परामर्श सेवा से क्या आशय है ? परामर्श कितने प्रकार का होता है ? परामर्शदाता के गुणों का वर्णन कीजिए । अथवा परामर्श सेवा किसे कहते हैं ? भारत में परामर्श के कार्य में आने वाली बाधाओं का वर्णन कीजिये । अथवा परामर्श सेवा से क्या तात्पर्य है ? परामर्श के प्रकार तथा विधियों का वर्णन कीजिये ।
परामर्श सेवा ( Counselling ) मार्गदर्शन कार्यक्रम में परामर्श सेवा का महत्व सर्वाधिक है । वैबस्टर के अनुसार ' परामर्श से अभिप्राय सलाह , विचार विनिमय तथा इच्छापूर्वक साहचर्य से है ।
' स्ट्रैंग के अनुसार- ' परामर्शदाता तथा परामर्शग्राहक के मध्य आमने - सामने के सम्बन्ध हैं । '
इसी प्रकार हम्फ्री तथा ट्रैक्सलर के अनुसार- ' परामर्श , व्यक्ति की समस्याओं के विद्यालय अथवा संस्था स्रोतों से समाधान की प्रक्रिया है ।
' मार्गदर्शन कार्यक्रम का आवश्यक अंग परामर्श है । गिलबर्ट रेन , जार्ज ई . मायर्स , राबिन्सन , कार्ल रोजर्स , एडमंड विलियमसन , हम्फ्री एवं ट्रैक्सलर , तथा एन्ड्र एवं जोन्स ने परामर्श की आवश्यकता इस प्रकार बताई है
1. यह व्यक्तिगत संदर्भ सूचक है ।
2. सेवार्थी को स्वयं निर्णय लेना पड़ता है ।
3. परामर्श , वैज्ञानिक सुझाव है ।
4. परामर्श , अधिगम में सहायक होता है ।
5. परामर्श की प्रक्रिया के दो पक्ष होते हैं . देने वाला तथा लेने वाला ।
6. छात्रों की योग्यता के अनुसार परामर्श देना ।
7. परामर्श एक सम्मिलित प्रयास है । इन सभी परिभाषाओं से स्पष्ट है कि मार्गदर्शन की एक आवश्यक विद्या परामर्श है ।
परामर्श के प्रकार ( Types of Counselling ) परामर्श तीन प्रकार के होते हैं
1. प्रत्यक्ष परामर्श ( Direct ) - प्रत्यक्ष परामर्श में बालक से सीधे ही किसी कार्य को करने को कहा जाता है । इसमें बालक को निर्देश दिये जाते हैं । प्रत्यक्ष परामर्श में विश्लेषण , संश्लेषण , निदान , पूर्वानुभाग परामर्श तथा अनुवर्तन तथा छात्रों को सहायता दी जाती है । परामर्शदाता आवश्यक सूचनाओं के आधार पर सेवार्थी को व्यक्तिगत तथा वस्तुनिष्ट सहायता देता है ।
2. अप्रत्यक्ष परामर्श ( Indirect ) - इस प्रकार के परामर्श में बालक को कोई परामर्श । वालक को किस क्रिया में लगाना चाहिए , इस बात का निर्णय होने सीधे नहीं दिया जाता के पश्चात् बालक को इच्छित कार्य में लगा दिया जाता है । अप्रत्यक्ष परामर्श से वार्तालाप , जाँच पड़ताल , निवेष्णात्मक अभिव्यक्ति , परीक्षा सुझावों पर चर्चा , योजना का प्रतिपादन , क्रियान्वयन तथा मूल्यांकन का प्रयोग किया जाता है ।
3. समाहारक परामर्श ( Eclectic ) - इसे संग्रही अथवा समन्वित परामर्श भी कहते हैं । इसमें व्यक्ति की आवश्यकताओं का अध्ययन किया जाता है । प्रविधियों के चयन , प्रयोग प्रभावशीलता के मूल्यांकन द्वारा परामर्श की तैयारी की जाती है । इन लोगों से सहायता ली जाती है , इसमें वस्तुनिष्ठ तथा समाहारक विधियों का प्रयोग किया जाता है । परामर्शदाता के गुण ( Qualities of Counseller ) लीफीवर के शब्दों में– ' एक शिक्षक परामर्शदाता वह है जिसे निर्देशन कार्य के लिये कम से कम एक कक्षा में कार्य से मुक्त किया जाय । वह आधे समय का उपयोग परामर्श तथा निर्देशन के लिये करे ।
स्टीपलेर तथा कामत के अनुसार परामर्शदाता में इन गुणों का होना आवश्यक है
( 1 ) वह नैतिक व्यवहार से युक्त हो
( 2 ) वह वौद्धिक योग्यता रखता है ।
( 3 ) इसमें संवेदनशीलता हो ।
( 4 ) उसमें वोधगम्यता ( Understanding ) हो ।
( 5 ) उसमें ऐसी प्रभावशीलता हो जिससे उसके सुझावों को स्वीकार किया जाय ।
( 6 ) उसके व्यवहार में नमनीयता ( Flexibility ) हो ।
( 7 ) उसमें समायोजन क्षमता तथा अपूर्व विश्वास हो ।
( 8 ) वह सेवार्थी के व्यक्तित्व का समग्र रूप से आदर करे । ( 9 ) वह स्वयं को समझे तथा सेवार्थी की सहायता करे । ( 10 ) उदारता तथा सहिष्णुता हो । विद्यालयों में परामर्शदाता का कार्य शिक्षक करते हैं । अतः फ्रेकालिन जे . केलर के शब्दों में ' शिक्षक वह सिखाता है जो वह ( शिक्षक ) स्वयं है , शिक्षक कार्य के महत्व को समझे । वह ऐसा विश्वास विकसित करे जो उसके जीवन के अंग बन जाये । तभी वह दूसरों को अपने जैसा बनाने में सक्षम हो सकता है । ' भारत में परामर्श कार्य ( Counselling in India ) भारत में मार्गदर्शन तथा परामर्श अभी विश्वास की अवस्था में हैं ।
भारत में परामर्श के कार्य में ये बाधायें प्रमुख हैं
1. शिक्षकों पर कार्य का अधिक दबाव ।
2. शिक्षकों का रूढ़िवादी दृष्टिकोण ।
3. अप्रशिक्षित तथा रूढ़िवादी अभिभावक ।
4. अप्रशिक्षित अध्यापक ।
5. पाठ्यक्रम का दोषपूर्ण होना ।
6. दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली ।
7. विद्यालयों में बढ़ती छात्रसंख्या ।
8. विद्यालयों की दयनीय आर्थिक स्थिति
9. साधनों का अभाव ।
10. संगठित मार्गदर्शन सेवा संगठनों का अभाव ।
11. प्रमापीकृत परीक्षण का अभाव ।
12. जाति , दल एवं धार्मिक विद्वेष । 1
3. निम्न जीवन स्तर इन सभी समस्याओं को इस प्रकार हल करके परामर्श कार्य को सुचारू रूप से गति दी जा सकती है । परामर्श , कब , क्यों और कैसे ? ( Counselling , when , why and how ? ) विद्यालय में परामर्श एक सशस्त शैक्षिक प्रक्रिया है । इसके द्वारा शिक्षक , छात्रों को उनकी समस्याओं के समाधान करने के लिए आवश्यक परामर्श देकर उनकी छिपी हुई क्षमताओं तथा योग्यताओं को उद्घाटित करता है । समस्या के स्पष्टीकरण , समस्या एवं तनाव से मुक्ति , विवेक एवं निर्णय शक्ति के अभाव में समस्या का समाधान , सुविधाओं के अभाव में समस्या को हल न कर पाना आदि ऐसी ही स्थितियों में परामर्श की आवश्यकता पड़ती है ।
परामर्श के लिए तीन विधियों का प्रयोग किया जाता है-
( 1 ) साक्षात्कार ,
( 2 ) समूह उपवोधन विधि ,
( 3 ) निदानात्मक विधि ।
1. साक्षात्कार विधि ( Interview method ) - इस विधि परामर्श के सेवार्थी से सूचनायें , समस्यायें तथा अन्य तथ्य संग्रह करके उसे समस्याओं के समाधान सुनाये जाते हैं । सेवार्थी से आत्मीयता स्थापित करके उसका विश्वास सहानुभूति तथा स्वीकृति प्राप्त की जाती है । आमोद - प्रमोद , व्यक्तिगत संदर्भ , प्रश्न पूछना , आश्चर्य अव्यवस्थित रचना , अनुमोदन , वार्तालाप के द्वारा परामर्श प्रदान किया जाता है ।
2. समूह निर्देशन विधि ( Group Guidance method ) - इस विधि द्वारा छात्रों में निर्णय शक्ति विकसित की जाती है । उनकी समस्याओं को पहचान कर समाधान खोजा जाता है । टीम लर्निग समूह , फिल्म , टेलीविजन , प्रश्न मंजूषा , व्याख्यान , लघु समूह प्रतिवेदन , अनौपचारिक वार्ता आदि अनेक प्रविधियों द्वारा प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष विधियों का प्रयोग करके परामर्श दिये जाते हैं ।
3. निदानात्मक विधि ( Clinical method ) - समस्यामूलक बालकों के उपचार के लिये निदानात्मक विधि का प्रयोग किया जाता है । समायोजन - योग्य घाले बालकों की समस्याओं के निदानात्मक परामर्श द्वारा हल किया जाता है ।