दृष्टि बाधित बालकों के शिक्षण में शिक्षक की क्या भूमिका होनी चाहिए ?
अध्यापक की भूमिका ( Role of Teacher )
अध्यापक का अत्यन्त महत्व है । दृष्टि बाधित बालकों के अध्यापकों को आँख की बनावट , सफाई , आँख की सामान्य बीमारियों तथा कठिनाइयों से परिचित होना चाहिए । उसे दवाइयों , रोशनी , शारीरिक सामान तथा शैक्षिक सामान का प्रबन्धन करना चाहिए । पढ़ाई की उचित विधि से परिचित होना चाहिए । उसे मनोवैज्ञानिक तथा शैक्षिक कठिनाइयों के साथ साथ संवेगात्मक कठिनाइयों को पहचानना चाहिए । उसे बालक की वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकताओं को पहचानना चाहिए । उसे बालकों को समस्या सुलझाने की शिक्षा देनी चाहिए । एक अध्यापक बालक में ऐसे गुणों का विकास कर सकता है , जिससे वह अच्छा सामाजिक , शैक्षिक तथा व्यावसायिक समायोजन कर सके । उसे बालक में ऐसी क्षमता उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए कि वह अपनी शारीरिक कमजोरी के हीन विचार को मन में न लाएँ । उसे बालकों के माता - पिता से भी मिलना चाहिए । दृष्टि बाधित बालक अव सामान्य विद्यालयों की कक्षाओं में पढ़ने लगे हैं । इन बालकों के लिए पाठ्यक्रम में थोड़ा सुधार किया जाता है । सामान्य विद्यालयों में स्रोत शिक्षक तथा स्रोत कक्ष की व्यवस्था की जाती है । दृष्टि बाधित बालकों की शिक्षा का उत्तरदायित्व सामान्य शिक्षक और स्रोत शिक्षक दोनों का ही होता है । वास्तव में यह उत्तरदायित्व सामान्य शिक्षक का ही होता है । स्रोत शिक्षक तो उनकी कठिनाइयों और समस्याओं के समाधान में सहायता करता है । इसलिए सामान्य शिक्षक को यह ज्ञान तथा कौशल होना चाहिए कि दृष्टि बाधित बालकों को किस प्रकार पढ़ाया जाए । सामान्य शिक्षा की निम्नांकित बातों का बोध होना आवश्यक होता है
( 1 ) दृष्टि बाधित बालक को शिक्षा ग्रहण करने का भी वही अधिकार होता है , जितना एक सामान्य वालक को होता है । शिक्षा के समान अवसरों की सुविधा “ संवैधानिक प्रावधान ” है । सामान्य विद्यालयों में दृष्टि बाधितों को प्रवेश नहीं देते हैं । तब उन्हें प्रवेश न देने का कोई औचित्य नहीं बनता है ।
( 2 ) दृष्टि बाधित बालक को सामान्य विद्यालय में प्रवेश देने से पूर्व स्रोत शिक्षक से परामर्श करना चाहिए । शिक्षा के नियोजन हेतु विशिष्ट शिक्षा , विशिष्ट विधियों व प्रविधिय के निर्देशन की आवश्यकता होती है ।
( 3 ) सामान्य शिक्षक को दृष्टि बाधित बालकों हेतु शिक्षण सहायक सामग्री की व्यवस्था करनी चाहिए । इस दिशा में उसे प्रयासरत् भी रहना चाहिए ।
( 4 ) शिक्षक को सामान्य बालकों को कहना चाहिए कि दृष्टि बाधित बालको की प्रत्येक प्रकार की सहायता करनी चाहिए । पढ़ने - लिखने के अतिरिक्त उन्हें चलने - फिरने में भी कठिनाई होती है ।
( 5 ) दृष्टि बाधित बालकों को सामान्य बालकों की भांति अधिगम अनुभव प्रदान किए जाए । समस्याओं का समाधान अलग से किया जाए ।
( 6 ) शिक्षक को सामान्य और दृष्टि बाधित वालकों में अन्तःक्रिया हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए तथा उनसे सम्बन्धों को बढ़ावा देना चाहिए ।
( 7 ) जहाँ तक सम्भव हो विद्यालय की सभी क्रियाओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और अवसर भी दिया जाए ।
( 8 ) दृष्टि बाधितों को सामान्य वालकों जैसे गृह कार्य भी दिए जाए ।
( 9 ) शिक्षक को इन वालकों हेतु कक्षा में समुचित वातावरण और बैठने की सुविधा का ध्यान रखना चाहिए । कक्षा में प्रकाश का ध्यान रखा जाए , आगे की कुर्सियों पर बैठाया जाए । शिक्षण सहायक सामग्री का उपयोग समुचित ढंग से किया जाए , श्यामपट पर बड़े अक्षर लिखे जाए । इन्हें थकावट जल्दी हो जाती है इसलिए कालांश भी अपेक्षाकृत छोटा होना चाहिए ।
( 10 ) कक्षा शिक्षण में अधिकांश शिक्षक हाव - भाव , संकेतों तथा अशाब्दिक भाषा उपयोग अधिक करते हैं । दृष्टि बाधित वालक अशाब्दिक भाषा का लाभ नहीं उठा सकते इसलिए उनकी अभिव्यक्ति शब्दों में भी की जाए । व्यावसायिक निर्देशन - दृष्टि बाधित वालकों का शैक्षिक तथा व्यावसायिक निर्देशन आपस में सम्बन्धित है । एक सफल शैक्षिक निर्देशन के लिए आवश्यक है कि बालक के व्यक्तित्व की प्रत्येक बात ध्यान में रखनी चाहिए । उदाहरणार्थ- शारीरिक तथा मानसिक योग्यताएँ तथा अयोग्यताएँ , उसका संवेगात्मक विकास , सामाजिक गुण , इच्छाएँ , रूचियाँ , अभिवृत्तियाँ आदि । यह भी देखना चाहिए कि वालक की इच्छाएँ अपनी हैं अथवा किसी अन्य द्वारा प्रभावित हैं । व्यावसायिक निर्देशन देने के लिए विभिन्न परीक्षण लेने चाहिए । एक सफल निर्देशन के लिए माता - पिता / अभिभावक , अध्यापक , डॉक्टर , मनोवैज्ञानिक , मनोचिकित्सक तथा निर्देशक में सहयोग अनिवार्य है । ऐसा भी पाया गया है कि दृष्टि वाधित वालक जज , वकील , शिक्षक , व्यारी कुछ भी बन सकते हैं । अतः इनके विकास को रोका न जाए व इन्हें पूर्णरूपेण प्रोत्साहित किया जाए ।
शिक्षा की मुख्य धारा में कक्षा प्रबन्धन ( Classroom Management in Mainsteaming )
दृष्टि बाधित बालकों की शिक्षा सामान्य विद्यालयों की कक्षा में दी जा सकती है । परन्तु दृष्टि बाधित बालक सुनकर तथा स्पर्श करके ही ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं , जब पाठ्यक्रम समान " ही होता है , परन्तु धनात्मक पाठ्यक्रम को विशेष महत्व दिया जाए । इनके लिए शिक्षण विधिया ऐसी हो , जिससे बहुइन्द्रिय अनुभव दिया जा सके । दृष्टि बाधित बालको हेतु धनात्मक पाठ्यक्रम का उपयोग किया जाए , जिससे उन्हें भीखने में सहायता मिलती है और उनके लिए सुविधाजनक होता है । अतिरिक्त पाठ्यक्रम पाठ्यक्रम के मुख्य क्षेत्र निम्नलिखित होते हैं का उपयोग न किया जाए । कौशलों के विकास से सीखने में सरलता होती है ।
1. ब्रेल लिपि प्रणाली
2. सहायक सामग्री का उपयोग
3. चलने फिरने का प्रशिक्षण देना
4. सामाजिक कौशलों का विकास
5. कौशलों का विकास तथा
6. इन्द्रियों का प्रशिक्षण
पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाएँ में मानसिक क्रियाओं जैसे- संगीत , अन्य शैक्षिक प्रतियोगिताओं में सम्मिलित किया जाए । शारीरिक तथा मानसिक क्रियाओं का अभ्यास कराया । नृत्य कौशल भी विकसित किए जा सकते हैं । इन बालकों का प्रशिक्षण समन्वित परिस्थितियों में ही दिया जाए ।
शिक्षण सहायक उपकरणों का उपयोग ( Use of Teaching Equipments )
दृष्टि बाधित बालकों के शिक्षण में शिक्षण तकनीकी के विकास ने महत्वपूर्ण योगदान किया है । आंशिक रूप से दृष्टि बाधित बालकों को विशेष लाभ मिलता है । अनेक प्रकार गणना यन्त्रों , घड़ियों , श्रव्य सामग्री यन्त्रों का विकास हुआ है । उत्तल दर्पण , चश्मे अथवा दृष्टि यन्त्रों का भी उपयोग किया जाता है । आकृतियों , अक्षरों चित्रों को बड़ा प्रदर्शित करने यन्त्रों का विकास किया गया है । दृष्टि कैमरा , चलायमान टेलीस्कोप का भी उपयोग करते उपरोक्त विशिष्ट उपकरणों की सहायता से दृष्टि बाधित बालक विद्यालय के वातावरण पर स्वामित्व कर लेते हैं । इन्हें निम्नांकित दिशा में प्रशिक्षण दिया जा सकता है ।
1 . विद्यालय तथा कक्षा में चलने में निर्देशन दिया जाता है , जिससे वे आराम से अपनी गति विधि कर सके ।
2 . अपना आवश्यकतानुसार वह कक्षा तथा कक्षा से बाहर व अन्दर स्वयं विना सहायता के आ जा सके ।
3 . विद्यालय के अन्य स्थानों पर आने जाने का निर्देशन दिया जाए ।
4. एक ही समय में एक ही गतिविधि को नियन्त्रित कर सकें ।
5 . इनसे सभी गतिविधियों का अभ्यास कराया जाए ।
6 . इन्हें विशिष्ट विवरण दिया जाए इनकी स्मरण शक्ति अपेक्षाकृत अधिक होती है । व्यक्ति को उसके बोलने से ही पहचान लेते हैं ।
7 . अन्य सहयोगी और साथियों को नाम से ही बुलाना चाहिए क्योंकि वह देख नहीं सकते कि किसे संकेत किया जा रहा है ।
8. जब वह वाहर जाय तथा उन्हें सहायक निर्देशिका ( Buddy ) दी जानी चाहिए ।
9. विद्यालय में कोई परिवर्तन किया गया है उसकी उन्हें पूरी जानकारी देनी चाहिए ।
