भारतीय संविधान के नीति - निर्देशक तत्व
निर्देशक सिद्धान्त अथवा तत्व ( Directive Principles ) भारतीय संविधान में इन सिद्धान्तों को इस प्रकार लिखा है , " इस भाग में अन्तर्विष्ट उपबन्ध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे किन्तु फिर भी उनमें अधिकाधिक तत्व देश हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्त्तव्य होगा । ” के शासन में मूलभूत अत : भारतीय संविधान में उल्लेखित नीति निर्देशक तत्व कोई वैधानिक कानून नहीं है लेकिन भारत सरकार नये कानूनों का निर्माण करते समय इन नीति निर्देशक तत्वों को ध्यान में रखेगी।
1. राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति सिद्धान्त - राज्य अपनी नीति का , विशिष्टतया , इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से
( i ) पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो
( ii ) समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियन्त्रण इस प्रकार वटा जिसके द्वारा सर्वोत्तम रूप से सामूहिक हित हो सके ।
( iii ) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार की हो जिसमें धन और उत्पादन के साधनों का अ जनता के लिये अहितकारी केन्द्रीयकरण न हो ।
( iv ) पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले ।
( v ) पुरुष एवं स्त्री श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की कोमल अवस् का दुरुपयोग न हो और आर्थिक कारणों से मजबूर होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हों ।
( vi ) बालकों को स्वतन्त्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधायें दी जायें और बालकों तथा कम आयु के व्यक्तियों की नैतिक तथा आर्थिक शोषण से रक्षा की जाये ।
( vii ) राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधि व्यवस्था इस प्रकार कार्य करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय आसानी से प्राप्त हो और विशेष रूप से यह सुनिश्चित करने के लिये कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाये । इसके अतिरिक्त निःशुल्क न्याय व्यवस्था प्रदान की जाये ।
2. कुछ दशाओं में काम , शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर , काम पाने के , शिक्षा पाने के और वेकारी , बुढ़ापा , बीमारी तथा अन्य अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्त करने का प्रभावपूर्ण प्रवन्ध करेगा ।
3. ग्राम पंचायतों का संगठन - राज्य ग्राम पंचायतों का संगठन करने के लिये कदम उठाएगा और उनको ऐसी शक्तियाँ और अधिकार प्रदान करेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन को इकाइयों के रूप में कार्य करने योग्य बनाने के लिये आवश्यक हैं ।
4. श्रमिकों के लिये निर्वाह मजदूरी आदि - राज्य , उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि , उद्योग या अन्य प्रकार के सभी श्रमिकों को कार्य , निर्वाह मजदूरी , शिष्ट जीवन स्तर और अवकाश का सम्पूर्ण उपयोग सुनिश्चित करने वाली कार्य की दशायें तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा और विशेष रूप से ग्रामों में कुटीर उद्योगों को वैयक्तिक या सामूहिक आधार पर बढ़ाने का प्रयास करेगा । इसके अतिरिक्त उद्योगों के प्रवन्ध में श्रमिकों की भागीदारी के लिये भी वह प्रयास करेगा ।
5. काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता का प्रवन्ध - राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिये प्रबन्ध करेगा ।
6. अनुसूचित जातियों , अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी हितों के लिए व्यवस्था- राज्य जनता के कमजोर वर्ग के , विशेष रूप से , अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ सम्बन्धी हितो की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय एवं सभी प्रकार के शोषण से उनकी रक्षा करेगा ।
7. बालकों के लिये निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रबन्ध - राज्य , इस संविधान के प्रारम्भ से दस वर्ष की अवधि के भीतर सभी बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने की व्यवस्था करने का प्रयास करेगा ।
8. नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता - राज्य , भारत के समस्त राज्य क्षेत्र नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता लागू करने का प्रयास करेगा ।
9. पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने तथा जन स्वास्थ्य का सुधार करना राज्य का कर्त्तव्य - राज्य अपने लोगों को पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और जन - स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्त्तव्यों में रखेगा और राज्य , विशेष रूप से , मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिये हानिकारक दवाइयों के , दवाओं के रूप में प्रयोग से भिन्न , उपयोग को रोकने का प्रयास करेगा ।
10. राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों , स्थानों और वस्तुओं की रक्षा - राष्ट्रीय महत्व वाले कलात्मक या ऐतिहासिक अभिरुचि वाले प्रत्येक स्मारक या स्थान या वस्तु की हर प्रकार से रक्षा करना राज्य की बाध्यता होगी ।
11. कार्यपालिका से न्यायपालिका की पृथकता - राज्य की लोक सेवाओं में , न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक् करने के लिये राज्य कदम उठायेगा ।
12. कृषि और पशुपालन संगठन - राज्य , कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दूध देने वाले और यातायात में काम आने वाले पशुओं को नस्लों के सुधार तथा उनके वध पर प्रतिबन्ध लगाने का प्रयास करेगा । इसके अतिरिक्त राज्य , देश के पर्यावरण और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा ।
13. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि - राज्य
( i ) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का
( ii ) राष्ट्रों के बीच न्याय संगत और सम्मानपूर्ण सम्बन्धों को बनाये रखने का
( iii ) संगठित लोगों के एक - दूसरे से व्यवहारों में अन्तर्राष्ट्रीय विधि और सन्धि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का , और
( iv ) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाने के लिये प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा ।