अधिगम बाधित बालकों की प्रमुख समस्या क्या हैं ? अधिगम आधारित बालकों के लिए उपचार आयाम बताइए ।
अधिगम बाधित बालकों की समस्याएँ ( Problems of Learning Disabled Children ) वालक के व्यक्तिगत क्रयाकलापों पर ध्यान दिया जाए तो ज्ञात होता है कि यह सामान्य बालकों के समान ही होते हैं । वह मन्द बुद्धि नहीं होते और न ही उन्हें देखने व सुनने में कोई कठिनाई होती है , परन्तु उनकी मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं विशेषकर बोध में कठिनाइयों के कारण उन्हें बोलने में , पढ़ने में , लिखने में तथा अंकों को सुनने तथा समझने में समस्या होती है । यह समस्या मानसिक मन्द क्रियाओं , भावनात्मक तथा व्यवहार सम्बन्धी कारण हो सकते हैं , लेकिन यह मानसिक मन्दिता , इन्द्रियों के प्रयोग के करने तथा सांस्कृतिक अनुदेशनात्मक अभ्यास के कारण नहीं होती है । वालकों को सामान्य बाधिता तथा गम्भीर रूप से बाधिक वालकों की श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है । सामान्य अधिगम वाधिक बालक नियमित विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं । ऐसे बालक नियमित विद्यालयों में पढ़ना पसन्द करते हैं । ऐसे बालकों को प्रारम्भिक अवस्था में पहचानना कठिन होता है । उनको पढ़ाई में समस्याएँ होती हैं । समस्याएँ अधिगम योग्यता के एक क्षेत्र में हो सकती हैं या एक से अधिक क्षेत्रों में भी हो सकती है , परन्तु यह सामान्य प्रभाव की होती है । यदि बालकों में यह समस्या सामान्य प्रकार से है , तो उनको सही अभ्यास तथा प्रशिक्षण देकर इस समस्या से छुटकारा दिलाया जा सकता है तथा पाठ्यक्रम में कुछ समायोजन करके इन सामान्य अधिगम बाधित बालकों को उच्च कक्षाओं में भी सामान्य बालकों के साथ पढ़ाया जा सकता है । जिन बालकों में अधिगम बाधिता गम्भीर होती है वे पढ़ - लिख नहीं सकते हैं । उनकी यह समस्या मस्तिष्क मन्द क्रिया के कारण हो सकती है । ऐसे बालकों को सामान्य विद्यालयों में परीक्षा देना बहुत कठिन होता है । अधिगम बाधित बालकों की व्यवहार सम्बन्धी विशेषताएँ भी भिन्न - भिन्न होती है , लेकिन उन सबकी बौद्धिक योग्यता तथा उप्लब्धि के बीच सामंजस्यता का अभाव होता है । यह समस्या उनकी होती है , लेकिन उनके सामने अन्य समस्याएँ जैसे होती है । इन समस्याओं का वर्णन निम्नलिखित है भावनात्मक तथा प्रारम्भिक कुशलता तथा समाज में पूर्ण रूप से समायोजित न हो पाना भी
1. अवधान का अभाव ( Attention Disorders of LD ) - ध्यान की समस्या अधिगम बाधिता के साथ - साथ उत्पन्न होती है । उन बालकों का ध्यान बहुत कम समय में करती है । केन्द्रित होता है । ध्यान केन्द्रित होने की समस्या विद्यार्थी की परीक्षा देने की योग्यता को प्रभावित
( 1 ) वह दिए गए समय तक अपना ध्यान नहीं केन्द्रित कर पाते हैं ।
( 2 ) वह उपयुक्त को समझ नहीं पाते तथा अनुपयुक्त को नकार नहीं पाते । वे अपने चारों ओर के उद्दीपनों की ओर आकर्षित होते रहते हैं ।
( 3 ) वह एक विषय से ध्यान हटाकर दूसरे विषय पर अपना ध्यान लगा लेते हैं ।
( 4 ) वह कम महत्वपूर्ण व्याख्याओं पर बहुत ध्यान देते हैं तथा आवश्यक तथ्यों को कोई महत्व नहीं देते हैं ।
2. स्मृति समस्या ( Memory Problem ) - अधिकांश से अधिगम बाधित बालक मन्द गति से सीखते हैं । ऐसे बालक न तो कार्य योजना बना पाते हैं और न ही उनको क्रियान्वयन कर पाते हैं । उनकी कुछ विशेषताएँ , जो स्मृति करने से सम्बन्धित होती है
( 1 ) स्मृति सम्वन्धी दोष वाले बालकों को सूचनाओं को एकत्र करने तथा पुनः प्राप्त करने में कठिनाई होती है । उनको देखने , सुनने तथा अन्य अधिगम प्रक्रियाओं में भी कठिनाई होती है ।
( 2 ) अधिगम बाधित वालकों को लय में पढ़ने से अंकों को क्रमानुसार में तथा शब्दों तथा मुहावरों व लोकोक्तियों को पढ़ने में कठिनाई होती है ।
( 3 ) उनको अक्षरों , शब्दों तथा आकारों को देखने में कठिनाई होती है ।
( 4 ) अल्पावधि तथा दीर्घावधि दोनों प्रकार की स्मृति वाले अधिगम बाधित बालक पढ़ने में कमजोर होते हैं ।
( 5 ) वह वर्तमान तथा भूत के अनुभवों के बीच सम्बन्ध नहीं कर पाते हैं ।
3. अधिगम बाघित बालकों की वाचन सम्बन्धी समस्या ( Reading Problem of LD Children ) - लगभग 80 प्रतिशत से 90 प्रतिशत अधिगम बाधित बालक पाठन सम्बन्धी समस्याओं से ग्रसित होते हैं और उनकी शैक्षिक उपलब्धि बहुत कम होती है । ये समस्याएँ उच्चारण , शब्द के बीच से अक्षरों को छोड़ देने , अन्य अक्षरों को शब्दों में जोड़ देने तथा एक शब्द के स्थान पर अन्य शब्दों को बोलने से सम्बन्धित होती हैं । यह समस्याएँ स्मृति की समस्या , अक्षरों को तथा शब्दों को उल्टा कर देने की समस्या तथा शब्दों की ध्वनि को मिला देने से सम्बन्धित हो सकती है , ये समस्या पाठन सम्बन्धी और समझने सम्बन्धी भी हो सकती हैं । अधिगम बाधित बालक दृश्य वक्ता तथा श्रव्य वक्ता दो प्रकार के होते हैं- दृश्य वक्ता सही शब्दों को गलत क्रम में लिखता है , तथा श्रव्य वक्ता शब्दों की ध्वनि को बढ़ा देता है या खींच देता है । जैसे- ' वह ' को ' वे ' उच्चारित करता है । वह अक्षरों को छोड़ने व जोड़ने तथा शब्दों , अक्षरों के प्रतिस्थापन सम्बन्धी त्रुटि भी करता है । ये त्रुटियाँ किशोरावस्था तक जारी रहती हैं तथा अधिगम बाधिता का कारण बन जाती है ।[ '
4. वाचन सम्बन्धी बाघिता ( Reading Disability ) - यह बाधिता दो प्रकार की होती है । यदि यह सामान्य प्रकार की होती है , जिसको वाचन में कठिनाई होती है , परन्तु यदि क्षति गम्भीर होती है तो व्यक्ति बिल्कुल भी नहीं पढ़ पाता है । वह शब्द बाधित होते नाम से भी प्रचलित है । सामान्य प्रकार की बाधिता वाले वालक प्रायः सामान्य कक्षाओं में पढ़ते हैं । यदि यह समस्या प्रारम्भ में ही पहचान ली जाए तो इस समस्या के समाधान की सहायता की जा सकती है तथा उसको सरलता से सामान्य बालकों के समान बनाया जा सकता है । गम्भीर रूप से बाधित बालकों को चिकित्सा की आवश्यकता होती है
5. लेखन सम्बन्धी बाधिता ( Writing Disability ) -लेखन सम्बन्धी बाधिता से ग्रसित बालक स्वयं तुरन्त लिख नहीं पाता है । यह क्षति दो प्रकार की होती है सामान्य तथा गम्भीर । इस बाधिता से सामान्य रूप से प्रभावित वालक साफ - साफ नहीं लिख पाते हैं , वे सामान्य विद्यालयों में पढ़ते हैं । यदि उनकी इस समस्या को आरम्भ में ही पहचान लिया जाए और इस समस्या के निराकरण में उन बालकों की सहायता की जाए तो इस समस्या को दूर किया जा सकता है । जो बालक इस बाधिता से गम्भीर रूप से ग्रसित होते हैं , वे बिना त्रुटि किए लिख सकते हैं । लेकिन स्वयं तुरन्त नहीं लिख पाते हैं , तब ऐसे बालक लिखना नहीं । सीख पाते हैं , तब उनकी लेखन अयोग्यता की समस्या दिखाई देती है । गम्भीर रूप से लेखन बाधित बालकों को शैक्षिक क्षेत्र के अन्य सामान्य बालकों के समान बनने के लिए चिकित्सीय सुविधाओं की आवश्यकता होती है ।
6. सम्प्रेषण की ग्राह्य करने की समस्या ( Problems in Comprehending Communication ) - इस प्रकार की बाधिता से सम्बन्धित बालकों को लिखकर , बोलकर तथा पढ़कर सम्प्रेषण में कठिनाई होती है , जो इस समस्या से साधारण रूप से प्रभावित होते हैं , उन्हें मौखिक तथा लिखित दोनों प्रकार के शब्दों को समझने में कठिनाई होती है । ऐसे बालक चिन्ह तथा संकेत भी नहीं समझ पाते हैं । यदि समय पर ध्यान दिया जाए तो इन बालकों की ज्ञानात्मक सम्बन्धी समस्या को दूर किया जा सकता है । अन्यथा उच्चारण तथा प्रवाह सम्बन्धी समस्या उत्पन्न हो सकती है । इस बाधिता से गम्भीर रूप से बाधित वालक न तो लिखित तथा मौखिक तथ्यों को समझ पाता है और न ही लिख , पढ़ और बोल सकता है । वह संकेतों तथा चिन्हों को भी नहीं समझ पाता है । ऐसे बालकों की समस्या का उपचार कठिन होता है , उन्हें सघन सुधार हेतु अभ्यासों की आवश्यकता होती है ।
7. संख्यात्मक योग्यता सम्बन्धी समस्या ( Problems of Numerical Ability ) - इस समस्या से प्रभावित बालक संख्याओं को एक - दूसरे से सम्बन्ध नहीं कर पाते हैं । इस कारण उन्हें गणना में तथा साधारण जोड़ घटाने में भी कठिनाई होती है । संख्यात्मक वाधिता भी दो प्रकार की होती है ।
( 1 ) सामान्य तथा
( 2 ) गम्भीर
, संख्यात्मक समस्याएँ कठिन प्रतीत होती हैं , परन्तु एक सामान्य बालक उन्हें आसानी से हल कर सकता है । इस समस्या से साधारण रूप से प्रभावित बालक पहले से ही सामान्य कक्षाओं में शिक्षा प्राप्त करते हैं , प्राथमिक स्तर पर ऐसे बालकों की पहचान नहीं हो पाती है , जब वे बालक गिनती सीखते हैं तथा साधारण जोड़ घटाना सीखते हैं तो यह समस्या प्रकट होती है । यदि यह समस्या सही समय पर पहचान ली जाए और इसमें सही संशोधन कर दिया जाए तो वे बालक भी सामान्य बालकों की भाँति सामान्य कक्षाओं में पढ़ सकते हैं , परन्तु यदि समस्या गम्भीर होती है तो बालक गिनतियों तथा उनके बीच सम्बन्ध को भी नहीं याद रख पाता है तथा उनको भी जोड़ घटाने करने में भी असमर्थ रहता है । संख्या सम्बन्धी गम्भीर समस्या का निराकरण कठिन होता है । इसके निवारण के लिए अत्यधिक सुधार हेतु अभ्यास की आवश्यकता होती है । अधिगम बाधित बालकों की कुछ विशिष्ट समस्याएँ होती हैं । इनका वर्णन वर्गीकरण में दिया गया है । अधिगम बाधित बालकों के लिए उपचार आयाम ( Treatment Approaches of LD Children ) अधिगम बाधित बालकों को दो आधारों पर चिकित्सा तथा व्यवस्था की जा सकती है । वह उपचार आयाम निम्नलिखित हैं- नाड़ी चिकित्सा आयाम तथा मनोशैक्षिक आयाम ( हवीट तथा फोरनिस 1984 ) ने सुझाव दिया ।
1. नाड़ी चिकित्सा आयाम ( Neurological Approach ) - नाड़ी चिकित्सा आयाम के अन्तर्गत अधिगम बाधित बालक को न्यूनतम मानसिक मन्दित क्रियाओं से प्रभावित रोगी असमर्थी समझा जाता है । ऐसे बालक को इस प्रकार चिकित्सा देनी चाहिए जैसे किसी अन्य रोग तथा चोट से प्रभावित रोगी को चिकित्सा प्रदान की जाती है । असमर्थी का मुख्य लक्षण यह होता है कि इसमें बालक भावात्मक होता है । इसलिए यह तर्कसम्मत है कि बालक की भावुकता में सन्तुलन करने के लिए उसको सहायता प्रदान करनी होगी । भावुकता के लक्षणों में सन्तुलन करने के लिए कुछ औषधियों के उपयोग की भी सलाह दी जाती है । इन औषधियों का बालक के अधिगम पर क्या प्रभाव पड़ता है ? यह तथ्य शोध कार्यों के परिणामों से स्पष्ट नहीं हुआ है । इन औषधियों का बालक के द्वारा कक्षा में किए जाने वाले व्यवहार पर सकारात्मक प्रभाव हो सकता है क्योंकि ये दवाएँ बालक की क्रिया स्तर को कम कर देती है तथा बालक को अधिक संयत तथा व्यवस्थित बना देती है , लेकिन क्या ये औषधियाँ बालक की अधिगम समस्याओं को दूर करने में भी सहायक होती हैं ? इसलिए इसके लिए व्यवहार सम्बन्धी आयाम या मनोशैक्षिक आयाम जो अध्यापक के ऐसे बालकों के साथ कार्य , उन्हें प्रेरित करने तथा उन्हें उपयुक्त अनुदेशन देने में अध्यापक के प्रभाव पर आधारित है ।
2. मनोशैक्षिक आयाम ( Psycho - Educational Approach ) - मनोशैक्षिक आयाम के अन्तर्गत अधिगम बाधित बालक को रोगी न मानकर ऐसा बालक माना जाता है , जो सब कुछ सीख सकता है । मनोशैक्षणिक आयाम के अनुसार अधिगम बाधित बालकों की पहचान प्रारम्भिक स्तर पर ही शीघ्र कर लेनी चाहिए तथा उनकी चिकित्सीय तथा मनोवैज्ञानिक सहायता के आधार पर पहचान करनी चाहिए ताकि उनकी कठिनाइयों व त्रुटियों को सही प्रकार से समझा जाए तथा उनकी बाधिता के परिमाण के आधार पर उनको नियमित कक्षाओं , संसाधन कक्षों में , विशिष्ट कक्षाओं में तथा विशिष्ट स्कूलों में उपयुक्त अनुदेशन तथा प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा सके । अधिगम बाधित बालकों की शिक्षा व प्रशिक्षण से सम्बन्धित विभिन्न आयाम हैं । इन आयामों को पाँच वर्गों के अन्तर्गत विभाजित किया जा सकता है
1. प्रशिक्षण प्रक्रिया आयाम ( Process Training Approach ) - इस तथ्य पर आधारित है कि शैक्षिक विषयों को याद करने के लिए आवश्यक मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को समझने की आवश्यकता होती है । अधिगम बाधित बालक की मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएँ सही क्रम में नहीं हो और मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का यह गलत क्रम उसके समझने में , बोलने में , लिखने में , पढ़ने में तथा गणितीय क्षेत्र में आवश्यक होता है । इसलिए यह आवश्यक है कि अधिगम बाधित बालक को मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं का भी प्रशिक्षण दिया जाए । जो विभिन्न शैक्षिक विषयों के अन्तर्गत करनी होती है । उदाहरणार्थ , यदि अधिगम बाधित बालक को बोध में कठिनाई के कारण वाचन प्रक्रिया में समस्या आ रही है तो उस बालक को का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा । दृश्य बोध
2. बहुइन्द्रीय आयाम ( Multisensory Approach ) - बहुइन्द्रीय आयाम इस अनुभव प्रणाली को में क्रियाशील दृश्य श्रव्य तथ्य पर आधारित है कि यदि बालक को एक से अधिक इन्द्री सीखने के होगी तो बालक अधिक सीखने का उत्सुक होगा , इस प्रकार की एक विधि कहते हैं । उदाहरणार्थ- अध्यापक बालक से कहानी सुनाने के लिए कहता है , अध्यापक बालक द्वारा कहे गए शब्दों को लिख लेता है फिर अध्यापक उन शब्दों को श्यामपट पर लिखता है और ये शब्द बालक की पढ़ने की क्रिया में सहायक होते हैं । शब्दों को याद करने के लिए , बालक श्यामपट पर लिखे शब्द को देखता है । अध्यापक उस शब्द को बोलता है । तो बालक उस शब्द को सुनता है तथा शब्द को बोलता है । अन्त में बालक शब्द को पहचान लेता है , वह समझ लेता है । दूरदर्शन अधिक प्रभावशाली होता है । दृश्य - श्रव्य दोनों क्रियाशील रहती हैं ।
3. वातावरण सम्बन्धी आयाम ( Environmental Approach ) -अधिगम बाधित बालक सामान्यतः तोड़ - फोड़ वाले तथा भावात्मक होते हैं । कुछ शिक्षाविद् ऐसे बालको के लिए वातावरण सम्बन्धी आयाम का सुझाव देते हैं । वातावरण सम्बन्धी आयाम के द्वारा कक्षा के वातावरण से उन अनुपयुक्त उद्दीपन को कम किया जा सकता है , जो बालक का अधिगम कार्य से ध्यान हटाती है । कक्षा के वातावरण से हानियों को जहाँ तक हो सके , दूर करने के लिए कक्षा के वातावरण में सुधार किया जा सकता है ।
( 1 ) दीवारों तथा छत की गूंज को ध्वनि नहीं करना ( No Echo ) ।
( 2 ) गलीचा डालना या फर्स डालना ।
( 3 ) पारदर्शी खिड़कियों का होना ।
( 4 ) किताब रखने का स्थान तथा अलमारियों की व्यवस्था ।
( 5 ) बुलेटिन बोर्ड का सीमित उपयोग करना ।
( 6 ) दीवारों पर टंगे हुए कैलेण्डर , चित्र तथा अन्य वस्तुओं को हटा देना ।
( 7 ) कक्षा के बाहर के वातावरण को ध्वनि रहित व आकर्षण रहित बनाना ।
( 8 ) शिक्षण सामग्री रंगों , आकार व व्यापकता को बढ़ाना ।
4. ज्ञानात्मक प्रशिक्षण आयाम ( Cognitive Training Approach ) अधिकांश अधिगम बाधित बालकों की समस्याओं का समाधान करने में कुछ त्रुटियाँ रह जाती हैं । वे कार्यों , अनुभव न करके कार्य करते हैं तथा अन्य विकल्पों को बिना सोचे समझे शीघ्रता से किसी भी प्रश्न का उत्तर दे देते हैं । उनकी दो पद्धतियाँ उपयोगी होती है । ये पद्धतियाँ निम्न हैं
( अ ) ज्ञानात्मक प्रारूप ( Cognitive Modelling ) - ज्ञानात्मक प्रारूप को कभी कभी स्मृति तथा ज्ञानात्मक व्यवहार परिवर्तन आव्यूह समझ लिया जाता है । इस विधि के आधार पर बालक को इस तथ्य की जानकारी दी जाती है कि लोग कैसे सीखते हैं तथा कैसे याद रखते हैं । ज्ञानात्मक प्रारूप के अनुसार अधिगम बाधित बालक के समक्ष उसके सहपाठी का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है , जो उससे अधिक योग्य होता है ताकि वह उस वयस्क अथवा साथी का अनुसरण कर सके तथा उपयुक्त तथ्य सीख सकें । इस पद्धति के द्वाराबी या किसी को ध्यान अधिगम बाधित बालक को यह सिखाया जाता है कि किसी शब्द को पढ़ने से पहले प्रश्न का उत्तर देने से पहले थोड़ा रूकना चाहिए । सारे संकेत तथा सम्भावनाओं से देखना चाहिए तथा फिर ध्यान से किसी प्रश्न का उत्तर देना चाहिए । याद करने के सम्बन्ध में बालकों को छोटे - छोटे खण्डों में सूचनाओं को एकत्र करना , इन सूचनाओं को बार - बार उसके सम्मुख दोहराना तथा उसकी स्मृति को बढ़ाने के लिए साधन का प्रयोग करना सिखाया है । जब अधिगम बाधित बालकों को सीखने तथा याद करने के प्रभावकारी उपाय बताए जाते हैं , तो उनमें आवश्यक सुधार किया जाए ।
( ब ) स्वत : अनुदेशन प्रशिक्षण ( Self - Instruction Training ) - इस प्रारूप को स्वयं अनुदेशन प्रशिक्षण के अन्तर्गत समायोजित किया जा सकता है । स्वयं अनुदेशन प्रशिक्षण के द्वारा बालक को स्वयं के शाब्दिक व्यवहार पर नियन्त्रण करने के लिए प्रेरित किया जाता है । उदाहरणार्थ
( 1 ) अध्यापक स्वयं जोर - जोर से बोलकर कोई कार्य करता है । जैसे गणित की किसी समस्या को हल करना ।
( 2 ) बालक उसी कार्य को अध्यापक के निर्देशन पर अभ्यास करता है ।
( 3 ) जब बालक कार्य करता है तो वह अनुदेशनों को स्वयं वाचन करता है , तथा
( 4 ) वालक स्वतः अनुदेशन के द्वारा कार्य करके काम पूरा कर लेता है । स्वयं अनुदेशन प्रशिक्षण के माध्यम से बालक को सीखने की परिस्थितियों में अपना कार्य कम करने में तथा ज्ञानात्मक कार्यों के लिए उसको स्वयं के आयाम की जानकारी में सहायता मिलती है ।
( 5 ) अन्य विशिष्ट आयाम तथा प्रविधियाँ ( Other Special Approaches and Techniques ) - अधिगम वाधित बालकों में कुछ विशेषताएँ होती हैं , उनमें दृष्टि सम्बन्धी दोष नहीं दिखाई देता है पर उनको दृष्टि बोध , दृष्टि गाह्यता , दृश्य सम्बन्धी वर्णन तथा दृश्य सम्बन्धी स्मृति में कठिनाई होती है । इसी प्रकार अधिगम बाधित बालकों में श्रवण सम्बन्धी दोष नहीं होता पर उन्हें श्रव्यात्मक जानकारी , श्रव्यात्मक अन्तर तथा श्रव्यात्मक स्मृति में कठिनाई होती है , उन्हें ध्यान और स्मृति की समस्या का सामना करना पड़ता है । यह सब कठिनाइयाँ उनकी भाषा को समझने में बाधक होती हैं तथा उनकी वाचन व लेखन योग्यता एवं सुनने के कौशल में अवरोध उत्पन्न करती है । इसलिए अधिगम बाधित बालकों के लिए इन क्षेत्रों में विशिष्ट प्रशिक्षण बहुत उपयोगी होता है । संसाधन विशेषज्ञ अध्यापक अधिगम बाधित बालकों को संसाधन कक्ष में इस प्रकार का विशेष प्रशिक्षण दे सकते हैं । अधिगम बाधित बालकों के लिए निम्न आयाम तथा क्रियाएँ बहुत उपयोगी हैं ।
( अ ) श्रवण का अभ्यास ( Listening Exercise ) - अधिगम बाधित बालकों को सुनने की समस्या होती है तथा इस समस्या के कारण उनकी श्रव्य सम्बन्धी योग्यता की प्राप्ति तथा उनके निर्देशनों को अनुकरण करने सम्बन्धी योग्यता में कठिनाई होती है । ऐसे बालकों के लिए सुनने का अभ्यास लाभकारी होता है । एक अभ्यास के अन्तर्गत कोई व्यक्ति जो उस स्थान पर नहीं दिखाई देता है । विभिन्न ध्वनियाँ बोलता है तथा बालकों से उन ध्वनियों को पहचानने के लिए कहा जाता है । जब वालकों का समूह बाहर घूमने के लिए जाता है तो बालकों से सामान्य ध्वनि सुनने के लिए कहा जा सकता है । जैसे- दौड़ती हुई गाड़ी , छुक छुक करती रेल तथा गाती हुई चिड़िया की आवाज सुनने की समस्या से प्रभावित बालकों को शब्दों को समझने की क्षमता को सुधारने के लिए अध्यापक मौखिक निर्देशन दे सकता है । ये निर्देशन छोटे तथा सामान्य होने चाहिए ताकि बालकों की यह कठिनाई कम हो । बालकों की सुनने तथा समझने की शक्ति को बढ़ाने के लिए पहेलियों की भी सहायता ली जा सकती है ।
( व ) अधिगम का विभेदीकरण ( Discrimination Learning ) - अधिगम बाधित बालकों को एक अक्षर से दूसरे अक्षर को अन्तर करने में कठिनाई होती है । ये एक शब्द को दूसरे शब्द से तथा एक संख्या को दूसरी संख्या से अन्तर नहीं कर पाते हैं । बालको की अन्तर सम्बन्धी समस्या को दूर करने के लिए विभेदीकरण अधिगम सहायक सिद्ध होता है । इस अधिगम के अन्तर्गत बालक को दो अक्षरों , शब्दों तथा संख्याओं के बीच समानता तथा असमानताओं के विषय में बतलाना चाहिए तथा फिर बालक को सही उत्तर बतलाना चाहिए । ( जैसे 6-9 तथा 3-8 ) अधिगम वाधित बालकों को अक्षरों , शब्दों तथा संख्याओं को पढ़ाने के लिए प्रारम्भ में इन अक्षरों को नए कागज पर रंगों में बड़े आकार में लिखना चाहिए , बालक इन अक्षरों को शब्दों को तथा संख्याओं को जोर - जोर से बोलकर रट लेते हैं । इन अक्षरों , शब्दों तथा संख्याओं के लिए श्रव्यात्मक तथा दृश्यात्मक ध्यान आवश्यक है । बालकों की दोहराने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ।
( स ) दृश्य ग्राह्यता का प्रशिक्षण ( Visual Reception Training ) - श्रव्य ग्राह्यता प्रशिक्षण के अन्तर्गत बालक को सामान्य वस्तुओं की पहचान करवाई जाती है । उन वस्तुओं का नाम बताकर उनका प्रयोग समझाकर तथा वस्तुओं से सम्बन्धित अन्य वस्तु के बारे में बताकर सामान्य वस्तुओं की जानकारी दी जाती है । बालकों से संसाधन कक्ष में शीशे के सामने खड़े होने के लिए कहा जाता है तथा उनसे जो कुछ वे शीशे में देखते हैं उसके बारे में बताने के लिये कहा जाता है । बालकों को कोई चित्र दे दिया जाता है तथा बालकों से उस चित्र के अन्तर्गत चित्रित वस्तु तथा रंग , आकार पृष्ठ भूमि तथा अन्य विवरणों के बारे में बताने के लिए कहा जा सकता है ।
( द ) श्रव्यात्मक - स्मृति प्रशिक्षण ( Visual Memory Training ) - यदि बालकों के नेत्र बन्द करके अपने वस्त्रों तथा वुलेटिन बोर्ड अथवा अन्य बालकों के बारे में बताने के लिए कहा जाए तो बालकों की श्रव्यात्मक - स्मृति विकसित होती है ।
( य ) स्थान सम्बन्धी प्रशिक्षण ( Spatial Training ) - बालकों से किसी वस्तु की ऊपर , तल तथा पीछे के बारे में पूछकर तथा ऊपर , नीचे , में छोटा , वड़ा , भारी आदि इन अवधारणाओं के बारे में बताया जा सकता है ।
( र ) श्रव्यात्मक जानकारी प्रशिक्षण ( Auditory Awarness Training ) बालकों से ध्वनियों के बारे में पूछकर जिनको वे सामान्यतः सुनते हैं । बालकों की श्रव्यात्मक जानकारी बढ़ाई जा सकती है । बालक प्रत्येक ध्वनि को पहचान सकते हैं और इसके बारे में बता सकते हैं । अध्यापक किसी बालक के कान से कुछ दूरी पर हाथ की घड़ी रखता है . तथा वालक से घड़ी की आवाज सुनने के लिए कहता है । बालक से कहा जाता है कि यदि वह घड़ी की आवाज न सुन पाए तो हाथ ऊपर उठा दें । इसी प्रकार समय - समय पर बालक से विभिन्न ध्वनियों को सुनने के लिए कहा जा सकता है ।
( ल ) श्रव्यात्मक विभेदीकरण अभ्यास ( Auditory Discrimination Exercise ) – श्रव्यात्मक अन्तर अभ्यास के अन्तर्गत घड़ी को छिपा दिया जाता है तथा बालकसे यह पूछा जाता है कि घड़ी किस दिशा में रखी हुई है । अध्यापक मेज को थपथपा सकता है तथा बालक से सुनने के लिए कहता है तथा फिर स्वयं थपथपाहट को गिनकर बालक से यह पूछता है कि उसने मेज को कितनी बार थपथपाया ? किसी बालक ने नेत्रों पर पट्टी बाँधकर बालक से उसकी कक्षा के सहपाठी की आवाज को सुनकर सहपाठी को पहचानन के लिए कहा जाता है , इस प्रकार के अभ्यास घर में किए जाए ।
( म ) श्रव्यात्मक स्मृति एवं क्रमागत प्रशिक्षण ( Auditory Memory and Sequencing Training ) - स्मृति तथा अनुक्रम के विकास हेतु बालकों के श्रख्यात्मक अनुदेशनों को , फोन नम्बर को दोहराने के लिए कहा जाता है , वे शिशु कविताएँ तथा गीत याद कर सकते हैं तथा उन बातों का याद रख सकते हैं , जो उनसे बाद में पूछी जाएंगी । अध्यापक बालकों को साधारण चुटकुले सुना सकते हैं तथा बालकों से उन्हें दोहराने के लिए कह सकते हैं
