प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनीकरण

  प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनीकरण





 प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनिकरण हेतु समस्याएँ ( Problems of Universalist of Primary Education ) शिक्षा सामाजिक परिवर्तन तथा विकास का सबसे सशक्त अहिंसक कारक है । शिक्षा के माध्यम से सामाजिक बुराईयां - अंधविश्वास , रूढ़िवाद आदि को समाप्त किया जा सकता है तथा व्यक्ति / समाज का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है । फलतः संसार में अनेक राष्ट्रों ने सार्वभौमिक अनिवार्य शिक्षा व्यवस्था प्रारंभ की । शिक्षा प्रसार एवं प्रसार से अल्पावधि में ही वे विकासशील देशों की श्रेणी में आ गए । भारत एक विशाल राष्ट्र है जिसमें नाना प्रकार की विशेषताएँ है । हिमालय की घाटियों में दुर्गम स्थान है , तो रेगिस्तानी देश भी है । पिछड़ी एवं जन - जातियों में अंघ - विश्वास एवं रूढ़िवादी का जोर है , तो आधुनिक परिवारों के विचार पूर्णतया वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है । एक ओर विज्ञान अट्टाविकायों में विलासितापूर्ण जीवन किलकारियां मारता है , तो दूसरी ओर नंगे बालक भूख से झटपटा कर मौत के मुँह में समा रहे हैं । शिक्षा नाम की बात ही दूसरी है । ऐसी परिस्थितियों में शिक्षा के सार्वजनिकरण के क्रम में देश के सामने अनेक समस्याएँ हैं । . स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात् जनता द्वारा चयनिक सरकार का ध्यान शिक्षा की ओर गया । भारतीय संविधान की 45 वीं धारा के निर्देशानुसार अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था 6-14 आयु वर्ग के बालकों - बालिकाओं के लिए प्रावधान रखा गया है । किन्तु क्या , संविधान होने के 55 वर्ष पश्चात् भी हमारी सरकार अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था लागू कर पाई ? स्वर्गीया प्रधान मंत्री इन्दिरा गाँधी के शब्दों में " प्रजातंत्र के सफल संचालन हेतु शिक्षा ( साक्षरता ) अनिवार्य शर्त है । " 6-14 आयु वर्ग के बालकों लिए हमारी सरकार निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा लागू क्यों नहीं कर सकी , आइए हम उन समस्याओं पर विचार करें । ये समस्याएँ निम्नांकित हैं 

( 1 ) आर्थिक समस्याएँ ( Economical Problems ) :

 ( क ) अभिभावकों की आर्थिक समस्याएँ- भारत की अधिकांश जनता गरीबी रेखा से निम्न स्तर की है । निर्धन अभिभावक माता - पिता अपने बच्चों को विद्यालय नहीं भेज़ पाते है । शिक्षा पर होने वाला व्यय यथा - पौशाक , पाठ्य - पुस्तक एवं सहायक ( अधिगम ) सामग्री , का भार वहन करना उनकी सीमा से बाहर की बात होती है । इसके स्थान पर वे निर्धन माता पिता बालकों को अर्थोपार्जन का एक माध्यम बनाते हैं । गाँवों में पशु चराना , खेतों में छोटा देखभाल उनका मुख्य कार्य होता है । शहरी क्षेत्र में निर्धनता की समस्या और भी अधिक मोटा कार्य करना , माता - पिता के खेतिहार कार्य में लगे होने के समय छोटे भाई - बहिनों की • उजागर होती है । गंदी बस्तियों के बालक कमरे के ढेर अथवा कचरा - पात्रों से कागज , पोलीथीन के टुकड़े , फटे - चिथडे एकत्रित करते , चाय की दुकानों पर कार्य करते अथवा भिक्षावृत्ति करते हुए साधारणतया दिखलाई पड़ते है । निर्धनता के इस ताण्डव नृत्य के कारण अभिभावक उन मासूम बच्चों को अर्थोपार्जन संबंधी कार्यों में लगाना अच्छा समझते है , २ कि विद्यालय भेजना । 

( ख ) केन्द्रीय सरकार के समक्ष आर्थिक समस्या- भारत ने प्राथमिक शिक्षा के राज्यों का विषय बना रखा है । फलतः राज्यों में होने वाला शिक्षा व्यय का केन्द्रीय सरका कुछ हिस्सा ही राज्य सरकारों को देती है । वास्तव में देखा जाए तो शिक्षा का विषय केन्द्रीय सरकार का होना चाहिए । शिक्षा को केन्द्रीय सरकार सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करे । किन अब समस्या के कारण केन्द्रीय सरकार शिक्षा पर होने वाले व्यय का कुछ अंश देकर अफ उत्तरदायित्व से मुक्ति कर लेती है । परन्तु 2004-2005 से केन्द्र सरकार द्वारा प्रवर्तित ' सर्व शिक्षा अभियान प्रारम्भ किया गया है । जिसका उद्देश्य है 1. 6-14 आयु वर्ग के सभी बच्चों तक शैक्षिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना । 2. सभी नामांकित बच्चों के वर्ष 2007 तक 5 वर्षीय प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करना । 3. सभी नामांकित बच्चों को वर्ष 2010 तक 8 वर्षीय प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण कराना । 4. सभी बच्चों का सार्वभौम ठहराव वर्ष 2010 तक सुनिश्चित करना । ( ग ) विद्यालय संबंधी 5. जीवनोपयोगी सन्तोषजनक स्तर की गुणात्मक शिक्षा उपलब्ध कराना । ( 1 ) विद्यालय भवनों का अभाव- एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में वर्तमान विद्यालय भवनों में 33 प्रतिशत भवन ही ऐसे है जिन्हें किसी प्रकार उपर्युक्त कहा जा सकता है , अर्थात् 67 प्रतिशत भवन अनुपयुक्त है । ये अनुपयुक्त भवन अंधकार से पूर्ण , घुटन से युक्त तथा वर्ष भर सीलन युक्त रहते हैं । इनमें दुर्गन्ध युक्त वातावरण रहता है , न ही प्रकाश की व्यवस्था है और न स्वच्छ एवं ताजा वायु की । बालकों को भेड़ - बकरियों के समान कक्षा कक्ष रूपी बाड़े में बैठा दिया जाता है जिसमें न तो आसन व्यवस्था ही है और न ही अन्य शैक्षिक सुविधाएं । खेल संबंधी सुविधाएँ तो दिशा - स्वप्न मात्र है । स्थानीय संस्थाएँ तथा दानी महानुभाव अपनी आर्थिक कठिनाइयों के कारण उपयुक्त भवनों का निर्माण नहीं करवा पाते है । फलतः मंदिरों , मस्जिदों , अनाथालयों , धर्मशालाओं , टूटे - फूटे पुराने भवनों वृक्षों के नीचे विद्यालय चलते है जिनमें आए दिन किसी न किसी कारण अवकाश करना पड़ता है और वर्षा बनी रहती है । में भवनों के दुर्घटनाग्रस्त होने की समस्याएँ वरावर ऋतु 

( 2 ) शैक्षिक समस्या- भारत में अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति अति शोचनीय है । आर्थिक कठिनाइयों के कारण विद्यालय

 छात्रों को शैक्षिक सुविधाएँ नहीं जुटा पाते हैं , इस प्रकार शैक्षिक समस्याएँ निम्नलिखित हैं 

( अ ) विद्यालय में पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं की जाती है । प्राथमिक शिक्षा में अध्यापक छात्र अनुपात 1:40 का है जो कि शैक्षिक दृष्टि से अनुपयुक्त है । एक शिक्षक 40 बालकों को शिक्षण कार्य नहीं करा सकता है । 

( ब ) प्राथमिक विद्यालयों में शैक्षिक सहायक ( अधिगम ) सामग्री का नितान्त अभाव होता है । पाठ्य - पुस्तकें ही एक मात्र शिक्षा का आधार होती है । शिक्षक सहायक / अधिगन सामग्री के अभाव में मौखिक ही समस्या का समाधान करता है । 

( स ) अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की व्यवस्था नहीं है । फलतः भवन की सफाई से लेकर आम समस्त कार्य छोटे - छोटे बालकों को ही करने पड़ते है । अतः उनका ध्यान शिक्षा से हट जाता है । है 

( द ) प्राथमिक विद्यालय में पुस्तकालय तो है ही नहीं । परिणामत : विद्यार्थियों के साथ साथ शिक्षक की भी कूपमण्डूक जैसी स्थिति हो जाती है । उसके ज्ञान का क्षेत्र विस्तृत नहीं हो पाता है ।


 ( 3 ) अन्य समस्याएँ 

( क ) अधिकांश प्राथमिक विद्यालयों में स्थानीय व्यक्तियों की शिक्षक पद पर नियुक्ति की जाती है । इन नियुक्तियों में पूर्णत : राजनीति कार्य करती है । परिणामतः शिक्षक विद्यालय की ओर ध्यान नहीं देता है । बस अपना निजी कार्य खेती - बाड़ी , दुकानदारी या अन्य कार्य करता है । न तो समय पर विद्यालय आता है और न पूर्ण समय विद्यालय में रूकता है । यहाँ तक कि छात्रों से निजी घरेलू , कार्य करवाता है । फलतः अभिभावक विद्यालय से बच्चे को पृथक् कर लेते हैं । 

( ख ) सरकार की वर्तमान नीति के अनुसार प्रत्येक 500 जनसंख्या की आबादी के पीछे एक प्राथमिक विद्यालय होना चाहिए । किन्तु अभी देश में लगभग 3.50 लाख ग्राम ऐसे है जिनकी आबादी 500 से कम है । परिणामतः इनके बच्चों को अन्य स्थानों पर पढ़ने जाना पड़ता है । 2 वन , नाले , नदी , दूरी तथा छोटे - छोटे बालक आदि कारणों से अन्य गाँव में जाकर बालक के लिए पढ़ाना संभव नहीं है । अतः ऐसे क्षेत्र के बालक शिक्षा से वंचित रह जाते हैं । परिणामतः अभिभावक छोटे बालक को विशेषतः वालिकाओं को इतनी दूर भेजना उचित नहीं समझते और ये बालक शिक्षा से वंचित ही रह जाते हैं । 


( 2 ) राजनैतिक समस्याएँ ( Political Problems ) 

( क ) देश का विभाजन - भारत को स्वतंत्रता तो अवश्य मिली किन्तु ब्रिटिश सरकार चलते - चलते देश का दो टुकड़ों में विभाजन कर गई और साम्प्रदायिक की आग भड़का गई । फलतः आजादी पश्चात् सरकार देश का विभाजन , साम्प्रदायिक दंगे , काश्मीर समस्या , आंतरिक समस्याएँ , जातीयता , प्रान्तीयता , चीन का आक्रमण , पाकिस्तान का आक्रमण आदि में व्यस्त रहने के कारण शिक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दे पाई । परिणामतः शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय एवं आशातीत प्रगति नहीं हो सकी । 

( ख ) भ्रष्ट राजनीति- हमारे देश की वर्तमान राजनीति का कोई मानदंड नहीं है और न कोई चरित्र , स्वार्थपूर्ति ही सर्वोच्च मापदंड है और वही सबसे बड़ा नेता है जो सर्वाधिक चाल चल कर अपना उल्लू सीधा कर सकें । परिणामतः शिक्षा के प्रत्येक क्षेत्र में राजनीति व्याप्त है जो निम्नलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट हो जाएगी 

( 1 ) शिक्षक स्थानान्तरण- वर्तमान सरकार एवं नेताओं का एक मात्र कार्य शिक्षक का स्थानान्तरण है । राजस्थान तो इस कार्य में अग्रणी है । शिक्षकों को फुटबॉल बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करना उनका मुख्य कार्य है । 

( 2 ) विद्यालय स्थापना- किसी गाँव , ढाणी , मोहल्ला या गली में विद्यालय खुलना चाहिए अथवा नहीं , वह भी स्थानीय नेता पर निर्भर करता है । विरोधी पक्ष के बालकों को  शिक्षा से वंचित रखना तथा उनके गाँव अथवा गली में विद्यालय न खुलवाना उसके शतरंज के पैतरे की मुख्य चाल होती है । सरकार भी इस कार्य में उसकी मददगार होती है ।

 ( 3 ) विद्यालय व्यवस्था में हस्तक्षेप- स्थानीय भ्रष्ट नेता विद्यालय व्यवस्था में हस्तक्षेप करते रहते हैं । परिणामतः प्रधानाध्यापक शैक्षिक प्रगति हेतु स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाता है । यदि कोई उत्साही प्रधानाध्यापक स्थानीय नेताओं को मुंह नहीं लगाता है , ले उसके लिए ये सिरदर्द बन जाते हैं और उसके विरुद्ध नाना प्रकार की शिकायतें उच्चाधिकारियों को करते हैं । उच्चाधिकारी भी उनके प्रभाव एवं अपनी कुर्सी - बाधाओं के कारण कानों में तेल डालकर स्थानीय नेताओं को प्रसन्न करने के लिए उनकी इच्छानुसार कार्य कर देते हैं । 

( 3 ) सामाजिक समस्याएँ ( Social Problems )

 ( 1 ) अशिक्षित अभिभावक - अधिकांश बालकों के अभिभावक स्वयं अशिक्षित है । फलतः वे शिक्षा के महत्व से अपरिचित है । वे अपने बालकों को शिक्षा दिलाने में कोई रुचि नहीं रखते और प्राय : ये भाग्यवादिता का सहारा लेते हैं । अशिक्षित अभिभावक बालकों की शिक्षा के लिए अभिशाप सिद्ध होते हैं और वे सम्पन्न होते हुए भी वालकों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं देते हैं । 

( 2 ) बाल विवाह - छोटे - छोटे बालकों को विवाह बंधन में बांध दिया जाता है । राजस्थान में तो बाल - विवाह का अत्यधिक प्रचलन है । यहाँ तो समाज के कर्णधार भी बाल विवाह में येन - केन - प्रकारेण योग देते हैं । परिणामतः वाल - विवाह के कारण उन वालकों की शिक्षा का कोई प्रश्न नहीं उठता है । 

( 3 ) जाति -प्रथा- जाति प्रथानुसार शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार ब्राह्मण वर्ग का है । गाँवों में आज भी यह विचार क्रियाशील है । शुद्र अथवा वर्तमान हरिजनों को शिक्षा प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है । दूर - दराज के 

( 4 ) पुत्र एवं पुत्री में भेद- हमारे देश में पुत्र को अत्यधिक महत्व दिया जाता है । तथा पुत्री को पराया धन समझ कर उसका तिरस्कर किया जाता है । ग्रामीण क्षेत्रों में यह भेद स्पष्टतया दृष्टिगोचर होता है । फलतः बालिकाओं की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया । जाता तथा अधिकांश अभिभावक बालिकाओं को पढ़ाने को हेय दृष्टि से देखते है । 

( 5 ) अन्य कारण - विद्यालय भवनों की दूरी , शिक्षकों का अभाव , विद्यालय में सुविधाओं का न होना , बालिका विद्यालयों में पुरुष शिक्षक की नियुक्ति , निर्धनता , रूढ़िवादिता नहीं हो पा रहा है । आदि अनेक ऐसे सामाजिक कारण है , जिनकी वजह से प्राथमिक शिक्षा का सार्वजनिकरण

 ( 4 ) भौगोलिक समस्याएँ ( Geographical Problems ) भारत एक विशाल देश है । जिसमें दुर्गम रेगिस्तान , अगम्य पर्वतमालाएं तथा भीषण जंगल है । इस भौगोलिक विविधता के परिणामस्वरूप ही शिक्षा को अनिवार्य नहीं बनाया जा सका और इसके प्रसार में अनेक कठिनाइयां है । पर्वतीय क्षेत्र में आवागमन के कारण बालक एक स्थान से दूसरे स्थान पर शिक्षा ग्रहण करने नहीं जा सकता है । विशाल मरुस्थल में गांव और आवादी छितरी हुई है । प्रत्येक ढाणी में विद्यालय नहीं है । अतः मरूस्थलीय प्रदेश में विशेषत : ग्रीष्मकाल में जब अंघड चलते है , बालकों का शिक्षा ग्रहण करने एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना संभव नहीं है । असम , नागालैण्ड आदि ऐसे प्रदेश है जहाँ जंगलों , नालों आदि जाना एक टेढ़ी खीर हैं । की बाहुतायत है और जंगली पशु विचरण करते हैं । ऐसी परिस्थितियों में बच्चे का विद्यालय  

( 5 ) शैक्षिक समस्याएँ ( Educational Problems ) : 

( 1 ) दोषपूर्ण पाठ्यक्रम- शिक्षा जगत में प्रचलित पाठ्यक्रम अति दोषपूर्ण है । इस पाठ्यक्रम में स्थानीय आवश्यकताओं पर कोई बल नहीं दिया गया है । राजस्थान में राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान ( S.IE.R.T. ) इस कार्य को करती है । पाठ्यक्रम में पुस्तकीय ज्ञान पर बल दिया गया है । साथ ही संपूर्ण राजस्थान में एक - सा ही पाठ्यक्रम निर्धारित किया गया है । क्षेत्रीय भिन्नता , स्थानीय परिस्थितियों आदि का कोई ध्यान नहीं रखा गया है । वर्तमान पाठ्यक्रम न तो जीवन से संबंधित है और न व्यावहारिक ही है । पाठ्यक्रम में न तो सरलता ही है और न ही आकर्षण ही । रचनात्मक क्रियाओं को इसमें कोई स्थान नहीं दिया गया है । यदि यह कहा जाए कि पाठ्यक्रम केवल साक्षर बनाने का कार्य करता है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी । 

( 2 ) शिक्षकों का अभाव - प्राथमिक पाठशालाओं में शिक्षकों की नितांत कमी रहती है । एक अध्यापकीय पाठशालाएं तो और भी अधिक समस्याग्रस्त होती हैं । परन्तु राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के परिप्रेक्ष्य में ' ब्लैक बोर्ड आपरेशन ' के तहत प्रत्येक विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक कार्यरत है । साधारतः अध्यापक छात्र का अनुपात 1 : 40 का है । परिणामतः शिक्षक समस्त छात्रों को मात्र घेर कर ही बैठता है और उन्हें भाग्य के भरोसे छोड़ देता है । 

( 3 ) योग्य शिक्षकों की अनुपलब्धता- योग्य , अनुभवी एवं शिक्षा के क्षेत्र में रूचि रखने वाले व्यक्ति शिक्षा क्षेत्र में कम ही आ पाते हैं जो आ जाते हैं , देर - सवेर अन्य सेवाओं के क्षेत्र में चले जाते हैं । कारण कि शिक्षकों की सेवा स्थिति , वेतनमान आदि अन्य सेवाओं से कम आकर्षक है । जब तो इस क्षेत्र में वही व्यक्ति आते हैं , जिन्हें अन्य क्षेत्रों में स्थान नहीं मिलता हैं अत : योग्य शिक्षकों को आकर्षित करने के लिए उनकी सेवा शर्तों के सुधार , आकर्षक , वेतनमान , पहाड़ी , रेगिस्तानी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में पृथक् से भत्ता आदि देना चाहिए । ताकि योग्य , अनुभवी एवं अच्छे व्यक्ति शिक्षा जगत की ओर आकर्षित हो सकें ।

 ( 4 ) सहायक ( अधिगम ) सामग्री का अभाव - प्राथमिक विद्यालयों में सहायक ( अधिगम ) सामग्री नाम मात्र को उपलब्ध होती है और वह भी बाबा आदम के जमाने की । परिणामत : शिक्षक विद्यार्थी को सब कुछ मौखिक ज्ञान देता हैं व्यावहारिकता के अभाव में छात्रों की रूचि , जिज्ञासा शान्त नहीं हो पाती और वे पाठशाला से जी चुराने लगते हैं । आधुनिक तकनीकी आधारित उपकरण , यन्त्र व साधनों को प्रयुक्त किया जाए ।

 ( 5 ) अमनोवैज्ञानिक शिक्षण पद्धतियाँ- शिक्षा के क्षेत्र में जो भी शिक्षण विधियाँ प्रचलित हैं , ज्यादातर पाश्चात्य है । भारतीय परिस्थितियों में उनकी सफलता संदिग्ध है । शिक्षाशास्त्रियों को भारतीय परिवेशानुसार शिक्षण - पद्धतियों की खोज करनी चाहिए । ताकि वे भारतीय विद्यालयों में सफल हो सके । शैक्षिक नवाचारों पर आधारित नवीनतम प्रविधि अपनायी जाए । उपर्युक्त शैक्षिक समस्याओं के अतिरिक्त अन्य समस्याएँ भी हैं जैसे बालक को रूचि , अभिरूचि का ध्यान नहीं रखना , शिक्षा का जीवन से संबंधित न होना , व्यक्तिगत - भिन्नता को नजरन्दाज कर देना आदि । 

( 6 ) अन्य समस्याएँ ( Other Problems ) - ऊपर कुछ समस्याओं का मोटे रूप मे ही वर्णन किया गया है इनके अतिरिक्त अन्य समस्याएँ भी है , जो निम्नलिखित हो सकती 

1. अपव्यय एवं अवरोधन की समस्या । 

2. भाषायी भिन्नता की समस्या । 

3. शिक्षा संबंधी प्रचार एवं प्रसार में कमी । 

4. शिक्षा के अलावा अध्यापकों को अन्य कार्यों में नियुक्त कर देना । 

5. बालक को घर पर अध्ययन की सुविधा प्राप्त न होना । 

6. शिक्षा में रोचकता का अभाव , आदि ।

 प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु सुझाव ( Suggestions for Universalization of Primary Education ) प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण हेतु निम्नांकित सुझाव दृष्टव्य हैं

 1. शिक्षा के लिए आवंटित बजट में सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा हेतु आर्थिक धनराशि निर्धारित की जाए ताकि प्राथमिक विद्यालयों की संख्या निरंतर बढ़ती जाए और प्रत्येक बालक को अपने निकट ही विद्यालय उपलब्ध हो सकें । रोजस्थान सरकार का यह प्रयास है कि राज्य में प्रति 250 आबादी रहने वाले सामान्य ग्राम तथा प्रति 150 आबादी वाले दूरस्थ गांवों के लिए प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध करा दिए है । 

2. दुर्गम ग्रामीण क्षेत्रों हेतु राजस्थान में चल रही ' शिक्षाकर्मी योजना ' के अन्तर्गत विद्यालय तथा ' प्रहर पाठशालाओं से नामांकन बढ़ा है । अतः इस योजना का सर्वत्र विस्तार किया जाए । 

3. राजस्थान राज्य की भांति सर्वत्र बालिकाओं का प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने हेतु ' सरस्वती योजना ' का प्रसार किया जाए ।

 4. प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने हेतु छात्र - छात्राओं को निःशुल्क पाठ्य पुस्तकों का वितरण किया जाए तथा मध्याह्न भोजन की व्यवस्था की जाए । राजस्थान में ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं तथा " शाला प्रवेश उत्सवों का आयोजन कर सभी बच्चों को प्राथमिक शालाओं में प्रविष्ट कराने का कार्य हो रहा है ।

 5. माता - पिता तथा अभिभावकों को अपने बालक - बालिकाओं को शिक्षित करने के महत्व समझने हेतु प्रौढ़ शिक्षा का कार्यक्रम तेजी से चलाया गया है । राजस्थान में “ लोक किया जा रहा है । ऐसे कार्यक्रम अन्यत्र भी चलाए जाएं । जुम्बिश ” नामक योजना के अंतर्गत " सम्पूर्ण साक्षरता ” कार्यक्रम इसी उद्देश्य से क्रियान्वित

 6. प्राथमिक शिक्षा अत्यधिक प्रसार के लिए ' गुरू - मित्र योजना ' की क्रियान्वित तथा प्राथमिक शिक्षा में गुणात्मक सुधार किया जा सकता है । की जा रही है । जिससे प्राथमिक स्तर पर नामांकन एवं ठहराव को सुनिश्चित किया जा सकेगा 

7. सर्वशिक्षा अभियान - भारत में 6 से 14 वर्ष की आयुवर्ग के प्रत्येक छात्र / छात्रा नुमति प्राप्त की । को 2010 तक अनिवार्य रूप से कक्षा 1 से 8 तक की अनिवार्य शिक्षा दी जा सके । इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए केन्द्र सरकार ने 93 वें संविधान संशोधन को 2002-2003 में राष्ट्रपति से र कारयुक्त शिक्षा प्रदान करना । 

8. वर्ष 2010 की समाप्ति तक इन बच्चों को उपयोगी एवं समुचित गुणवत्ता और संस्कार युक्त शिक्षा प्रदान करना है