शैक्षिक नेतृत्व से क्या आशय है ? शैक्षिक नेतृत्व की आवश्यकता एवं महत्व पर प्रकाश डालिए । What do you understand by Educational Leadership ? Throw light on need and importance of Educational Leadership

 

शैक्षिक नेतृत्व से क्या आशय है ? शैक्षिक नेतृत्व की आवश्यकता एवं महत्व पर प्रकाश डालिए । What do you understand by Educational Leadership ? Throw light on need and importance of Educational Leadership 


शैक्षिक नेतृत्व से आशय  ( Meaning of Educational Leadership . ) वास्तव में शैक्षिक प्रशासन के क्षेत्र में सफल प्रशासक बनने के लिये शैक्षिक नेतृत्व की अद्भुत शक्ति को निश्चित रूप से अर्जित करना पड़ता है । जिस प्रकार समाज के अन्य क्षेत्रों में नेतृत्व - शक्ति की महत्ता को सभी स्वीकार करते हैं उसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में “ शैक्षिक नेतृत्व " की परमावश्यकता तथा महत्व को निर्विवाद रूप से माना जाता है । “ शैक्षिक नेतृत्व ” भी प्रभावशाली , आकर्षणपूर्ण तथा अनेक गुणों से युक्त हुआ करता है । “ शैक्षिक नेतृत्व " के लिये जन्मगत अथवा वंशानुक्रम की विशेषताओं को आजकल स्वीकार नहीं किया जाता अपितु व्यक्तित्व सम्बन्धी अनेक गुणों तथा अर्जित योग्यताओं ( Acquired abilities ) को ही शैक्षिक नेतृत्व का आधार स्वीकार किया जाता है । “ यस्य कस्य प्रसूतो अपि गुणवान पूज्येत नरः ” मनुष्य कहीं भी उत्पन्न हो , इसका कोई अर्थ नहीं , गुणवान होने पर ही वह पूज्य होता है । इस सम्बन्ध में “ पंचतन्त्र " की उक्ति भी उल्लेखनीय है- " प्रकाश्यं स्वगुणोदयेन गुणीनां गच्छन्ति किं जन्मना " ( कोई वस्तु गुणों के उदय से ही प्रकाशमान होती है । उसके उत्पत्ति स्थान का कोई महत्व नहीं होता ) । सर्वमान्य मत यह है कि समाज में रहकर अनुकूल परिस्थितियों के मिलने पर तथा आन्तरिक प्रेरणा से उत्साहित होकर कोई व्यक्ति ऐसे गुणों को अपने अन्दर समाहित कर लेता है कि समाज के अन्य व्यक्ति उसे नेता कहने तथा मानने के लिये बाध्य हो जाते हैं । यही प्रक्रिया शिक्षा क्षेत्र में “ शैक्षिक नेतृत्व ” प्रदान करती है । शैक्षिक नेतृत्व ' की अपने सीमित शब्दों में इस प्रकार परिभाषा व्यक्त कर सकते हैं। " शैक्षिक प्रशासन के क्षेत्र में किसी विशिष्ट व्यक्ति का जनतान्त्रिक युक्त तथा सहकर्मियों के हृदय को सर्वांगरूप में जीतने वाला व्यवहार जो वैयक्तिक तथा अर्जित पर आधारित होता है , “ शैक्षिक नेतृत्व " कहा जाता है । " गुणों ' शैक्षिक नेतृत्व ' से परिपूर्ण व्यक्ति , प्रशासन के कार्यों को उसी प्रकार करने में सक्षम होता है जैसा उस शैक्षिक समूह के व्यक्ति कराने की इच्छा रखते हैं । शैक्षिक नेतृत्व के अन्तर्गत कार्यकुशलता , लोकप्रिय व्यवहार तथा सद्भावना आदि का बड़ा मूल्य होता है । “ शैक्षिक नेतृत्व " में ऐसी शक्ति होती है जो अध्यापन की क्षमता में निसन्देह वृद्धि कर देती है । सारांश में कहा जा सकता है कि " शैक्षिक नेतृत्व " में उन सभी कार्यों को करने की क्षमता होती है जो शिक्षा विभाक तथा शिक्षण संस्थाओं को उत्तरोत्तर उन्नति के लिये आवश्यक समझे जाते हैं । नेतृत्व के जितने गुण पहले बताये जा चुके हैं उनका शैक्षिक नेतृत्व में भी होना आवश्यक है । शिक्षण संस्थाओं के प्रशासन तथा पर्यवेक्षण सम्बन्धी सभी कार्यों को सफलता वस्तुतः शैक्षिक नेतृत्व पर ही आधारित होती है ।

शैक्षिक - नेतृत्व की आवश्यकता एवं महत्व ( Need & Importance of Edu . Leadership ) शैक्षिक नेतृत्व का अर्थ स्पष्ट करने के उपरान्त शैक्षिक नेतृत्व की आवश्यकता तथा उसके महत्व पर विचार करना युक्तिसंगत प्रतीत होता है । " नेतृत्व " के सम्बन्ध में विचार करते समय हम यह अध्यन कर चुके है कि कोई भी छोटा अथवा वड़ा समूह नेता के विना नहीं रह सकता । कोई भी समूह अपने कार्यों का सम्पादन नेता के माध्यम से ही करना चाहता है । नेतृत्व युक्त समूह गौरव का अनुभव भी करता है । जिस समूह अथवा समाज का कोई नेता नहीं होता वह समूह दिशाहीन तथा उद्देश्यहीन होता है । आजकल अपने देश में प्रजातन्त्र की स्थापना हो चुकी है । देश में विभिन्न समाजों , सम्प्रदायों , संगठनों तथा संस्थाओं की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है । अतएव नेताओं को संख्या का भी उसी अनुपात में बढ़ना स्वाभाविक है । एक समूह अथवा समाज में कई नेता भी उदित हो जाते हैं परन्तु उन सभी का सर्व प्रमुख नेता एक ही व्यक्ति होता है , अन्य सहनेता कालान्तर में प्रमुख नेता को बातों का ही अनुमोदन करने लगते हैं । इतना निश्चित है कि समाज में नेतृत्व की आवश्यकता निस्सन्देह होती हैं । रहते हैं । परन्तु छात्रों , अध्यापकों तथा संरक्षकों की कार्य क्षमता को उचित दिशा दिखाने के लिये शैक्षिक नेतृत्व की परमावश्यकता होती है । “ शैक्षिक नेतृत्व " को आवश्यकताओं का संक्षेप में इस प्रकार उल्लेख किया जा सकता है ।
1. सामाजिक परिवर्तन के अनुकूल शिक्षा विकास ( Edu development according to Social change ) - समाज सदैव एकसी स्थिति में नहीं रहा करता । समाज की मान्यताओं , मूल्यों तथा धारणाओं में परिवर्तन होता रहता है । शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का साधन माना जाता है , साथ ही शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का अनुगमन भी करना पड़ता है । समाज के अनुरूप किस प्रकार की शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए तथा शिक्षा के उद्देश्य , पाठ्यक्रम , व्यवस्था , शिक्षण विधि आदि में किस प्रकार का परिवर्तन होना आवश्यक है , इन सभी बातों का ज्ञान “ शैक्षिक नेतृत्व " को संभालने वाले व्यक्तियों को हुआ करता है । विद्यालयों , महाविद्यालयों था विश्वविद्यालयों के बड़े - बड़े प्रशासकों का नेता के रूप में यही कर्त्तव्य होता है कि वे शिक्षा को समाज की आवश्यताओं के अनुरूप प्रदान करने की व्यवस्था   करें । वर्तमान युग में शिक्षा के व्यावसायीकरण , तकनीकीकरण , राष्ट्रीयकरण करने में “ शैक्षिक नेतृत्व ” की परमावश्यकता है । विद्यालयों में आवश्यक नीतियों तथा रीतियों का कार्यान्वयन शैक्षिक नेता की कर सकते हैं । इस प्रकार के परिवर्तन को विद्यालय के वातावरण में प्रधानाचार्य के सहयोग से ही अपनाया जा सकता है ।
2. सामूहिक कार्यक्रमों में समन्वय ( Coordination in group - activties ) शैक्षिक समाजों में सभी व्यक्ति एक ही स्वभाव के नहीं होते । विद्यालयों में देखा जाता है । कि कुछ अध्यापक कार्य के प्रति तल्लीन , कुछ उपयोगी तथा उन्नतिप्रद बातों का सदैव विरोध करने वाले , कुछ अर्थोपार्जन को ही अधिक महत्व देने वाले तो कुछ अध्यापक , अध्यापन कार्य के प्रति निष्ठावान् होते हैं । स्वभाव की दृष्टि से भी कुछ विनोदी , परोपकारी तथा मिष्टभाषी होते हैं तो कुछ झगड़ालू , ईर्ष्यालु तथा मितभाषी होते हैं । इस विभिन्नता के रहते हुए भी विद्यालय के सामूहिक कार्य - कलापों में सभी अध्यापकों को एक साँचे में ढालने तथा पारस्परिक एकता एवं सद्भाव को बनाये रखने के लिये किसी एक योग्य नेता की आवश्यकता होती है । विद्यालय के प्रधानाचार्य “ शैक्षिक नेतृत्व " उत्तरदायित्व को समझते हुए इस कार्य का कुशलतापूर्वक सम्पादन कर सकते है । “ शैक्षिक नेतृत्व " की यह अपूर्व विशेषता होती है कि व्यक्तियों की विरोधी विचार धाराओं के होते हुए भी उन्हें एक उद्देश्य तथा एक योजना में तल्लीन रहने के लिये प्रेरित एवं उत्साहित कर देता है ।
3. नियोजन , व्यवस्था तथा संलग्नता की सफलता ( Success in planning , organization and pursuasion ) - शिक्षा के क्षेत्र में नवीन तथा उपयोगी कार्यों के लिये योजना का निर्माण करना होता है , कार्य सफलता के लिये संगठन की आवश्यकता होती है , कार्यान्वयन में कोई व्यक्ति विरोध या उदासीनता न दिखाये , इसके लिये सजग रहना पड़ता है । वास्तव में इन कार्यों को उचित रूप में करने के लिये योग्य नेताओं की दक्षता , प्रवीणता तथा कुशलता की आवश्यकता होती है । नियोजन तथा व्यवस्था के कार्यों में सभी व्यक्तियों के सहयोग को कुशल नेता ही प्राप्त करता है । इसका प्रमुख कारण समूह के व्यक्तियों का नेता में वश्वास तथा उसके प्रति आदर की भावना होती है । विरोध व्यक्त करने वाले व्यक्तियों को नेता अपने व्यक्तित्व के प्रभाव से शीघ्र ही सहमत कर लेता है तथा कार्य संचालन के लिये सुविधा प्राप्त करता है । कुछ विद्यालय के प्रधानाचार्यों का सर्वगुण सम्पन्न व्यक्तित्व छात्रों तथा अध्यापकों के लिये अत्यन्त आदर्शमय एवं प्रभावयुक्त होता है । इस प्रकार के कार्यों के नियोजन तथा प्रशासन में पूर्णतया सफल होते हैं । शिक्षा विभाग के अन्य अधिकारियों को प्रशासनिक योजनाएं भी तभी सफल होती है जब उनमें शैक्षिक नेतृत्व की योग्यता होती है ।
4. शैक्षिक स्तर की निरन्तर उन्नति ( Continuous progress in Educational Standard ) - शिक्षा के क्षेत्र में नवीन अनुसन्धानों , उपागमों ( approaches ) तथा नई विधियों का बड़ा महत्व होता है । शैक्षिक नेता से यह आशा की जाती है कि वह अद्यतन ( uptodate ) शैक्षिक सामग्री से पूर्णतया परिचित रहे तथा अपने आश्रित व्यक्तियों को भी उनसे अवगत कराये । उत्तम शैक्षिक नेता अपने सहकर्मियों की शैक्षिक योग्यताओं की वृद्धि करने में रुचि लेता है । नेता की प्रेरणा से ही विद्यालय के अध्यापक योग्यता तथा कुशलता प्राप्त करने के लिये लालायित होते हैं । अध्यापकों का व्यक्तिगत रूप से परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की सहायता से अवकाश लेकर अनुसन्धान कार्य करना तथा सभी विषयों पर उत्तमोत्तम ग्रन्थ लेखन का कार्य करना वास्तव में शैक्षिक स्तर को ऊँचा करना है । अनुभव कुछ विद्यालय पढ़ाई उस विद्यालय के प्रधानाचार्य ( नेता ) का परिश्रम ही सर्वोपरि होता है । के आधार पर हम कह सकते हैं कि किसी क्षेत्र में किसी विद्यालय के स्थाई यश के मूल में के क्षेत्र में , कुछ खेलकूद की क्रियाओं में तो कुछ विद्यालय सांस्कृतिक क्रिया कलापों में प्रसिद्ध हो जाते हैं । वास्तव में इन विशिष्ट क्षेत्रों की ख्याति प्रधानाचार्य की विशेष प्रवृत्ति ( attitude ) पर ही अवलम्बित होती है । योग्य तथा कुशल नेता विद्यालय की सर्वागीण उन्नति पर ही अपना ध्यान आकर्षित करते है और ऐसा करने में सफल भी होते हैं । इसके अतिरिक्त शिक्षा विभाग के आदेशानुसार तथा पर्यवेक्षकों के दिये गये सुझावों के अनुसार जैसा शैक्षिक स्तर होना चाहिए उसे निर्मित करने तथा बनाये रखने के लिये योग्य शैक्षिक नेतृत्व की हो आवश्यकता होती है ।
5. सामाजिकता , सामाजिक जागरूकता तथा कार्यारम्भ की प्रवृत्ति का विकास ( Development in Socialibility , social consciousness and Initiation ) - किसी समूह के व्यक्ति पारस्परिक व्यवहारों में सामाजिकता को अपनाये अर्थात् जिन व्यवहारों को समाज में शिष्ट एवं सभ्य कहा जाता , उन्हें अपनाने का प्रयत्न करें , इसके लिये मार्ग प्रदर्शन कुशल नेतृत्व द्वारा ही किया जा सकता है । समाज के नियमों में बँधकर तथा अनुशासन का पालन करते हुए श्रेष्ठ नागरिक के गुणों को निरन्तर सीखना सामाजिक जागरूकता कहलाती है । समाज में क्या भला अथवा बुरा है , इसका भी व्यक्ति को ज्ञान होना चाहिए परन्तु व्यक्ति स्वयं ही इन सभी बातों को नहीं जान सकता । अतएव इन बातों की उचित जानकारी प्राप्त करने के लिये किसी योग्य नेता की आवश्यकता का अनुभव करता है । इसके अतिरिक्त सभी व्यक्तियों में यद्यपि कार्य करने की शक्ति होती है और समय तथा अवसर मिलने पर वे उसका • परिचय भी देते हैं परन्तु किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने की अथवा स्वोयक्रम , उनमें योग्यता और हिम्मत नहीं होती । कार्य में पहल करने तथा अन्य व्यक्तियों को लक्ष्य प्राप्ति में जुटाने की अद्भुत योग्यता नेता में ही होती है । इसमें सन्देह नहीं कि यदि किसी समाज में नेतृत्व शक्ति द्वारा कार्यारम्भ में पहल नहीं की जाती तो वह समाज शक्ति रखते हुए भी सुप्त तथा मृतप्राय हो जाता है । सैनिकों में पराक्रम का अभाव कभी नहीं होता परन्तु अपने नेता , द्वारा कार्यारम्भ करते ही तथा नेता का संकेत मिलेत ही सैनिकों में अद्भुत शक्ति का संचार होने लगता है । एक अन्य सरल उदाहरण से इस बात को और भी अधिक स्पष्ट रूप में समझा जा सकता है । एक विद्यालय के अध्यापक पारस्परिक सद्भावनाओं में वृद्धि करने के लिये विद्यालय के अन्दर किसी गोष्ठी अथवा क्लब की स्थापना करना चाहते हैं , छात्रों तथा अध्यापकों की सुविधा के लिये किसी सहकारी समिति का निर्माण करना चाहते हैं । तथा छात्रों में नैतिकता की भावना को जागृत करने के लिये अनेक योजनाएँ भी बनाते हैं इन कार्यों का संचालन करने के लिये वे अनेक बार विचार - विमर्श करते हैं परन्तु उनका कार्यान्वयन वे तब तक नहीं कर पाते जब तक कोई वरिष्ठ अध्यापक अथवा स्वयं प्रधानाचार्या इन को करने में पहल नहीं करता । कार्यारम्भ होने के पश्चात् तो सभी व्यक्ति सक्रिय हो जाते हैं । इसमें सन्देह नहीं कि विद्यालय में सामाजिक जागरूकता तथा सामाजिकता को अपनाने के लिये शैक्षिक नेतृत्व की परमावश्यकता होती है ।