विशिष्ट बालकों का निर्देशन व व्यक्तित्व का विकास कैसे किया जाना चाहिए ? क्या शारीरिक अक्षम बालक के लिए विशेष निर्देशन होना चाहिए ? अथवा प्रतिभाशाली बालकों के लिए विशेष निर्देशन की क्यों आवश्यकता होती है ? इनके लिए कैसाविशिष्ट बालकों का निर्देशन व व्यक्तित्व का विकास कैसे किया जाना चाहिए ? क्या शारीरिक अक्षम बालक के लिए विशेष निर्देशन होना चाहिए ? अथवा प्रतिभाशाली बालकों के लिए विशेष निर्देशन की क्यों आवश्यकता होती है ? इनके लिए कैसा शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन किया जाएगा ? अथवा मन्दबुद्धि बालकों के लिए विशेष निर्देशन की क्यों आवश्यकता होती है ? इनके लिए कैसा शैक्षिक व व्यावसायिक निर्देशन होना चाहिए ? अथवा विशिष्ट बालकों के निर्देशन से क्या तात्पर्य है ? इनको व्यक्तित्व विकास के लिए किस प्रकार निर्देशित किया जा सकता है ?
विशिष्ट बालकों का निर्देशन
( Guidance of Exceptional Children ) विशिष्ट बालकों का निर्देशन शिक्षा के लिए अत्यधिक आवश्यक है क्योंकि निर्देशन वह व्यवस्था है , जिसके द्वारा शारीरिक व मानसिक रूप से विकलांग बालकों की शिक्षा व प्रशिक्षण सही हो सकता है । उनके विकास कार्यात्मकता , गुणवत्ता को बनाया जा सकता है और उनका सामान्य सन्तुलित विकास किया जा सकता है । सामान्य जनजीवन में विशिष्ट वालकों का वर्गीकरण हो जाता है । जैसे शारीरिक व मानसिक रूप से विकलांग बालक , मंद बुद्धि , पिछड़े , असमायोजित व अति प्रतिभाशाली वालक आदि होते हैं । इनके लिए शैक्षिक व व्यावसायिक दोनों प्रकार का विशेष निर्देशन आवश्यक होता है , क्योंकि विशिष्ट बालक भी समाज के महत्वपूर्ण अंग होते हैं । भारत में ही लगभग 5 करोड़ के करीब अक्षम बालक हैं , जो किसी न किसी रूप में विकलांग हैं , लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनको समाज का हिस्सा न समझा जाए । इसीलिए ऐसे बालकों के लिए व्यापक निर्देशन की आवश्यकता होती है । विशिष्ट बालकों के निर्देशन का अर्थ है ऐसे बालकों के लिए विशेष रूप से दिशा निर्देश किया जाए , जिससे वे सामान्य व्यक्ति के समान समाज का एक अंग बन सकें । निर्देशन शब्द उन समस्त सेवाओं की ओर संकेत करता है , जो कि एक व्यक्ति को निम्नलिखित योग्यताओं के विकास में सहायता करती हैं ।
( 1 ) अपने लिए उचित उद्देश्यों को निर्धारित करना ।
( 2 ) ऐसे तरीकों का प्रबन्ध करना जिनसे इन उद्देश्यों की पूर्ति हो सके । एक पूर्ण निर्देशन सेवा में निम्नलिखित बातें होना अनिवार्य हैं।
( 1 ) एक व्यक्ति को अपने को समझने में सहायता करना ।
( 2 ) प्रत्येक व्यक्ति में रुचि तथा इच्छाएँ जाग्रत करना , जो कि समाज के अनुरूप हों ।
( 3 ) उचित सम्प्राप्ति को जाग्रत करना ।
( 4 ) व्यक्ति को अपने वातावरण से अवगत कराना ।
( 5 ) अत्यधिक अनुभव प्रदान करना ।
( 6 ) अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अत्यधिक अवसर प्रदान करना । विशिष्ट बालकों को शैक्षिक और व्यावसायिक दोनों प्रकार का निर्देशन देना चाहिए , यद्यपि इनके निर्देशन का अधिकतर भाग शैक्षिक निर्देशन होता है । दोनों प्रकार के निर्देशन प्रदान करने की सबसे अच्छी संस्था विद्यालय है । एक विशिष्ट बालक की निर्देशन आवश्यकताएँ एक सामान्य बालक की आवश्यकता से किसी भी प्रकार कम नहीं हैं । विशिष्ट बालकों को निर्देशन समूह में न देकर व्यक्तिगत रूप से देना चाहिए । इसका कारण यह है कि प्रत्येक विशिष्ट बालक की आवश्यकता भिन्न होती है ।
इनको निर्देशन सेवाएँ इस प्रकार दी जानी चाहिए
1. निर्देशन उन सभी विशिष्ट बालकों को देना चाहिए , जो स्कूल में आते हैं ।
2. स्कूल निर्देशन सेवा को अन्य बाहरी निर्देशन सेवाओं से भी सहायता लेनी चाहिए ।
3. स्कूल निर्देशन सेवा में उन सभी साधनो का प्रयोग करना चाहिए , जो इसके लिए उपलब्ध व आवश्यक हों । निर्देशन तथा व्यक्तित्व विकास एक व्यक्ति की अच्छी जिन्दगी उसके व्यक्तित्व पर निर्भर करती है । निर्देशन सेवाएँ विशिष्ट बालकों के व्यक्तित्व के विकास में सहायक हो सकती हैं । उसके लिए विशिष्ट बालकों की आवश्यकताओं तथा निर्देशन की आवश्यकताओं को भली - भाँति समझना चाहिए । एक अच्छे व्यक्तित्व के लिए आवश्यक है- सुरक्षा , स्वतन्त्रता तथा आत्म - प्रदर्शन की आवश्यकताओं के बीच स्वीकारात्मक सन्तुलन इस ओर विशिष्ट बालकों की निर्देशन सेवाओं को प्रयत्न करना चाहिए ।
सर्वप्रथम निर्देशक द्वारा व्यक्तित्व का विकास होना चाहिए और इसके लिए व्यक्तित्व में कुछ विशेषताएँ पैदा करनी चाहिए
( 1 ) शारीरिक अक्षमता की स्वीकारना ( 2 ) स्वतन्त्र व्यक्तित्व का विकास ( 3 ) सुरक्षा ( 4 ) आत्मविश्वास ( 5 ) आत्म - प्रदर्शन की क्षमता व उपयुक्त शिक्षा ( 6 ) किसी कार्य , व्यवसाय या रोजगार में दक्षता ( 7 ) उसको कार्य अनुभव के बाद रोजगार की प्राप्ति ( 8 ) जीवन एक संघर्ष के साथ जीना चाहिए । ये बातें व्यक्तित्व के विकास के लिए व्यापक निर्देशन कार्यक्रम द्वारा चलायी जानी चाहिए ताकि शैक्षिक व व्यावसायिक प्रशिक्षण से पूर्ण एक सन्तुलित व्यक्तित्व की आधारशिला तैयार हो सके । अक्षम बालक के लिए विशेष निर्देशन अक्षम बालक नाना प्रकार के होते हैं । निर्देशन प्रदान करने से पहले उनकी यह पहचान अनिवार्य है कि वे किस प्रकार के अक्षम वालक हैं । एक शारीरिक रूप से अक्षम बालक की पहचान विद्यालय में भली प्रकार से नहीं हो सकती । इसके लिए उन्हें क्लीनिक में भेजना चाहिए । अक्षम वालक के निर्देशन के लिए निर्देशनकर्ता तथा परामर्शदाता का विद्यालय में होना अनिवार्य है ।
इन बालकों की पहचान के समय निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए
( 1 ) उन कार्यों को करवाना , जिन्हें अक्षम बालक भी उतना ही प्रभावशाली ढंग से कर सकता है , जितना कि कक्षा का सामान्य बालक ।
( 2 ) अक्षम बालक की कार्य में सफलता पर प्रसन्नता प्रकट करना और उसे स्वीकार करना ।
( 3 ) बालक से गति , सामाजिक कौशल तथा अन्य योग्यताओं से सम्बन्धित कार्य करवाना ।
( 4 ) उनके वातावरण को नियन्त्रित करना ।
( 5 ) सहनशीलता , प्रसन्नता , रुचि आदि गुणों का परीक्षण करना ।
( 6 ) बालकों के अभिभावकों को विशेष निर्देशन देना जिससे वे अपने बच्चों की आवश्यकताओं को समझें । निर्देशन का मुख्य उद्देश्य बालकों को इस योग्य बनाना है कि वे अपने लिए उद्देश्यों को निर्धारित कर सकें । निर्देशन के द्वारा व्यक्ति को अपने वातावरण को समझने की क्षमता विकसित करनी चाहिए । यह विशिष्ट बालकों के लिए महत्वपूर्ण है । चूँकि अक्षम बालक की योग्यताएं सीमित होती हैं , अतः यह आवश्यक है कि ऐसे बालकों को इस बात का ज्ञान हो कि उनके पास कितनी योग्यता है । यदि विशिष्ट बालक को इस बात का ज्ञान हो जाए तो वह अपनी योग्यतानुसार अपने उद्देश्यों को निर्धारित कर सकता है । इससे उसे अन्य लोगों के समान जीवन में समायोजन स्थापित करने में सहायता मिलती है । एक भली प्रकार संयोजित निर्देशन इस क्षेत्र में सहायक हो सकता है । शैक्षिक और व्यावसायिक निर्देशन विशिष्ट वालकों के शैक्षिक और व्यावसायिक सामंजस्य की अति आवश्यकता है । इसके लिए शैक्षिक और व्यावसायिक पुनर्स्थापन संस्थाएँ होनी चाहिए । ये संस्थाएँ स्कूल के सहयोग से निर्देशन प्रदान कर सकती हैं , विदेशों के समान जनता पुनर्स्थापन संस्थाएं भी इस कार्य के लिए स्थापित की जा सकती हैं ।
इन संस्थाओं और विद्यालय द्वारा विशिष्ट बालकों के समायोजन हेतु दिए जाने वाले निर्देशन में ये 8 सोपान होने चाहिए
1. विशिष्ट बालक की पहचान - इसके लिए अध्यापक को अन्य संस्थाओं की सहायता लेनी चाहिए । वह शैक्षिक संस्थाओं , स्वास्थ्य संस्थाओं , समाज कल्याण संस्थाओं तथा अन्य इसी प्रकार की संस्थाओं की सेवाएँ प्राप्त कर सकता है ।
2. डॉक्टरी जाँच - बालक की भली प्रकार जाँच करवानी चाहिए । इसके द्वारा यह निश्चित करना चाहिए कि कौन - से विषय विशिष्ट बालक के लिए उपयुक्त होंगे और कौन सा व्यवसाय ठीक रहेगा ।
3. शारीरिक पुनःस्थापन - उन शारीरिक अक्षमताओं को , जो कम हो सकती हैं या दूर की जा सकती हैं , अवश्य दूर करना चाहिए । इसके उपरान्त ही उन्हें शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन देना चाहिए ।
4. परामर्श - परामर्श निर्देशन सेव का केन्द्र बिन्दु है । इसके बिना पुनर्स्थापन नहीं हो सकता । परामर्श सेवाओं को प्रथम साक्षात्कार से ही आरम्भ करना चाहिए तथा तब तक देते रहना चाहिए , जब तक व्यक्ति को नौकरी नहीं मिल जाती । एक अच्छी परामर्श सेवा व्यक्ति को उसकी कमजोरियों से अवगत कराती है तथा उन्हें दूर करने का प्रयत्न करवाती है ।
5. व्यावसायिक शिक्षण - निर्देशन सेवाओं को बालक की अच्छी नौकरी के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण का भी प्रबन्ध करना चाहिए । यदि माध्यमिक स्कूल व्यावसायिक कोर्स प्रदान करते है तो अक्षम बालक को उसका पूर्ण लाभ उठाना चाहिए । माध्यमिक स्कूल को ऐसे बालक को नौकरी में लगाने का भी प्रयत्न करना चाहिए ।
6. आवश्यक पूरक सेवाएं - इन सेवाओं के अन्तर्गत आयेंगे- आवश्यक जीवन सम्बन्धी सुझाव , प्रशिक्षण सम्बन्धी सामान , ऐसे सामान तथा वस्तुएँ , जो व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए आवश्यक हैं ।
7. व्यवसाय स्थापन- एक व्यावसायिक पुनर्स्थापन तभी सम्भव हो सकता है , जबकि उस व्यक्ति को किसी उचित व्यवसाय में लगा दिया जाए । इसके लिए आवश्यक है कि व्यवसाय इस प्रकार का हो कि व्यक्ति अपनी योग्यता का पूर्ण लाभ उठा सकें । विशिष्ट बालकों के सम्बन्ध में भी यह बात लागू होती है । एक सफल स्थापन एक अच्छे व्यावसायिक निर्देशन का आवश्यक गुण है । हाल में इस क्षेत्र में अक्षम बालकों के लिए अत्यधिक विकास हुआ है । अमेरिका में श्री वरनन वेन्टा ( Vernon Benta ) के नेतृत्व में जो अध्ययन हुए , उनसे स्थापन की चयनित स्थापन की विधि का पता चला । यह मुख्यतः विशिष्ट बालकों के सम्बन्ध में है ।
8. अनुसरण सेवा ( Follow - up ) - एक अच्छी निर्देशन सेवा में यह नहीं सोचना चाहिए कि व्यक्ति को नौकरी मिलने पर निर्देशन का कार्य समाप्त हो गया । इसके अन्तर्गत अनुसरण भी आती हैं । यह देखना चाहिए कि वालक नौकरी मिलने पर सन्तुष्ट है या नहीं और वह ठीक से काम कर रहा है या नहीं । उसे वेतन ठीक मिल रहा है अथवा नहीं , आदि