मार्गदर्शन प्रभारी कौन - कौन होते हैं ? विद्यालयों में मार्गदर्शन सेवाओं का संगठन किस प्रकार किया जाता है ? मार्गदर्शन के लिये किन विधियों का प्रयोग होता है ?
मार्ग दर्शन प्रभारी ( Guidance Personnel ) मार्ग दर्शन कार्यक्रम का प्रचार व्यापक होता जा रहा है । प्रत्येक विद्यालय शैक्षिक मार्ग - दर्शन कार्यक्रम की आवश्यकता अनुभव करता है ।
कैली के अनुसार- ' मार्ग - दर्शन वह समग्र कार्यक्रम है जो छात्रों को उनकी अभिवृद्धि के अधिक स्तर तक सहायता प्रदान करता है । अतः ऐसे कार्यक्रम के लिए छात्रों को उचित स्टाफ की आवश्यकता पड़ती है । प्रत्येक अध्यापक को इसकी जानकारी आवश्यक है । कोई भी अध्यापक सीखने , परामर्शदाता के साथ परामर्श , प्रधानाचार्य के साथ समंजन के सम्बन्धों को पृथक नहीं कर सकता । प्रत्येक इसमें निहित है । प्रत्येक
विद्यालय मार्ग - दर्शन का कार्य तीन व्यक्तियों की सक्रियता पर निर्भर करता
1. प्रधानाचार्य ( Head Master ) - प्रधानाचार्य का स्थान विद्यालय में केन्द्रीभूत होता है । वह विद्यालय को नेतृत्व प्रदान करता है । सच तो यह है कि यदि प्रधानाचार्य ही मार्ग दर्शन कार्यक्रम में रुचि नहीं लेगा तो विद्यालय का कोई अध्यापक किसी भी कार्यक्रम को सफलता प्रदान नहीं कर सकता । यदि विद्यालय का परामर्शदाता ( Counsellor ) किसी बालक को बताता है कि अमुक पाठ्यक्रम ले , तो ऐसी स्थिति में प्रधानाचार्य ही मुख्य परामर्शदाता के रूप में अभिभावक को वास्तविक स्थिति से परिचय कराता है । प्रधानाचार्य की भूमिका मार्ग - दर्शन कार्यक्रम में महत्वपूर्ण होती है ।
( 1 ) वह मार्ग दर्शन कार्यक्रम को नेतृत्व प्रदान करता है ।
( 2 ) वह मार्ग - दर्शन कार्यक्रम का सांगोपांग परिचय प्राप्त करता है । वह आधुनिकतम साहित्य तथा सूचनाओं के सम्पर्क में रहता है ।
( 3 ) वह अभिभावकों को मार्गदर्शन के सिद्धान्त तथा कार्य से परिचित कराता है ।
( 4 ) वह अध्यापक , छात्र तथा अभिभावकों को आवश्यक एवं सहायक सामग्री प्रदान करता है ।
( 5 ) वह मार्गदर्शन सम्बन्धी दायित्वों को रुच्यानुसार ही अध्यापकों को सौंपता है ।
( 6 ) वह अध्यापकों को मार्गदर्शन सम्बन्धी सेमीनार आदि में भाग लेने के लिए प्रोत्साहन देता है ।
( 7 ) वह मार्गदर्शन कार्यक्रम हेतु समितियों का गठन करता है ।
2. कक्षा अध्यापक ( Class Teacher ) - मार्गदर्शन कार्यक्रम में कक्षा अध्यापक की भूमिका प्रमुख एवं महत्वपूर्ण है । कक्षा अध्यापक छात्रों के सीधे सम्पर्क में रहता है । एडिथ के अनुसार- मार्ग - दर्शन कार्यक्रम में अध्यापक का सहयोग अपरिहार्य है । इसके सिद्धांत चाहे कितने ही आकर्षक हों , इसकी भावना चाहे कितनी प्रायोगिक हो , अध्यापक ही इसको अन्तिम परीक्षण प्रदान करता है । प्रधानाचार्य तथा निरीक्षक उसकी के लिए रहते हैं , परन्तु वह व्यक्ति के रूप में ही उसे शिक्षण प्रदान करता है । ' अध्यापक मार्गदर्शन कार्यक्रम की सफलता हेतु यह भूमिका प्रस्तुत करता है-
( 1 ) वह कक्षा की रुचि , योग्यता , क्षमता तथा समस्याओं को पहचानता है ।
( 2 ) वह अनेक विषय अध्यापकों के साथ मार्गदर्शन हेतु सम्पर्क स्थापित करता है ।
( 3 ) अभिभावकों के सम्पर्क में रहते हैं ।
( 4 ) छात्रों का विश्वास प्राप्त करके उनके विकास का प्रयत्न करता है ।
( 5 ) आवश्यकता पड़ने पर वह विशेषज्ञों की राय भी लेता है ।
3. अभिभावक ( Parents ) - मार्गदर्शन कार्यक्रम की जानकारी अभिभावकों को होना भी आवश्यक है । उन्हीं के वालकों के कल्याण के लिए ही तो वह कार्यक्रम है । वे मार्ग दर्शन अधिकारियों के परामर्श को ग्रहण करके अपने बालकों के भविष्य का निर्धारण करते हैं । इस कार्य के लिए अध्यापक अभिभावक संघों की स्थापना करके पर्याप्त सहायता ली जा सकती है ।
4. विशेषज्ञ ( Specialists ) - मार्गदर्शन कार्यक्रम वस्तुतः एक तकनीकी कार्यक्रम है । इसमें परामर्शदाता मनोवैज्ञानिक , मनोचिकित्सक तथा चिकित्सक विशेषज्ञों के रूप में सहायता देते हैं ।
( 1 ) परामर्शदाता मार्ग दर्शन कार्यक्रम को नेतृत्व प्रदान करता है । साथ ही वह प्रशासक का कार्य भी करता है । इस कार्यक्रम की सफलता का दायित्व उसी पर आता है । वह विभिन्न पाठ्यक्रमों , व्यवसायों के चयन आदि के विषय में परामर्श देता है ।
( 2 ) मनोवैज्ञानिक समस्या बालकों ( Problem children ) की पहचान करता है । समस्या बालकों का व्यवहार सम्पूर्ण कक्षा को प्रभावित करता है । ऐसे बालकों को मनोवैज्ञानिक को सौंपा जाता है ।
( 3 ) चिकित्सक विद्यालय की निष्पत्ति तथा छात्र के स्वास्थ्य के मध्य सकारात्मक सहसम्बन्ध पाया जाता है । छात्रों के स्वास्थ्य का परीक्षण तथा उनकी समस्याओं को स्वास्थ्य विशेषज्ञ ही अच्छी तरह हल कर सकता है । वह छात्रों की सामयिक स्वास्थ्य परीक्षा द्वारा रोग निदान करता है , अध्यापक तथा अभिभावकों की सीमित सुविधाओं का ध्यान रखता है , स्कूल स्वास्थ्य को उन्नत करने के लिये कार्यक्रम चलाता है , इन सबसे ऊपर वह तत्सम्बन्धी सूचनायें प्रदान करता है । मार्ग - दर्शन सेवा का संगठन ( Organisation of Guidance Programme ) • मार्गदर्शन कार्यक्रम का संगठन , शिक्षण संस्थाओं के लिए आवश्यक हो गया है । शिक्षण संस्थाओं के इस कार्यक्रम के संगठन के लिए समुचित स्थान , धनराशि तथा परीक्षण एवं के शिक्षकों को भी मार्गदर्शन के कार्य का प्रशिक्षण देना भी आवश्यक है । उपकरणों के साथ - साथ प्रशिक्षित व्यक्तियों की भी आवश्यकता होती है । साथ ही विद्यालयों • विद्यालयों में मार्गदर्शन सेवा संगठन इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आरंभ किया जाता है
( 1 ) विद्यार्थियों की वैयक्तिक समस्याओं एवं योग्यताओं , आवश्यकताओं को समझना ।
( 2 ) अभिभावकों , शिक्षकों तथा छात्रों के मध्य मधुर संबंध निकसित करना ।
( 3 ) छात्रों को भावी जीवन के विकास के लिये , विषय तथा व्यवसाय चयन में सहायता देना ।
( 4 ) छात्रों की निजी समस्याओं का समाधान ढूंढना । निर्देशन कर्मचारियों को मार्ग - दर्शन के समीक्षकों की जानकारी होनी आवश्यक है । शिक्षा की भूमिका इसमें अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है । चित्रहोम के शब्दों में- ' जिस विद्यालय में कक्षा - शिक्षक निर्देशन सम्बन्धी दायित्वों को स्वीकार करता है , वहाँ शिक्षण तथा मार्गदर्शन के कार्य का विभाजन कठिन हो जाता है । वह शिक्षण के दौरान ही छात्रों को स्वयं की योग्यताओं को समझाने के कार्य का चयन करके , स्वयं की प्रगति का मूल्यांकन करने में सहायता देता है ।
विद्यालयों में मार्गदर्शन के लिये ये कार्य लिये जाने चाहिये
( 1 ) वातावरण का निर्माण ।
( 2 ) छात्रों की योग्यताओं की पहचान ।
( 3 ) छात्रों के अभिलेख ( Records ) बनाना ।
( 4 ) प्रशासनिक समस्याओं का समाधान ।
( 5 ) छात्रों की आर्थिक सहायता ।
( 6 ) निदानात्मक शिक्षण की व्यवस्था । आजकल विद्यालयों में मार्गदर्शन सेवाओं की बहुत आवश्यकता अनुभव की जा रही है । ये आवश्यकतायें इस बात की प्रतीक हैं कि विद्यालयों में इन सेवाओं का संगठन होना चाहिये । विद्यालयों में यह सेवा इस प्रकार संगठित की जा सकती है ।
इसके साथ - साथ इन बातों पर भी अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए
1. निर्देशक ( Guide ) –निर्देशन सेवाओं का संचालन करने के लिए एक प्रशिक्षित निर्देशक की आवश्यकता है । उसका काम मनोवैज्ञानिक परीक्षायें लेना , सामग्री तथा तथ्यों का वस्तुतत : इन सेवाओं के संगठन का केन्द्र बिन्दु है । संकलन , व्यवसाय चयन तथा दूसरी संस्थाओं का सहयोग प्राप्त करना है । यह निर्देशक ही
2. तथ्य एकत्रित करना ( Collection of data ) - इसके अन्तर्गत हर स्रोत से सामग्री एकत्र की जाती है । यह भी ध्यान रखा जाता है कि बालक की भावी योजना क्या है ? यह सामग्री समुदाय , परिवार , विद्यालय के वैयक्तिक रिकार्ड तथा परीक्षा परिणाम छात्रों से व्यक्तिगत रूप में प्राप्त की जाती है । अपनाई जाती हैं
3. मार्गदर्शन कैसे दिया जाए ( How to guide ) - इसके लिये दो प्रकार की विधिया
( i ) सामूहिक विकास ( Group Method ) - सामूहिक रूप से विचार , बैठकें , विज्ञापन , सामूहिक मिलन आदि विधियों से सामूहिक मार्ग - दर्शन दिया जाता है । के द्वारा सूचनायें प्राप्त करके आवश्यक मार्गदर्शन दिया जा सकता है ।
( ii ) व्यक्तिगत मार्गदर्शन ( Individual guidance ) - साक्षात्कार ( Interview ) मार्ग - दर्शन की विधियाँ ( Guidance Techniques ) मार्ग - दर्शन कार्यक्रम इतना व्यापक है कि किसी एक विधि से उसका काम नहीं चलता है । इसमें अनेक विधियों का सहारा लेना पड़ता है । ये विधियाँ इस प्रकार हैं
1. परीक्षण विधि ( Test techniques ) - मार्गदर्शन के लिए पहले बालक की विभिन्न योग्यताओं तथा उपलब्धियों की परीक्षा ले लेनी चाहिए । इसके बालक को किस प्रकार के निर्देशन की आवश्यकता है , इसका ज्ञान प्राप्त हो जायेगा ।
2. अवलोकन विधियाँ ( Observational techniques ) - इस विधि के अन्तर्गत बालक के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है ।
3. परिमापन ( Rating scales ) - इस विधि द्वारा बालकों की विभिन्न स्थितियों का परिमापन किया जाता है ।
4. घटना सम्बन्धी तथ्य ( Ancedotal - record ) - समय - समय पर घटी घटनाओं का संग्रह भी बालकों को निर्देश देने में पर्याप्त सहायता देता है ।
5. स्वानुभव ( Self - report ) - स्वयं , बालक के अनुभव भी निर्देशन में सहायता करते हैं । ये अनुभव उसकी रुचि पर आधारित होते हैं ।
6. अन्य विधियाँ ( Miscellaneous techniques ) - इसके अतिरिक्त अन्य विधियों से भी सूचनायें प्राप्त करके उनके अनुसार परामर्श देना आदि का उपयोग किया जा सकता है ।