सहायक सेवाएँ ( Support Services ) समझाइये । पाठ्य सहगामी क्रियाओं से क्या अभिप्राय है ? शालाओं में इनकी उपयोगिता What is meant by co - curricular activities ? Explain their utility in schools .

 

सहायक सेवाएँ ( Support Services ) समझाइये ।  पाठ्य सहगामी क्रियाओं से क्या अभिप्राय है ? शालाओं में इनकी उपयोगिता What is meant by co - curricular activities ? Explain their utility in schools . 

 निम्नलिखित पाठ्यान्तर क्रियाओं में से किन्हीं दो क्रियाओं पर प्रकाश डालिये -
( अ ) छात्र संघ या स्वशासन
( ब ) शैक्षिक परिभ्रमण
( स ) विद्यालय पत्रिका
( द ) नाट्याभिनय
( य ) स्कूल सभा ।

( अ ) छात्र संघ या स्वशासन ( Students Association ) छात्र स्वशासन का अर्थ है विद्यालय प्रबन्ध के लिये इस प्रकार की प्रणाली को अपनाया जाय जिसमें छात्र अधिक से अधिक भाग ले सकें , उसके प्रबन्ध का उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर उठा सकें । गुड के शिक्षा शब्द - कोष में इस प्रकार परिभाषा दी गयी है - " छात्र द्वारा स्वशासन समस्त छात्रों में से स्वयं छात्रों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा विद्यालय में प्रवन्ध एवं आचरण सम्बन्धी मामलों का विनिमय करता है ।
” छात्र स्वशासन के उद्देश्य एवं महत्व
1. आदर्श नागरिकता का विकास - छात्र स्वशासन का प्रमुख उद्देश्य छात्रों में आदर्श जाता है । नागरिकता का विकास करना है । इसके द्वारा छात्रों को प्रजातन्त्रात्मक प्रणाली का ज्ञान कराया
2. नेतृत्व के गुणों का विकास - स्वशासन का अन्य उद्देश्य छात्रों में नेतृत्व की शक्ति का विकास करना है । वे विद्यालय के छात्र संघ के सदस्य वनकर अपनी प्रतिभा का परिचय देने का प्रयास करते हैं तथा अपने साथियों को प्रभावित करके नेतृत्व करने की शिक्षा प्राप्त करते हैं ।
3. उत्तरदायित्व निभाने की क्षमता का विकास - छात्र संघ का संचालन कर छात्रों में उत्तरदायित्व निभाने की क्षमता का विकास होता है । वे सौपे गये कार्यों को ठीक प्रकार से पूरा करने का प्रयास करते हैं । इस प्रकार स्वशासन द्वारा उनमें उत्तरदायित्व निभाने को क्षमता का विकास होता है ।
4. आत्म नियन्त्रण की भावना का विकास - स्वशासन द्वारा बालकों में आत्म नियन्त्रण की भावना का विकास होता है । छात्र समय और धैर्य से छात्र संघ के नियमों का फालन करते हैं तथा अनुशासन के महत्व को समझते हैं । वे अपने साथियों को भी ऐसा ही करने के लिये प्रेरित करते हैं ।
5. पारस्परिक सहयोग की भावना का विकास - स्वशासन छात्रों को परस्पर सहयोग के महत्व का ज्ञान कराता है । वे परस्पर मिलकर काम करना सीखते हैं । विभिन्न समितियों का संचालन करते समय उन्हें यह ज्ञात होता है कि बिना परस्पर सहयोग के कोई कार्य ठीक प्रकार से नहीं हो सकता है ।
6. संगठनकर्ता के गुणों का विकास - स्वशासन छात्रों को संगठन करने की कला में दक्ष करता है । छात्र स्वयं विभिन्न पाठ्य सहगामी क्रियाओं का संचालन कर संगठन और  संचालन की शिक्षा प्राप्त करते हैं ।
7. नैतिक गुणों का विकास- इससे बालकों में नैतिकता के विभिन्न गुणों का विकास होता है । निष्पक्षता , कर्त्तव्य परायणता , सहानुभूति , सद्भावना , धैर्य , ईमानदारी , सहनशीलता आदि गुणों के विकास में स्वशासन का विशेष योगदान रहता है ।
8. अध्यापक छात्रों के सम्बन्धों में मधुरता - स्वशासन सम्बन्धी समस्त क्रियाएँ अध्यापकों के मार्गदर्शन में होती हैं , अतः छात्र उनके सम्पर्क में आते हैं और उनके गुणों से प्रभावित होते हैं ।
9. अनुशासन की समस्या का हल - उचित ढंग से संचालित स्वशासन विद्यालय में अनुशासन की समस्या को जन्म ही नहीं लेने देता । छात्र विद्यालय में अनुशासन स्थापना का उत्तरदायित्व स्वयं अपने ऊपर अनुभव करते हैं , अत : वे ऐसा कोई भी कार्य नहीं होने देते , जिससे विद्यालय में अनुशासनहीनता फैले । छात्र संघ ( परिषद ) का संगठन - स्वशासन को व्यावहारिक रूप प्रदान करने के लिये विद्यालय में एक ' विद्यालय सभा ' होनी चाहिए । जिसके सदस्य छात्रों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि तथा विर्नियुक्त सदस्य हों । विर्नियुक्त सदस्यों की नियुक्ति अध्यापकों के माध्यम से हो । विद्यालय सभा के अधीन 4 मण्डल हों , जिनके सदस्यों का निर्वाचन विद्यालय सभा द्वारा किया जाय ।
इन मण्डलों को निम्नलिखित उत्तरदायित्व सौपे जायें
( 1 ) अनुशासन ,
( 2 ) खेलकूद तथा व्यायाम ,
( 3 ) स्वास्थ्य सम्बन्धी क्रियाएँ , स्वच्छता तथा पौष्टिक आहार ,
( 4 ) सामाजिक कल्याण और उनसे सम्बन्धित क्रियाएँ : जैसे - साक्षरता प्रसार , समाज - सेवा , बाढ़ पीड़ितों की सहायता , शरणार्थियों की सहायता ,
( 5 ) पाठ्य सहगामी क्रियाएँ- इनमें वाद - विवाद , नाटक , प्रिय व्यापार , भ्रमण आदि क्रियाएँ सम्मिलित हैं ।

छात्र संघ ( परिषद ) के संगठन में सावधानियाँ - छात्र संघ ( परिषद ) के संगठन में निम्नलिखित सावधानियाँ ध्यान में रखनी चाहिए
( 1 ) ' छात्र संघ ' ( परिषद ) के हिसाब - किताब की समय - समय पर जाँच की जाय ।
( 2 ) सम्बन्धित अध्यापकों को अपना दृष्टिकोण सहानुभूति और सहयोग का रखना चाहिए । छात्रों के साथ तानाशाही का व्यवहार अनुचित है ।
( 3 ) प्रधानाध्यापक को यह बात ध्यान में रखने की है कि छात्र संघ ( परिषद ) किसी राजनैतिक दल के प्रभाव में न आ जाय ।
( 4 ) छात्र संघ की स्थापना के लिये जो कदम उठाये जायें धीरे - धीरे उठाये जायें । इस कार्य में शीघ्रता नहीं की जाय ।व
( 5 ) छात्र - स्वशासन का स्वरूप विद्यालय की आवश्यकताओं के अनुकूल हो ।
( 6 ) ‘ छात्र - संघ ' ( परिषद ) का स्वरूप न तो अधिक बड़ा हो और न अधिक छोटा ।
( 7 ) परिषद के चुनाव में किसी भी प्रकार का पक्षपात नहीं होना चाहिए । किसी वर्ग को महत्व नहीं दिया जाय ।
( 8 ) विद्यालय की ओर से ' छात्र संघ ' ( परिषद ) को हर प्रकार की सहायता प्रदान  की जाय ।
( 9 ) परिषद के सदस्यों को उत्साहित करने के साथ - साथ उन पर विश्वास भी किया जाय , परन्तु अनुचित कार्यों को तुरन्त रोका जाय ।

( ब ) शैक्षिक परिभ्रमण ( Educational Tour ) परिभ्रमण से हमारा अर्थ उन छोटी यात्राओं से है जो स्थानीय औद्योगिक , ऐतिहासिक , सांस्कृतिक तथा धार्मिक स्थानों को देखने के लिए गठित की जाती हैं । W.M.Gregory ने परिभ्रमण को शिक्षा में महत्वपूर्ण स्थान दिया है । उनके विचार में शिक्षा वास्तविक जीवन से बहुत दूर जा रही है और हमारे शिक्षालय छात्रों को अनुभव द्वारा शिक्षा प्राप्त करने के साधनों का बहुत ही कम प्रयोग करते हैं । उन्हें तो चाहिए कि ' शब्दों ' के स्थान पर अधिक क्रियाओं , वस्तुओं तथा अनुभवों द्वारा शिक्षा पाने के अवसर छात्रों को प्रदान करें । आधुनिक शिक्षालय में बाग का , दुकान का तथा भ्रमण का एक विशेष महत्व हैं । शैक्षिक परिभ्रमण के लाभ- शैक्षिक परिभ्रमण द्वारा छात्रों को निम्नलिखित पहुँचते
1. शिक्षा के काम का पूरक - अजायबघर , किले , मन्दिर , गुफा , पर्वत , नहर , खेत , घाटी आदि का परिभ्रमण सामाजिक ज्ञान का वास्तविक परिचय कराकर कक्षा के कार्य का पूरक सिद्ध होता है । विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए प्रयोगशाला तथा औद्योगिक कारखाने महत्वपूर्ण हैं । परिभ्रमण द्वारा बहुत से विषयों के पाठ रोचक , स्पष्ट , निश्चित तथा वास्तविक बन जाते हैं । विभिन्न विषयों का एक - दूसरे से यथार्थ सम्बन्ध स्थापित हो जाता है ।
2. स्कूलों की क्रियाओं में विभिन्नता आती है - छात्रों में परिभ्रमण द्वारा एक नया उत्साह आता है और कक्षा का नीरस जीवन रोचक बन जाता है ।
3. नेतृत्व के गुणों का निर्माण- परिभ्रमण में छात्रों को अनेक प्रकार के कार्यों का प्रबन्ध करना पड़ता है । प्रबन्ध करने के लिए योग्यता तथा बुद्धि चाहिए तथा छात्रों को स्वयं स्फूर्ति से कार्य करने का अवसर प्राप्त होता है । छात्रों में सहयोग की भावना आती है ।
4. स्थानीय ज्ञान - छात्र अपने वातावरण के बारे में अधिक ज्ञान प्राप्त कर वे स्थानीय वस्तुओं , व्यक्तियों संस्थाओं आदि के सम्पर्क में आते हैं ।
5. छात्रों में तीव्रता आती है - छात्रों की निष्क्रियता दूर होती है । वे कार्य में व्यस्त रहते हैं । उनकी इन्द्रियाँ व्यस्त रहती हैं और वे आविष्कारों का आनन्द लूटते हैं ।
6. सौन्दर्य भावना - परिभ्रमण छात्रों में सौन्दर्य भाव भरते हैं , उनके मन में प्राकृतिक वस्तुएँ देखने की इच्छा बढ़ती है । परिभ्रमण के प्रबन्ध कार्य - परिभ्रमण का पूरा - पूरा लाभ उठाने के लिए यह आवश्यक है कि उनकी योजना ढंग से की जाए । प्रबन्धकों को चाहिए कि परिभ्रमण करने से पहले परिभ्रमण सम्वन्धी स्थानों के बारे में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करें , जिससे उन्हें बालकों के प्रश्नों के उत्तर देने में सुगमता हो । इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि परिभ्रमण के दो लक्ष्य शिक्षा तथा विनोद साथ - साथ होने चाहिए । जहाँ तक सम्भव हो यात्रा - टोली में गायक , कहानी सुनाने वाले , फोटो लेने वाले छात्र होने चाहिए । ज्ञान प्राप्त करना तथा मनोरंजक साथ - साथ होने चाहिए । छात्रों को छोटी - छोटी टोलियों में बाँटकर प्रत्येक टोली का एक नेता नियुक्त करना चाहिए । भ्रमण - यात्रा में First Aid Box अवश्य साथ ले जाना चाहिए । प्रबन्धक इस बात का भी ध्यान रखें कि छात्र अनुशासन में रहें , यद्यपि हँसना - खेलना आदि भी है ।

( स ) विद्यालय - पत्रिका ( School Magazine ) विद्यालय - पत्रिका छात्रों में ' सामूहिक चैतन्यता ' के भाव उत्पन्न करने का प्रमुख साधन है । इससे छात्रों को अपने भाव प्रकट करने का अवसर मिलता है । इसके द्वारा छात्रों की लिखने की शक्ति बढ़ती है । छात्रों में साहित्यिक रुचि उत्पन्न होती है । स्कूल के कार्यों का प्रचार होता है । विद्वता बढ़ती है । स्कूल का इतिहास स्कूल पत्रिका में लिखा रहता है । पत्रिका प्रकाशन के व्यवसाय के लिए छात्रों को प्रारम्भिक ट्रेनिंग मिलती है । अभिरुचियों का विकास होता है । नये छात्रों को स्कूल की परम्पराओं से परिचय प्राप्त होता है । छात्रों में उत्तरदायित्व की भावना का विकास होता है । अभिभावकों तथा स्कूल में सम्वन्ध स्थापित होता है । सफलता के लिए सहायक बातें- छात्रों के लेख छपने से पहले शुद्ध किये जायें । स्कूल - पत्रिका में विभिन्न विषयों पर लेख छपने चाहिए । कविता , कहानी , निबन्ध , दोहे आदि होने चाहिए । आधुनिक समाचार भी अवश्य होने चाहिए । स्कूल के पाठ्यक्रम सम्बन्धी तथा सहपाठीय क्रियाओं का उल्लेख भी होना चाहिए । छात्रों में से ही सम्पादक चुने जाने चाहिए । लेख लिखने तथा उत्साह बढ़ाने के लिए छात्रों को पारितोषिक दिये जाने चाहिए । जहाँ तक हो सके शिक्षकों द्वारा लिखे हुए लेखों की संख्या कम हो । जिस स्कूल में चन्दे की कमी हो , वहाँ पर Wall Magazine की रचना अवश्य करनी चाहिए । स्कूल - पत्रिका में नामी छात्रों के कारनामे भी छपने चाहिए । अमुक छात्र ने परीक्षा में जिले अथवा राज्य में ऊँचा स्थान प्राप्त किया , अमुक छात्र वाद - विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आया या अमुक बालक जिले की एक मील की दौड़ में द्वितीय रहा आदि समाचार छपने चाहिए । यदि छात्रों के चित्र छप सकें तो बहुत ही अच्छा है विद्यालय की समस्त सभा सोसाइटियों का वार्षिक अथवा अर्द्ध - वार्षिक विवरण पत्रिका में छपना चाहिए । पत्रिका की छपाई अत्यन्त सुन्दर व आकर्षक होनी चाहिए ।

( द ) नाट्याभिनय ( Dramatization ) यह आत्म - अभिव्यक्ति का एक अति सुन्दर साधन है । इसके द्वारा विभिन्न विषयों के ज्ञान में समन्वय स्थापित होता है । नाट्य - अभिनय की तैयारी करते समय छात्रा की बोलने की शक्ति का विकास होता है । इतिहास का अध्ययन किया जाता है । महात्मा बुद्ध , चन्द्रगुप्त , विक्रमादित्य , गाँधीजी के जीवन पर नाटक खेलते हुए छात्र उनके जीवन से परिचय प्राप्त करते हैं । समय - समय पर जो वस्त्र अथवा पोशाक प्रचलित थीं , उनसे परिचित होते हैं । छात्रों का भौगालिक ज्ञान भी बढ़ता है । छात्र संगीत तथा नृत्य कला का प्रदर्शन करते हैं । छात्रों में नाटक की सफलता के लिए अपार उत्साह पाया जाता है वे सहयोग की भावना का महत्व सीखते हैं । छात्रों में सामूहिक चैतन्यता का विकास होता है । प्रत्येक छात्र शिक्षालय का मान बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक उत्साह दिखाता है । - अपनी - अपनी रुचि के अनुसार कार्य करने का अवसर छात्रों को मिल जाता है तथा उनके व्यक्तित्व का विकास होता है ।

( य ) स्कूल सभा ( School Assembly ) स्कूल सभा से हमारा तात्पर्य उस सामूहिक इकाई से है जिसमें शिक्षालय के सारे तथा शिक्षक इकट्ठे होते हैं । प्राय : स्कूल में प्रार्थना सभा के बाद ही शिक्षण कार्य प्रारम्भ किया जाता है । छात्र प्र इस गतिविधि द्वारा निम्नलिखित लक्ष्यों की प्राप्ति हो सकती है न
1. स्कूल में एकात्मकता लाना - स्कूल में कार्य कर रहे सभी वर्गों को एक साथ कार्य करने का अवसर मिलता है । जैसे एक परिवार के सदस्य समय - समय पर विचार विमर्श करते हैं , उसी प्रकार विद्यालय परिवार के सदस्य भी करते हैं ।
2. स्कूल के कार्य का ब्यौरा - सभा में इस बात की चर्चा होती है कि विभिन्न गतिविधियाँ किस प्रकार हो रही हैं । इससे छात्र स्कूल के सम्पूर्ण कार्य के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं ।
3. सामूहिक चेतना - स्कूल सभा द्वारा छात्र स्कूल के लक्ष्य तथा परम्परा से परिचित होते हैं । उनमें सामूहिक चेतना का भाव निर्मित होता है । छात्र स्कूल का संगठित रूप जानने का अवसर प्राप्त करते हैं ।
4. अच्छी आदतों का निर्माण - स्कूल सभा में छात्रों को ऐसी ट्रेनिंग मिल जाती है कि वे सभ्य सभा में बैठ सकें । उनमें धैर्य से वक्ताओं के विचार सुनने का अभ्यास होता है । किस समय पर ताली बजानी चाहिए आदि वातों का ज्ञान उन्हें प्राप्त होता है ।
5. प्रतिभा तथा उपलब्धि का उचित स्थान- ख्याति प्राप्त योग्य तथा प्रतिभासम्पन्न छात्रों के अच्छे कामों की प्रशंसा करके , दूसरे छात्रों में भी उत्साह उत्पन्न होता है ।
6. छात्रों की लज्जा दूर करना- स्कूल सभा के समय छात्र मंच पर आकर अन्य लजीले स्वभाव को दूर करते हैं । छात्रों , अध्यापकों एवं अतिथियों के सामने भाषण देकर अथवा गीत गाकर या और कार्य कर ।
7. प्रशासनिक समस्या को सभा में रखना- कभी - कभी स्कूल की समस्याओं को समस्त छात्रों के सामने रखा जाता है तथा उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया जाता है कि वे इन समस्याओं को दूर करने के लिए अध्यापक वर्ग का हाथ बटाएँ ।
8. छात्रों का ज्ञान बढ़ाना - संसार के बारे में छात्रों का ज्ञान बढ़ाया जा सकता है । अनुभवी तथा प्रसिद्ध व्यक्तियों के भाषण छात्रों का ज्ञान बढ़ाने में सहायक सिद्ध होते हैं ।
9. छात्रों की रुचियों के विकास के अवसर - सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने से विभिन्न रुचियों वाले छात्र उसमें भाग लेकर अपना विकास करते हैं ।
10. आध्यात्मिकता का भाव - स्कूल सभा में थोड़े समय के लिए प्रार्थना का होना होते हैं । आवश्यक है । इससे छात्रों में ईश्वर देश तथा प्राणीमात्र के प्रति अपने कर्त्तव्य के भाव जाग्रत स्कूल सभा कार्यक्रम के संचालन हेतु मार्गदर्शन संकेत -

निम्नलिखित प्रकार हैं
( 1 ) वर्ष में प्रत्येक छात्र तथा अध्यापक एक कार्यक्रम में अवश्य भाग ले ।
( 2 ) सभा में विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ हों  कार्यक्रम विख्यात व्यक्तियों द्वारा दिखाए जाएँ ।
( 3 ) कभी - कभी मनोरंजन कार्यक्रम भी रखा जाए । अच्छा होगा यदि इस प्रकार के
( 4 ) कार्यक्रम सुनियोजित हों । प्रशिक्षण दिया जाए ।
( 5 ) कार्यक्रम चलाने में छात्रों का सहयोग लिया जाए । कार्यक्रम चलाने में उन्हें
( 6 ) प्रधानाध्यापक अथवा सम्बन्धित शिक्षक द्वारा कार्यक्रम प्रदर्शित होने से पूर्व देख लिया जाना चाहिए , ताकि कोई आपत्तिजनक कार्य प्रदर्शित न किया जा सके ।
( 7 ) सभा में उचित अनुशासनिक वातावरण बना रहना चाहिए । तालियाँ उचित मात्रा में तथा अवसरानुकूल बजानी चाहिए ।
( 8 ) विशेष सभा सप्ताह में एक बार से ज्यादा नहीं होनी चाहिए ।
( 9 ) अच्छे कार्यक्रम पर बल दिया जाना चाहिए ।
( 10 ) जहाँ तक सम्भव हो छात्रों को सभा में प्रताड़ना तथा दण्ड नहीं देना चाहिए ।
( 11 ) कार्यक्रम का समय - समय पर मूल्यांकन किया जाना चाहिए । प्रधानाचार्य तथा स्कूल सभा - प्रशासनिक अधिकारी होने के नाते स्कूल के सभी कार्यों का उत्तरदायित्व उसी पर है । परन्तु उसका प्रयत्न होना चाहिए कि निर्देशन उसी का रहे और अध्यापक तथा छात्र अवसरानुकूल कार्यक्रम चलाते रहें । सभा के प्रत्येक कार्यक्रम के बारे में उसे पूरा ज्ञान होना चाहिए ।