अधिगम असमर्थी बालकों की शिक्षा में अध्यापक की भूमिका का वर्णन कीजिए । -
अधिगम बालकों की शिक्षा में अध्यापक की भूमिका ( Role of Teacher for LD Children ) अधिगम असमर्थी बालकों की समस्याओं का निराकरण करने में अध्यापक निम्नलिखित योगदान दे सकते हैं और इन भूमिकाओं का निर्वाह कर सकते हैं अधिगम असमर्थी बालकों का प्रबन्धन ( Managing the LD Children ) - अधिगम बाधित बालकों को उनकी बाधिता के अनुरूप एक या अधिक क्षेत्रों में अध्यापक के शिक्षण तथा मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है । विशेषज्ञ अध्यापक की उपस्थिति , अनुपस्थिति इस तथ्य पर निर्भर करती है कि नियमित कक्षा अध्यापक अनुदेशनों को किस सीमा तक प्रयोग करते हैं । यह सत्य है कि नियमित कक्षाध्यापक तथा विशेषज्ञ अध्यापक के बीच सहयोगात्मक कार्य सम्बन्ध होना चाहिए । सामान्य तथा विशेषज्ञ अध्यापक को उनके कार्य क्षेत्र के अनुसार कार्य करना चाहिए । किसको क्या कार्य करना होगा ? इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता है , फिर भी सामान्य अध्यापक अधिगम बाधित बालक की करने में अपना योगदान दे सकते हैं । समस्याओं को दूर कक्षाध्यापक सामान्य तथा बाधित दोनों प्रकार के बालकों का शिक्षण कार्य करता है ।
• उन्हें वालकों की व्यवहार सम्बन्धी विशेषताओं को देखने का अवसर मिलता है , वे अधिगम बाधित बालकों को पहचान सकते हैं तथा पहचान के आधार पर वे अधिगम बाधित बालको को विशेष अध्यापक की सहायता प्रदान कर सकते हैं तथा उनकी कठिनाइयों तथा समस्याओं को दूर करने में सहायक हो सकते हैं । यदि अध्यापक को यह ज्ञात हो कि उनकी कक्षा में अधिगम बाधित बालक है तो उन्हें विशेषज्ञ अध्यापक की सहायता व परामर्श से व्यवस्थित तथा अनुकूल अनुदेशन प्रयोग करने चाहिए । यदि अध्यापक उपलब्ध न हो तो नियमित अध्यापक को स्वयं अनुदेशनों का प्रयोग करना चाहिए । उन्हें इस तथ्य का ध्यान रखना चाहिए कि अधिगम बाधित बालकों को आधारभूत आवश्यक शिक्षण है , जो क्षण अधिगम बाधित बालकों के लिए उपयोगी है । वह सामान्य बालकों के लिए भी उपयोगी होगा । सामान्य तथा अधिगम बाधित वालकों के शिक्षण हेतु बहुत से आयाम हैं । अधिगम बाधित बालक विपरीत विशेषताओं वाले होते हैं । उन्हें विकास के भिन्न भिन्न स्तरों पर अपनी शैक्षिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विभिन्न प्रविधियों को आवश्यकता होती है । विद्यालयी स्तर पर बालकों की क्षमताओं को बढ़ाने , उन्हें आत्मनिर्भर बनाने तथा स्वयं कार्य करने की क्षमता का विकास कराने के लिए उन्हें उचित वातावरण प्रदान करना चाहिए , इस स्तर पर सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए , हानिकारक तथा अत्यधिक शीघ्र टूटने वाली सामग्री को वालकों से दूर रखना चाहिए । पूर्व प्रारम्भ स्तर पर बालकों की कक्षा शोर रहित , प्रकाश युक्त तथा साफ सुथरी होनी चाहिए । अधिगम वाधित बालकों को हानि रहित वातावरण में सामान्य शिक्षण तथा विशिष्ट शिक्षण दिया जाना चाहिए । ऐसे बालकों को कक्षा के मध्य में बैठाया जा सकता है ताकि अध्यापक का ध्यान उन पर केन्द्रित रह सकें । यद्यपि वालकों को छोटे - छोटे समूह व्यक्तिगत रूप में कार्य कर सकते हैं फिर भी साथी की सहायता वाले अनुदेशन कार्य तथा विशेष योजना को भी प्रयोग में लाना चाहिए । इसके लिए अध्यापक को अधिगम वाधित बालक के लिए अच्छे सामान्य साथी का चुनाव करना चाहिए । अधिगम बाधित बालकों के शिक्षण के लिए योजना का प्रारूप तथा अनुदेशनीय प्रक्रिया आवश्यक होते हैं । पाठ्यक्रम को क्रम तथा कार्यक्रम के आधार पर तैयार करना चाहिए ताकि अधिगम बाधित वालक इसको पढ़ सके । इस कार्य के लिए विश्लेषण प्रक्रिया उपयुक्त है । इसके आधार पर अध्यापक कार्यों को छोटे - छोटे खण्डों में बाँट सकते हैं तथा प्रत्येक स्तर पर विद्यार्थियों की सहायता कर सकते हैं । अध्यापक को प्रत्येक पाठ्य योजना के अन्त में सारांश प्रस्तुति अवश्य देनी चाहिए ताकि अधिगम बाधित बालक अपनी गति से पढ़ सकें । इससे उन्हें पढ़ने में सहायता मिलेगी । अधिगम बाधित बालकों के खाली समय के सदुपयोग करने के लिए उपकरणों व सामग्री की सहायता ली जा सकती है ताकि वालकों का समय व्यर्थ न हो तथा वह कुछ सीख सकें । अधिगम बाधित बालकों की शैक्षिक क्षति तथा असफलताओं को दूर करने के लिए विभिन्न विशिष्ट शैक्षिक प्रक्रियाएँ हैं , इसमें से एक सामान्य पद्धति अधिगम आव्यूह है । इस पद्धति के अन्तर्गत वालकों को अधिगम प्रक्रिया जिसमें स्वयं अनुदेशन तथा मौखिक रूप के द्वारा अधिगम करने का अवसर मिलता है ।
अधिगम बाधित बालकों में ज्ञानात्मक योग्यताओं का अभाव होता है , इसलिए अध्यापक स्वयं महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर दे सकते हैं , लिख सकते हैं तथा स्वयं पढ़ने के लिए कह सकते हैं । अधिगम बाधित बालकों के लिए स्वयं अनुदेशनीय प्रविधियाँ बहुत प्रभावशाली होती हैं । विश्वसनीय मूल्यांकन शिक्षण मूल्यांकन तथा अनुदेशन में प्रगति की व्यवस्था है । यह एक सीधा , लगातार तथा विद्यार्थियों की प्रगति ज्ञान करने का साधन है । इस परिस्थिति में अध्यापक वृहत क्षेत्र में विद्यार्थियों का व्यवहार समझ सकता है । अपनुदेशनात्मक निर्णय लेने में यह अध्यापक के लिए सहायक होता है । पाठ्यक्रम तथा अन्य शिक्षण सामग्री के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि यह बालकों के कार्य करने के स्तर के अनुरूप , उपयुक्त तथा प्रेरणादायक होनी चाहिए । यह संकीर्ण नहीं होनी चाहिए । बालकों को दिए गए कार्य को अधिक प्रेरित करने के लिए अध्यापक को बालक की निपुणता तथा रूचि का प्रयोग करना चाहिए । बालकों का ध्यान करने तथा अधिगम को अधिक रूचिकर बनाने के लिए अध्यापकों को विभिन्न रंगों तथा उदाहरणों का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए । अधिगम असमर्थी बालकों की शिक्षा के लिए बहु इन्द्रिया आयाम का प्रयोग हो सकता है । शब्दों को सुनकर , देखकर , बोलकर आदि के आधार पर फ्रेरानल्ड ( 1943 ) में दृश्य , श्रव्य तथा सौन्दर्यानुभूति का विकास किया । एक बार यदि शब्द ज्ञान में दक्षता प्राप्त कर लें तो सहायता कर सकता है तथा उनकी प्रगति अथवा कमियों के बारे में बता सकता है । इस प्रकार नए शब्दों का शिक्षण किया जा सकता है । वालकों को शब्द अथवा कोई लेखन का संगठन एवं व्यवस्था किस प्रकार किया जाता है । इसके बारे में भी अध्यापक बता सकता है । जब बालक को शब्द ज्ञान हो जाता है तो वह वाक्य तथा कहानी लिखना प्रारम्भ कर देता है तथा धीरे - धीरे पढ़ना भी प्रारम्भ कर देता है । बहु इन्द्रीय कार्य अथवा ज्ञान देने की अनेक विधियाँ हैं । सीधे अनुदेशन देने की क्रिया में निर्धारण अनुदेशन तथा मूल्यांकन का प्रयोग किया जाता है । शिक्षण एक सीधे अनुदेशन की व्यवस्था है , जिसके अन्तर्गत त्रुटियों की कम सम्भावनाएँ हैं । इसके माध्यम से पर्याप्त रूप से अभ्यास होता है तथा शीघ्र ही पृष्ठ - पोषण दिया जाता है । शिक्षण में गणित तथा पाठन सम्बन्धी अंश सम्मिलित रहते हैं । शिक्षण का प्रयोग सर्वप्रथम असुविधात्मक बालकों के लिए किया गया और अब अधिगम असमर्थी बालकों के लिए किया जा रहा है । अधिगम आव्यूह का प्रयोग अधिगम असमर्थी बालकों के अधिगम हेतु सहायता देने में प्रयोग किया जा रहा है । स्कूल व्यवस्था के अन्तर्गत प्रबन्धन कर्ताओं की सहायता के लिए कम्प्यूटर प्राप्त अनुदेशनों को भी सम्मिलित किया जा रहा है । आत्मविश्वास का विकास - अधिगम असमर्थी बालकों की सहायता करने के लिए सबसे उत्तम कार्य बालकों को उनके उत्तरदायित्वों तथा कर्तव्यों का निर्धारण करना और सौंपना है । विशेषतः ऐसे बालकों को जो समस्याओं में उलझे हुए हैं । विद्यार्थियों को पालतू जानवर अथवा पौधे की देखभाल करने का कार्य सौंपना महत्वपूर्ण है । इस प्रकार बालकों के मस्तिष्क पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ता है और वे समझेगे कि उनके लिए विद्यालय की कक्षाओं में उपस्थिति केवल शैक्षिक शक्ति के लिए ही नहीं परन्तु किसी जीव ( पालतू पशु अथवा पौधे ) के जीवन के लिए भी है । अध्यापक का इस प्रकार का व्यवहार बालकों में आत्मविश्वास एक नाटकीय विधि से ओतप्रोत होता है ।