. शिक्षा के सार्वजनिकरण से क्या तात्पर्य है ? इसकी आवश्यकता एवं का वर्णन कीजिये ।
शिक्षा का सार्वजनिकरण ( Meaning of Universalization of Education ) विश्व के अनेक विकसित राष्ट्रों में ' अनिवार्य सार्वजनिक शिक्षा ' का प्रावधान किया गया है । किसी राष्ट्र की चहुंमुखी उन्नति , उसके नागरिकों पर निर्भर करती है । अत : नागरिकों का शिक्षित होना अनिवार्य है । शिक्षा से नागरिकों का सर्वांगीण विकास होता है और उसमें चेतना जागृत होती है । शिक्षा के सार्वजनिकरण का अर्थ है कि एक निश्चित आयु वर्ग के बालक - बालिकाएं एक निश्चित स्तर तक अनिवार्य रूप से विद्यालयी शिक्षा प्राप्त करें । भारतीय संविधान की धारा 23 ( i ) में शिक्षा के सार्वजनिकरण हेतु निम्नलिखित प्रावधान हैं " प्रत्येक को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है । कम से कम प्राथमिक और जीवन के लिए आवश्यक स्तरों तक शिक्षा निःशुल्क होगी , प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य होगी । ” भारतीय संविधान की धारा -45 में निम्नलिखित प्रावधान रखा गया है “ संविधान के लागू होने के समय से दस वर्षों में 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बालक - वालिकाओं के लिए ' अनिवार्य ' एवं ' निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा ' की व्यवस्था करने का सरकार प्रयास करेगी । " भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ । इसके दस वर्ष पश्चात् अर्थात् सन् 1960 तक हमें निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था लागू कर देनी चाहिए थी किन्तु 6 वर्ष के लम्बे समय के बीत जाने पर भी हम निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा लागू नहीं कर सके है । नवीं पंचवर्षीय योजना ( 1977-2002 ) के अन्त तक 6 से 14 वर्ष तक के 100 प्रतिशत बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का लक्ष्य निर्धारित किया गया था , इसे सर्वशिक्षा अभियान के नाम से 2010 तक बढ़ाया गया । शिक्षा के सार्वजनिकरण की आवश्यकता एवं महत्व ( Need and Importance of Universalisation of Education ) वर्तमान समय में शिक्षा के सार्वजनिकरण की आवश्यकता एवं महत्व के अधोलिखित कारण हैं
( 1 ) साक्षरता प्रसार में सहायक- भारत की अधिकांश जनता निरक्षर है । भारत में सन् 1991 में साक्षरता 52.11 प्रतिशत थी , जिनमें 63.86 प्रतिशत पुरुष और 39.42 स्त्रियाँ है । परन्तु 2001 की जनगणना के अनुसार भारत की साक्षरता बढ़कर 65.38 प्रतिशत हो गयी , जिससे पुरुषों में साक्षरता का प्रतिशत 75.38 प्रशित है , वहीं 54,16 प्रतिशत स्त्रियाँ ही शिक्षित है । साक्षर व्यक्ति सामाजिक परिवर्तन को तर्क , विचार , परिस्थिति को ध्यान में रखकर स्वीकार कर लेता है और समाज समयानुसार प्रगति पथ पर अग्रसित चला जाता है । सामाजिक प्रगति हेतु साक्षरता अनिवार्य है । साक्षरता का प्रसार शिक्षा के सार्वजनिकरण से ही हो सकता है । सन् 1991 की जनगणना के आधार पर राजस्थान की साक्षरता 38.55 प्रतिशत ( पुरुष 54.99 प्रतिशत और स्त्री 20.44 प्रतिशत ) हो गयी थी , जबकि सन् 2001 की जनगणना के अनुसार राजस्थान राज्य की साक्षरता 61.03 प्रतिशत ( पुरुष 76.46 प्रतिशत एवं महिला 44.34 प्रतिशथ ) है ।
( 2 ) व्यक्ति का विकास – शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण शारीरिक , मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास है । शिक्षित व्यक्ति की विचारधारा निरक्षर व्यक्ति से भिन्न होती है । निरक्षर व्यक्ति का क्षेत्र संकुचित होता है तथा शिक्षित व्यक्ति व्यापक दृष्टिकोण रखता है । वह स्वयं की उन्नति के साथ - साथ समाज एवं राष्ट्रीय उन्नति में भी योगदान करता
( 3 ) सामाजिक विकास - किसी समाज का मूल्यांकन उसके सदस्यों की शिक्षा से किया जा सकता है । शिक्षित समाज द्रुत गति से विकास करता है । वह परम्परा , रूढ़िवाद , अंधविश्वासों से परे रहता है तथा विज्ञान एवं तकनीकी विकास का लाभ उठाकर सामाजिक विकास में योग देता है ।
( 4 ) लोकतंत्र की सफलता - भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के शब्दों में “ प्रजातंत्र के सफल संचालन हेतु शिक्षा ( साक्षरता ) अनिवार्य शर्त है । " उसी देश में प्रजातंत्र सफल हो सकता है , जिस देश के नागरिक शिक्षित हो । ' अशिक्षा ' के कारण भारत में जातिवाद , भाषावाद , प्रान्तीयता , साम्प्रदायिकता , क्षेत्रीयता आदि की विकराल समस्याएं है जिनसे भारत प्रगति नहीं कर पा रहा है ।
( 5 ) व्यावसायिक सफलता - वर्तमान युग विज्ञान का युग है । प्रत्येक व्यवसाय तकनीक पर आधारित है । शिक्षित व्यक्ति वर्तमान विज्ञान एवं तकनीकी पहलुओं को समझ कर व्यावसायिक सफलता प्राप्त कर सकता है ।
( 6 ) राष्ट्रीय विकास - शिक्षित नागरिक राष्ट्रीय विकास की सुदृढ़ कड़ी होते हैं । शिक्षित व्यक्ति राष्ट्रीय विकास के लिए स्वार्थ को तिलांजली दे देता है । तथा बड़े से बड़ा वलिदान करने की भावना भी रखता है ।
( 7 ) दैनिक जीवन की सफलता हेतु - आज विज्ञान एवं तकनीक पर आधारित , जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में , उपकरणों का बोलबाला है । इन उपकरणों की जानकारी आवश्यक होती है । शिक्षित व्यक्ति आवश्यकता पड़ने पर छोटी - मोटी खराबियों को सरलता से दूर कर सकता है और अपने दैनिक जीवन में सफल हो सकता है ।
( 8 ) अन्तर्राष्ट्रीय संदभाव हेतु- संचार एवं आवागमन के द्रुतगामी साधनों ने संपूर्ण विश्व को घर - आंगन जैसा बना दिया है । आज आत्म - निर्भरता के स्थान पर पारस्परिक अंतः निर्भरता है । एक देश अपनी आवश्यकता दूसरे देश से पूर्ण करता है । स्पष्टत : आज विज्ञान ने इतने संहारक अस्त्र बना दिए है कि अणु आयुधों के प्रयोग से क्षण मात्र में पृथ्वी का मानचित्र वदला जा सकता है । शिक्षा , स्वास्थ्य , विकास आदि पारस्परिक सद्भाव का ही परिणाम है । अतः सार्वजनिकरण शिक्षा से अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव में वृद्धि होती है ।
( 9 ) उच्च शिक्षा की तैयारी - अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा के परिणामस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति साक्षर तो होगा ही उसमें शिक्षा के प्रति लगाव भी उत्पन्न होगा । वह रूचि के अनुसार धार्मिक , साहित्यिक , भाषा , यात्रा , खोज संबंधी साहित्य का अध्ययन करने का प्रयत्न करेगा । फलतः उसमें उच्च शिक्षा प्राप्त करने की भावना जागृत होगी । शिक्षा विकास का मार्ग प्रशस्त सोचेगा और सहायक होगा । करती है । उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति का स्वयं का , समाज का राष्ट्र का विकास करने की बात करने हेतु सुझाव दीजिये ।