भावपूर्ण विद्यालय प्रबन्ध के सिद्धान्त बताइये । Describe principles of effective school managemant .
प्रभावपूर्ण विद्यालय प्रबन्धन के सिद्धान्त ( Principles of Effective School Management ) प्रभावपूर्ण विद्यालय प्रवन्ध के प्रमुख सिद्धान्त निम्नलिखित हैं
1. आधारभूत दर्शन - विद्यालय के प्रत्येक कर्मचारी वर्ग को शिक्षा एवं विद्यालय के उद्देश्य स्पष्ट हों । यह उचित ही कहा गया है कि " सत्र के आरम्भ में ही प्रत्येक को यह स्पष्ट कर दिया जाये जिससे कोई भी संदेह में न रहे कि विद्यालय क्या करना चाहता है या क्या प्राप्त करना चाहता है । "
2. प्रजातांत्रिक प्रबन्ध - एक दक्षतापूर्ण प्रबन्ध को प्रजातांत्रिक प्रबन्ध के सिद्धान्तों पर आधरित होना चाहिए जैसी कि चर्चा की गई है ।
3. आँकड़ों का वैज्ञानिक संग्रहण- इसका यह आशय है कि विद्यालय वृत्त ( रिकॉर्ड ) को उचित ढंग से रखा जाये और उन्हें हर प्रकार पूर्ण और शुद्ध होना चाहिए । इस दिशा में कोई कमी सारे संगठन की योजना को उलट सकती है । प्रबन्धक को , जो कि विद्यालय का प्रधान है , विद्यालय प्रवन्ध के इस पक्ष पर विशेष ध्यान देना चाहिए ।
4. पाठ्यक्रम को छात्र के विकास का साधन मानना- छात्र विभिन्न प्रकार की रुचि , योग्यता और सुझाव प्रदर्शित करते हैं , अतः पाठ्यक्रम भी विविध एवं लोचदार होना चाहिए ।
5. अध्यापक वर्ग के व्यक्तित्व के प्रति आदर - अध्यापक वर्ग के व्यक्तित्व का आदर किया जाना चाहिए । अत्यधिक अनुरूपता अध्यापक वर्ग का यंत्रीकरण कर देती है । तथा पहल शक्ति , उत्साह और प्रयोग करने जैसी आवश्यक विकासशील शक्तियों को हानि पहुँचाती है ।
6. समन्वय - कार्यक्रम का नियोजन इस प्रकार किया जाना चाहिए कि सभी कर्मचारी एक समन्वित अंग की तरह कार्य करें ।
7. उत्तदायित्वों में सहभागिता होना- अध्यापक वर्ग का पूर्ण सहयोग एवं सहायता प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि विद्यालय का प्रधान नीतियों के निर्माण एवं उनके परिचालन हेतु अध्यापक वर्ग को भी उसमें सम्मिलित करें ।
8. विद्यालय सामग्री का दक्षतापूर्ण उपयोग - विद्यालय व्यवस्था क्या है ? विद्यालय सामग्री से हमारा आशय भवन , अध्यापक एवं छात्रों से है । विद्यालय के अध्यापक वर्ग के कार्य विभाजन का बंटवारा अध्यापकों की योग्यता और अनुभव के आधार पर किया जाये । एक अच्छी समय - सारणी , प्रधानाध्यापक को विद्यालय भवन का उत्तम उपयोग करने में सहायक होगी ।
9. वित्त का न्याययुक्त उपयोग - विद्यालय अधिकारियों के हाथ में विद्यालय वित्त ट्रस्ट के रूप में है , धन का अपव्यय ही अनेकों समस्याओं का कारण हो सकता है , विशेष रूप से बाल - निधि का जो कि छात्रों में अनुशासनहीनता उत्पन्न कर सकता है । अत : यह बहुत , आवश्यक है कि बाल - निधि को छात्रों के ही हित में व्यय किया जाय ।
10. लक्ष्य निर्धारण तथा योजना - सत्रानुसार कार्यक्रम निश्चित कर लेना चाहिए । सम्पूर्ण वर्ष का पाठ्यक्रम उचित भागों में बाटा जाना चाहिए ।
11. आवधिक निरीक्षण - आवधिक एवं मासिक निरीक्षण करते रहना चाहिए जिससे छात्रों एवं अध्यापकों की उन्नति का ज्ञान हो सके तथा नीतियों की सफलता पर सोच - विचार किया जाये ।
12. लचीलापन - इस बात पर बल दिया जाना चाहिए कि प्रबन्ध साधन है न कि साध्य , इसे साध्य के ऊपर अधिकार नहीं करना चाहिए । साध्य तो वालगक के व्यक्तित्व का बहुमुखी विकास है । पाठ्यक्रम अध्यापन - विधि , परीक्षा , समय - सारणी , वास्तव में विद्यालय प्रबन्ध का प्रत्येक पक्ष इस साध्य के लिए लगा है । अत : यह उचित है कि प्रवन्ध को लचीला रखा जाये । एच.जी. स्टीड ( H.G. Stead ) ने ठीक ही कहा है कि प्रबन्ध को तरल होना चाहिए , अध्यापकों को अपनी अध्यापन - विधि का प्रयोग करने का अधिकार होना चाहिए । इसी प्रकार छात्रों को भी अनेक नियम एवं बन्धनों के रूपों को मानने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए । ठीक ही कहा गया है कि स्व - अनुशासन डण्डे से प्राप्त नहीं किया जा सकता , इसे केवल प्रेम और सहानुभूति से प्राप्त किया जा सकता है । इसी प्रकार मासिक परीक्षाओं को भी सव कुछ नहीं समझ लेना चाहिए । ये केवल पूर्व वांछित साध्य के लिए साधन मात्र है । विद्यालय प्रबन्ध जो कि प्रत्येक पक्ष - छात्रों , अध्यापकों और प्रधानाध्यापक का सेवक है , उसे स्वामी का स्थान प्राप्त नहीं होना चाहिए ।
13. अध्यापकों की व्यावसायिक उन्नति - ऐसे मार्ग एवं साधनों की खोज की जानी चाहिए जिससे अध्यापक वर्ग की व्यावसायिक उन्नति हो ।
14. आशावादी सिद्धान्त - सम्पूर्ण प्रबन्ध की भावना मूलत : आशावादी होनी चाहिए ।
15. छात्रों का भाग लेना- विद्यालय कार्यक्रमों में विद्यार्थियों का भाग लेना भी आवश्यक है ।