मन्दितमना बालकों की शिक्षा व्यवस्था परक निबन्ध लिखिए । अथवा मन्दितमना बालकों की शिक्षा का पाठ्यक्रम किस प्रकार का होना चाहिए ?
( 1 ) बालक को स्वतन्त्रतापूर्वक उत्तरदायित्व के कार्यों को करने के लिए प्रोत्साहित
( 2 ) उसमें सुरक्षा की भावना को विकसित करना ।
( 3 ) उसकी उपलब्धियों पर उसकी प्रशंसा करना ।
( 4 ) वाचन , पठन व लेखन का अनवरत् अभ्यास करना तथा मन्दिता के स्तर के अनुसार अन्य शैक्षणिक योग्यताएं विकसित करना ।
( 5 ) अभ्यास के अनुभव की ओर निर्देशित करना ।
( 6 ) बालक को अपने दैनिक कार्यों को स्वयं कुशलतार्वक करने का प्रशिक्षण देना ।
( 7 ) अपनी मानसिक आयु से अधिक उच्च मानसिक आयु के बालकों के साथ विभिन्न क्रियाकलापों में भाग लेना उसकी सामाजिक , शारीरिक एवं संवेगात्मक प्रगति के लिए उत्साहवर्धक रहता है ।
( 8 ) व्यावसायिक अभिवृत्ति की ओर उन्मुख करना ।
( 9 ) नियमित डॉक्टरी जाँच व मनोवैज्ञानिक परीक्षण के आधार पर उपचारात्मक व्यायाम व अभ्यास कराना ।
( 10 ) विद्यालयों में इनके लिए विशेष शिक्षा की व्यवस्था करना ।
( 11 ) इनके विकासात्मक इतिहास का अभिलेख तैयार करना ।
( 12 ) माता - पिता तथा शिक्षकों द्वारा इस क्षेत्र के विशेषज्ञों से इनके विकास के अधिकतम सम्भव स्तर का ज्ञान प्राप्त करके उसके अनुरूप इनकी विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धि के लक्ष्य निर्धारित करना ।
( 13 ) अवसामान्यता का स्तर अधिक होने पर उचित सुरक्षापूर्ण देखभाल की व्यवस्था करना ।
( 14 ) व्यवहार चिकित्सा ( Behaviour therapy ) के द्वारा इनमें वातावरण के साथ अनुकूलन की योग्यता विकसित करना । उपर्युक्त उपायों के द्वारा यद्यपि मन्दितमना बालकों को सामान्य मानसिक योग्यता का बालक नहीं बनाया जा सकता है , फिर भी उनके मानसिक मन्दन के अनुरूप उन्हें समाज में कुछ उपयोगी योगदान देने तथा स्वयं स्वावलम्बी बनने में सहयोग दिया जा सकता है
मन्दितमना बालकों के लिए शिक्षा व्यवस्था ( Educational Provision for Mentally Retarded Children ) मानसिक मन्दिता बालक के शारीरिक , शैक्षिक , सामाजिक , व्यावसायिक एवं सांवेगिक आदि सभी क्षेत्रों में विकास को किसी न किसी स्थिति तक निश्चित रूप से प्रभावित करती है । मन्दिता की पहचान एवं निदान के पश्चात् बालक को उसकी मन्दिता के स्तर व प्रकृति के अनुरूप शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से विशेष शिक्षा की व्यवस्था निम्न रूपों में की जा सकती है
- 1. आवासीय विद्यालय ( Residential Schools ) दुःसाध्य रूप से मन्दितमना वालकों को घर अथवा सामान्य विद्यालयों में शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान करना पूर्णतया असम्भव होता है । अतः इन्हें सुसज्जित अस्पताल विद्यालय ( well equipped hospital - cum - schools ) में ही रखा जाना चाहिए , जहाँ पर इनकी देखभाल करने के लिए योग्य परिचारिकाएँ तथा चिकित्सक नियुक्त होते हैं , क्योंकि ये बालक अपने स्वयं के दैनिक कार्यों को भी नहीं कर पाते हैं , इन्हें सम्पूर्ण जीवन ऐसी संस्थाओं में ही व्यतीत करना होता है । कुछ विद्वन परीक्षण एवं शिक्षा ग्रहण करने योग्य ( trainable and educable ) मन्दितमना बालकों के लिए भी पृथक् विद्यालयों की व्यवस्था को उचित मानते हैं । इस प्रकार की व्यवस्था बालकों के समायोजन की दृष्टि से तो उत्तम होती है , किन्तु अन्य क्षेत्रों में बालकों के विकास एवं प्रगति को अवरुद्ध करती है । बालक का सामान्य बालकों से सम्पर्क टूट जाता है और जो अनेक क्रियाएँ वह अनुकरण से सीख सकता है , नहीं सीख पाता । अतः आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था अत्यधिक मन्दिता वाले बालकों के लिए ही उचित रहती है ।
2. विशेष विद्यालय ( Special Schools ) विशेष विद्यालयों की व्यवस्था अत्यधिक मन्दिता वाले तथा प्रशिक्षण योग्यता मन्दितमना बालकों के लिए आवासीय विद्यालय व्यवस्था से अधिक व्यावहारिक एवं उपयोगी मानी जाती है । इसमें बालक एक निश्चित अवधि के लिए ही विद्यालय जाता है , शेष समय वह अपने परिवारीजनों तथा साथियों के सम्पर्क में ही व्यतीत करता है । इस प्रकार वह विशेष शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्राप्त करने के साथ - साथ सामाजिक रूप से भी प्रगति करता है । इन विद्यालयों में सन्दितमना बालकों की आवश्यकता , योग्यता स्तर तथा आयु के अनुरूप पृथक् प्रकार का कक्षा विभाजन होता है । बालकों की विद्यालयीन आयु ( School - age ) में छूट ( relaxation ) रखी जाती है । इसके अतिरिक्त विशेष रूप से प्रशिक्षित अध्यापकों , परिचायिकाओं एवं समाज सेवियों की सेवाएँ इन विद्यालयों को उपलब्ध रहती हैं ।
3. विशेष कक्षा ( Special Classes ) सामान्य विद्यालयों में न्यून मन्दितमना बालकों के लिए पृथक् रूप से विशेष शिक्षा की व्यवस्था , विशेष कक्षाओं के रूप में की जा सकती है । ऐसे विद्यालयों में जहाँ मन्दितमना बालकों की संख्या अधिक नहीं होती है बालक केवल कुछ समयावधि के लिए विशेष कक्षा में अपनी योग्यता के अनुरूप शिक्षण एवं प्रशिक्षण पाते हैं । शेष समय वे औसत वालकों के साथ ही सामान्य कक्षाओं में रहते हैं । यह व्यवस्था अनुशासन की दृष्टि से दोषपूर्ण रहती है । मन्दितमना बालकों की संख्या अधिक होने पर सामान्य विद्यालयों में ही उनके लिए पूर्णरूप से पृथक् समजातीय ( homogenous ) कक्षा की व्यवस्था सर्वोत्तम शिक्षा व्यवस्था मानी जाती है । इसमें समान वर्ष - आयु एवं मानसिक आयु वर्ग के बालक एक ही कक्षा में पूरी अवधि के लिए रहते हैं । इस प्रकार शिक्षा के द्वारा समान कार्यक्रम निर्धारित करना एवं समान गति से समान लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षण सामग्री व पाठ्यक्रम को व्यवस्थित करना सरल हो जाता है तथा वालक का उसकी योग्यता के अनुरूप विकास उत्तम गति से होता है । मन्दितमना बालकों की शिक्षा ( Education of Mentally Retarded Children ) सभी स्तर एवं प्रकृति के मन्दितमना बालक शिक्षा ग्रहण योग्य नहीं होते हैं । केवल न्यून मन्दित वाले ( बुद्धि लब्धि 50 से 75 ) कुछ प्राथमिक कक्षाओं को पास करने की योग्यता रखते हैं । सीमित मन्दिता वाले ( बुद्धि लव्धि 25 से 50 ) कठिन परिश्रम के पश्चात् केवल पढ़ना व लिखना सीख पाते हैं अन्यथा उन्हें कुछ विना कौशल वाले कार्यों का प्रशिक्षण देना ही सम्भव होता है । जड़ बुद्धि ( बुद्धि लब्धि 25 से कम ) पूरी तरह निर्भर होते हैं तथा स्वयं के कार्य भी नहीं कर पाते हैं । अतः केवल प्रथम दो समूहों के बालकों को शिक्षा प्रदान की जा सकती है - ( I ) शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना बालक ( Educable Mentally Retarded Children ) शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना बालकों की मानसिक आयु औसत बालकों की मानसिक आयु से सार्थक रूप से कम होती है । इसके लिए शिक्षा के उद्देश्य तथा पाठ्यक्रम का निर्धारण उनकी शिक्षा का प्रथम व सबसे महत्वपूर्ण चरण है ।
1. उद्देश्य एवं लक्ष्य - शिक्षा के उद्देश्य एवं लक्ष्य की दृष्टि से मन्दितमना एवं सामान्य बालकों में कोई अन्तर नहीं होता है । दोनों की शिक्षा के मुख्य व विस्तृत उद्देश्य बालक में
( i ) सामाजिक कौशलों ,
( ii ) व्यक्तिगत योग्यता ( personal adequacy ) व
( iii ) व्यावसायिक कौशलों का विकास करना है । यहाँ सामाजिक कौशल से तात्पर्य व्यक्ति / बालक विशेष का अपने साथियों , परिवार , विद्यालय व पड़ोसियों के साथ समायोजन से है । व्यक्तिगत योग्यता का अर्थ बालक में स्वयं सन्तुलित अवस्था में स्वतन्त्रतापूर्वक जीवन व्यतीत कर सकने की योग्यता है । व्यावसायिक कौशल से तात्पर्य वालक की उस योग्यता से है , जिसके द्वारा वह अपने को पूर्ण या आंशिक रूप से उत्पादक क्रिया द्वारा सहारा दे सके । इसके अतिरिक्त किर्क एवं जोनसन ने शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना वालकों के लिए शिक्षा के मुख्य 8 उद्देश्य बताए हैं
( 1 ) सामाजिक कौशल का विकास ।
( 2 ) बालक में व्यावसायिक कौशलों का विकास करना ।
( 3 ) उत्तम मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के द्वारा वालक में स्वतन्त्र व्यवहार व संवेगात्मक सुरक्षा का विकास करना ।
( 4 ) उत्तम स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों के द्वारा स्वास्थ्य एवं आरोग्यता की आदतों का विकास करना ।
( 5 ) निम्नतम शैक्षिक योग्यता ( पढ़ना , लिखना व सरल गणित ) का विकास करना ।
( 6 ) खाली समय में अपने आपको मनोरंजन एवं अन्य क्रिया - कलापों में व्यस्त रखने की समर्थता का विकास ।
( 7 ) पाठ्यक्रम के द्वारा उनमें परिवार में अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करने को योग्यता का विकास करना ।
( 8 ) सामुदायिक गतिविधियों के द्वारा उन्हें समुदाय का एक क्रियाशील सदस्य बनाना ।
2. पाठ्यक्रम- अवसामान्य मानसिक विकास होने के कारण शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना बालक , सामान्य बालकों के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम से किसी भी प्रकार कोई लाभ नहीं उठा सकते हैं । अतः इनके मन्दिता के स्तर , आवश्यकताओं तथा शिक्षा के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए इनके लिए पाठ्यक्रम का निर्धारण करना चाहिए । इस प्रकार इसमें केवल शैक्षिक विषयों का समावेश ही नहीं किया जाए , वरन् विभिन्न पाठ्य सहगामी तथा पाठ्यान्तर क्रियाओं और व्यावसायिक विषयों को भी उचित स्थान दिया जाए । इसके अतिरिक्त इनका पाठ्यक्रम अत्यधिक सरल एवं इनकी योग्यता स्तर के क्रम में व्यवस्थित किया जाना चाहिए । ये स्तर निम्न प्रकार से हो सकते हैं
( i ) प्राथमिक स्तर पाठ्यक्रम ( Primary Level Curriculum ) - 3 से 8 वर्ष आयु तक इस स्तर के पाठ्यक्रम के मुख्य उद्देश्य वालकों में
( अ ) अपनी देखभाल स्वयं करना ,
( व ) समन्वय ,
( स ) हस्तादि का प्रयोग ( manipulation of objects ) ,
( द ) दूसरों को सम्मान व सहयोग देना , तथा
( य ) वाक् शक्ति का विकास करना आदि हैं । इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए इन बालकों को वस्त्र पहनना , स्वच्छता , शौच की आदतों आदि का प्रशिक्षण , सामूहिक गान तथा स्पष्ट उच्चारण अभ्यास के द्वारा वाक् - शक्ति का विकास तथा अच्छी आदतों का प्रशिक्षण दिया जाता है ।
( ii ) माध्यमिक स्तर पाठ्यक्रम ( Middle Level Curriculum ) – 6 से 18 वर्ष आयु तक इस स्तर के पाठ्यक्रम के अन्तर्गत पठन , लेखन , गणित से लेकर सामान्य कक्षाओं के कक्षा 8 या 9 तक के पाठ्यक्रम के विषयों को कठिनता क्रम से रखा जा सकता है । इसके अतिरिक्त अर्द्ध - कौशल व बिना कौशल के कार्यों का प्रशिक्षण भी इस स्तर पर दिया जा सकता है । खाली समय का सदुपयोग करना सिखाने के उद्देश्य से विभिन्न खेल - कूद , नाटक , कला , हस्तकला , गायन तथा सामाजिक सदस्यता वाले क्रिया - कलापों का प्रशिक्षण दिया जाता है ।
( iii ) वयस्क स्तर पाठ्यक्रम ( Adult Level Curriculum ) - 15 वर्ष आयु से स्तर बहुत कम होता अधिक इस स्तर की शिक्षा केवल उन बालकों / व्यक्तियों को दी जाती है , जिनमें मन्दिता का जैसे- मन्द बुद्धि व न्यून बुद्धि वालकों में इनके पाठ्यक्रम में व्यावसायिक कुशलता तथा नागरिकता से सम्बन्धित विषय भी सम्मिलित रहते हैं ।
3. शिक्षक एवं शिक्षण पद्धति- प्रशिक्षण योग्य मन्दितमना बालकों को शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित एवं दक्ष शिक्षकों की आवश्यकता होती है , क्योंकि इन वालकों की अपनी एक विशेष प्रकार की आवश्यकताएँ होती हैं तथा विकास की गति अत्यन्त मन्द होती है । अतः इनके शिक्षक के लिए यह आवश्यक है कि उसे वाल - मनोविज्ञान तथा विभिन्न शिक्षण विधियों एवं तकनीकियों का ज्ञान हो । इसके साथ ही उसके व्यक्तित्व में सहनशीलता एवं धैर्य जैसे गुणों का समावेश हो , जिससे कि वह कक्षा में उत्पन्न किसी प्रकार की समस्या सरलता से हल कर सके । इसके अतिरिक्त , विभिन्न शिक्षण विधियों का प्रयोग पाठ्यक्रम को स्तर के अनुरूप किया जाना चाहिए तथा विधि का चुनाव करते समय बालक की कठिनाइयों , अन्य अक्षमताओं , आवश्यकताओं आदि का ध्यान रखना चाहिए अर्थात् शिक्षण बाल केन्द्रित होना चाहिए । विषय को उदाहरणों , रंगीन चित्रों , कहानियों , कविताओं आदि के माध्यम से रुचिकर ढंग से पढ़ाना चाहिए । विषय - वस्तु को सूक्ष्म इकाइयों में विभक्त करके सामूहिक एवं व्यक्तिगत रूप से पढ़ाना शिक्षण को अधिक प्रभावी बना सकता है ।
( II ) प्रशिक्षण योग्य मन्दितमना बालक ( Trainable Mentally Retarded Children ) प्रशिक्षण योग्य मन्दितमना वालक शिक्षा पाने योग्य मन्दितमना बालकों से बौद्धिक रूप से और भी निम्न होते हैं । अतः उनके समान शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते । इनके लिए शिक्षा की व्यवस्था पृथक् कक्षाओं या विद्यालय में करनी पड़ती है तथा अथक परिश्रम के पश्चात् ये केंवल पढ़ना व साधारण गणित ही सीख पाते हैं । इनकी शिक्षा मुख्य रूप से विभिन्न आदतों तथा कौशलों के प्रशिक्षण पर केन्द्रित रहती है ।
इनकी शिक्षा का प्रावधान करते समय निम्न बातें विशेष तौर पर ध्यान रखने योग्य हैं
( 1 ) इन बालकों को सही पहचान निदान इनकी शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण कारण है । इसके लिए विशेषज्ञों व वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाना ही सर्वोत्तम रहता है ।
( 2 ) इन बालकों की कक्षा का आकार सूक्ष्म ( छः से पन्द्रह बालक तक ) रखा जाए ।
( 3 ) इनको विद्यालय ले जाने तथा विद्यालय से घर लाने के लिए उचित आवागमन के साधन उपलब्ध कराए जाएँ ।
( 4 ) जहाँ तक सम्भव हो , एक कक्षा में लगभग एक ही वर्षायु वर्ग के बालक रखे जाएँ । कक्षा अध्यापन में समान आयु एवं समान मानसिक परिपक्वता का ध्यान रखना चाहिए ।
( 5 ) उनके लिए पृथक् शिक्षा उद्देश्य निर्धारित किए जायें जो कि उनको आवश्यकताओं व क्षमताओं के अनुरूप हों ।
( 6 ) विशेष रूप से परिमार्जित पाठ्यक्रम का अनुकरण किया जाए ।
( 7 ) इनकी कक्षा अथवा विद्यालयों में विशेष रूप से प्रशिक्षित अध्यापक नियुक्त किए जायें ।
( 8 ) इन बालकों के माता - पिता को इनकी विभिन्न क्षमताओं व आवश्यकताओं से रूप से सत्यता के साथ परिचित करा दिया जाए ताकि इनको प्रशिक्षित करने में उनका पूर्ण सहयोग रहे ।
शिक्षा का उद्देश्य - प्रशिक्षण योग्य मन्दितमना बालकों को शिक्षित करने के लिए निर्मित पाठ्यक्रम के तीन सामान्य उद्देश्य होने चाहिए
( 1 ) स्व - सहायता ( self - help ) की योग्यता का विकास ,
( 2 ) घर व समाज में समायोजित होने की क्षमता का विकास तथा
( 3 ) आर्थिक उपयोगिता ( economic usefulness ) का विकास । पाठ्यक्रम - निम्न मानसिक स्तर के कारण इन बालकों में किसी भी प्रकार के शैक्षिक व व्यावसायिक कौशलों का विकास असम्भव होता है । स्व - सहायता की योग्यता का विकास करना इनकी शिक्षा एवं प्रशिक्षण का मुख्य भाग है । इसके लिए सर्वप्रथम सांवेदिक प्रशिक्षण ( sensory training ) दिया जाता है , जिससे यह छूकर , देखकर , सूँघकर , चखकर तथा सुनकर स्थितियों एवं वस्तुओं में भिन्नता का अनुमान कर सकें । ये स्वयं अनी देखभाल कर सकें । इसके लिए इनको वस्त्र पहनना , उतारना , ठीक प्रकार से भोजन ग्रहण करना , गुसल करना , शौच जाना , स्वच्छ रहना तथा विभिन्न दैनिक कार्यों को नियमित दिनचर्या के साथ पूरा करना सिखाया जाता है । सामाजिक कौशल के नाम पर ये अभिनन्दन करना , उचित समय पर हँसना , बोलना , किसी वस्तु की माँग करना सीख जाते हैं । इसके अतिरिक्त निरन्तर अभ्यास व अथक् परिश्रम के द्वारा इनको अपने साथियों , परिवारीजनों तथा सहपाठियों के साथ समायोजित करना भी सिखाया जा सकता है । इन बालकों में आर्थिक - उपयोगिता ( economic - usefulness ) का विकास करने के उद्देश्य से किसी प्रकार के व्यावसायिक कौशलों का प्रशिक्षण देना असम्भव होता है । लेकिन घर के कार्यों में प्रशिक्षित कर दिए जाने पर वह अपने समय व शक्ति का प्रयोग उपयोगी रूप में कर सकते हैं । इसके लिए इनको कक्षाओं में विभिन्न बिना कौशल ( unskilled ) के कार्यों , जैसे- चीजों को व्यवस्थित करना , कपड़े व वर्तन धोना , सफाई करना , पौधों में पानी देना , सब्जियाँ व फूल चुनना , सरल कटिंग के कार्य करना तथा बाजार से कुछ आसान खरीदारी करना आदि का प्रशिक्षण दिया जा सकता है । मानसिक न्यूनता के कारण इनमें लिखने , पढ़ने व गणित की योग्यता नाममात्र को तथा बहुत विलम्ब से विकसित हो पाती है । अतः पाठ्यक्रम के उच्चतम स्तर पर इनको विभिन्न संकेतों जैसे- ठहरो , खतरा है , सड़क बन्द है , पीछे हटो , वचाओ , विभिन्न वस्तुओं के नाम आदि को पढ़ना तथा अत्यन्त साधारण स्तर के जोड़ , घटाने व . गिनती करने का अभ्यास कराया जा सकता है । शिक्षक इन बालकों की शिक्षा केवल विभिन्न योग्यताओं के प्रशिक्षण को ही अपने में समाहित करते हैं अतः इनके लिए शिक्षक का विशेष योग्यता वाला होना आवश्यक नहीं है , किन्तु उसे मन्दितमना बालकों को शिक्षित एवं प्रशिक्षित करने की विधियों में पूर्ण रूप से कुशल होना चाहिए । इसके अतिरिक्त उसे इन वालकों के मनोविज्ञान का विस्तृत ज्ञान , सामान्य चिकित्सीय ज्ञान तथा निरन्तर परिश्रम की क्षमता व धैर्य शिक्षक के मुख्य लक्षण होने चाहिए ।