता है एवं अपने स्तर को ऊँचा कर सकता है । यह अपने स्थान पर उचित है कि अधिक तीव्र प्रगति कुछ सीमा तक कमी तथा कमजोरी होती है ।
( 4 ) प्रयोगात्मक आँकड़े प्रगट करते हैं कि सामान्य शिक्षण संस्थाओं में प्रतिभाशाली वालकों के साथ सामाजिक कुप्रबन्ध उग्र रूप में पाया जाता है । प्रतिभाशाली वालक कार्य कम होने या कभी - कभी न होने से खाली बैठे रहते हैं , क्योंकि या तो उन पर कार्य का बोझ नहीं होता अथवा वे कार्य को शीघ्र ही समाप्त कर लेते हैं । ऐसी परिस्थितियों में उनका व्यक्तिगत व्यवहार स्वीकार करने योग्य नहीं होता । क्योंकि वे स्वयं को उद्दंडता के कार्यों में शामिल कर लेते हैं ।
( 5 ) विशिष्ट कक्षाओं में बुद्धिमान छात्रों को अग्रसर होने का अवसर मिलता है लेकिन शिक्षक को ऐसे बालकों को सामान्य कक्षा में कार्य के प्रति प्रेरित करने में समस्या तथा बाधाओं का सामना करना पड़ता है । सामान्यत : विलक्षण वालक अन्य सामान्य बालकों की अपेक्षा संवेदनशील होते हैं । उनकी सोचने की क्षमता अधिक तथा तीव्र होती है । वे कार्य के प्रति सावधान होते हैं , इसलिये उनके शिक्षण में विशेष विधियों व प्रविधियों की आवश्यकता होती है ।
( 6 ) प्रतिभाशाली बालकों की कक्षाओं में प्रत्येक बालक यह जानता है कि केवल कक्षा में वह ही एक बुद्धिमान विद्यार्थी नहीं है परन्तु और भी कई विद्यार्थी हैं । यह विचार बालकों में आत्मविश्वास की भावना का विकास करता है । विशिष्ट कक्षायें बालकों में अधिक सीमा तक शिक्षण विशेष धाराओं में मार्ग दर्शक के रूप में अग्रसर होने का अवसर भी प्रदान करती है । उसी समूह में कुछ बाल , कविता , नाटक , खेल - कूद तथा सामान्य ज्ञान जैसी शाखाओं में रुचि लेते हैं । आगे आने वाले समय में बालकों के लिये उपयुक्त प्रशिक्षण तथा विशिष्ट शिक्षा के कार्यक्रमों में सहायक सिद्ध हो सकता है । विभिन्न शाखाओं के विशेषज्ञों द्वारा बालकों का पूर्ण रूप से सामाजिक वातावरण में विभिन्न
( 7 ) विशिष्ट शिक्षा के द्वारा चयनित स्थानापन ( Selective Placement ) किया जाता श्रेणियों में विश्लेषण , मूल्यांकन तथा निर्धारण किया जाता है । भौतिक परीक्षण तथा मूल्य • निर्धारण भिन्न - भिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों जैसे मानसिक , मनोविज्ञानी , चिकित्सक श्रवण , नेत्र , मस्तिष्क , अस्थि तथा शिक्षाविदों आदि द्वारा प्रतिभाशाली बालकों के चयनित स्थानापन के लिये अति आवश्यक है ।
( 8 ) विशिष्ट शिक्षा को अन्य सेवाओं की भी आवश्यकता होती है । जैसे अस्थि - पंग बालकों का शारीरिक , व्यवसायिक तथा नियमित रूप से शारीरिक परीक्षण । कुछ प्रतिभाशाली बालकों को चिकित्सा देख - रेख की निश्चित तथा नियमित रूप से भी आवश्यकता होती है । समय - समय पर अन्धे बालकों और श्रवण - अपंग बालकों को परीक्षण की आवश्यकता हो सकती है । कुछ विशिष्ट बालकों को व्यवसायिक और शारीरिक मानसिक , मनोवैज्ञानिक आदि सेवायें अतिआवश्यक हैं । यह कहना उचित है कि कुछ विशेष उपकरण तथा अतिरिक्त प्रशिक्षण शिक्षाविदों के लिये आवश्यक है और कई बार यह काफी महंगा भी होता है । लेकिन वास्तव में शारीरिक रूप से अपंग तथा विशिष्ट बालकों की देख - भाल में कमी करना उपयुक्त प्रशिक्षण की अपेक्षा अधिक महंगा पड़ता है ।
( 9 ) विशिष्ट बालकों का महत्व सामान्य कक्षा में आने वाली परेशानियों से समझा जा सकता है जिसका शिक्षाविदों को सामना करना पड़ता है । सामान्य कक्षा में अपंग तथा सामान्य व अन्य विभिन्न श्रेणी के वालक होते हैं । वे शारीरिक रूप से बाधित और साधारण या प्रतिभाशाली और सामान्य होते हैं । शिक्षाविद को ऐसी विधियाँ उन्हें शिक्षित करने के समय अपनानी पड़ती हैं , जो उपरोक्त विभिन्न श्रेणियों के बालकों के लिये उपयुक्त हो । लेकिन बालकों को शिक्षा देते समय कक्षा में शिक्षाविद को कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है , क्योंकि विद्यार्थियों को उन्हें दिया जाने वाला अनुदेशन समझने में समस्या आती है । कुछ विद्यार्थी अनुदेशन की सार्थकता के माप को कम समझते हैं । ऐसी अवस्था में विशिष्ट कक्षाओं की आवश्यकता को गम्भीर रूप से समझा जाता है । एक प्रकार से विशिष्ट शिक्षा का अर्थ • प्रतिभाशाली बालकों की सहायता ही नहीं परन्तु सामान्य कक्षा अध्यापकों के लिये किसी परिणाम पर भी पहुँचना है ।
( 10 ) ऐसा कहा जाता है कि शिक्षा उस स्थान से शुरू होती है जहाँ पर औषधियों का अन्त होता है । श्रवण बाधित बालक को श्रवण यन्त्र उपलब्ध कराना चिकित्सा विज्ञान का कार्य है । परन्तु बालकों की देखने व सुनने की सामर्थ्य का उपयोग करना निसन्देह शिक्षा का कार्य क्षेत्र है । यदि श्रवण बाधाओं को ठीक किया जाता है तो ये चिकित्सा का कार्य क्षेत्र है , और यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो यह शिक्षा की चिन्ता का विषय है । इसके विषय में शिक्षाविदों का सोचना है , कि क्या किया जा सकता है ? जैसे पूर्णतया अन्धे बालकों के • लिये ' बेल ' ( Braile ) या इससे सम्बन्धित संसाधन उपलब्ध कराना , यात्रा के माध्यम से प्रशिक्षण तथा विचार विमर्श द्वारा समझाना आदि , विशिष्ट शिक्षा के माध्यम से शिक्षा विशेषज्ञों की सेवाओं द्वारा प्रदान की जाती है ।