दृष्टि बाधित बालकों के शैक्षिक प्रावधान
दृष्टि बाधित बालकों को शिक्षा देने का सबसे अच्छा तरीका विशेष कक्षाओं आयोजन है । एक विद्यालय में ऐसे बालकों की संख्या 1 से 500 तक होती है अध्यापन इस बात का निर्णय कर सकता है कि क्या उनके लिए विशेष कक्षा का आयोजन किया ज तथा कौन - कौन - सी सुविधाएँ प्रदान की जाएँ । एक कक्षा से स्कूल , समुदाय तथा समाज का कार्य हो सकता है । इस कक्षा में विभिन्न श्रेणियों के बालक हो सकते हैं । गाँवों में भी आरिक रूप से देखने वाले बालकों के लिए विशेष कक्षा का प्रवन्ध होना चाहिए । अनेक गाँव मिलका इस कक्षा का निर्माण कर सकते हैं । गाँव के बालक नजदीक के शहर भी जा सकते हैं औ अक्सर सम्भव व आवश्यक हो तो छात्र छात्रावास में भी रह सकते हैं । राज्य के शिक्षा निदेशक को चाहिए कि गाँवों में ऐसे अध्यापकों की सहायता करें , जिनकी कक्षा में आंशिक रूप में देखने वाले वालक हैं । यदि राज्य द्वारा शिक्षा का प्रबन्धन नहीं है तो समाज सेवक इसका प्रवन्ध कर सकते हैं । आवश्यक शैक्षिक सामना शिक्षा विभाग द्वारा दिया जा सकता है । बड़े विद्यालयों में प्रत्येक कक्षा में कम से कम एक बालक कम देखने वाला होता है । ऐसी अवस्थ में सबसे पहले प्राथमिक श्रेणियों के विद्यार्थियों के लिए शिक्षा का आयोजन करना चाहिए । क्योंकि जितनी जल्दी कम देखने वाले वालकों को शैक्षिक सुविधाएँ दी जाएँगी , उतनी हो अधिक सफलता की आवश्यकता होगी । कक्षा व्यवस्था की विधि - चूँकि पृथकीकरण अब आधुनिक शैक्षिक सिद्धान्तों के अनुरूप नहीं है , अतः एक सहकारिता योजना का विकास किया गया है , जिसके द्वारा कम देखने वाले वालक अपने कार्य एक विशेष सामान से युक्त कक्षा में एक योग्य शिक्षक के अन्तर्गत करते हैं । अन्य कार्यक्रमों के लिए अन्य औसत वालकों के साथ मिल जाते हैं । सहकारिता - यदि उपर्युक्त योजना सफलतापूर्वक चलती है , तो बालक के स्वास्थ्य तथा शिक्षा का उत्तरदायित्व अधीक्षक , प्रधानाध्यापक , स्कूल स्वासी सेवा अध्यापक तथा विशेष कक्षा के अध्यापक तथा वालक के माता - पिता पर है । इस सहयोग को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक को शिक्षा के विशेष उद्देश्य से परिचित होना चाहिए । इन सभी को समस्या समाधान में सहयोग देना चाहिए । आंशिक रूप से देखने वाले वालक का विशेष कक्षा तथा सामान्य कक्षा में भली प्रकार स्वागत करना चाहिए ।
इससे वह अपनी कठिनाइयों पर विजय पाने में सफल होगा । पाठ्यक्रम - कम देखने वाले और औसत बालकों का पाठ्यक्रम एक - सा होता है । जिससे आँखों पर अधिक जोर पड़े । अध्यापकों को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि ऐसा कोई भी कार्य अधिक नहीं करवाया जाए . शैक्षिक माध्यम तथा संसाधन व्यवस्था ऐसे बालक दृष्टि बाधित कहलाते हैं , उनसे देखने वाले कार्य कम कराने चाहिए । रोशनी पर विशेष ध्यान देना चाहिए ।
इस सम्बन्ध में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं
1. शैक्षिक माध्यम - ऐसे बालकों के लिए शैक्षिक माध्यम एक बड़े पैमाने पर है । एक औसत बालक के लिए किताब 10 या 12 अंक के टंकन में होती है , पर आंशिक देखने. वाले कारकों के लिए 18 या 24 अंक के टंकन में होती है । प्रिन्ट साफ तथा विस्तृत होना चाहिए । अनावश्यक टंकन नहीं होना चाहिए । सफेद कागज पर काली स्याही से लिखा होना चाहिए । दो शब्दों के बीच जगह होनी चाहिए । हाशिया होना चाहिए । मानचित्र तथा चित्र होने चाहिए । बड़े सफेद या क्रीम रंग के कागजों पर मोटी तथा गहरी लीड वाली पेन्सिल प्रयोग करनी चाहिए । आर्ट तथा क्राफ्ट के लिए ऐसा सामान प्रयुक्त होना चाहिए कि आँखों पर अधिक जोर न पड़े । मशीनी तरीके , जैसे - टाइपराइटर , रेटियों आदि बड़ी मात्रा में प्रयोग होने चाहिए । टाइपराइटर के दूने की विधि को उपयोग करना चाहिए ।
2. रोशनी - प्राकृति तथा बनावटी दोनों प्रकार की रोशनी सभी बालकों के लिए महत्व रखती है । यह कम देखने वाले वालकों के लिए और भी अधिक महत्व रखती है । ऐसे बालकों का कमरा पूर्णरूप से हर स्थान से रोशनीयुक्त होना चाहिए । कक्षा की छतें , सफेद तथा दीवारें हल्के रंग से रंगी होनी चाहिए तथा उनमें चमक नहीं होनी चाहिए । भूरे तथा हरे बोर्ड में परावर्तन अधिक होता है । अतः उनका प्रयोग करना चाहिए । -
3. फर्नीचर - एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकने वाला फर्नीचर अधिक अच्छा होता है । इन्हें बालक किसी भी स्थान पर ले जाकर बैठ सकते हैं । फर्नीचर इस प्रकार का हो जो पढ़ते हुए वालक के लिए उपयुक्त हो । इसका रंग हल्का होना चाहिए ।
