सीखने की सुविधा प्रदान करने में तथा पाठ्यक्रम क्रियान्वयन में शिक्षक की भूमिका का वर्णन कीजिये । अथवा शिक्षा की राष्ट्रीय व्यवस्था में सीखने में सुविधा प्रदान करने में शिक्षक की क्या भूमिका होनी चाहिए ?
सीखने की सुविधा प्रदान करने में शिक्षक की भूमिका ( Teacher's Role as Facilitator of Learning ) कक्षा के अन्दर शिक्षण सम्वन्धित सभी निर्देश , प्रक्रिया , उत्प्रेरणा आदि का कार्य जो करता है , वह अध्यापक ही है । इससे शिक्षण को गतिशील एवं प्रभावी बनाने की प्रक्रिया पूर्ण होती है । अध्यापक के अभाव में शिक्षण में भावनात्मक सम्बन्ध ( भावात्मक पक्ष ) प्रवल नहीं बन वाते । एक शिक्षक के निम्नलिखित कार्य होते हैं
1. उत्प्रेरणा प्रदान करना ( To Secure Motivation ) - कोई कार्य तभी सफल होता है , जब कर्त्ता के भीतर उस कार्य के प्रति उल्लास हो । सीखने के प्रति बालक में रुचि उत्पन्न कर देना ही उत्प्रेरणा है । इसका शिक्षण में महत्वपूर्ण स्थान है । निष्क्रियता और उदासीनता के वातावरण में बालक नवीन ज्ञान को प्राप्त करने में उत्सुक नहीं होता है । एक विद्वान ने कहा भी है— “ प्रेरणा या उत्साह शिक्षण में महत्वपूर्ण अंग हैं और जब तक हम शिक्षण के उत्प्रेरक अंग की ओर ध्यान नहीं देंगे तब तक शिक्षण के वास्तविक रूप को नहीं समझ सकते हैं । " पथ - प्रदर्शन के अभाव में बालकों के दिग्भ्रमित हो जाने की सदैव आशंका बनी रहती है ।
पथ - प्रदर्शन की सामान्यत : तीन विधियाँ हैं-
( 1 ) बालकों की विशिष्ट योग्यताओं का पता लगाकर उत्प्रेरणा द्वारा
( 2 ) निर्देश तथा उदाहरणों द्वारा
( 3 ) वांद - विवाद , व्यक्तिगत बातचीत तथा समस्याओं के उत्पन्न होने पर परामर्श देकर ।
2. बालक के संवेगों को प्रशिक्षित करना ( To Train the Emotion of Lear ner ) - शिक्षक , शिक्षण द्वारा बालकों में उचित भावनाएँ उत्पन्न करता है । संवेगों की उचित प्रशिक्षा होती है । स्थिर संवेगात्मक जीवन का विकास होता है । यह विकास शिक्षक की सहानुभूति , प्रेम , उचित कार्य , वैयक्तिक सम्पर्क तथा उचित पथ - प्रदर्शन द्वारा सुगमता से सम्पन्न होता है । जो बालक विद्यालय आएँ वे अनुभव करें कि उन्हें विद्यालय में स्नेह व सहानुभूति शिक्षण के मध्य मिल रही है ।
3. छात्र को क्रियाशील बनाने का अवसर देना ( To Provide Opportunities of Activeness ) - अध्यापक बालक की विभिन्न मूल प्रवृत्तियों का शोधन कर उन्हें निश्चित दिशा प्रदान करता है , जिससे कि उनका बहुमुखी विकास हो सके । बालकों के अध्ययन और सीखने की विधि तथा चिन्तन करने के उचित ढंग और सामग्री के मूल्यांकन करने की उचित पद्धतियों में अध्यापक को अपने बालकों का सतर्क होकर पथ - प्रदर्शन करना होता है । इस प्रकार शिक्षण द्वारा अध्यापक बालकों की क्रियाशीलता को स्वाभाविक गति से विकसित होने का अवसर प्रदान करता है ।
4. एक सूचनादाता के रूप में ( As an Source of Information ) - शिक्षक , शिक्षण द्वारा ज्ञान की नवीन संरचना प्रदान करता है । वह नये ज्ञान को प्रकाश में लाता है । नाना प्रकार के अज्ञात विचारों एवं वस्तुओं से अवगत कराता है । जो अध्यापक कहानी कहने की कला में अधिक प्रवीण होते हैं ; बालकों की मनोवृत्तियों का अच्छा ज्ञान रखते हैं , विषय के प्रस्तुतीकरण की विधि जानते हैं , उन्हें इस क्षेत्र में पर्याप्त सफलता मिलती है ।
5. शिक्षण का अर्थ सम्बन्ध स्थापित करना है ( Teaching is Establishing Relationship ) – शिक्षा एक त्रिभुजी प्रक्रिया है । बालक , शिक्षक तथा विषय इस क्रिया के केन्द्र विन्दु हैं । शिक्षण के द्वारा इन तीनों के मध्य सम्बन्धों का स्थापन होता है । यह सम्बन्ध स्थापित करते समय अध्यापक को कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है , जिनमें सर्वप्रथम है - बालक की प्रकृति का ज्ञान । बालक में वैयक्तिक विभिन्नताएँ होती हैं । जैसे- स्वास्थ्य , शारीरिक शक्तियाँ , रुचियाँ , योग्यताएँ , संवेग , नैतिक , स्वभाव एवं बुद्धि आदि । एक शिक्षक तभी अपने कार्य में सफल माना जाता है जबकि वह बालक की वैयक्तिक विभिन्नताओं को समझकर उसे शिक्षण प्रदान करे । विषय और विद्यार्थी के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने की कला का उसे ज्ञान होना चाहिए । उसका एक जीवन - दर्शन भी होना चाहिए , जिससे बालकों को प्रभावित कर सके ।
6. अध्यापक का कार्य सिखाना है ( To Learn is the Funtion of Teacher ) – शिक्षक का प्रमुख कार्य है बालकों में उत्प्रेरणा का प्रादुर्भाव करना । उसे पढ़ने के लिए उत्साहित करना । अध्यापक बालक की इसी क्रिया में सहायता करता है । शिक्षण का यह मौखिक सिद्धान्त सभी शिक्षाविदों द्वारा समाहित हुआ है । बर्टन ने स्पष्ट शब्दों में कहा “ शिक्षण सीखने में उत्तेजना , पथ - प्रदर्शन और प्रोत्साहन देता है । शिक्षक द्वारा एसे वातावरण की सृष्टि होनी चाहिए जिसके मध्य बालक को अपने विषय के प्रति स्वाभाविक रुचि उत्पन्न हो जाए और सोत्साह उसे सीखने हेतु कर्मरत हो ।
7. शिक्षण व्यक्तित्व निर्माण का साधन है ( Teaching is Means of Preparation of Personality ) - शिक्षक का प्रमुख दायित्व होता है कि वह शिक्षण तथा अन्य स्त्रोतों के माध्यम से बालक के सम्यक् व्यक्तित्व का निर्माण करें । शिक्षण के प्रमुख माध्यम द्वारा बालक का शारीरिक , बौद्धिक तथा आध्यात्मिक और संवेगात्मक विकास होता है । इस विकास में उसमें ऐसी क्षमता आ जाती है कि वह अपने भावी जीवन को सुखी बना सकता है । शिक्षण एक नयी उत्कण्ठा तथा प्रेरणा को जाग्रत कर निरन्तर प्रगतिशील बने रहने की लालसा उत्पन्न कर देता है । अतः शिक्षण के इस पावन यज्ञ को उत्तम ढंग से प्रतिपादित करना चाहिए । तभी हमें सुख , शान्ति एवं कल्याण के दर्शन हो सकेंगे ।
8. बालक को वातावरण के अनुकूल बनाने में सहायता प्रदान करना ( To Help the Student to Adjust Himself to his Environment ) - रायबर्न के अनुसार “ शिक्षण का कार्य यह भी है कि बालक को अपने वातावरण के प्रति सम्यक् अनुशीलन करने में सहायता दे । शिक्षण द्वारा बालक की प्राकृतिक एवं सामाजिक वातावरण के प्रति किसी न किसी प्रतिक्रिया में सुधार किया जाता है । इससे बालक प्रभावशाली तथा उपयुक्त प्रतिक्रियाएँ करने की योग्यता प्राप्त करता है और शिक्षण द्वारा वालकों को इस जगत में जीने की कला का ज्ञान प्राप्त होता है । ”
सिम्पसन ( Simpson ) ने ठीक कहा है , " शिक्षण वह साधन है । जिससे कि समाज अपने बालकों को एक चुने हुए वातावरण जिसमें कि उनको रहना है शीघ्रातिशीघ्र उसके अनुकूल बनाने की क्रिया में प्रवीण करता है ।