माता - पिता द्वारा तिरस्कृत बालक के क्या कारण हैं

 माता - पिता द्वारा तिरस्कृत बालक के क्या कारण हैं 

 बालकों के सम्पूर्ण सन्तुलित विकास में माता - पिता का महत्वपूर्ण योगदान होता है । बहुधा माता - पिता तो अपने बच्चों की उचित देख - रेख करते हैं , किन्तु कुछ माता - पिता अपने बच्चों को पसन्द नहीं करते हैं तथा समय - समय पर उनकी निन्दा व अपमान करते हैं , जिसका सीधा प्रभाव बालकों के व्यक्तित्व पर पड़ता है । ऐसे ही वालक को हम तिरस्कृत बालक कहते हैं । 

बॉलवे ( Bowlby , 1933 ) के अनुसार , “ तिरस्कृत बालक संवेगात्मक .. रूप से अस्थिर , क्रोध को रोकने में अयोग्य और अन्य लोगों से व्यर्थ सम्बन्ध वाले होते हैं । माता - पिता के तिरस्कार के कारण ( Causes of Parental Rejection ) जब माता - पिता अपने बच्चों का तिरस्कार करते हैं तो इसके पीछे कई कारण होते हैं । इन बालकों का अध्ययन करने के बाद इनके निम्न कारक पाए गये हैं 

1. जब माता - पिता के आपसी सम्बन्ध ठीक नहीं होते हैं अर्थात् वह स्वयं आक्रामक ( aggressive ) व शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते हैं तो वे अपने बच्चों को तिरस्कृत रूप में देखने लगते हैं ।अधिक होती है तो माता - पिता बच्चों का तिरस्कार करने लगते हैं । 

2. जब परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती है और जहाँ बच्चों की संख्या हो अथवा न हो , तब यदि बच्चे उनकी आशाओं को पूर्ण नहीं करते हैं तो भी बच्चे माता

 3. बहुत से माता - पिता अपने बच्चों से बहुत उम्मीदें लगाते हैं चाहे बच्चों में योग्यता पिता के तिरस्कार के भागी हो जाते हैं । 

4. जब बच्चों के किसी अंग में विकार आ जाता है और वह अयोग्य व अक्षम हो जाता है तो भी माता - पिता अन्य बच्चों की अपेक्षा उस बच्चे का तिरस्कार करने लगते हैं ।

 5. जब माता - पिता और बच्चों के व्यवहार में व्यक्तिगत भिन्नता पायी जाती है तो भी माता - पिता तिरस्कारपूर्ण व्यवहार करने लगते हैं । 

6. यदि बच्चे माता - पिता के व्यक्तिगत जीवन या व्यक्तित्व विकास आदि में बाधा पहुँचाते हैं तो माता - पिता बच्चों का तिरस्कार करने लगते हैं । तिरस्कृत बालकों की पहचान ( Identification of Parentally Rejected Children ) यों तो विभिन्न लक्षणों के प्रकट करने के आधार पर इस प्रकार के बालकों को पहचाना जा सकता है । 


फिर भी वैज्ञानिक ढंग से इन बालकों को समझने एवं ढूँढने के लिए कुछ प्रमुख मानकीकृत परीक्षणों का प्रयोग किया जा सकता है 

1. आर . पी . रोहनर ( 1979 ) माता - पिता स्वीकृत तिरस्कृत प्रश्नावली ( PARQ ) - यह परीक्षण तीन रूपों में है- बालग , माता , प्रौढ़ आदि । इस परीक्षण के प्रश्न तीनों रूपों में एक हैं । तीनों मापनियों में 60-60 प्रश्न हैं । प्रस्तुत मापनी के उत्तर चार रूपों में से देने होते हैं । अंक भी क्रमशः 4 , 3 , 2 , 1 दिए जाते हैं । इस परीक्षण में विश्वसनीयता और आन्तरिक सह - सम्बन्ध ज्ञात किया गया है । इसमें बालक के और प्रौढ़ों के अपने माता के बारे में विचार जाने जाते हैं और एक मापनी में माँ के अपने बच्चों के विषय में विचार जाने जाते हैं । इसका हिन्दी रूपान्तरण जयप्रकाश ( सागर ) एवं महेश भार्गव ( आगरा ) ने किया । 

2. हरीशचन्द्र शर्मा एवं नरेन्द्र सिंह चौहान ( 1976 ) माता - पिता बच्चों की सम्बन्ध सूची ( PCR ) प्रस्तुत परीक्षण बच्चों के माता - पिता के लिए बनाया गया है । इसके द्वारा माता - पिता का बच्चों के प्रति व्यवहार जाना जाता है । इस परीक्षण में आठ परिस्थितियाँ हैं एवं आठों के दो पक्ष हैं । इसमें माता - पिता दोनों को उत्तर देने के लिए अलग - अलग प्रपत्र प्रयोग करते हैं । इस परीक्षण की विश्वसनीयता पुनर्परीक्षण विधि से 200 अभिभावकों के अंगों के आधार पर ज्ञात की , जो कि .72 से 89 तक ज्ञात हुई । 

 3. जी . पी . शैरी एवं जे.पी. सिन्हा ( 1987 ) पारिवारिक सम्बन्ध सूची ( FRI ) - यह परीक्षण विद्यालय एवं कॉलेज के हिन्दी भाषीय छात्रों के लिए बनाया गया है । इस परीक्षण द्वारा छात्रों के पारिवारिक सम्बन्धों के बारे में जान सकते हैं । इस परीक्षण में 150 पद हैं , जिन्हें करने के लिए कोई सीमा निश्चित नहीं है , फिर भी परीक्षार्थी इसे 40-50 मिनट में कर लेता है । यह परीक्षण पारिवारिक स्वीकारोक्ति ( acceptance ) , एकाग्रता ( concentration ) तथा अस्वीकारोक्ति तीन पहलुओं का मापन करता है । इस परीक्षण की विश्वसनीयता पुनर्परीक्षण विधि से ज्ञात की । साथ ही विषयवस्तु वैधता ज्ञात की जो कि .01 स्तर पर सार्थक सिद्ध हुई । इस परीक्षण पर शतांशीय और स्टेनाइन मानक ज्ञात किए गए ।

 4. एन . एस . चौहान एवं सी.पी. कोकर ( 1985 ) माता - पिता का बहु आयापी •• मापनी ( MDP Scale ) - यह परीक्षण बच्चों के माता - पिता के लिए बनाया गया है । इस परीक्षण में 56 पद हैं । इसके द्वारा माता - पिता की बच्चों के प्रति अभिवृत्ति जानी जाती है । इसकी विश्वसनीयता पुनर्परीक्षण विधि से ज्ञात की जो कि 52 से .65 प्राप्त हुई । इसके बाद अर्द्धविच्छित विधि से 69 से .75 ज्ञात की । इस परीक्षण से सम्बन्धित कोई परीक्षण नहीं है , इसलिए इस परीक्षण पर कसौटी सम्बन्धी वैधता ज्ञात की ।

 5. आर . आर . शर्मा ( 1988 ) माता - पिता उत्साहवर्द्धक मापनी ( PES ) - यह परीक्षण हायर सेकेण्डरी के छात्रों के लिए बनाया गया है । इसके द्वारा यह देखा जाता है कि करने की कोई समय सीमा निश्चित नहीं है , फिर भी छात्र इसे 25-30 मि . में पूरा कर लेने • माता - पिता अपने बच्चों का कितना उत्साहवर्द्धन करते हैं । इस परीक्षण में 40 पद हैं । इसको हैं । इस परीक्षण की विश्वसनीयता दो विधियों - पुनर्परीक्षण विधि और अर्द्धविच्छेदित विधि से ज्ञात की , जो कि क्रमशः .76 व .83 ज्ञात हुई । विषय - वस्तु सम्बन्धी वैधता ज्ञात की । इस परीक्षण में शतांशीय मानक भी ज्ञात किए । 

6. नलिनी रॉव ( 1986 ) माता - पिता बच्चों के सम्बन्धों की मापनी ( PCRS ) - यह परीक्षण 12-18 वर्ष के बालकों के लिए बनाया गया है । इस परीक्षण को हिन्दी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं में अलग - अलग बनाया गया है । इस परीक्षण में 100 पद है , जिनके द्वारा बच्चों को दोनों माता - पिता के बारे में अलग - अलग विचार प्रस्तुत करने होते हैं । इस परीक्षण की विश्वसनीयता पुनःपरीक्षण विधि से ज्ञात की , जो कि लड़कियों के समूह में 77 से .87 तथा लड़कों के समूह पर 77 से 87 ज्ञात हुई । वैधता ज्ञात की , जो कि .05 स्वर पर सार्थक सिद्ध हुई । माता - पिता में अपने बालकों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति जाग्रत करना ( To Develop Awareness in Parents for Accepting their Children ) . बच्चे अपने माता - पिता के प्यार में अपने आपको सुरक्षित महसूस करते हैं । अतः अपन बालकों के प्रति माता - पिता को दया नहीं दिखानी चाहिए और न ही उन्हें वेइज्जत तथा घृणित रूप से देखना चाहिए तथा न ही उन्हें ऐसे वालक होने का दुःख प्रकट करना चाहिए । उन्हें बालकों को वास्तव में प्यार करना चाहिए । न केवल ममता देनी चाहिए , बल्कि उनके सुधार के उपाय भी करने चाहिए । बालक को इस बात का आभास देना चाहिए कि वह परिवार का एक प्रिय सदस्य है , प्रत्येक व्यक्ति उसको चाहता है । माता - पिता को अपने बालक को संवेगात्मक रूप से स्वीकार करना चाहिए । उनके प्रति असन्तोष की भावना नहीं रखनी चाहिए । ऐसी अभिवृत्ति माता - पिता के लिए भी अच्छी होती है । चिकित्सक , मनोवैज्ञानिक , शिक्षा शास्त्री तथा समाज - सेवक को बहुधा उन माता - पिता को शिक्षित करना पड़ता है , जो अपने बालकों को स्वीकार नहीं करते हैं । ऐसी स्थिति में उन विभिन्न विधियों का प्रयोग करना चाहिए • जिससे माता - पिता अपने बालकों को स्वीकार करने लगे । 


अनेक ऐसी विधियाँ हैं , जिनके द्वारा माता - पिता अपने बालकों को वस्तुनिष्ठ रूप से स्वीकार करने लगते हैं

 1. सबसे पहले माता - पिता में यह भावना लानी चाहिए कि कोई भी दुनिया में एक साथ वड़ा विद्वान , खिलाड़ी , वक्ता , संगीतकार आदि नहीं होता है । हमें जो प्राप्त हो गया है । उसी के साथ रहना पड़ता है । यह सत्य है कि कोई व्यक्ति लम्बा होना चाहता है तो कोईछोटा , कोई संगीतकार बनना चाहता है तो कोई सुन्दर । परन्तु प्रौढ़ता का चिन्ह है कि मनुष्य को जो कुछ प्राप्त होता है , उसे स्वीकार कर लेता है । यदि मनुष्य एक - दूसरे को सिर्फ इसलिए है । अतः इन विचारों को ध्यान में रखकर माता - पिता को हमेशा अपने बच्चों को स्वीकार स्वीकार करें कि वह पूर्ण नहीं है तो मनुष्य अकेला रह जाएगा क्योंकि कोई भी पूर्ण नहीं करना चाहिए । 

2. यदि कोई बालक अक्षम भी है तो भी उसके माता - पिता को इस बात से अवगत कराना चाहिए कि उन्हीं की समस्या दुर्लभ या अनोखी नहीं है , बल्कि अनेक माता - पिता के समक्ष यह समस्या है ।

 3. अध्यापक माता - पिता को जीवन का प्रजातान्त्रिक विचार बताकर उन्हें अपने बालकों की ओर उन्मुख कर सकते हैं ।

 4. कुछ माता - पिता जीवन की समस्याओं के प्रति धार्मिक विचार रखते हैं , उन्हें यह बताना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति भगवान का बालक है । अतः उसके प्रति प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि उसका सम्मान करे और उसके विकास का प्रयत्न करें ।

 5. माता - पिता को इस बात से अवगत कराना चाहिए कि बालक की अक्षमता उसकी उन्नति नहीं रोकती , वल्कि हीन भावना मार्ग रोकती है । इस हीन भावना के उत्पन्न होने में माता - पिता का बहुत बड़ा हाथ रहता है , जिससे बालक अति संवेदनशील बन जाता है और उसमें शर्म , स्व- दया आदि दुर्गुण आ सकते हैं । अधिकतर माता - पिता यह चाहेंगे कि उनका बालक अधिक अक्षम न बने । इसके लिए उन्हें बालकों को हीन भावना से बचाना चाहिए ।

 6. माता - पिता को यह भी समझना चाहिए कि वह अपने बच्चों से उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार ही आशा करें । साथ ही इस बात की ओर ध्यान देना चाहि कि उनका बालक क्या बन सकता है ।

 7. माता - पिता को अपने बालकों के लिए यह नहीं सोचना चाहिए कि उनका बालक कभी ठीक नहीं हो पाएगा । उन्हें यह सोचना चाहिए कि यद्यपि बालक का एक अंग नहीं है पर उसके अन्य अंग तो ठीक हैं । उन्हें हमेशा आशावान रहना चाहिए । 

8. जो माता - पिता अपने व्यक्तिगत तनाव का दोषारोपण बच्चों पर करते हैं , उन माता पिता में समझ का विकास करना चाहिए ।

 9. अध्यापक तथा समाज - सेवक को चाहिए कि वह माता - पिता को बालक की सामाजिक , मानसिक , शारीरिक , संवेगात्मक और आर्थिक आवश्यकताओं से अवगत कराए । उन्हें यह भी बताना चाहिए कि बालक अपनी इच्छाओं के अनुसार अपना जीवनयापन करना चाहते हैं । वे दूसरों से प्रशंसा और सुरक्षा चाहते हैं । बालकों की इन विभिन्न आवश्यकताओं के प्रति जागरूक रहना माता - पिता का कर्तव्य है । यदि माता - पिता को उपर्युक्त विधियों से अवगत करा दिया जाए तो जो माता - पिता अपने बच्चों का तिरस्कार करते हैं वह काफी कम हो सकता है ।