निर्देशन तथा परामर्श ( Guidance and Counselling )
मार्गदर्शन से क्या आशय है ? मार्ग दर्शन की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? मार्ग - दर्शन के विभिन्न प्रकारों का वर्णन कीजिए । मार्गदर्शन
( Guidance ) ' मार्ग - दर्शन ' शब्द ' गाइडैन्स ' के समानान्तर प्रयोग में लाया जाता है । इसका सामान्य अर्थ सहायता करने से लिया जाता है । कूज ( Koos ) एवं केफेअर ( Kefavour ) के अनुसार ' मार्ग दर्शन वह स्थिति है जहाँ से युवक शैक्षणिक तथा व्यावसायिक उपलब्धियों के लिए विभाजित होते हैं तथा प्राप्त अवसर एवं परिस्थितियों का समायोजन करते हैं । ' इस प्रकार कारमाइकेल ( Carmichal ) के अनुसार - प्रभावपूर्ण शिक्षा ही मार्ग - दर्शन है और वास्तविक मार्ग - प्रदर्शन का उद्देश्य ‘ स्वयं मार्ग - प्रदर्शन है । ' प्रत्येक व्यक्ति के सामने समायोजन की समस्या होती है । समस्याओं का समाधान वह अपनी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार करता है और कभी - कभी क्षमता की कमी के कारण वह समायोजन में असफल रहता है । ऐसी अवस्था में व्यक्ति को मार्ग दर्शन की आवश्यकता पड़ती है । मार्ग - दर्शन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति की समायोजन समस्या के समाधान में सहायता की जाती है । समायोजन की समस्या उस समय उत्पन्न होती है , जबकि व्यक्ति की आवश्यकता पूरी नहीं होती । वास्तव में समायोजन समस्या जीवन में प्रतिदिन आती रहतो है । वैयक्तिक भिन्नता के कारण समायोजन की आवश्यकता अनुभव की जाती है । यदि समायोजन की प्रक्रिया गलत हो जाती है तो उसका स्वरूप विकृत हो जायेगा । समायोजन के लिए मार्ग दर्शन की आवश्यकता होती है । मार्ग - दर्शन का इतिहास उतना ही पुराना है जितना , मानव समाज वर्ग एवं आश्रम में व्यक्ति तथा समाज को उनकी प्रकृति के अनुसार विभाजित किया जाता था । ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र वर्ग व्यक्ति की विशेषताओं के आधार पर निर्धारित किये जाते थे । गुरुकुलों में छात्रों को उनकी रुचि के अनुसार व्यवसाय की शिक्षा दी जाती थी । यूनान में प्लेटो तथा अन्य विचारकों ने प्रतिभाशाली व्यक्तियों को विकास करने के अवसर प्रदान करने की सिफारिश की ।
शिक्षा के क्षेत्र में इंग्लैंड में 1944 में पारित शिक्षा अधिनियम के अनुसार विद्यालय में मार्गदर्शन का कार्यक्रम आरम्भ किया गया । विद्यालयों में कैरियर मास्टर्स की नियुक्तियाँ की गईं ।
अमेरिका में 1905 में ब्रेड विनर्स इन्स्टीट्यूट की स्थापना से मार्गदर्शन का कार्य आरम्भ हुआ ।
पारसन्स ने वेस्टन वोकेशन व्यूरो की स्थापना की ।
डेविड व्हीलर , फ्रेडरिक , एच.एलेन , मेयर , ब्लूम , फील्ड आदि ने मार्गदर्शन के कार्य को आगे बढ़ाया ।
फ्रांस , जर्मनी आदि में दूसरे महायुद्ध के पश्चात् शिक्षा के क्षेत्र में मार्गदर्शन का कार्य आरम्भ हुआ ।
सरकारों ने मार्ग दर्शन कार्यक्रम को राष्ट्रीय महत्व दिया ।
भारत में मार्ग - दर्शन ( Guidance in India ) भारत में मार्गदर्शन के कार्य का आरम्भ श्री सोहनलाल एवं के.जी. सैयेदैन ने आरम्भ किया ।
1905 में जी.एस. बोस की अध्यक्षता में कलकत्ता में व्यावहारिक मनोविज्ञान के कारण खोली गई , बम्बई में व्यावसायिक निर्देशन केन्द्र खोला गया ।
बाटलिवाय ने इस केन्द्र का संचालन किया । इसके बाद एच.पी. मेहता ने बम्बई में मार्ग - दर्शन - कार्य को आगे बढ़ाया ।
1952 में उत्तरप्रदेश में इलाहाबाद में मनोविज्ञान प्रयोगशाला की स्थापना की गई । मेरठ , कानपुर , वनारस , वरेली , लखनऊ में भी मनोविज्ञान केन्द्र खोले गये । आज भारत के हर प्रदेश में सरकारें मार्गदर्शन केन्द्रों का संचालन कर रही हैं ,
विश्व विद्यालयों के मनोविज्ञान विभाग , शैक्षिक , व्यावसायिक एवं वैयक्तिक मार्ग दर्शन देकर व्यक्तियों की सहायता कर रहे हैं ।
निजी क्षेत्र में भी अनेक संघ ( associations ) तथा व्यक्ति , भार्ग - दर्शन - कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में योग दे रहे हैं । मार्ग - दर्शन : परिभाषायें ( Guidance : Definitions ) शिक्षा के क्षेत्र में मार्ग - दर्शन की बहुत आवश्यकता है । शिक्षा समाज की वह प्रक्रिया है जो व्यक्ति में आवश्यक परिवर्तन लाती है । शिक्षा यदि वैयक्तिक भिन्नता को ध्यान में रखकर दी जाती है तो वह बालक के सर्वांगीण विकास को पूरा करने में समर्थ है । यदि नहीं तो उसके कारणों की जांच होनी आवश्यक है । यदि वालक में कुछ दोष हैं तो उनका निराकरण मार्ग दर्शन ( Guidance ) के द्वारा सम्भव है ।-
1. आर्थर जे , जोन्स- ' व्यक्तियों को बुद्धिमत्तापूर्वक चुनाव तथा समायोजन करने में दी जाने वाली सहायता निर्देशन है । '
2. जेम्स ड्रेवर - मार्ग - प्रदर्शन शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त होता है-
( 1 ) बालकों का मार्ग - दर्शन- जिसका अर्थ है चिकित्सा , मनोवैज्ञानिक , शैक्षणिक एवं मनोचिकित्सात्मक तथा उपचारात्मक संगठन तथा सहयोग , जो कि जटिल या मन्दबुद्धि बालकों के व्यवहार अथवा शैक्षिक समस्याओं का अध्ययन करता है ।
( 2 ) शैक्षणिक मार्ग - दर्शन - प्रमापीकृत मानसिक , शैक्षणिक परीक्षण के अर्थ में प्राथमिक पाठशालाओं के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता है ।
( 3 ) व्यावसायिक मार्ग - दर्शन - बालकों तथा उनके माता - पिता को बालकों के व्यावसायिक चयन में सहायता पहुँचाता है , इसी आधार पर बुद्धि परीक्षा , शैक्षिक परीक्षा , विशेष अभिवृत्ति अयोग्यता परीक्षण , स्कूल रिकार्ड , रुचि , आकांक्षा आदि की सूचना देता है तथा राज्य के श्रमक्षेत्र की सूचनायें प्रदान करता है ।
3. ब्रेवेट जोन एम . - शिक्षा का अर्थ इस प्रकार लिया जाता है-
( 1 ) परिवर्तन की प्रक्रिया , जो व्यक्ति में होती है
( 2 ) सूचना देना ( instruction )
( 3 ) वे चेतन जो प्रयास व्यक्ति को शारीरिक , मानसिक , भावात्मक , नैतिक विकास के योग्य बनाने का निर्देश देते हैं जिससे व्यक्ति सामाजिक रूप में प्रभावशाली और व्यक्तिगत रूप में सन्तोषजनक हो सके ।
4. सेकेण्डरी एजूकेशन कमीशन - निर्देशन में लड़के और लड़कियों की सहायता करने की वह कठिन कला सम्मिलित है , जिसके द्वारा वे अपने भविष्य को बुद्धिमत्तापूर्वक , सभी कारणों को मद्देनजर रखते हुए अपनी योजना बनाते हैं , जिनके मध्य रहकर उन्हें संसार में काम करना होगा ।
5. शर्ले हैमरिन - व्यक्ति के स्वयं के पहचानने में इस प्रकार सहायता करना जिससे वह अपने जीवन में आगे बढ़ सके , निर्देशन कहलाता है ।
6. क्रो एवं क्रो - निर्देशन से तात्पर्य , निर्देशन देना नहीं है , एक व्यक्ति का दृष्टिकोण दूसरे पर थोपना नहीं है , दूसरे व्यक्ति के लिए स्वयं निर्णय लेने की अपेक्षा निर्णय कर देना नहीं है और न ही दूसरे के जीवन का बोझ ढोना है । इसके विपरीत योग्य एवं सुशिक्षित व्यक्ति द्वारा , दूसरे व्यक्ति को चाहे वह किसी भी आयु वर्ग का है , आपकी जीवन क्रियाओं को स्वयं संगठित करने , अपने निजी दृष्टिकोण को विकसित करने , अपने निर्णय स्वयं ले सकने तथा अपना भार स्वयं वहन करने में सहायता करना ही वास्तविक निर्देशन है ।
7. भायर्स - निर्देशन , व्यक्ति की जन्मजात व्यक्तियों व प्रशिक्षण से अर्जित क्षमताओं को संरक्षित रखने का एक मूल प्रयास है । इस संरक्षण के लिये वह व्यक्ति को उन समस्त समस्याओं से सम्पन्न बनाता है जिससे वह अपनी तथा समाज की सन्तुष्टि के लिये अपनी उच्चतम शक्तियों का अन्वेषण कर सके । इन परिभाषाओं के आधार पर हम थॉमस रिस्क के शब्दों में यह कह सकते हैं- ' मार्ग प्रदर्शन का उद्देश्य छात्रों को उनकी समस्याओं के समाधान में सहायता देना , समस्या के सुलझाने की क्षमता उत्पन्न करता है अर्थात् आत्मनिर्देशन करना है । ' शिक्षा सम्बन्धी कार्यों में मार्गदर्शन की आवश्यकता है । मार्ग दर्शन से विद्यार्थी विशेष में सभी आवश्यकताओं को पूरा करने की योग्यता उत्पन्न की जाती है । शिक्षा में मार्ग - दर्शन का बहुत महत्व है । बालक कोमल पौधों के समान होते हैं और अनुकरण की शक्ति अधिक होती है । यदि शिक्षा में उनकी स्थिति सामान्य रहती है । उनकी और उन्हें किसी प्रकार का निर्देशन नहीं दिया जाता तो उनका जीवन - वृत्त समाजोपयोगी नहीं होगा । यदि उसे मार्गदर्शन मिलता है तो जहाँ वह स्वयं स्वस्थ ( मानसिक , शारीरिक रूप से ) होगा , वहीं वह समाज के लिए भी बहुत उपयोगी होगा ।
विशेषताएँ ( Characteristics ) मार्ग - दर्शन के तत्व इस प्रकार हैं
1. मार्ग दर्शन व्यक्ति पर ध्यान देता है , समस्या पर नहीं ।
2. योग्यताओं की खोज , व्यक्ति की रुचि , अभिरुचि , आवश्यकता , परिसीमा , स्वभाव तथा आदर्शों के आधार पर की जाती है ।
3. आत्म - निर्देशन तथा आत्म - विकास की ओर ले जाता है ।
4. वर्तमान तथा भविष्य के प्रति आश्वस्त होता है ।
5. व्यवसाय में सफलता प्राप्त करना ।
6. नवीन परिस्थिति में समायोजन की क्षमता उत्पन्न करना ।
7. आवश्यकतानुरूप परामर्श की व्यवस्था करना । मार्ग - दर्शन की आवश्यकता ( Need for Guidance ) सावरी एवं टेलफोर्ड के अनुसार- “ अच्छी मार्ग - दर्शन परिपाटियाँ वे हैं जो व्यक्ति को अपने मामलों को सुलझाने तथा जीवन - यापन का अधिगम कराती हैं । इसका उद्देश्य व्यक्ति को पराश्रयी बनाना नहीं है , अपितु उसे स्वयं निर्देशित करने में सहायता देना है । व्यक्ति की प्रतिष्ठा - मार्ग दर्शन का चरम विन्दु है । ”
मार्ग - दर्शन की आवश्यकता इस प्रकार है
1. व्यक्तिगत भेद ( Individual Difference ) - प्रत्येक कक्षा में विभिन्न वातावरण के छात्र आते हैं जिनमें व्यक्तिगत भेद पाये जाते हैं । " इन व्यक्तिगत भेदों का अध्ययन तथा समायोजन करने के लिए निर्देशन की आवश्यकता पड़ती है । ” अनिवार्य शिक्षा ( Compulsory education ) के कारण विद्यालयों में समाज के प्रत्येक स्तर के बच्चों का आना आरम्भ हो गया है , जिसके कारण कक्षा के छात्रों में व्यक्तिगत भेदों का प्रसार ( Range ) बढ़ गया है । इस बढ़ती हुई सीमा के लिए मार्ग - दर्शन की परम आवश्यकता है जिसके द्वारा हो सके । प्रत्येक छात्र को समायोजित किया जा सके और उसकी योग्यताओं का अधिकतम विकास
2. शिक्षा के उद्देश्यों में परिवर्तन ( Change in the objectives of education ) - आज की शिक्षा लगभग उसी परिपाटी पर चल रही है जिस पर वह वर्षों पहले थी । शिक्षा का आधार व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है , अत : मार्ग - दर्शन का लक्ष्य शिक्षा के उद्देश्यों में परिवर्तन लाना है । शिक्षा के उद्देश्यों में परिवर्तन तभी हो सकेगा जब मार्ग दर्शन द्वारा वैयक्तिक आधार पर शिक्षा के नवीन उद्देश्यों तथा विधियों का विकास होगा ।
3. कार्य की भिन्नता ( Variation in work ) प्रत्येक व्यक्ति की कार्य करने की शक्ति भिन्न होती है । ऐसे कार्य , जिनमें बालक की रुचि नहीं होती है , वे सभी उनके विकास में बाधक होते हैं । उनकी कार्यक्षमता को मार्ग - दर्शन के द्वारा ही उचित रूप में उपयोग किया जा सकता है और उनकी कुशलता को विकसित किया जा सकता है ।
4. औद्योगीकरण ( Industrialization ) - मार्ग - दर्शन एक ऐसी तकनीकी प्रक्रिया के साथ में विकसित हुआ है जिसने मनुष्य के विकास के लिये नवीन द्वार खोले हैं । इस दृष्टि से मार्गदर्शन के उद्देश्य इस प्रकार हैं
( 1 ) व्यक्ति को समस्या समाधान के योग्य बनाना ।
( 2 ) समायोजन हेतु सहायता प्रदान करना ।
( 3 ) योग्यता , क्षमता के अनुसार व्यावसायिक तथा शैक्षिक अवसर प्रदान कराना ।
( 4 ) व्यक्ति को उसमें निहित योग्यताओं एवं क्षमताओं से परिचित कराना ।
( 5 ) व्यक्ति की निहित विशेषताओं के विकास में योग देना । इन उद्देश्यों के संदर्भ में सार्ग - दर्शन एक सोद्देश्य क्रियात्मक पद्धति के रूप में विकसित हुआ है ।
इसकी प्रकृति इस प्रकार है
1. यह व्यक्ति तथा समूह , दोनों से संबंधित है ।
2. इसका स्वरूप बहुपक्षी है ।
3 . इसमें अनेक विधियों का प्रयोग किया जाता है ।
4. यह व्यक्तिनिष्ठ ( Subjective ) तथा वस्तुनिष्ठ ( Objective ) दोनों होता है ।
5. यह व्यक्ति तथा समाज , दोनों की प्रगति चाहता है ।
6. यह समस्या केन्द्रित है ।
7. यह व्यक्ति को आत्मनिर्देशन के योग्य बनाता है , समायोजन की क्षमता उत्पन्न करता है तथा तात्कालिक एवं दीर्घकालिक , दोनों समस्याओं का समाधान करता है । औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों तथा तकनीशियनों में उचित मार्गदर्शन द्वारा कार्यक्षमता तथा कार्य - कुशलता का विकास किया जा सकता है । सच तो यह है कि बालक की योग्यता का उचित निर्धारण व्यावहारिक रूप से भविष्य के लिए यहीं पर होता है ।
5. प्रतिभाओं के विकास हेतु ( Development of Genius ) - विद्यालय मानव जीवन के निर्माण की प्रयोगशाला है । बालक में निहित शक्तियों का विकास विद्यालय में होता है । आजकल समूह - शिक्षा के कारण बालकों के व्यक्तिगत भेदों पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है । हर बालक की कार्य करने की क्षमता भिन्न है । मार्ग दर्शन की सुविधाओं द्वारा हर बालक का विकास उसकी कार्यक्षमता व योग्यता के अनुसार होगा ।
6. मानव शक्ति का विकास ( Development of human energy ) - मानव की शक्ति विभिन्न क्षेत्रों में लगी रहने के कारण नष्ट हो जाती है और उसका उसे तथा समाज को कोई लाभ नहीं पहुँचता । मार्ग दर्शन से व्यक्ति की सभी शक्तियों का विभिन्न क्षेत्रों में उपयोग होता है , जिसका लाभ समाज को उचित रूप से मिलता है । मार्गदर्शन के प्रकार ( Types of Guidance ) मार्ग दर्शन का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है । यह व्यक्ति की हर प्रकार की क्रियाओं में उपयोगी हो सकता है ।
मार्ग दर्शन के मुख्य तीन प्रकार होते हैं
1. व्यक्तिगत मार्ग - दर्शन ( Individual Guidance ) - व्यक्तिगत मार्गदर्शन के अन्तर्गत व्यक्ति को अलग निर्देशन दिया जाता है । व्यक्ति को उसकी अपनी समस्याओं से अवगत कराया जाता है और उसे सलाह दी जाती है कि वह अमुक - अमुक तरीके अपना ले तो उसका जीवन सही राह पर लग जायेगा । व्यक्तिगत मार्ग दर्शन , व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान के लिये दिया जाता है । व्यक्तिगत मार्ग - दर्शन की आवश्यकता इस प्रकार है
( 1 ) व्यक्तिगत जीवन में सुख - शान्ति एवं संतोष का विकास ।
( 2 ) व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान हेतु सही निर्णय ।
( 3 ) व्यक्तिगत समंजन की क्षमता का विकास ।
( 4 ) व्यक्तिगत कौशलों का विकास ।
( 5 ) पारिवारिक एवं व्यावसायिक जीवन में सामंजस्य ।
( 6 ) पारिवारिक एवं वैयक्तिक तनावों को कम करना ।
शिक्षा के क्षेत्र में वैयक्तिक मार्ग - दर्शन इस प्रकार दिया जा सकता है
( 1 ) अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करके ,
( 2 ) उत्तरदायित्व की भावना का विकास करके ,
( 3 ) खेलों तथा पाठ्य - सामग्री क्रियाओं का आयोजन करके ,
( 4 ) स्वास्थ्य के प्रति चेतना का विकास करके ,
( 5 ) मानवीय गुणों का विकास करके ,
( 6 ) बालकों में सहयोग तथा नेतृत्व का विकास करके ।
व्यक्तिगत मार्ग - दर्शन का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के सन्तुलित विकास में सहायता करना है । व्यक्ति कई प्रकार की समस्याओं से पीड़ित होता है और उसक निराकरण आवश्यक हो जाता है । उसमें समस्या का निदान ( Diagnosis ) तथा उपचार ( Treatment ) किया जाता है । इसके लिए सुझाव ( Suggestion ) , लगाव ( Persuation ) , शोधन ( Sublimation ) , पुनर्शिक्षण ( Reeducation ) आदि विधियों से उपचार किया जाता है । जटिल समस्याओं के लिए मनोविश्लेषण तथा सामूहिक चिकित्सा आदि का सहारा लिया जाता है ।
2. शैक्षणिक मार्ग दर्शन ( Educational Guidance ) - जोन्स ने शैक्षणिक मार्ग दर्शन की परिभाषा इस प्रकार की है- “ शैक्षणिक मार्ग दर्शन का अर्थ उस व्यक्तिगत सहायता से है जो विद्यार्थियों को इसलिए प्रदान की जाती है कि वे अपने लिए उपयुक्त शिक्षालय पाठ्य क्रम , पाठ्य - विषय एवं स्कूली जीवन का चयन कर सकें और उनसे समायोजन कर सकें । "