शिक्षा नीति ( Educational Policy )

 शिक्षा नीति ( Educational Policy ) कीजिये । .



                                                                         शिक्षा संस्थान 10 + 2 + 3 पर कोठारी शिक्षा आयोग के विचारों को व्यक्त उत्तर शिक्षा प्रणाली : संरचना और स्तर कोठारी कमीशन ने देश की शिक्षा प्रणाली में आमूल परिवर्तन करने के क्रान्तिकारी सुझाव दिये हैं । ये सुझाव निश्चय ही उपयोगी होंगे यदि भारत सरकार इन्हें ज्यों का त्यो मान ले । कमीशन ने शिक्षा के स्तर पर विचार करते हुए चार बातों पर अधिक जोर दिया है

 ( 1 ) शिक्षा के पिरामिड के विभिन्न कोण और उनका आपसी सम्बन्ध ।

 ( 2 ) विभिन्न अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षा का कुल समय । 

( 3) प्राप्त सुविधाओं का उपयोग । 

( 4 ) अध्यापकों के गुण , पाठ्यक्रम , अध्यापन - पद्धति , मूल्यांकन तथा भवन एवं साधन । ये चारों बातें शिक्षा के सम्पूर्ण ढाँचे का निर्माण करती हैं । शिक्षा के ढाँचे के निर्माण हेतु कुल शिक्षा का समय तथा साधन पर विचार करना आवश्यक है । विद्यार्थियों के बौद्धिक स्तर का निर्माण करने के लिये विद्यालय स्तर पर दो बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है 

( 1 ) उपयोग की वृद्धि अर्थात् साधन जुटाना , 

( 2 ) विद्यार्थियों में गुणों का विकास । 


1. नवीन शिक्षा संरचना शिक्षा आयोग ने शिक्षा में अपेक्षित सुधार करने के लिए शिक्षा प्रणाली में इस प्रकार नवीन संरचना को स्थान दिये हैं नवीन शिक्षा संरचना इस प्रकार होनी चाहिए 

( 1 ) एक से तीन वर्ष तक की पूर्व विद्यालय शिक्षा ।

 ( 2 ) 10 वर्ष की सामान्य शिक्षा जिसमें 7 से 8 वर्ष की प्रथमिक शिक्षा भी है । इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है । 4 या 5 वर्ष की निम्न प्राथमिक ( Lower primary ) और 2 या 3 वर्ष की उच्च ( Higher primary ) प्राथमिक अवस्था । इसके पश्चात् निम्न माध्यमिक स्तर पर 3 या 2 वर्ष की सामान्य ( General ) शिक्षा या 1 से 3 वर्ष की व्यावसायिक ( Vocational ) शिक्षा दी जाये । 

( 3 ) उच्च शिक्षा की अवस्था में 2 वर्ष की सामान्य शिक्षा या 1 से 3 वर्ष तक की व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए । इसका प्रतिशत 50 कर दिया जाये ।

 ( 4 ) पहली उपाधि ( Degree ) के लिये उच्च शिक्षा का समय 3 वर्ष या अधिक होना चाहिये । इसमें विभिन्न पाठ्य - क्रम हों जो दूसरी डिग्री तथा अनुसंधान में सहायक हो ।

 ( 5 ) विद्यालय में प्रवेश लेते समय बालक की आयु 6 वर्ष से कम न हो । 

( 6 ) सार्वजनिक परीक्षा ( Public Examination ) 10 वर्ष की शिक्षा के पश्चात् होनी चाहिए । 

( 7 ) सामान्य शिक्षा की अधिकता कक्षा IX में होनी चाहिए और कक्षा X में विशेषीकरण ( Specialisation ) को प्रोत्साहन देना चाहिए ।

 ( 8 ) माध्यमिक विद्यालय दो प्रकार के हों 

 ( i ) दस वर्ष का शिक्षण देने वाले । 

( ii ) 11 या 12 वर्ष का शिक्षण देने वाले 


( 9 ) हर हाई स्कूल को उच्चतर माध्यमिक ( Higher Secondary ) स्कूल परिवर्तित करने में अधिकता बरतनी चाहिए । इनमें यह ध्यान रखा जाय कि बड़े विद्या के ही स्तर को ऊँचा उठाया जाये । यह प्रगति विद्यमान स्कूलों की 25 प्रतिशत होनी चाहिए संकोच नहीं करना चाहिए । जो हायर सेकेन्डरी स्कूल आशा के अनुसार कार्य नहीं कर रहे हैं , उनका स्तर गिरा देगे

( 10 ) हायर सेकेण्डरी की कक्षा X में नया पाठ्यक्रम लागू किया जाय । कक्षा ) तथा XII में विभिन्न पाठ्यक्रम के विशेषीकरण की व्यवस्था की जाय । कक्षा ( Transitional ) काल की स्थिति में रहेगी । जिन विद्यालयों में समेकित ( integrate पाठ्यक्रम की व्यवस्था IX , X , XI कक्षाओं में है , वहाँ कक्षा XII खुलने तक विशेष व्यव करनी होगी । 



2. प्री- यूनिवर्सिटी कोर्स का स्थानान्तरण शिक्षा के इस स्वरूप को देखते हुए यह तो सोचना पड़ता है कि प्री - यूनिवर्सिटी पाठ्य क्रम का क्या होगा ? इस सम्बन्ध में कमीशन के सुझाव इस प्रकार हैं 

( 1 ) प्री - यूनिवर्सिटी कोर्स 1975-76 तक यूनिवर्सिटी तथा कॉलेजों से हटा क का पाठ्य - क्रम होना चाहिए । सेकेण्डरी स्कूलों में रख दिया जाय । 1985-86 तक हर हालत में 2 वर्ष का उच्च शिक्ष 

( 2 ) यूनिवर्सिटी तथा कॉलेजों से प्री - यूनिवर्सिटी कोर्स को हटाकर स्कूलों के साथ मिलाने की जिम्मेदारी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ( U.G.C. ) उठाये । 

( 3 ) साथ ही साथ राज्य के शिक्षा विभागों द्वारा हायर सेकेण्डरी कक्षायें चुने हुए स्कूल में आरम्भ कर दी जानी चाहिये । ये स्वयंचालित ( Self Contained ) इकाई के रूप में और इन्हें यथा - विधि आवर्तित ( Recurring ) अनुदान मिलना चाहिए । के लिए पुनर्गठित किया जाना चाहिए ।

 ( 4 ) सेकेण्डरी एजूकेशन बोर्ड को हायर सेकेण्डरी शिक्षा की जिम्मेदारी को निभाने 

( 5 ) चौथी योजना में प्राप्त सुविधाओं का उचित उपयोग किया जाना चाहिए । इस म अग्रगामी ( Pilot ) योजनाओं के रूप में चुने हुये स्कूलों में ये प्रयोग किये जायें । " 

( 6 ) इस समय को सामान्य रूप से पाँचवी पंचवर्षीय योजना में लागू करना चाहिए और इसको अन्तिम रूप सातवीं पंचवर्षीय योजना में मिल जाना चाहिए । 



3. विश्वविद्यालय स्तर पर पुनर्गठन विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षा के पुनर्गठन हेतु आयोग ने ये सुझाव प्रस्तुत किये हैं ।

( 1 ) विश्वविद्यालय में पहली डिग्री के लिये 3 वर्ष से अधिक समय नहीं लगना चाहिये । 

( 2 ) दूसरी डिग्री प्राप्त करने के लिये 2 या 3 वर्ष का अन्तर पर्याप्त है । चलना चाहिए । 

( 3 ) कुछ विश्वविद्यालयों को 3 वर्षीय ग्रेजुएट स्कूल , मास्टर्स डिग्री कोर्स के निमित 

( 4 ) पहली डिग्री के लिए 3 वर्ष का विशेष कोर्स होना चाहिए । इस समय विश्वविद्यालयों में कुछ विशेष विषयों में त्रि - वर्षीय कोर्स आरम्भ करना चाहिए ।

 ( 5 ) नये तथा पुराने पाठ्यक्रमों के मध्य उचित संतुलन होना चाहिए । 

( 6 ) जो छात्र 3 वर्षीय कोर्स लें , उन्हें छात्र - वृत्ति आदि देकर आकर्षित करना चाहिए । 

( 7 ) उत्तर प्रदेश में त्रिवर्षीय डिग्री कोर्स , त्रिवर्षीय ग्रेजुएट स्कूलों की स्थापना से होना चाहिए । ये स्कूल कुछ विशेष विश्वविद्यालयों में कुछ विशेष विषयों में होने चाहिए । अन्य कॉलेजों में 15-20 वर्ष में यह त्रिवर्षीय पाठ्य - क्रम लागू किये जा सकते हैं । 4. सुविधाओं का उपयोग जहाँ एक भौतिक सुविधाओं के उपयोग का प्रश्न है , वे यदि पूरी तरह से उपयोग की जाएँ तो निसन्देह शिक्षा के गठन तथा स्तर में परिवर्तन आयेगा । 



इस हेतु आयोग की संस्तुतियाँ इस प्रकार हैं

 ( 1 ) योजनाओं में विद्यमान सुविधाओं को सघन ( Intensive ) रूप से उपयोग करने पर बल दिया जाना चाहिये । 

( 2 ) पढ़ाई के दिनों की संख्या इस प्रकार रखी जाय- स्कूल- 39 सप्ताह , पूर्व प्राथमिक- 36 सप्ताह , कॉलेज -38 सप्ताह । 

( 3 ) शिक्षा मंत्रालय को राज्य सरकार तथा यू.जी.सी. के साथ मिल कर छुट्टियों के लिए एक कैलेन्डर बना लेना चाहिए । पढ़ाई के दिनों का जो नुकसान परीक्षाओं या अन्य कारणों से हो जाता है , 21 दिन तथा 26 दिनों से ( क्रमश : स्कूल तथा कॉलेजों में ) अधिक नहीं होना चाहिए । •

 ( 4 ) अवकाश का पूरा उपयोग विद्यार्थियों के साथ हो । यह उपयोग अध्ययन में भाग लेने , समाज सेवा शिविरों में जाने , उत्पादक ( Production ) अनुभव , साक्षरता अभियान आदि के अध्ययन से हो । 

( 5 ) स्कूलों में कार्य के दिनों की संख्या बढ़ाई जा सकती है । कॉलेजों में स्वयं - अध्ययनै ( Self Study ) पर बल देना चाहिए । 

( 6 ) शिक्षा संस्थाओं में प्राप्त सुविधाओं , जैसे- पुस्तकालय , प्रयोगशाला , कार्यशाला ( Workshop ) , हस्तकला - केन्द्र ( Craft - sheds ) आदि के उपयोग पर पूरा - पूरा बल दिया जाना आवश्यक है ।



 5. गतिशील तथा विकासशील स्तर आयोग का आज की स्थिति में विचार है- कुल मिलाकर स्थिति प्रकाश और अन्धकार की सम्मिलित तस्वीर है जिसमें उत्थान और पतन , किन्हीं क्षेत्रों में सुधार तथा अन्य किन्हीं में स्तरों का पतन , यह सब कुछ एक साथ देखने को मिलता है । अत : आयोग द्वारा प्रस्तावित सुझाव इस प्रकार हैं 

( 1 ) शिक्षा के सभी स्तरों पर सघन रूप से स्तर को ऊँचा उठाने के प्रयत्ल होने चाहिए । स्कूल के पहले 10 वर्षों में बालक में गुणात्मक विकास हो जिससे इस स्तर पर शिक्षा में अपव्यय ( Wastage ) की संभावना कम रहे । कक्षा X पास करने के पश्चात् यही प्रयत्न सेकेण्डरी तथा उच्च शिक्षा में ही हों । 

( 2 ) प्राथमिक तथा सेकेण्डरी कक्षा के अन्त में राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी मशीनरी का निर्माण किया जाय जो राष्ट्रीय स्तर की परिभाषा कर सके , उनकी पुनरावृत्ति और मूल्यांकन कर सके ।

 ( 3 ) स्तर को उठाने के लिए उचित सहयोग तथा सम्बद्धता ( Co - ordination ) आवश्यकता है । यह सम्बद्धता शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर होनी चाहिए यह उस पृथकता में समाप्त कर दे जिससे शिक्षण संस्थायें ग्रसित हैं । इस दृष्टि से कमीशन का विचार है 

( i ) विश्वविद्यालय तथा कॉलेजों को स्कूलों की कुशलता बढ़ाने में विभिन्न उपयो से योग देना चाहिए ।

 ( ii ) विद्यालय संगमों ( Complexes ) का निर्माण होना चाहिए । ये संगम इस प्रक के होने चाहिये कि एक सेकेण्डरी स्कूल आस - पास के प्राइमरी स्कूलों को प्रभावित कर सके इस प्रकार सभी विद्यालय , विकास के लिए एक समूह का निर्माण कर लेंगे । - इन संगमों का निर्माण करने से पहले हम सोच लें कि भारत में 26000 सेकेण्ड स्कूल हैं जिनमें से 14000 ग्रामीण क्षेत्रों में हैं । इसी प्रकार ग्राम क्षेत्रों में लगभग 6500 , इमरी तथा 3,60,000 लोअर प्राइमरी स्कूल हैं । यों इस मील की परिधि में 26 प्राइम तथा 1 सेकेण्डरी स्कूल हैं । प्राइमरी स्कूलों में सुविधायें नहीं के बराबर हैं । अतः सेकेण्डर स्कूल के हैडमास्टर को प्रसार सेवा ( Extension Service ) का काम करना चाहिए । 


6. पार्ट टाइम शिक्षा आज हमारी शिक्षा तीन मुख्य सारणियों में विभक्त हैं 

( 1 ) प्री - स्कूल शिक्षा , जिसमें कोई औपचारिक शिक्षा नहीं होती । 

( 2 ) स्कूल शिक्षा , जिसमें शिक्षा होती है , काम नहीं । 

( 3 ) स्कूल के बाद की शिक्षा , जिसमें काम होता है , शिक्षा नहीं । इसीलिए हम शायद भूल जाते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य समस्त जीवन भर प्राप्त नह किया जा सकता । यह तो जीवनपर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है । अतः शिक्षा जैसे भी प्राप्त क गई हो , उसे पूरे समय की शिक्षा की भाँति महत्व देना चाहिए । 


7. एकरूपता अतः आज भारत में शिक्षा के विभिन्न स्तर तथा रूप प्रचलित है । आयोग का विच है कि शिक्षा में एकरूपता के बिना अपेक्षित विकास नहीं हो सकता । शिक्षा के विभिन्न स् तथा उपस्तरों पर एकरूपता का होना आवश्यक है ।